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प्राइम टाइम इंट्रो : स्कूल ऑफ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर का हाल

बनारस के संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के छात्रों के प्रदर्शन को छोड़ दें तो हर जगह छात्र भी उसी तरह के वाक्य बोलते नज़र आए जिस तरह के उनके प्रिंसिपल बोलते हैं, जिस तरह के उनके घर वाले, गोलमोल. दूसरी तरफ मुंबई यूनिवर्सटी के छात्रों के आंदोलन में ज़िद दिखी, नारे सुनाई दिए और तेवर भी.

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प्राइम टाइम इंट्रो : स्कूल ऑफ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर का हाल
यूनिवर्सिटी सीरीज़ का यह 15 वां अंक है. कॉलेज के कैंपस में ख़राब हालत के ख़िलाफ़ नारों और प्रदर्शनों से मुलाकात दिल्ली मुंबई में ही ठीक से होती है, महानगरों से बाहर के कॉलेजों में छात्र राजनीति दम तोड़ चुकी है, इस वजह से भी वहां न तो छात्रों का संघर्ष है और न ही उनकी आवाज़ में मुखरता. बहुत कम छात्र मिले जो खुलकर यूनिवर्सिटी की समस्या को सामने रख सके, उन्हें यह तो पता है कि टीचर नहीं है मगर यह कहना नहीं आया कि इससे वे किस तरह बर्बाद हो रहे हैं, जीवन में पीछे छूट रहे हैं.

बनारस के संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के छात्रों के प्रदर्शन को छोड़ दें तो हर जगह छात्र भी उसी तरह के वाक्य बोलते नज़र आए जिस तरह के उनके प्रिंसिपल बोलते हैं, जिस तरह के उनके घर वाले, गोलमोल. दूसरी तरफ मुंबई यूनिवर्सटी के छात्रों के आंदोलन में ज़िद दिखी, नारे सुनाई दिए और तेवर भी. बनारस के संपूर्णानंद संस्कृत यूनिवर्सिटी के छात्रों के प्रदर्शन में पता ही नहीं चलता है कि कर्मकांड कर रहे हैं या लोकतंत्र का कांड कर रहे हैं.

School of Planning and Architecture में छात्रों की नारेबाज़ी 26 अक्टूबर की सुबह 9 बजे से चल रही है. 26 की पूरी रात वे कैंपस में बाहर ही नारेबाज़ी करते रहे. जिन मांगों को लेकर प्रदर्शन कर रहे थे, उन्हें देखकर दिल्ली से बाहर के छात्र यही सोच रहे होंगे कि इनसे ज़्यादा समस्या तो हमारे यहां हैं मगर हम लोग तो एडजस्ट कर गए हैं, ये क्यों हाय हाय कर रहे हैं. दरअसल, लगता है हमारे राजनीतिक और सामाजिक संस्कार से बोलना चला गया है. अब हम फेसबुक पर ही बोलने को बोलना समझते हैं, अथॉरिटी या प्रशासन के सामने कुछ ज़्यादा ही चुप रहने लगे हैं.

एसपीए के इस आंदोलन की वजह है यह आग. 26 अक्टूबर की सुबह 5 बजे के करीब कैंपस के गर्ल्स हॉस्टल में शॉट सर्किट से आग लग गई. जिस वक्त आग लगी, उस वक्त कमरे में कोई लड़की नहीं थी. आग के कारण कमरे का सारा सामान जल कर राख हो गया. इस कमरे में रहने वाली दो लड़कियां इराक की हैं जिनका पासपोर्ट भी जल गया है. इनका कहना है कि छह लाख तक के सामान जल गए. पंखा टूट कर नीचे आ गिरा. गनीमत है कि उस वक्त कमरे में कोई नहीं था, वरना अगर तीनों लड़कियां यहां होती तो कुछ भी हो सकता था. आग की इस घटना ने हॉस्टल की सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोल दी. गार्ड को आग बुझाने के सिलेंडर का इस्तेमाल करना नहीं आता था और छात्राओं को भी ट्रेनिंग नहीं दी गई थी कि आग लगने पर क्या करना है.

1941 में बना था एसपीए. यह देश का सबसे पुराना और प्रतिष्ठित संस्थान है जहां प्लानिंग और आर्किटेक्ट की पढ़ाई होती है. इस कॉलेज की स्थापना इसलिए की गई थी कि यहां से निकलने वाले छात्र गांव, शहर और अन्य क्षेत्रों में प्लानिंग करने में मदद करेंगे. कस्बों की प्लानिंग का हाल देखकर आप निश्चिंत हो सकते हैं कि भारत में कभी किसी ने आर्किटेक्ट और प्लानिंग की कभी पढ़ाई ही नहीं की है. 2015 में संसद द्वारा कानून पास कर इसे राष्ट्रीय महत्व के संस्थान के रूप में घोषित किया गया. राष्ट्रीय महत्व के इस संस्थान के छात्र आंदोलन के महत्व को भी समझते हैं. लोकतंत्र में अगर आपने धरना या प्रदर्शन नहीं दिया, या शामिल नहीं हुए, यकीकनन आपने लोकतंत्र जीया ही नहीं.

हाथ में बैनर लेकर चलना लोकतंत्र का सबसे ख़ूबसूरत दृश्य है. ऐसे दृश्यों के बग़ैर न तो आप नागरिक बनते हैं और न मनुष्य. बैनर पर लिखे ये शब्द सिर्फ नारे नहीं हैं बल्कि कविता हैं. इसे उठा कर जब आप क्लास रूम से निकल कर कॉलेज के कैंपस के किसी आंगन में जमा होने पहुंच रहे होते हैं तब आप अपने भीतर के भय से आज़ाद हो रहे होते हैं और बोलने का फर्ज़ अदा करने की तैयारी कर चुके होते हैं. बोलना ख़ुद को बेहतर करना है. एसपीए के ये छात्र आग की सुरक्षा को लेकर यहां जमा हो चुके हैं. समूह की यह ताकत ही है जो प्रशासन को विनम्र बनाती है. पहले दिन अनदेखा करने के बाद दूसरे दिन जब आंदोलन चला तो कॉलेज के डीन हाज़िर हो गए. छात्र डीन से सवाल जवाब करने लगे हैं. सवाल ही नहीं किया तो आपने जीवन क्या जीया.

एसपीए डिम्ड यूनिवर्सिटी है. 1200 छात्र पढ़ते हैं. फिर भी यहां के हॉस्टल की समस्याओं की सूची काफी लंबी है. एक छात्र ने बताया कि हॉस्टल में पानी साफ नहीं आता है जिसकी वजह से छात्र बाहर से पानी की बोतल ख़रीदते हैं. एक छात्र पानी पर हज़ार से पंद्रह सौ रुपये ख़र्च करता है. सीलिंग टूट कर गिरती रहती है. छात्र बताते हैं कि यहां सांप भी आते हैं. बंदर और चूहे तो आते जाते ही रहते हैं.

आंदोलन करने वाले छात्रों ने कॉलेज का पूरा बजट छान मारा है. बकायदा नोटिस बोर्ड पर लगा दिया है. यह संस्थान प्राथमिकता सूची में होने के बाद भी बजट की कटौती का सामना कर रहा है. 2013-14 में एसपीए का बजट प्रावधान था 45 करोड़ मगर मिला 28 करोड़. 2014-15 में एसपीए का बजट प्रावधान था 46 करोड़ मगर मिला 30 करोड़. 2015-16 में एसपीए का बजट प्रावधान था 40 करोड़ मगर मिला 26 करोड़.

आप देख रहे हैं कि किस तरह बजट कम मिल रहा है. इसका असर यहां की बुनियादी सुविधाओं पर पड़ रहा है. कॉलेज में डॉक्टर होना चाहिए मगर नहीं है. दवा भी उपलब्ध नहीं है. गर्ल्स हॉस्टल में एक फ्लोर पर आठ ही शौचालय हैं जबकि साठ छात्राएं रहती हैं. उनके हिसाब से यह काफी कम है.

एसपीए के छात्रों ने बताया कि सफाई का बुरा हाल है. आंदोलन के दौरान उन्होंने इस कचरे को साफ कर जमा कर दिया. छात्रों का कहना है कि कैंपस में मच्छरों का राज है जिसकी वजह से कई छात्रों को डेंगू हो चुका है. पुराने कूलर का कबाड़ यहां जमा है. वैसे आप दिल्ली के मोहल्लों में जाइये पुरानी गाड़ियां और स्कूटर कबाड़ के रूप में जमे हुए हैं. कोई हटाने वाला नहीं है. कैंपस का हाल भी कुछ ऐसा ही है.

एसपीए डीम्ड यूनिवर्सिटी है. यहां भी जितने शिक्षक होने चाहिए उतने नहीं हैं. आंकड़े बताते हैं कि मंज़ूर पदों की तुलना में कम शिक्षक हैं और शिक्षकों की संख्या कम ही होती जा रही है.

2014 में प्रोफेसर के लिए 32 पद मंज़ूर हैं, 29 प्रोफेसर थे. 2014 से लेकर 2016 तक यह संख्या 29 से कम होकर 23 पर पहुंच गई. 2014 में असोसिएट प्रोफेसर के 44 पद मंज़ूर थे मगर काम कर रहे थे 30. 2014 में 30 असोसिएट प्रोफेसर थे और 2016 में 31, यानी 13 की कमी है.

स्कूल ऑफ प्लानिंग एंड आर्किटेक्टर में भी शिक्षकों की कमी है. अब चलते हैं राजस्थान. यहां के सिस्टम में एक शब्द का इस्तमाल होता है, कार्य व्यवस्थार्थ. कार्य व्यवस्थार्थ का मतलब यह हुआ कि आप कॉलेज अ में पढ़ाते हैं और कॉलेज ब में टीचर नहीं है तो आपको तीन महीने के लिए कॉलेज ब में भेज दिया जाएगा. मगर कॉलेज अ के टीचर इतने परेशान हो गए कि कोर्ट से स्टे ले आए. तो अब नया तरीका निकाला गया है. लेक्चरर को 15 दिनों के लिए किसी दूसरे कॉलेज में भेजो. इसी सिस्टम को कार्य व्यवस्थार्थ कहते हैं. इसमें कार्य भी है, व्यवस्था भी, यथार्थ भी है और अर्थात भी है. सब मिलकर बनते हैं कार्य व्यवस्थार्थ यानी समस्या साक्षात. राजस्थान सरकार ने 21 अक्टूबर को आदेश जारी किया है. आदेश जारी करने वाली संस्था का नाम है आयुक्तालय कॉलेज शिक्षा, राजस्थान, जयपुर. इस आदेश में पूरा चार्ट बना है. बताया गया है कि किस कॉलेज से टीचर को किस कॉलेज में 15 दिन के लिए भेजा जाएगा. इस आदेश के मुताबिक शिक्षकविहीन कॉलेज में दो शिक्षक बारी बारी से 15-15 दिन के लिए भेजे जाएंगे. दोनों पर ज़िम्मेदारी होगी कि 30 दिनों के भीतर पाठ्यक्रम पूरा करने का प्रयास करेंगे. इसकी सूचना प्रिंसिपल को देने के बाद ही अपने मूल कॉलेज की तरफ प्रस्थान करेंगे.

30 दिनों में कोर्स पूरा करने के लिए 279 शिक्षकों का चयन किया गया है. क्या दो टीचर मिलकर 30 दिन में किसी भी पाठ्यक्रम को पूरा कर सकते है? भारत को विश्व गुरु बनाने का चूरन खुलेआम बेचा जा रहा है. ये आइडिया चूरन ही है क्योंकि 30 दिन में पाठ्यक्रम पूरा करने के कमाल की उम्मीद भारत के ही शिक्षकों से ही की जा सकती है. जहां से ये टीचर 15-15 दिन के लिए हटाए जाएंगे वहां तो विषय थम जाएगा. इससे राजस्थान के एक कॉलेज में एक साल में कोर्स पूरा होगा और एक साल में 30 दिन. कमाल का आइडिया है न. आप देख रहे हैं रागदरबारी, कॉलेज सरकारी और छात्र तरकारी. लेकिन इस सूची यह तो पता चल गया कि कहां कहां ज़ीरो टीचर हैं.

चौमहला राजकीय महाविद्यालय में भूगोल का कोई टीचर नहीं है. मनोहरथाना राजकीय महाविद्यालय में संस्कृत का कोई टीचर नहीं है. मनोहरथाना महाविद्यालय में समाजशास्त्र में भी कोई टीचर नहीं है. खानपुर राजकीय महाविद्यालय में इतिहास, भूगोल, समाजशास्त्र में ज़ीरो टीचर हैं.

समस्या का समाधान यही होगा कि शिक्षकों की स्थायी नियुक्ति की जाए. निर्यात करने लायक शिक्षक तैयार नहीं होते हैं तब तक आयात से ही इन खाली पदों को भरा जा सकता है. इस सूची में कई शहरों के नाम हैं जिनका उच्चारण टीवी पर नहीं होता है. जैसे खेतड़ी, झाडौल, केकड़ी. यहां के राजकीय कॉलेजों के कई विषयों में ज़ीरो टीचर हैं.

इस सूची से पता चलता है कि कई कॉलेजों में संस्कृत के शिक्षकों की पदस्थापना पर खासा ज़ोर दिया गया है. आख़िर संस्कृत का अपमान, नहीं सहेगा हिन्दुस्तान टाइप नारे दीवारों पर लिखने से पहले कुछ तो करके दिखाना ही होगा. 30 दिन के लिए संस्कृत के शिक्षक भेजे जा रहे हैं. जब टीचर नहीं थे तब भी संस्कृत के साथ मज़ाक हो रहा था, अब जह 30 दिन में कोर्स पूरा कराने का प्रयास करेंगे तो यह मज़ाक नहीं, लाफ्टर चैलेंज होगा. आदेश में लिखा है कि आने जाने का किराया दिया जाएगा. 15 दिन ठहरने, खाने पीने के बारे में आदेश स्पष्ट नहीं है. गेस्ट टीचर की स्थिति ठीक नहीं है. 15-15 दिनों के लिए भेजे जाने का यह आइडिया नया है क्योंकि पहले तीन तीन महीने के लिए शिक्षक भेजे जाते थे तो इसके खिलाफ शिक्षक कोर्ट चले गए और स्टे ले आए. लगता है इससे बचने के लिए 15 दिन में कोर्स पूरा करने का लाफ्टर चैलेंज आया है.

जफर मुल्तानी ने मध्य प्रदेश के आगर मालवा से गेस्ट शिक्षकों की एक समस्या की तरफ ध्यान खींचने के लिए स्टोरी भेजी है. आप जानते हैं कि मध्य प्रदेश में गेस्ट टीचर को अतिथि विद्वान कहा जाता है. इस हिसाब से वहां के परमानेंट टीचर को विद्वान समझा जाता है या नहीं, पता नहीं. अतिथि भी और विद्वान भी, सुनकर लगेगा कि ज़्यादा ख़ातिरदारी इन्हीं की होती है. मगर सबसे ज़्यादा शोषण इन्हीं का होता है. कॉलेजों में शिक्षकों को ठेके पर रखने की जो शब्दावली नामावली का प्रयोग हुआ है, उसका संकलन करेंगे तो पूरी एक किताब बन जाएगी.

यहां के शासकीय नेहरू महाविद्यालय में अतिथि विद्वान नमिता 70 किमी दूर से पढ़ाने आती है. नमिता यूनिवर्सिटी टॉपर रही हैं. कुछ दिनों पहले नमिता का यूटरस की सर्जरी हुई थी. सरकार का नियम है कि कोई भी अतिथि विद्वान लगातार सात दिनों का अवकाश नहीं ले सकता है. सात दिनों से ज़्यादा अवकाश लेगा तो कार्य मुक्त कर दिया जाएगा यानी हटा दिया जाएगा. नमिता नौकरी बचाने के लिए सर्जरी की हीलत में भी सफर करती रहीं और कॉलेज आती रही. वैसे भी जो सैलरी मिलती है वो कार के पेट्रोल पर ही ख़र्च हो जाती है.

आप सोचिए महिला अतिथि विद्वान को मां बनने पर कितनी छुट्टी मिलती होगी. हमने पता किया तो बताया गया कि अतिथि विद्वान को मैटरनिटी लीव मातृत्व अवकाश की पात्रता नहीं है. आपको शौकिंग नहीं लगा, अंग्रेज़ी में नहीं लगा तो क्या हिन्दी में हैरानी नहीं हुई. यही नहीं अतिथि विद्वान के लिए भी ज़रूरी है कि वे सेमिनार में जाएं, पेपर प्रजेंट करें मगर जब वे जाते हैं तो वेतन कट जाता है. परमानेंट टीचर जाते हैं तो उनका वेतन नहीं कटता है. आपको इसके पीछे का तर्क समझ आया.

अब आइये मुंबई यूनिवर्सिटी. इसके इतिहास में पहली बार वाइस चांसलर को बर्ख़ास्त किया गया है. इतिहास में बर्ख़ास्तगी से अपना नाम दर्ज़ कराने वाले संजय देशमुख कुछ और मामलों में इतिहास बनाते बनाते रह गए. आरटीआई कार्यकर्ता अनिल गलगली ने यह खुलासा किया है कि संजय देशमुख वीसी बनने से पहले 2015 में एलएलबी की परीक्षा में फेल हो गए थे. इसके बाद भी वे 774 कॉलेजों की यूनिवर्सिटी का वीसी बनाए गए. टाइम्स ऑफ इंडिया ने लिखा है कि वे आरएसएस के करीबी हैं. आरएसएस को संजय देशमुख से दूरी बना लेनी चाहिए क्योंकि अनिल गलगली ने खुलासा किया है कि संजय देशमुख ने अपने कार्यकाल में रिकार्ड विदेश यात्राएं की हैं.

हमारे सहयोगी सोहित मिश्र ने बताया कि उन्होंने 100 करोड़ की फिक्स डिपाज़िट तोड़ दी. यह भी पता चल रहा है कि वाइस चांसलर साहब विद्यार्थियों के पैसे से हवाई जहाज़ ख़रीदना चाहते थे. हवाई जहाज़. हमारे वाइस चांसलरों ने यूनिवर्सिटी की यूनिवर्सिटी बर्बाद कर दी मगर ये पहले होंगे जिन्होंने बर्बाद करने के बाद हवाई जहाज़ ख़रीदने का सपना देखा. अगर यह सही है तो वीसी बनाने से पहले लिखवा लेना चाहिए कि मैं नियुक्त करने वाले के राजनीतिक एजेंडे को चलाते हुए यूनिवर्सिटी को जल्द से जल्द बर्बाद कर दूंगा मगर उसके पैसे से हवाई जहाज़ नहीं खरीदूंगा. इस खबर को बताते हुए दिल धड़क रहा है. जाने क्यों लग रहा है कि ऐसा नहीं हुआ होगा मगर सोहित मिश्र ने बताया है कि संजय देशमुख ने जहाज़ उड़ाने हेतु प्राइवेट लाइसेंस के लिए अप्लाई भी किया. काश ये ख़बर ग़लत हो. हवाई जहाज़ ख़रीदने के साथ ये उड़ाना भी चाहते थे. ये हुआ न सच्चा वीसी. पायलट का ख़र्चा बचाने की सोची. अगर विपक्ष को फिक्स करने के काम से सीबीआई, ईडी. आयकर विभाग कुछ घंटे के लिए फ्री हो तो संजय देशमुख से भी मिल आना चाहिए. विपक्ष इन जांच एजेंसियों पर यही आरोप लगाता है कि उन्हीं के पीछे पड़ी हैं, किसी और के नहीं. वैसे बिग ब्रेकिंग न्यूज़ यही है कि विश्वविद्यालय में एयरक्राफ्ट ख़रीदने का प्रस्ताव पास नहीं हुआ.

इस बीच दोबारा कापी चेक कराने की मांग करने वाले छात्रों ने मैदान बदल दिया है. अब वे यूनिवर्सिटी के मैदान से निकल कर आज़ाद मैदान आ गए हैं. दोबारा परीक्षा की फीस वृद्धि से नाराज़ हैं. 500 रुपये की फीस को बढ़ाकर 1050 रुपये कर दिए गए हैं. सोचिए संजय देशमुख ने जहाज़ ख़रीद लिया होता तो ग़ज़ब हो जाता. बच्चे बैनर लेकर मुंबई की सड़कों पर दौड़ते रहते और वीसी समंदर के ऊपर जहाज़ उड़ाते हुए हंसते रहते. याहू याहू करते रहे.

छात्र तो फिर भी प्रदर्शन कर लेते हैं. संविदा पर, ठेके पर, अंशकालिक पढ़ाने वाले टीचर तो प्रदर्शन भी नहीं कर सकते हैं. न्यूनतम मज़दूरी से भी कम पर पढ़ा रहे हैं, बीमार होते हैं तो छुट्टी नहीं मिल सकती, बुख़ार में कॉलेज जा रहे हैं, और आप हमें हंसा हंसा कर मारे जा रहे हैं कि हम विश्व गुरु बनने वाले हैं. ब्रेक ले लीजिए ब्रोकन सिस्टम का एक और नमूना दिखाऊंगा, भारत में क्रबिस्तान और श्मशान को लेकर सिर्फ सांप्रदायिक राजनीति ही नहीं हो सकती है, लोगों ने साबित कर दिया है कि वे इस मामले में घोटाला भी कर सकते हैं.


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