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प्रधानमंत्री के सहयोगी संघवाद में राज्यों की आवाज़ शामिल नहीं : नीतीश कुमार

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प्रधानमंत्री के सहयोगी संघवाद में राज्यों की आवाज़ शामिल नहीं : नीतीश कुमार
बिहार के मुख़्यमंत्री नीतीश कुमार ने एनडीटीवी के लिए ओपन एडिटोरियल में भारत के संघीय ढांचे की ज़रूरत यानी सहयोगी संघवाद के विषय पर ये ख़ास आलेख लिखा है। नीतीश कुमार अपने इस आलेख में केंद्र और राज्यों के बीच संसाधनों के बंटवारे और ग़रीब राज्यों को दिए जाने वाले विशिष्ट आर्थिक मदद पर अपनी राय व्यक्त की है। पढ़ें नीतीश कुमार का ये ख़ास आलेख-  

इन दिनों जब सहयोगी संघवाद एक लोकप्रिय मंत्र होता जा रहा है, तब यह एक बड़ी विडम्बना है कि केंद्र के साथ संसाधनों के बंटवारे के अहम मामले में राज्यों की ईमानदार राय अभी तक नहीं दिखी है या उसे बहुत कम जगह दी गई है। इसकी बहुत सारी वजहें हैं।

पहली, 14वें वित्त आयोग की सिफारिशें स्वीकार करने के फौरन बाद, केंद्र सरकार इसे राज्यों की जीत घोषित करने के प्रचार अभियान में जुट गई। अगर केंद्र पर राज्यों की विजय हो गई थी तो वे जश्न क्यों नहीं मना रहे थे? ठीक है कि पलटकर यह सवाल भी पूछा जा सकता है कि अगर केंद्र के साथ नई वित्तीय व्यवस्था में राज्यों के संसाधन छिने तो उन्होंने विरोध क्यों नहीं किया? दोनों तरह से, यह दिखाई पड़ता है कि राज्यों की ईमानदार राय आनी बाकी है। ऐसी स्थिति में सहयोगी संघवाद पर कुछ बुनियादी प्रश्न उठ खड़े होते हैं।

बिहार पहला राज्य था, जिसने लगातार सवाल खड़े किए और केंद्र के साथ नीतियों पर संवाद किया। मैं यह देखकर हैरान था कि 14वें वित्तीय आयोग की सिफारिशों को स्वीकार करने के तत्काल बाद केंद्र जोर-शोर से इस प्रचार में लग गया कि करों के बंटवारे में राज्यों का हिस्सा 32 फ़ीसदी से 42 फ़ीसदी कर दिया गया है। मेरी समझ में नहीं आया कि इन फ़ैसलों के नतीजों के बारे में राज्यों को ईमानदारी से जानकारी क्यों नहीं दी गई? और ये नतीजे सिर्फ वित्तीय नहीं थे। बिहार जैसे गरीब राज्यों के लिए, जहां लाखों परिवार, बस बचे रहने के लिए कई कल्याण योजनाओं पर निर्भर हैं, कर बंटवारे में बदलावों के नतीजे सामाजिक तौर पर काफी बड़े होंगे। चूंकि केंद्र अपने फ़ैसले के नतीजों के ब्योरे लेकर नहीं आ रहा, मुझे फौरन लग गया कि कुछ गलत हो रहा है और मैंने तुरंत नई व्यवस्था के तहत बिहार को होने वाले नुकसान को लेकर केंद्र को आगाह किया। फिर मैंने तत्काल केंद्रीय वित्तमंत्री अरुण जेटली से मिलकर इसके नतीजों पर बात की और बिहार सरकार का रुख उनके सामने रखा।

बहरहाल, बिहार एक अपवाद था। कई प्रभावित राज्यों ने सवाल खड़े नहीं किए। नई बीजेपी की आलाकमान संस्कृति में, बहुत सारे नेता और मुख्यमंत्री भी किसी ऐसी नीति पर सवाल उठाना या बहस करना जोखिम-भरा मानते हैं, जिसे लेकर प्रधानमंत्री और उनकी सरकार ने एक नज़रिया अख्तियार कर रखा है। साथ ही, बिहार की प्रतिक्रिया को राजनीति के प्रिज़्म के जरिये देखना और इसे एक राजनीतिक विरोधी के विरोध या उसकी आलोचना की तरह खारिज कर देना सुविधाजनक है। बहरहाल, राज्यों की नीति, राजनीति और राय को केंद्र से अलग करके देखने की क्षमता होनी चाहिए। भारत के संघीय ढांचे के साथ ज़्यादा जीवंत और लचीला लोकतंत्र होने के लिए यह ज़रूरी है। तो इसी जज़्बे के साथ, भारत में केंद्र और राज्यों के बीच 14वें वित्त आयोग की सिफारिशों द्वारा बनी नई वितरण व्यवस्था के नतीजों को लेकर संवाद की ज़रूरत है।

मैंने प्रधानमंत्री से मिलकर उनके सामने बिहार के हित की बात रखी, लेकिन केंद्र और राज्यों के संसाधनों के बंटवारे को लेकर एक राज्य सभी राज्यों के सामूहिक नज़रिये को व्यक्त नहीं कर सकता। सहयोगी संघवाद की भावना के तहत, केंद्र सरकार को सभी राज्यों के मुख्य अधिकारियों और मुख्यमंत्रियों के साथ एक खुली बैठक करने पर विचार करना चाहिए। ऐसी बैठक में, केंद्र नए प्रावधानों के बारे में बताए, जबकि हर राज्य को संसाधनों के बंटवारे पर अपनी राय देने का अवसर मिलना चाहिए और इसे खुले दिमाग से सुना जाना चाहिए, आंका जाना चाहिए।

पुष्ट तथ्यों और आंकड़ों के साथ, बिहार सरकार ने केंद्र को फंड में खासी कमी की जानकारी दी है। 14वें वित्त आयोग की सिफारिशों, 2014-15 के आर्थिक सर्वेक्षण और 2015-16 के केंद्रीय बजट के गहन विश्लेषण से यह जाहिर हो चुका है कि जहां एक तरफ राज्यों को कर का हिस्सा बढ़ाया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ कई कल्याणकरी और महत्वपूर्ण योजनाओं में राज्यों को केंद्र सरकार द्वारा मिलने वाले बजटीय सहयोग में खासी कटौती की जा रही है। राज्य योजना के रूप में नियत कई योजनाएं रद्द कर दी गई हैं और केंद्रीय मदद से चलने वाली ज़्यादातर योजनाओं का पैसा कम कर दिया गया है।

बिहार की सामाजिक-आर्थिक चुनौतियां बेहद विशिष्ट हैं, जिनसे पर्याप्त संसाधनों के बिना नहीं निबटा जा सकता। फिर, राज्य को नई व्यवस्था के हिसाब से काफी नुकसान होगा। 14वें वित्त आयोग की सिफारिशों के आधार पर, बिहार को टैक्स बंटवारे का सिर्फ 9.665 फ़ीसदी हिस्सा मिलेगा, जबकि 13वें वित्त आयोग में राज्य के लिए 10.9 फ़ीसदी हिस्सा तय था। प्राथमिक अनुमानों के हिसाब से, अगर केंद्रीय करों में हिस्सेदारी और विभिन्न योजनाओं में कटौती को देखा जाए तो 2015-16 में ही, बिहार को 10,000 करोड़ से ज़्यादा बड़ी रकम से हाथ धोना पड़ेगा। इसकी वजह से राज्य बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं, कौशल विकास और आधारभूत ढांचा और काफी कुछ और देने से लाचार हो जाएगा।

बिहार के लिए विशेष योजना के तहत आवंटित 8,200 करोड़ रुपये रिलीज़ कराने में भी बिहार को अनिश्चितता का सामना करना पड़ रहा है। केंद्र सरकार ने योजना आयोग और पिछड़ा क्षेत्र अनुदान फंड जैसे दूसरे चैनल बंद करके हालात और ख़राब कर दिए हैं। केंद्र सरकार ने 14वें वित्तीय आयोग का यह सुझाव नहीं माना है कि 'जिस हद तक कुछ राज्यों में फार्मूला आधारित फंड ट्रांसफ़र वहां की ज़रूरतों के लिए काफी न होते हों, उन्हें उचित ढंग से एक निश्चित आधार पर अनुदान-सहायता के सहारे पूरा किया जाना चाहिए...' बजट भाषण में, वित्तमंत्री द्वारा आंध्र प्रदेश की तर्ज पर पश्चिम बंगाल और बिहार के लिए विशेष सहायता की घोषणा पर भी कोई फलप्रद कार्रवाई नहीं हुई है।

जवाब राजनीति नहीं, नीति है। ऐसे समय में, जब बहुत सरल अध्ययन से भी पता चलता है कि केंद्र सरकार ने बिहार को संसाधनों में कड़ी और न समझ में आने वाली कटौती के जरिये अपाहिज बना डाला है, बीजेपी की राजनीति बिल्कुल अलग स्तर पर चल रही है। बीजेपी प्रचार कर रही है कि एक साल से भी कम समय में केंद्र सरकार ने राज्य पर एक लाख करोड़ से ज़्यादा की मेहरबानी बरसाई है। अर्द्धसत्यों की ऐसी पैकेजिंग बिहार की जनता के साथ एक क्रूर मज़ाक है।

सहयोगी संघवाद का वह मॉडल क्या है, जिसकी बीजेपी सरकार परिकल्पना करती है? इस परिकल्पना में राज्यों की अकेली और सामूहिक आवाज़ें कहां हैं? जब योजना आयोग को विघटित किया गया, राज्यों की सामूहिक आवाज़ अनसुनी रह गई। यह वह मंच था, जहां संसाधन, ज्ञान और संयोजन से जुड़ा केंद्र और राज्य का संवाद संभव होता था। अब तक किसी संस्था या प्रक्रिया से यह जगह भरी नहीं जा सकी है। चौदहवें वित्त आयोग द्वारा शुरू की गई नई संसाधन-बंटवारे की व्यवस्था के संदर्भ में यह कहानी फिर दोहराई जा रही है। एक बार फिर नीति निर्धारण में राज्यों की आवाज़ अनसुनी रह जा रही है। इसकी जगह जो दिखाई पड़ रहा है, वह केंद्र का व्यापक जनसंपर्क अभियान है और नीति की इकतरफ़ा दास्तान की पैकेजिंग है।

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क्या सहयोगी संघवाद के नारे के साथ ऐसे अंतर्विरोध चल सकते हैं? मुझे नहीं लगता। राज्यों की आवाज़ और बिहार के हक़ में, मैं लगातार संवाद करता रहूंगा, एक रुख अख्तियार करूंगा और कार्रवाई की मांग करूंगा, ताकि केंद्र यह न भूले कि भले ही ताकत उसके पास हो, भारत की जनता राज्यों में रहती है और जनता के हित सर्वोच्च हैं।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति एनडीटीवी उत्तरदायी नहीं है। इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार एनडीटीवी के नहीं हैं, तथा एनडीटीवी उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।


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