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बाणभट्ट के सरकारी मुलाज़िम.....

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बाणभट्ट के सरकारी मुलाज़िम.....

एक कार्यक्रम में शिरकत करते नए आईएएस अधिकारी (फाइल फोटो)

बाणभट्ट की राजा हर्ष से पहली मुलाक़ात अच्छी नहीं रही. जब द्वारपाल उसे राजा के सम्मुख प्रस्तुत करने के लिए ले गया तो राजा हर्ष की प्रतिक्रिया ऐसी थी - एष स बाण, 'यही वह बाण है?' जब तक मैं इससे प्रसन्न न हो जाऊं, मैं इसे देखना तक नहीं चाहता. 'न तावदेनमकृतप्रसाद: पश्यामि' | राजा हर्ष ने नजर फ़ेर ली. 'चक्षुष: प्रभां परिवृत्य प्रेष्ठष्य प्रष्ठतो'.....और अपने पास बैठे दूसरे सामंत से कहा - 'ये तो बड़ा दुष्ट है' ..महानयं भुजंग:

बाणभट्ट का शासकों के जीवन से यह पहला कटु साक्षात्कर था. राज-दरबारों में जगह बनाना कभी आसान नहीं रहा. बाण ने अपना यह अनुभव हर्षचरित में लिखा. हर्षवर्धन के जीवन पर केंद्रित यह गद्य रचना बाणभट्ट को भारतीय मेधा के इतिहास में एक अपूर्व स्थान देती है. आठ उच्छ्वासों (अध्यायों) में बंटा यह ग्रंथ छठी-सातवीं शताब्दी के भारत का जो चित्र रचता है, वह इससे पहले कभी किसी ने नहीं रचा. हर्षचरित : एक सांस्कृतिक अध्ययन में भारतीय इतिहास के मूर्धन्य डॉ.वासुदेव शरण अग्रवाल ने लिखा है कि 'बाण के ग्रंथ भारतीय जीवन के चलचित्र हैं.'

हर्षचरित में मौजूद ऐसे कई 'चलचित्रों' में एक चलचित्र उस 'नौकरशाही' का है जो राज्य की उत्पत्ति के आदिकालों से ही राज-दरबारों का अपरिहार्य हिस्सा रहा है. हर्षचरित के सातवें उच्छवास में बाणभट्ट ने सरकारी मुलाज़िमों पर जो लिखा है उस पर वासुदेव शरण अग्रवाल ने लिखा - 'इसके अंतर्गत बाण ने राजसेवा स्वीकार करने वाले व्यक्तियों के, उनके सुख दुख की भांति भांति की मनोवृत्तियों के, उनके द्वारा किये जाने वाले कुत्सित कर्म, काट-कपट उखाड़-पछाड़, खुशामद और चापलूसी के विषय में उदगार प्रकट किए हैं. यह प्रकरण विश्व-साहित्य में अद्वितीय है.'

'सरकारी नौकरी की निंदा में शायद ही आज तक किसी ने ऐसी पैनी बातें लिखी हो. बाण के ये अपने हृदय के उदगार हैं जो उसने हंसवेग के मुख से कहलवाए हैं. राजदरबारों की चाटुकारिता, स्वार्थ से सने हुए भृत्यों और अभिमान में डूबे राजाओं का जो दमघोंटू वातावरण उन्होंने घूम फिर के देखा था, उन्होंने उसकी खरी आलोचना अपने स्वतन्त्र व्यक्तित्व की समस्त शक्ति को समेटकर यहां की है.'

ऐसा नहीं है कि भारतीय समाज के चित्रण में सरकारी कर्मचारियों पर यह पहला विवरण है. चाणक्य के अर्थशास्त्र में 'प्रशासन' पर विस्तृत ब्यौरे उपलब्ध हैं. गुप्तचर प्रणाली से लेकर गांव स्तर तक के जटिल नौकरशाही - तंत्र का उल्लेख चाणक्य करते हैं. बाणभट्ट के विवरण चाणक्य के विवरणों से कई मायनों में अलग हैं. पहला तो यह कि चाणक्य के ब्यौरे उस समय की प्रशासनिक व्यवस्था के डिटेल्स हैं. वह शासक के लिए सुविधाजनक निर्देश हैं जिनका पालन शासक से अपेक्षित हैं. वह प्रशासनिक अधिकारियों के भ्रष्ट आचरण के जितने प्रकार के दृष्टांत और उनकी पारिभाषिक शव्दावली देते हैं, उसे देखकर लगता है कि भ्रष्टाचार कोई आज की ही परंपरा नहीं है. इस परंपरा में हम हजारों सालों से पारंगत हैं. भ्रष्टाचार की कला हमारी संस्कृति का उसी तरह से हिस्सा रही है जैसे अजन्ता एलोरा की चित्रकला. मसलन चाणक्य ने अपने अर्थशास्त्र में सरकारी धन का घोटाला करने के 40 तरीके बताए हैं जिन्हें कर्मचारी अमल में लाकर सरकारी खजाने पर हाथ साफ कर देते थे. जनता को परेशान करके की गई कमाई अवस्तार कहलाती थी. सरकारी धन का खुद के लिए इस्तेमाल उपभोग क्षय कहा जाता था. किसी की प्रोफेशनल इनकंपीटेंसी से हुआ नुकसान परिहापण कहलाता था. प्राप्त सरकारी आय को रजिस्टर में दर्ज न करना, किसी निर्धारित मद में आये पैसे को उसी जगह न लगाना अपहार कहा जाता था.

चाणक्य यथार्थ के कठोर और अप्रिय रूपों से परिचित थे. वह यह मानने को तैयार ही नहीं थे कि प्रशासनिक अधिकारी 'मछली की तरह पानी में रहते हुए भी पानी नहीं पिएगा'. वह यह कहते हुए जरूर बहुत दुखी रहे होंगे कि 'घोटालेबाजों के बजाय आकाश में उड़ने वाले पक्षियों की गतिविधियां जानना कहीं ज्यादा आसान है.'

लेकिन चाणक्य के उलट वाणभट्ट सरकारी मुलाजिमों के 'प्रशासकीय रूप' से परे जाकर उनकी रोजमर्रा की जिंदगी की तस्वीरें उकेरते हैं. बाणभट्ट के ब्यूरोक्रेट्स मानवीय अंतर्द्वंद को दर्शाते हैं. वो अच्छे भी हैं, बुरे भी, वो स्वतंत्र भी हैं, विवश भी. वह मुक्त भी हैं, दास भी. वह आततायी भी हैं, निरीह भी.

उसे स्वतंत्रता कहां? शान्ति कहां? (क्व गतस्य शांतिः) पापकर्मों का प्रायश्चित कहां? (किं प्रायश्चित), उसे सुधारने का उपाय क्या?(का प्रतिपत्तिक्रिया), उसमें पुरुषोचित अभिमान कहां? (क: पुरुषाभिमानः) उसके सुख -विलास कैसे? (किं नामानो विलासा:) वह जीवित भी कैसे?(कीदृशं जीवितं)

एक दास के रूप में दलदल में धंसा हुआ !!! (प्रबलपंकमं इव सर्वंधस्तानन्यति दारुणो दास शब्द:)...यह था बाणभट्ट का सरकारी मुलाजिम जो चमचागीरी में (नीचचाटुकरणेषु) नर-कोयल को टक्कर देता था (पुंसकोकिला काकुक्कणितेषु). चम्पी कराना कोई आज के सरकारी आदमी की ही आदत नहीं है. बाण के दौर में भी आम जनों से काम करवाने के बदले पैरों की चम्पी-मालिश कराने का रिवाज था (प्रतिपादकः पादसंवाहनासु).

बाणभट्ट उस दौर के प्रशासकों का जो आरेख बनाते हैं वह सच्चाई के इतना करीब है कि सहसा विश्वास नहीं होता! हजारों साल पहले भी इंसान की फ़ितरत, अपने वक्त से उसकी मुजाहमत कितनी सटीक और निर्दय थी! आदमी के हृदय की दुर्बलता और उसकी आधिकारिता के बीच के अ-समायोजन को बाणभट्ट इस तरह बयान करते हैं कि वह आज की ही बात लगती है. उनका मुलाज़िम 'कुलीन होते हुए भी शासक के पास जाने में अपराधी की तरह थर-थर कांपता है'. वह लालची था. (दैन्यसंकोचितहृदयावकाशस्य) बाहर से देखने पर स्मार्ट लग सकता था, पर जरूरी नहीं था कि अपने राजा को वांछित परिणाम भी दे दे. (दर्शनीयस्यआपि....इव: निस्फलजन्मनः). अपने साथ के सहकर्मी की तरक्की उसे पचती नहीं थी. (समसमुतकरषेसु निरग्निपच्यमानस्य)। ओहदा घटने के डर उसे हमेशा सालता रहता. (संतापयतो  बन्धुनविमानस्यापियागतिकस्य) गलत काम करते करते उनके हृदय का बड़प्पन तिरोहित हो जाता. पैसों के चक्कर में वह कोई भी जोखिम उठाने को तत्पर रहता. अपनी ताकत बढ़ाने के फेर में वह किसी भी हद तक जाने को तैयार था. (कुत्सितकर्मागींकरणकुपितएवोन्नतया वियुक्तस्य धनश्रद्धया क्लेशानुपार्जयत:)

बाणभट्ट ने हर्षचरित में प्रशासनिक कर्मचारियों की परवशता दर्शाने के लिए बहुत कठोर और निंदक उपमाएं प्रयोग की हैं. मसलन वह राजा के अधीन काम करने वाले अधिकारियों की अभिव्यक्ति की बंदिश और उनके व्यक्तित्व की सीमाओं के उपहासात्मक अंदाज में सामने लाते हैं - 'खाट से उठते ही प्रणाम करने का सरकारी मुलाजिम का उसी तरह स्वभाव बन जाता है मानो वह दग्धमुंड सम्प्रदाय के साधु हो' (शय्योत्थायम प्रणमतो दग्धमुंडस्य).

बाणभट्ट ने अपने दौर के सरकारी मुलाजिमों पर जो कटाक्ष किया है वह भारतीय साहित्य में ही नहीं, किसी भी युग में उस तीखेपन के साथ अन्यत्र भाषाओं में भी नहीं मिलता. हर्षचरित: एक सांस्कृतिक अध्ययन में डॉ वासुदेव शरण अग्रवाल ने लिखा है - "बाणभट्ट अत्यंत पैनी बुद्धि के व्यक्ति थे...उन्होंने निकट के राजकुल में काम करने वालों को देखा पहचाना था और उनके स्वभाव की विशेषताओं का अध्ययन किया था.'

"नौकरी करके राज-दरबार के ठाट बाट में बाण ने अपने व्यक्तित्व की स्वतंत्रता नहीं गंवाई. तटस्थ आलोचक की भांति वे राजकुलों और राजकर्मचारियों के दोषों की समीक्षा कर सके."

तंजकसी की यह शैली बाद में ग़ालिब की शायरी में है. क्या संयोग है कि ग़ालिब ने भी 'शाह के मुसाहिब के इतराने' पे फब्ती कसी थी. 'बना है शह का मुसाहिब फिर है इतराता, वरना इस शहर में ग़ालिब की आबरू क्या है.' गालिब ने अपने समकालीन शायर और बादशाह के उस्ताद जौक से चिढ़कर यह शेर कहा था. उन्हें खुद बादशाह का मुलाजिम होने से परहेज न था. उन्होंने बाद में कहा भी 'ग़ालिब बजीफ़ाख़्वार हो, दो शाह को दुआ वो दिन गए कि कहते थे नौकर नहीं हूं मैं.'

मुलाजिम होने का सबब किसी विवशता से जुड़ा हो सकता है. गालिब ने अपने ख़तों में यह कुबूल भी किया कि उनकी आधी से ज्यादा जिंदगी ना-लायकों के कसीदे पढ़ने में ज़ाया हो गई. यकीनन मुलाज़िम होने की कैफ़ियत ने उनकी सृजनात्मकता को प्रभावित किया था लेकिन वह मजबूर थे. बाणभट्ट के सरकारी मुलाज़िम भी मजबूर थे. जो अच्छे थे, जीविका कमाने की अभिलाषा में दिन रात परिश्रम करते. अपने परिवार को छोड़कर दंड सहकर भी परिजनों के लिए धनोपार्जन करते. ऐसे भी लोग कम न थे जो उसूल-पसंद थे. उनके जीवन-ध्येय उच्च थे. वो छोटे पदों पर होकर भी बड़े थे जिनके लिए आत्म-सम्मान 'त्रैलोक्य राज-भोग' से भी ऊपर था. बाणभट्ट ने उन्हें सम्मान दिया है. "न मतो नमस्तष्यत्रैलोक्क्याधिराज्योपभोगोअपि मनस्विन:"

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धर्मेंद्र सिंह भारतीय पुलिस सेवा के उत्तर प्रदेश कैडर के अधिकारी हैं...

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