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क्या मोदी सरकार ने अपनी ज़िम्मेदारियां निभाईं?

हमारे देश में अब यह संस्कृति बन गई है कि सरकार को ही सारा काम करना चाहिए. अगर आपसे कोई काम नहीं हो रहा है तो आप सरकार से सवाल करें. हमारे देश में ऐसी संस्कृति नहीं थी. कभी नहीं थी.

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क्या मोदी सरकार ने अपनी ज़िम्मेदारियां निभाईं?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (फाइल फोटो)

इन पांच सालों में काफी कुछ बदल गया. जो सबसे ज़्यादा बदला वो सवाल पूछने की व्यवस्था. इस व्यवस्था की बुनियाद जाने अनजाने में 1975 में 'दीवार' फिल्म में सलीम जावेद ने डाली थी. जब अमिताभ अपने दारोगा भाई शशि कपूर को कहते हैं कि जाओ पहले उस आदमी का साइन लेकर आओ. मेरी राय में यही लाइन अब लाइन में बदल गई है कि जाओ पहले यह पूछ कर आओ कि 70 सालों में क्यों नहीं हुआ. यह संवाद इस बात पर खत्म होता है कि उसके बाद मेरे भाई तुम जिस कागज पर कहोगे साइन कर दूंगा. लेकिन दारोगा भाई ने साफ साफ कह दिया कि दूसरों के जुर्म साबित करने से यह सच्चाई नहीं बदल सकती है कि तुम भी एक मुजरिम है. यह सच्चाई तुम्हारे और मेरे बीच एक दीवार है भाई. अच्छी बात है कि अभी तक किसी ने नहीं कहा कि स्मार्टफोन 70 साल पहले क्यों नहीं आया. एनि वे. हर दौर की कुछ पहचान होती है. इसमें एक और नगीना जोड़ा है हमारे प्रधानमंत्री मोदी ने. गुजराती में उनके भाषण के इस अंश का पहले अनुवाद पढ़ि‍ए...

हमारे देश में अब यह संस्कृति बन गई है कि सरकार को ही सारा काम करना चाहिए. अगर आपसे कोई काम नहीं हो रहा है तो आप सरकार से सवाल करें. हमारे देश में ऐसी संस्कृति नहीं थी. कभी नहीं थी. लोग धर्मशाला बनाते थे, गौ शाला बनाते थे, और पानी का परब बनाते थे. कुआं बनाते थे. ये सारे काम सरकार ने कभी नहीं किया. सामाजिक लोगों ने इनका निर्माण किया. धर्मशाला, पानी का परब, लाइब्रेरी सब लोगों ने बनाए. धीरे-धीरे जाने-अनजाने में  लोगों की ताकत दबा दी गई और राज्य सरकारों की ताकत बढ़ती गई. मैं यह कह रहा हूं कि राज्य सरकार लोकतंत्र की ज़िम्मेदारियों को पूरा करे और समुदाय समाज के कल्याण के लिए काम करते रहें. इससे समाज विकसित होता है.


सामुदायिक प्रयासों के संदर्भ में प्रधानमंत्री की बात सही है लेकिन यह बात जनरल तरीके से कह देना कि आपसे कोई काम नहीं हो रहा है तो आप सरकार से सवाल करें. सरकार का काम धर्मशाला बनाना नही है और किसी समुदाय को धर्मशाला के लिए नहीं करना चाहिए. लेकिन हज हाउस भी बनाए गए और धर्मशालाएं भी. सरकारों ने तीर्थयात्राएं कराने की योजना भी बना दी और सब चुप रहे. मगर यह कहना कि आपसे कोई काम नहीं हो रहा है तो आप सरकार से सवाल करें, थोड़ी समस्या पैदा करता है. और सवाल करने की संस्कृति हमारे देश में कब नहीं थी. प्रधानमंत्री ने कई उदाहरणों में लाइब्रेरी का ज़िक्र कर दिया तो बेशक लाइब्रेरी समाज ने भी बनाए हैं मगर सरकारों ने क्यों छोड़ दिया. लाइब्रेरी बनाना सरकार का भी काम है. दिल्ली में लाखों की संख्या में हर राज्य से छात्र आए मगर कोई बताए कि केंद्र और राज्य सरकारों ने कितनी लाइब्रेरी बनाई.

आप दिल्ली के उन इलाकों में जाइये जहां छात्र किराये के मकानों में रहते हैं. प्राइवेट लाइब्रेरी खुल गई है. छात्रों के पास पढ़ने की जगह नहीं है. 1000 रुपये किराया देकर लाइब्रेरी में पढ़ने की जगह पाते हैं. मुखर्जी नगर जाने पर छात्र छात्राओं की आम शिकायत होती है कि पढ़ने की जगह नहीं है. बहुत पैसे लगते हैं. पूरी दिल्ली में इस तरह की लाइब्रेरी खुल गई है. दिल्ली ही नहीं जयपुर और पटना तक में लाइब्रेरी एक कारोबार के तौर पर पनप चुका है मगर राज्य और केंद सरकारों की योजनाओं से पब्लिक लाइब्रेरी का नाम गायब है. बहुत से छात्र जो कॉलेज के नहीं हैं उन्हें लाइब्रेरी की ज़रूरत होती है. पिछले दिनों आपको याद होगा कि दिल्ली के नज़फगढ़ से एक लड़के ने लिखा है कि नज़फगढ़ में लाइब्रेरी नहीं होती है. वहां के छात्रों को 35 से 45 किलोमीटर की दूरी तय करनी होती है. उन्होंने बीजेपी के सांसद और आप के विधायक से संपर्क किया मगर किसी ने लाइब्रेरी नहीं बनी. जगह नहीं मिल पाई. दिल्ली जैसे शहर में लाइब्रेरी बनाने का काम सरकार का ही है. यह सवाल भी सरकार से पूछा जाना चाहिए मगर छात्रों को इतनी बुनियादी बात का पता नहीं है कि वे इसे मुद्दा बना सकें. इस शहर में सैकड़ों की संख्या में लाइब्रेरी बन गई है मगर दो दो सरकारों की राजधानी में सरकारों ने कितनी लाइब्रेरी बनाई ये सवाल पूछने की नई संस्कृति पहले नहीं थी, इसलिए अब पैदा करनी होगी. नज़फगढ़ के अभिषेक ने बताया कि वह एक तरफ से 16 किमी की यात्रा कर लाइब्रेरी जाता है. दोनों तरफ मिलाकर 32 किमी की यात्रा लाइब्रेरी के लिए करता है.

रोज़गार का सवाल उठ रहा है. प्रधानमंत्री मोदी ने एक इंटरव्यू में पकौड़ा तलने को रोज़गार कहा था. त्रिपुरा के मुख्यमंत्री बिप्लब कुमार देब ने कहा था कि बेरोज़गार युवाओं को चाहिए कि वे सरकारी नौकरी की आस छोड़ कर पान दुकान खोल लें, गाय पालना शुरू कर दें. खूब आलोचना हुई. अब मध्य प्रदेश में कमलनाथ की सरकार बनी है. कांग्रेस सरकार के पास रोज़गार को लेकर क्या नया आइडिया है. स्थानीय अखबारो में एक खबर छपी है कि मुख्य मंत्री कमलनाथ की सरकार ने युवा स्वाभिमान योजना के तहत युवाओं को बैंड बाजा बजाने का कौशल देने जा रही है.

छिंदवाड़ा मे बैंड बजाने की ट्रेनिंग के लिए एक स्कूल खोला जाएगा. बगैर किसी स्कूल के इतने अच्छे बैंड मास्टर हैं अपने देश में. जो सरकार के स्कूल कालेज से पढ़कर निकल रहे हैं उन्हें तो इन्हीं सरकारों के सलाहकार बताते हैं कि वे किसी लायक नहीं हैं. कहीं अच्छे बैंड मास्टरों को इन स्कूलो में डालकर खराब करने की तो योजना नहीं है ये.

हमें पता नहीं बैंड मास्टर कैसे बन जाते हैं मगर हर शादी में आज मेरे याद की शादी का धुन बजता है ये पता है. उन्हें स्कूल क्यों चाहिए. क्या वाकई हमारी राजनीति के पास रोज़गार को लेकर कोई ठोस जवाब नहीं है.

रोज़गार किस तरह का हो, यह एक सवाल तो है मगर रोज़गार की सरकारी परीक्षा कैसी हो, इस पर कोई भी सरकार ठोस पहल नहीं कर रही है. यूपी से लेकर असम तक के छात्र अब परेशान हो गए हैं. असम के छात्रों ने ईमेल किया है कि राज्य सरकार के पंचायती विभाग ने 20 मई 2018 को 945 वेकेंसी निकाली है. 5 मार्च 2019 को रिजल्ट निकल गया. इस बीच सीआईडी जांच हुई, जांच में धांधली की बात सामने आई. छात्रों ने और विपक्ष के नेता तरुण गोगोई ने आरोप लगाया कि बीजेपी और संघ से जुड़े लोगों का चयन किया गया है. अब मुख्यमंत्री ने एक व्यक्ति की जांच कमेटी बना दी है. मगर अहमदाबाद में एक कमाल हुआ. 3 मार्च को परीक्षा हुई, शिवरात्री की छुट्टी थी 4 मार्च को और रिज़ल्ट 5 मार्च को आ गया. डेढ़ साल की नौकरी सीरीज़ के दौरान ये चमत्कार मैंने नहीं देखा था.

संदेश अखबार की यह खबर है. टेक्निकल सुपरवाइज़र और इंस्पेक्टर के इस इम्तहान में 17,900 छात्र बैठे थे. दो दिन में परीक्षा होकर रिज़ल्ट हो जाए इसकी चर्चा हर जगह होनी चाहिए. अहमदाबाद म्यूनिसिपल कारपोरेशन ने इम्तहान लेने और रिजल्ट निकालने में नियमों की परवाह नहीं की. AMC ने रविवार को परीक्षा लेकर प्रश्न पत्र भी रख लिए, परीक्षार्थियों को आंसर की भी नहीं दिया. किसी को खबर तक नहीं हुई दो दिन में रिजल्ट आ गया. इस खबर में यह भी है कि छात्रों ने आरोप लगाए हैं कि परीक्षा के पहले ही नियुक्ति के लिए बुलावा पत्र दे दिया गया था. आरक्षित श्रेणियों के हिसाब से रिजल्ट नहीं निकाला. रिजल्ट निकालने से पहले दस्तावेज़ों की जांच के लिए बुलावा आ गया.

इन समस्याओं की नज़र से देखेंगे तो देश में कोई लहर नज़र नहीं आएगी. दिल्ली में अतिथि शिक्षकों का आंदोलन चल रहा है. उसमें दो धाराओं का संघर्ष है. एक धारा कहती है कि बगैर इम्तहान के किसी को नौकरी नहीं मिलनी चाहिए, एक धारा कहती है कि जो कई सालों से पढ़ा रहे हैं उसे मिलनी चाहिए. शिक्षकों की दो धारा के सामने बीजेपी और आम आदमी पार्टी की भी धाराएं हैं वो अलग हैं. दिल्ली से अभिषेक यादव की तरह यूपी के सोनभद्र से मोहम्मद नज़ीम ने एक वीडियो शूट किया है. कहानी त्रिवेणी एक्सप्रेस की है. हमने इस ट्रेन का डेटा खुद भी चेक किया है. अगर हमसे चूक नहीं हुई है कि 365 दिनों में यह ट्रेन 32 बार ही समय पर पहुंची है. 11 बार रद्द हुई है और 322 बार लेट रही है. औसत साढ़े पांच घंटे लेट चलती है.

शुक्रिया नज़ीम का जिन्होंने इस ट्रेन के विजुअल हमें उपलब्ध कराए. 14369 टनकपुर से सोनभद्र होते हुए सिंगरौली जाने वाली यह ट्रेन शायद ही कभी अपने समय पर चलती है. बरेली से आगे है टनकपुर. वहां से लखनऊ तक ठीक आती है मगर उसके आगे जो धीरे होती है, धीरे ही होती जाती है. यात्रियों का दावा है कि 2016 से मार्च 2019 तक यह कभी भी अपने समय पर नहीं पहुंची है. चोरी की घना आम है. शिकायत दर्ज कराने के लिए स्टेशन मास्टर शिकायत पुस्तिका नहीं देते हैं. एक्सप्रेस का रेट देकर पैसेंजर से भी बदतर हालत है. त्रिवेणी एक्सप्रेस को लेकर यात्रियों ने रेल मंत्री को खूब ट्वीट किए हैं. जिनमें रेल मंत्री को चुनौती दी गई है कि वे त्रिवेणी एक्सप्रेस को समय पर चलाकर दिखा दें. वरना त्रिवेणी एक्सप्रेस को ही बंद कर दें, इससे समय की बहुत बरबादी होती है. सिंगरौली से लखनऊ आने में यह ट्रेन हमेशा 5 घंटे की देरी से पहुंचती है. पब्लिक लाइफ की कोई कीमत नहीं है. सबसे बड़ी बात है कि अंग्रेज़ी में भी ट्वीट करने पर रेल मंत्री ने त्रिवेणी एक्सप्रेस का कुछ नहीं किया है.

अगर हम इन सवालों को सरकारों के प्रदर्शन के सामने रख दें, किसी की भी सरकार हो तो सरकारों को लगेगा कि बेकार ही हज़ारों करोड़ विज्ञापन पर फूंक दिए. पब्लिक ने त्रिवेणी एक्सप्रेस का सवाल उठाकर मज़ा खराब कर दिया. हम अक्सर सोचते हैं कि ये सब खबरें नहीं हैं बड़ी खबर तो कुछ और है. चुनाव आयोग की प्रेस कांफ्रेंस. बिलकुल है मगर उसी दिन उसी वक्त ये लोग मारे मारे न्यूज़ चैनलों को खोज रहे होते हैं उनकी ज़िंदगी दांव पर लगी है. काश किसी का ध्यान पड़ जाता. बिहार से इन दिनों माध्यमिक शिक्षा पात्रता परीक्षा पास किए शिक्षक खूब मेसेज भेजते हैं. इस सर्टिफिकेट से शिक्षकों को सरकारी नौकरी मिल जानी चाहिए थी मगर कई लोगों को नहीं मिली. 7 साल गुज़र गए और अब 31 मार्च को इनके सर्टिफिकेट की मियाद समाप्त हो जाएगी. अब तक इनमें से बहुत लोग हिन्दू मुस्लिम डिबेट में रमे थे, इन्हें दूसरों के सवाल का महत्व समझ नहीं आ रहा था. जब खुद की ज़िंदगी दांव पर लगी है तो अब ये पत्रकार खोज रहे हैं. इनमें से कई सवाल करने वाले पत्रकारों को गाली भी देते होंगे मगर इन्हें स्वतंत्र और जनता की बात करने वाले मीडिया का महत्व समझ आ रहा है.

इन सबकी परेशानी जानलेवा है. 31 मार्च को इन्हें स्टेट टीचर एलिजिबिलिटी टेस्ट STET की पात्रता समाप्त हो जाएगी. सर्टिफिकेट की मियाद समाप्त हो जाएगी. 7 साल से शिक्षक बनने का सर्टिफिकेट लेकर बैठे रहे मगर नौकरी नहीं मिली. वेकेंसी नहीं आई. इनका कहना है कि बिहार में 5700 स्कूल बिना शिक्षक के चल रहे हैं और शिक्षक बनने की इनकी पात्रता की मियाद समाप्त हो रही है. हमें सैंकड़ों की संख्या में भेजे गए इन मेसेज को डिलिट करते हुए दुख हो रहा है. कहां बड़े बड़े एंकर चुनाव का विश्लेषण कर रहे हैं और मैं टेट और नगर पालिका की नौकरी को लेकर प्रोग्राम कर रहा हूं. मगर इन मेसेजों में जो दर्द है, जो व्यथा है वो किसी एक की नहीं है. पूरे सिस्टम के उदासीन और निर्मम हो जाने की कथा है इसमें. किसके पास नहीं गए ये लोग. विधायक से मंत्री तक. ये चाहते हैं कि इनके सर्टिफिकेट के खत्म होने की मियाद बढ़ा दी जाए ताकि ये कुछ साल और नौकरी मिलने के इंतज़ार में खुद को गंवा सकें. जब तक मेसेज भेजने वाले लोग अपने सवाल को लेकर सीरीयस नहीं होंगे, इस सवाल का जवाब नहीं मिलेगा. आरा, पटना, गोपालगंज और भागलपुर से मुझे मेसेज भेज कर इंडिया पाकिस्तान का मैच देखने से समाधान नहीं होता है. इन सब मेसेज से गुज़रते हुए लगता है कि नागरिकों ने ही अपना नागरिक बोध समाप्त कर दिया है. कितना भयानक अकेलापन है. खुद ये कभी प्राइम टाइम में माध्यमिक शिक्षक की पात्रता STET से संबंधित खबर नहीं देखेंगे मगर मुझसे चाहते हैं कि मैं दिखाऊं.

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चुनावों का एलान हो चुका है. अब मुझे ऐसे मेसेज न भेजें. कोई फायदा नहीं. अधिकारी और मंत्री अब चुनाव के काम में लग गए हैं. आपकी समस्या इनके लिए पहले भी महत्वपूर्ण नहीं थी और अब तो जायज़ बहाना मिल गया है. बेरोज़गारी के सवाल पर चुनाव नहीं होगा. होता तो अभी तक सारे नेता इसी को लेकर बात कर रहे होते. चैनलों में डिबेट हो रहा होता. मैं जानता हूं कि आप तनाव में हैं. किसी का सर्टिफिकेट लैप्स हो जाए और नौकरी न मिले तनाव समझ सकता हूं. मगर आप बेरोज़गारों को एक ताबीज़ देना चाहता हूं. जब भी निराशा हो कि नौकरी नहीं मिली, अपने घर में कोई न्यूज़ चैनल लगाएं. उसके सामने सावधान मुदा में छह सेकेंड खड़े रहे. एंकर के दिखते ही तीन बार भारत माता की जय बोलें. आप अपना दर्द भूल जाएंगे. और ऐसा करने से सेना का मनोबल भी नहीं गिरेगा. वैसे आपके नेता रोज़गार पर बात क्यों नहीं कर रहे हैं. क्या आप नहीं चाहते. आज ही इंडियन एक्सप्रेस में खबर आई है कि खेती से जुड़े कामों की मज़दूरी काफी गिर गई है. जिनकी खेती है उनकी आमदनी 14 साल में सबसे कम हुई है. फिर भी मीडिया में किसान नहीं है. राजनीति को तमाशा मत बनाइये. चुनाव का समय है, इस दौरान गंभीर रहें.

दि वायर पर धीरज मिश्रा की यह रिपोर्ट गंगा के कल्याण में बहुत काम आएगी. दि वायर ने आरटीआई से पूछा है कि अक्तूबर 2016 में नेशनल गंगा काउंसिल बनी थी, उसकी अब तक कितनी बैठके हुई हैं. नेशनल गंगा काउंसिल के अध्यक्ष प्रधानमंत्री हैं. नियम के अनुसार इसकी साल में एक बार बैठक होनी चाहिए. मगर आरटीआई से सूचना मिली है कि नेशनल गंगा काउंसिल की एक भी बैठक नहीं हुई है. जबकि इसके बने हुए दो साल हो गए. इसका काम था गंगा नदी के पानी का प्रबंधन, संरक्षण करना. गंगा को लेकर चल रही परियोजनाओं की समीक्षा के लिए यह शीर्ष संस्था हैं मगर दो साल में एक भी बैठक नहीं हो सकी. गंगा हमारी संस्कृति के अलावा 2014 के बाद की राजनीति का महत्वपूर्ण अंग है और इसकी चोटी की संस्था की एक भी बैठक नहीं होती है. हम वाकई गंभीर हैं.


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