सांप्रदायिक तूफ़ान के भंवर में दिल्ली का चुनाव

बीजेपी सांसद प्रवेश वर्मा अपने इस भाषण में कह रहे हैं कि लाखों लोग घरों में घुस कर बलात्कार करने आएंगे. नाम लिए बग़ैर शाहीन बाग से जोड़ कर बलात्कार का भय खड़ा करने की कोशिश की है. क्या वाकई दिल्ली में ऐसे हालात हैं. क्या यह महिला मतदाताओं का अपमान नहीं है कि उन्हें बलात्कार का सांप्रदायिक भय दिखाकर फैसला लेने के लिए कहा जा रहा है.

नई दिल्ली:

दिल्ली का चुनाव सांप्रदायिक मुद्दों के हाईवे पर पहुंच गया है. विकास पर चुनाव लड़े जाने का भ्रम पूरी तरह दरक गया है. प्रेस कांफ्रेंस और भाषणों में औपचारिकता के लिए सड़क और स्कूल के सवाल उठ रहे हैं लेकिन माहौल बनाने के लिए काम आ रहा है, पाकिस्तान, शाहीन बाग़, गद्दार, गोली मारो और वो लोग. जिस तरह से दो दिनों में इन बातों को लेकर हमले तेज़ हुए हैं, उसमें गति इतनी थी कि ज़ुबान फिसलने की बजाए उन्हीं रणनीतियों की भाषा बोलने लगी है जिन्हें अगले दो हफ्तों के लिए बनाया गया है. चुनाव आयोग ने केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर और बीजेपी के सांसद प्रवेश वर्मा को नोटिस देकर जवाब मांगा. क्या नोटिस नोटिस में ही चुनाव बीत जाएगा या आयोग सख्ती से फैसला लेगा? आयोग की भी परीक्षा हो रही है. बजट के बाद प्रधानमंत्री भी दिल्ली में रैली करेंगे. क्या उनके साथ मंच पर ये दोनों नेता भी होंगे? अभी तक प्रधानमंत्री या बीजेपी के अध्यक्ष या गृहमंत्री ने दोनों के बयान की निंदा नहीं की है. मीडिया ने अनुराग ठाकुर के गोली मारने के नारे को ठंडे बस्ते में डाल दिया है. उसे टीवी पर खेलने के लिए एक नया खलनायक मिल गया है. जिसके बारे में आगे बात करूंगा. बीजेपी सांसद प्रवेश वर्मा के बयान ने सांप्रदायिक बातों की तो सारी हदें तोड़ दी. कपड़ों से पहचानने के प्रधानमंत्री के बयान के बाद प्रवेश वर्मा का यह बयान उसी की दिशा में अगली कड़ी है.

बीजेपी सांसद प्रवेश वर्मा अपने इस भाषण में कह रहे हैं कि लाखों लोग घरों में घुस कर बलात्कार करने आएंगे. नाम लिए बग़ैर शाहीन बाग से जोड़ कर बलात्कार का भय खड़ा करने की कोशिश की है. क्या वाकई दिल्ली में ऐसे हालात हैं. क्या यह महिला मतदाताओं का अपमान नहीं है कि उन्हें बलात्कार का सांप्रदायिक भय दिखाकर फैसला लेने के लिए कहा जा रहा है.

सुप्रीम कोर्ट का डेटा है कि 2019 में जनवरी से जून के बीच बच्चों खासकर लड़कियों के खिलाफ 24000 से अधिक बलात्कार के मामले दर्ज हुए थे. 2018 में भारत में 33,977 बलात्कार के केस दर्ज हुए हैं. क्या किसी केस में प्रधानमंत्री और अमित शाह बचाते हुए देखे गए हैं? राष्ट्रीय अपराध शाखा ब्यूरो के रिकार्ड के अनुसार 2018 में दिल्ली में बलात्कार के 1217 मामले दर्ज हुए थे. दिल्ली पुलिस गृहमंत्रालय के तहत आती है. क्या यह बात प्रवेश वर्मा को मालूम है. यूपी में बीजेपी का शासन है. 2018 में यूपी में बलात्कार के 4322 मामले दर्ज हुए हैं. सिर्फ यूपी की बात नहीं है. मध्य प्रदेश और राजस्थान में भी 4000 से अधिक मामले दर्ज हुए हैं. बलात्कार हमारे समाज का घृणित पक्ष है. लेकिन इसे एक चुनाव में समुदाय या किसी प्रदर्शन में आने वाले लोगों से जोड़ना क्या सही है? यही नहीं प्रवेश वर्मा एक दूसरे भाषण में और आगे बढ़ जाते हैं. एलान करते हैं कि बीजेपी की सरकार आई तो एक महीने के भीतर सरकारी ज़मीनों पर बनी मस्जिदें तोड़ दी जाएंगी.

क्या यह धार्मिक भावनाओं को भड़काने का मामला नहीं है. जब हमारी सहयोगी अंजिली इस्टवाल ने प्रवेश वर्मा से सवाल किया तो प्रवेश वर्मा इधर उधर की बात करने लगे. कश्मीरी पंडितों के साथ हुए अन्याय का सहारा लेने लगे. प्रवेश वर्मा कहते हैं कि शाहीन बाग में जिहाद के नारे लगते हैं. जिहाद के नारे के वीडियो कहां हैं? शाहीन बाग के मंच से बार बार कहने के वीडियो हैं कि यहां से धार्मिक नारे नहीं लगेंगे. देश विरोधी नारे नहीं लगेंगे. क्या चुनाव आयोग यह कहता है कि कोई जिहाद के नारे लगाए तो आप धार्मिक उन्माद के नारे लगा सकते हैं? मस्जिद तोड़ने के नारे लगा सकते हैं? प्रदर्शन से जुड़े लोगों को इस तरह से पेश करेंगे कि वो घरों में घुस कर बेटियों को उठा ले जाएंगे. मार देंगे. बलात्कार करेंगे. अनुराग ठाकुर ने सफाई के नाम पर इतना ही कहा कि पूरा वीडियो देखें.

क्या अनुराग ठाकुर यह कह रहे हैं कि दिल्ली की जनता का गोली मारने का मूड है? अगर जनता में गुस्सा है तो उसे गोली मारने के लिए उकसाया जा सकता है? दिल्ली बीजेपी अध्यक्ष मनोज तिवारी भी कहते हैं कि गोली मारने की बात जनता कर रही है.

वैसे इस वीडियो को आप देखेंगे तो वो जनता है जो बीजेपी की टोपी पहने है. कुछ बगैर टोपी पहने हुए भी हैं. गोली मारने का आरोप सीधा-सीधा जनता पर मढ़ने की राजनीति और मंत्री को बचाने की सफाई गज़ब है. अनुराग ठाकुर और प्रवेश वर्मा दोनों ही बीजेपी के स्टार प्रचारक हैं. दोनों को चुनाव आयोग ने नोटिस देकर 30 जनवरी तक जवाब मांगा है. कांग्रेस के अजय मानक और सुभाष चोपड़ा ने दोनों के बयानों पर चुनाव आयोग में शिकायत दर्ज कराई है.

शाहीन बाग मुद्दा बन चुका है. पहले कहा गया कि वहां आने वाले लोगों को 500 रुपये मिलते हैं. यह आरोप चला नहीं. मज़हब का टैग लगाया गया चला नहीं. फिर शाहीन बाग से पूछा गया कि कश्मीरी पंडितों पर क्यों नही बोलते तो वहां 19 जनवरी 2020 को कश्मीरी पंडितों की हालत पर चर्चा हुई. छात्रों ने उनके साथ हुई नाइंसाफी के खिलाफ सहानुभूति जताने के लिए पोस्टर बनाए. 14 जनवरी को दिल्ली हाई कोर्ट में शाहीन बाग के प्रदर्शन को हटाने के लिए याचिका पर सुनवाई हुई थी.

हाई कोर्ट ने कहा कि धरना कहां पर हो, कैसे हो, उसे लेकर हम कोई आदेश नहीं दे सकते हैं. ज़मीनी हकीकत को देखते हुए पुलिस को अपने विवेक का इस्तमाल करना चाहिए क्योंकि ज़मीन पर स्थिति हर वक्त बदलते रहती है. कोर्ट ने पुलिस को बल की जगह बातचीत का सहारा लेने के लिए कहा था. बातचीत के नाम पर दिल्ली के उप राज्यपाल ने शाहीन बाग के धरने में शामिल कुछ लोगों से बात भी की थी मगर कोई नतीजा नहीं निकला. 2018 में सुप्रीम कोर्ट का एक आदेश है. जस्टिस ए के सिकरी और जस्टिस अशोक भूषण का जंतर मंतर को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला दिया था जो शाहीन बाग के प्रदर्शन को समझा जा सकता है. अपने फैसले में दो जजों की बेंच ने कहा था कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना लोगों का मौलिक अधिकार है. लोकतंत्र के यह अधिकार बेहद ज़रूरी है खासकर भारत के संदर्भ में और भी ज़रूरी हो जाता है जहां अगर कोई हाशिये के लोग हैं, जिन अल्पसंख्यकों का अच्छे से प्रतिनिधित्व नहीं हो पाता है, वो अपने अधिकार की दावेदारी इसी तरह से करते हैं. लोकतंत्र नागरिकों की भागीदारी पर ही निर्भर करता है. नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने ध्वनि प्रदूषण के नाम पर जंतर मंतर पर धरना प्रदर्शन पर रोक लगा दी थी. 10 जनवरी को ही सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि धारा 144 का इस्मताल ज़िम्मेदारी से होना चाहिए. सिर्फ कानून और व्यवस्था को बनाए रखने के उपाय के तौर पर ही. न कि इसका इस्तमाल लोकतांत्रिक अधिकारों के इस्तमाल को रोकने के लिए होना चाहिए.

प्रदर्शन को लेकर अदालतों के आदेश को इस बहस में भुला दिया गया है. ऐसा नहीं है कि शाहीन बाग के भीतर धरना प्रदर्शन को हटाने और जारी रखने को लेकर बहस नहीं है, हर दिन यह सवाल उठता है कि क्यों न धरने को कहीं और ले जाया जाए या एक तरफ से रास्ता खोल दिया जाए.

28 जनवरी की शाम शाहीन बाग के शामियाने में कोई पिस्तौल लेकर आ गया जिसे वहां मौजूद लोगों ने काबू में कर लिया और पुलिस को सौंप दिया. यह व्यक्ति किस मकसद से और किसके फायदे के लिए पिस्तौल लेकर गया था इसकी जांच होनी चाहिए. जहां पर पुलिस का इतना सख्त पहरा है वहां पर कोई पिस्तौल लेकर जाने और लहराने का प्रयास यूं ही नहीं करेगा. लेकिन इसी के साथ रेज़िडेंट वेलफेयर एसोसिएशन से जुड़े लोग मंच तक जाना चाहते थे कि इस प्रदर्शन को हटा लिया जाए. ताकि आने जाने का रास्ता साफ हो सके. मगर महिलाओं ने इन्हें वापस जाने के नारे लगाए.

शरजील इमाम पर आते हैं. 25 जनवरी को बीजेपी प्रवक्ता संबित पात्रा शरजील इमाम का एक छोटा सा ढाई मिनट का वीडियो ट्वीट करते हैं और वायरल हो जाता है. पहले ये धारणा बन जाती है कि यह वीडियो शाहीन बाग का है लेकिन पता चलता है कि अलीगढ़ का है. शरजील के बार में जो अभी तक जानकारी है वो बायेडेटा टाइप है. आईआईटी बांबे से कंप्यूटर साइंस की पढ़ाई की है. वहां पढ़ाया भी है. इस वक्त शरजील इमाम जेएनयू से पीएचडी कर रहा है. उसकी गतिविधियां या विचारधारा के सूत्र सार्वजनिक नहीं हैं. जब सामने आएंगे तो उस पर भी बात होगी.

शरजील ने मंगलवार को अपने ट्वीट में लिखा है कि पुलिस के सामने सरेंडर किया है. अब उसकी सुरक्षा का जिम्मा दिल्ली पुलिस के हाथ में है. शरजील की मां का बयान छपा था कि उनका बेटा चोर नहीं है जो पुलिस से भागेगा. शरजील के पिता जनता दल युनाइटेड से विधानसभा का चुनाव लड़ चुके हैं. चुनाव हार गए. उनकी अच्छी प्रतिष्ठा थी. अब इस दुनिया में नहीं हैं. शरजील के चाचा भी जेडीयू में हैं.

शुरूआत में शरजील इमाम के वीडियो को शाहीन बाग से जोड़ा गया. अलीगढ़ के वीडियो होने की बात आई तो अलीगढ़ वाला हिस्सा छोड़ दिया गया. तुरंत ही शाहीन बाग ने बयान जारी किया कि शरजील इमाम का कोई संबंध नहीं है. उनके आंदोलन में कोई एक नेता नहीं है. न ही किसी एक का भूमिका है. शाहीन बाग इसकी बातों से खुद को अलग करता है. शाहीन बाग के मंच से ये भाषण नहीं दिया गया है. लेकिन शरजील इमाम ने 2 जनवरी को अपने फेसबुक पर पोस्ट किया था कि 'राजनीतिक पार्टियों के गुंडों द्वारा हिंसा की आशंका और आंदोलन के राजनीतिकरण से बचने के लिए चक्का जाम को वापस ले लिया है. हमें आंशका थी कि पुलिस को बीच में न लाकर बीजेपी आंदोलनकारियों के साथ हिंसा करना चाहती थी. यदि ऐसा होता तो अहिंसात्म आंदोलन पर न केवल दाग लग जाएगा बल्कि लोगों का मनोबल टूट जाएगा. हम कुछ दिन बाद इस रोड को दोबारा जाम कर सकते हैं यदि हम शांतिपूर्वक हट जाएं.'

अगर ये नेता होता तो शाहीन बाग का आंदोलन खत्म हो चुका होता. क्या आपको बताया गया है कि शरजील इमाम ने शाहीन बाग के आंदोलन को अहिंसात्मक कहा है और इसके वापस लेने का एलान कर चुका है जिसे ज़ाहिर है किसी ने नहीं माना. लेकिन ढाई मिनट में शरजील के बयान को वायरल किया गया और उसके बयान को लेकर राजनीति गरमाई. पहले आप इस हिस्से को पढ़ लीजिए जिसे संबित पात्रा ने ट्वीट किया था. 'असम कट कर अलग हो जाएगा हिन्दुस्तान से तभी ये हमारी बात सुनेंगे. असम में जो मुस्लिम का हाल है वो आपको पता है. डिटेंशन सेंटर में डाले जा रहे हैं. पता चलेगा कि छह से आठ महीने में सारे बंगाली को मार दिया गया. हिन्दू हो या मुसलमान. अगर असम की मदद करनी है तो फौज के लिए असम का रास्ता बंद करना होगा. बंद कर सकते हैं.'

इस बयान को ऐसे पेश किया गया कि शरजील ने असम को भारत से काटने की बात करता है. ज़ाहिर है कोई बर्दाश्त नहीं करेगा. करना भी नही चाहिए लेकिन क्या वो ऐसा ही कह रहा है? शरजील ने इंडियन एक्सप्रेस से कहा है कि चक्का जाम की बात कर रहा था. 24 जनवरी के फेसबुक पोस्ट में लिखता है कि शाहीन बाग का मॉडल चक्का जाम का मॉडल है. 2016 में जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान दिल्ली में पानी की सप्लाई काट दी गई थी. सेना बुलानी पड़ी थी पानी की सप्लाई बहाल करने के लिए. तब भी काफी प्रतिक्रिया हुई थी कि एक शहर की सप्लाई कैसे बंद की जा सकती है लेकिन तब ऐसी बहस नहीं हुई थी कि ऐसा करने वालों में से कोई शरजील इमाम है.

क्या शरजील इस तरह की बात कर रहा है या वाकई असम को देश से काटने की बात कर रहा है, तो फिर वह अहिंसक आंदोलन की बात क्यों करता है, लेफ्ट और एबीवीपी की हिंसा से सतर्क रहने की बात क्यों करेगा? यह सब तब पता चलेगा जब आप अलीगढ़ में उसके भाषण का पूरा वीडियो सुनेंगे जो 40 मिनट का है. बहुत सारे हिस्से हैं जिनसे कोई सहमत नहीं हो सकता मगर क्या वो देश को तोड़ने वाली बातें हैं, इस पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए. वीडियो में शरजील कांग्रेस को हिन्दू पार्टी कहता है. कांग्रेस पर आए दिन नरम हिन्दुत्व का आरोप लगता रहता है. अगर यह वायरल कराया जाता तो फिर उस आरोप का क्या होता कि शाहीन बाग के पीछे कांग्रेस है. शरजील लेफ्ट पर एंटी मुस्लिम का आरोप लगाता है, जो लगता ही रहता है. लेकिन जब इस हिस्से को वायरल कराया जाता तो वो आरोप पानी हो जाता कि लेफ्ट के लोग आंदोलन को सपोर्ट कर रहे हैं. जब वह गांधी को 20वीं सदी का सबसे बड़ा फासिस्ट कहता है तो उसे क्यों नहीं वायरल कराया गया? शरजील जेएनयू के वामपंथी संगठन और एबीवीपी दोनों को हिंसक बताता है और इनके सतर्क रहने को कहता है. ज़ाहिर है ये वायरल होता तो फिर उस आरोप का क्या होता कि शाहीन बाग के पीछे जेएनयू के टुकड़े टुकड़े गैंग है. शरजील इमाम कन्हैया की भी आलोचना करता है. इस पूरे वीडियो को सुन कर लिखने वाले पत्रकार मोहम्मद असीम से सुशील महापात्र ने बात की. असीम का कहना है कि जिस वीडियो में शरजील सारे दलों की आलोचना करता है, बीजेपी और संघ के बारे में एक शब्द नहीं कहता है. प्रधानमंत्री मोदी के बारे में एक शब्द नहीं कहा है.

क्या असीम की बात सही है कि उमर खालिद और कन्हैया पुराने हो गए तो शरीजल के नाम का चेहरा बन गया. क्या शरजील पर राय बनाने से पहले उसके 40 मिनट के वीडियो सुना नहीं जाना चाहिए. उसकी बातों से तो यही लगता है कि वह अपना स्पेस बना रहा है. खुद नेता बनना चाहता है. शरजील के पुराने पोस्ट को भी देखा जाना चाहिए कि क्या वो कहीं हिंसा की बात कर रहा है? जब आप किसी को राजद्रोह के आरोप में पकड़ रहे हैं तो क्या यह तर्क संगत नहीं है कि पूरा वीडियो पब्लिक के सामने लाया जाए. अगर गलत है तो उसकी आलोचना होनी चाहिए. शरजील के बयान से न लेफ्ट सहमत होगा, न कांग्रेस सहमत होगी न गांधीवादी लेकिन उसके एक हिस्से बीजेपी उत्साहित है. शरजील हो या कोई हो, एक बात हमेशा ध्यान रखें. सांप्रदायिकता को खुराक दूसरे के घर से मिलता है. मुस्लिम सांप्रदायिकता को हिन्दुओं के घर से और हिन्दू सांप्रदायिकता को भोजन मुसलमानों के घर से मिलता है. जो खाना खराब है उसका साथ कभी मत दीजिए. फेंक दीजिए. सांप्रदायिकता खत्म हो जाएगी.

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हिलाल कहते हैं कि बीजेपी को जो चाहिए था वो शरजील इमाम के रूप में मिल गया है. इसलिए गृहमंत्री उसके बयान के ज़िक्र में अपनी तरफ से भी जोड़ देते हैं जो शरजील ने नहीं कहा है. शरजील ने असम को लेकर बयान दिया है लेकिन पाकिस्तान में मिलाने की बात नहीं कही है. असम के बगल में बांग्लादेश है. आप देखिए कि शरजील कितना काम आ रहा है और किसके काम आ रहा है.

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शरजील से कोई हमदर्दी रखने की ज़रूरत नहीं है मगर कानून की बुनियादी शर्त तो पूरी होनी चाहिए. जिस जनता में वो आतंकवादी बताया जा रहा है क्या उसके पूरे वीडियो को नहीं दिखाया जाना चाहिए या उस वीडियो की बातों को नहीं बताना चाहिए? अब मीडिया इस वीडियो को लेकर कैसे रिपोर्ट कर रहा है उसकी भाषा पर गौर कीजिए. जो मंत्री गोली मारने के नारे लगा रहे हैं उनके बारे में कहता है कि विवादित नारे हैं. शरजील के वीडियो को लेकर मीडिया कथित भी नहीं लगाता है सीधे देशद्रोही घोषित कर देता है. एक तरफ अनुराग ठाकुर भीड़ को उकसा रहे हैं दूसरी तरह शरजील को लेकर भीड़ बनाई जा रही है. जेएनयू में नकाब पहन कर गुंडे हॉस्टल में घुस गए, मारपीट की. आज तक एक भी गिरफ्तारी नहीं हुई. सिर्फ एक सवाल से टेस्ट कर लीजिए. जिन चैनलों पर शरजील इमाम को लेकर बवाल मचा है क्या वहां पूरा वीडियो दिखाया जा रहा है, क्या वहां तीन आंतकवादियों को लेकर दिल्ली आ रहे देवेंदर सिंह को लेकर सरकार से पूछा जा रहा है? आपको जवाब मिलेगा.