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राष्ट्रगान की गरिमा को मत गिराइए

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राष्ट्रगान की गरिमा को मत गिराइए

प्रतीकात्मक फोटो.

दादा कोंडके के बारे में सुना है? युवा पीढ़ी शायद उन्हें जानती भी नहीं है और रेट्रो जेनरेशन ने उन्हें भुला दिया है. मराठी के नामचीन फिल्म निर्माता और अभिनेता रहे हैं. मराठी में कामयाबी मिली तो राष्ट्रभाषा में भी हाथ आजमाया. उनकी 9 फिल्में सिल्वर जुबली रहीं और इसके लिए उनका नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में भी दर्ज हुआ. नाम, काम और व्यक्तित्व तीनों में कॉमेडी थी. लेकिन स्वस्थ मनोरंजन से उनका दूर तक वास्ता नहीं था. फूहड़ता और द्विअर्थी संवादों से उन्होंने शोहरत कमाई. उनकी फिल्मों को देखने के लिए आपको अव्वल दर्जे का बेगैरत होना पड़ता था. उनकी फिल्म देखना तो छोड़िए, उनकी फिल्मों का नाम जुबां पर लाने के लिए भी आपको अपनी बेशर्मी बढ़ानी पड़ती थी. खुद ही देख लीजिए उनकी फिल्मों के नाम-"अंधेरी रात में दिया तेरे हाथ में", "तेरे मेरे बीच में", "खोल दे मेरी जुबान", "आगे की सोच". डॉयलॉग सुन लीजिएगा तो आपकी शराफत पानी-पानी हो जाएगी.
 
जरा सोचिए कि दादा कोंडके की मूवी के पहले राष्ट्रगान बजाया जाता तो क्या इससे राष्ट्रगान की गरिमा नहीं गिरती! आप सनी लियोनी की फिल्म के दर्शकों को राष्ट्रगान बजाकर खड़ा करवाएंगे!
 
मुझ जैसे "देश" के "भक्तों" को ऐतराज राष्ट्रगान के लिए 52 सेकेंड खड़े होने पर नहीं है और न ही कोई परेशानी है. बात राष्ट्रगान के सम्मान की है, गरिमा की है. राष्ट्रगान राष्ट्रीय महत्व के मौके पर बजना चाहिए. सिनेमा हॉल में कोल्ड ड्रिंक और पॉप  कॉर्न थामे जनता को राष्ट्रगान से अनुशासित करना संभव नहीं जान पड़ता. ऐसे प्रयास पहले भी हो चुके हैं. 60 और 70 के दशक में सिनेमा हॉल में राष्ट्रगान बजाया जाता था. लेकिन लोग बीच में ही आते-जाते रहते थे. धीरे-धीरे यह परंपरा खत्म होती गई. हालांकि महाराष्ट्र में यह अब भी होता है.
 
राष्ट्रगान के लिए सही समय और उचित अवसर होता है. खेल के मैदान पर जब राष्ट्रगान बजता है तो अपने देश की टीम के लिए भावनाएं उबाल मारती हैं. फख़्र से सीना फूलने लगता है. मेरे ज़ेहन में आज भी 13 साल पुरानी यादें ताजी हैं. बात 2003 विश्व कप की है. सौरव गांगुली की कप्तानी में भारतीय टीम फाइनल में पहुंची थी. फाइनल मुकाबला ऑस्ट्रेलिया से था. दक्षिण अफ्रीका  के शहर जोहानिसबर्ग के वान्डरर्स स्टेडियम पर मैच शुरू होने के पहले राष्ट्रगान बजा तो खचाखच भरा हुआ स्टेडियम खुद-ब-खुद अपने पैरों पर था. जन-गण-मन की मधुर ध्वनि ने जैसे ही कानों को स्पर्श किया, हजारों लबों में स्वत: स्पंदन होने लगा. सीना गर्व से चौड़ा हुआ जा रहा था. जी, 56 इंच से भी ज्यादा! रोम-रोम में रोमांच भर आया. शरीर में कंपन और आंखों में न जाने क्यों आंसू आ गए. बात ज्यादा पुरानी नहीं है. साल 2006 में क्रिकेट सीरीज़ के दौरान हमने तो पाकिस्तान में भी अपने राष्ट्र के गान को सुना है और स्टेडियम में आए वहां के दर्शकों को खड़े होकर मान रखते हुए पाया. राष्ट्रगान और राष्ट्रीय धवज की गरिमा ही इतनी भव्य होती है कि आप स्वत: सम्मान में खड़े हो जाते हैं.
 
यकीन कीजिए, नई पीढ़ी राष्ट्र् के सम्मान को लेकर ज्यादा संजीदा है. मेरे खुद के शहजादे टेलीविजन पर भी राष्ट्रगान बजते ही सावधान की मुद्रा में खड़े हो जाते हैं. स्कूल और कॉलेज में राष्ट्रगान को नियमित कीजिए न, किसको ऐतराज होगा.

संजय किशोर एनडीटीवी के खेल विभाग में एसोसिएट एडिटर हैं...

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