यह ख़बर 13 दिसंबर, 2014 को प्रकाशित हुई थी

उमाशंकर सिंह की कलम से : धर्मांतरण रोकने के लिए कानून क्यों चाहिए, क्यों नहीं चाहिए?

उमाशंकर सिंह की कलम से : धर्मांतरण रोकने के लिए कानून क्यों चाहिए, क्यों नहीं चाहिए?

नई दिल्ली:

धर्मांतरण पर मचे शोरगुल के बीच सत्तारूढ़ पार्टी बीजेपी जोर-जोर से चिल्लाकर कह रही है कि वह धर्मांतरण रोकने लिए कानून बनाने के पक्ष में है। लेकिन कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियां, जो धर्मांतरण के मुद्दे पर सरकार को घुटने के बल देखना चाहती हैं, कानून के मुद्दे पर खामोश नजर आ रही हैं।

आइए जानने की कोशिश करते हैं कि धर्मांतरण रोकने के लिए बीजेपी को क्यों चाहिए कानून और कांग्रेस और अन्य पार्टियां क्यों हैं इस पर खामोश।

इसके लिए पहले हमें धर्मांतरण के दो स्वरूपों के बीच के फर्क को समझना पड़ेगा। एक धर्मांतरण जो आगरा में हुआ या जिसे अलीगढ़ में कराए जाने की तैयारी है और दूसरा धर्मांतरण, वो जो झारखंड या उड़ीसा जैसे राज्यों में किसी अनजान गांव में चुपचाप हो जाता है। बात सामने नहीं आती, विरोध नहीं होता और टीवी पर खबर नहीं बनती। तीखे सवाल नहीं पूछे जाते।

समझने की सुविधा के लिए हम इस लेख में आगे 'आगरा धर्मांतरण' और 'झारखंड धर्मांतरण' टर्म का प्रयोग करेंगे। यह सच्चाई है कि बहुत सारी मिशनरीज भारत में दशकों से धर्म परिवर्तन में जुटी हुईं हैं। वे ऐसे इलाकों को चुनती हैं, जहां हमारी सरकारें आजतक मूलभूत सुविधाएं सुनिश्चित नहीं कर पाईं। न रोजगार के अवसर, न बच्चों की शिक्षा, न कोई आर्थिक गारंटी और न ही सामाजिक इज्जत।

इसका फायदा उठाकर मिशनरीज यहां स्कूल खोलती हैं, रोजगार के सिम्बोलिक ही सही, अवसर पैदा करने की कोशिश करती हैं। लोगों को मिशनरीज के कामकाज में हिस्सेदार बनाती हैं। मिशनरीज सरकारी कमजोरियों से बनी स्थिति का ही नहीं, 'गर्व से कहो हम हिंदू हैं' के अहंकार में नीची जातियों के साथ हो रहे तिरस्कार का भी फायदा उठाती हैं।

वे उन लोगों में आत्मसम्मान का भाव भरती हैं, जिनके हिंदू होते हुए भी नीची जाति का बताकर मंदिरों में घुसने नहीं दिया जाता। जिन्हें भगवान की मूर्ति को नहीं छूने दिया जाता कि वे अपवित्र हो जाएंगे, उनके हाथों में वे बाइबल पकड़ाते हैं। चर्च में बुलाकर कैंडल जलवाते हैं। कुल मिलाकर मिशनरीज वाले मोहताज लोगों को मूलभूत सुविधाएं देकर धर्म परिवर्तन कराती हैं। महज राशन कार्ड का आश्वासन देकर नहीं।

सरकार किसी भी राजनीतिक पार्टी की रही हो, किसी ने अंतिम आदमी तक विकास पहुंचाने की कोशिश नहीं की। उनको शायद ठीक लगता रहा है कि उनका काम मिशनरीज कर रही हैं। इसलिए सरकारें अपने मुनाफे के प्रोजेक्ट चलाती रही हैं, मिशनरीज की गतिविधियों की तरफ से आंखे बंद किए रहीं।

बीजेपी झारखंड तरह के धर्मांतरण के खिलाफ है, इसलिए वह सख्त कानून बनाना चाहती है। कितना सीधा, सरल और आसान रास्ता होगा, एक कानून का जो किसी को धर्म परिवर्तन की इजाजत नहीं देगा। देश का 100 करोड़ का हिन्दू परिवार अक्षुण्ण रहेगा। अगर कानून नहीं बनाया, तो उन इलाकों में विकास पहुंचाने का दबाव ज्यादा पड़ेगा, जहां सुविधाओं की कमी के चलते लोग मिशनरीज की बातों में आ जाते हैं। ये दुरूह काम है। इसलिए धर्मांतरण रोकने के लिए कानून चाहिए। विकास तो होता रहेगा।

कांग्रेस या अन्य पार्टी चुप है, क्योंकि वे आगरा जैसा धर्मांतरण तो नहीं चाहती, पर झारखंड जैसे धर्मांतरण से उसे ऐतराज नहीं। आखिर इस पार्टी ने देश पर सबसे ज्यादा राज किया है और उसे आगे भी उम्मीद है कि राज करेगी।

ऐसे में कोई पार्टी ऐसा कानून क्यों बनते देखना चाहेगी, जिसके नहीं रहने से मिशनरीज की गतिविधियां जारी हैं और वह कहीं न कहीं सरकार की जिम्मेदारी उठा रही हैं। हां, पर कांग्रेस जैसी पार्टी दुविधा में भी है। ये इससे भी जाहिर होता है कि जब मैंने राजीव शुक्ला से पूछा कि वेंकैया नायडू कानून बनाने की बात कर रहें हैं, क्या कांग्रेस साथ है, तो उनका जवाब था, पहले वह ड्राफ्ट लेकर आए, पढ़ेंगे, देखेंगे फिर उस पर बात करेंगे।

मतलब फिलहाल सैद्दांतिक तौर पर भी कांग्रेस यह सहमति नहीं देना चाहती कि कानून बने। पर क्या वह यह चाहती है कि कानून बने, तो सिर्फ आगरा जैसे धर्मांतरणों के लिए? और पेंच यह भी है कि अगर कानून बन गया, तो फिर बीजेपी को राजनीतिक तौर पर निशाना साधने के लिए तरकश में कुछ तीर कम हो जाएंगे।

बीजेपी के साथ पेंच यह है कि वह झारखंड तरह का धर्मांतरण रोकना चाहती है, पर आगरा तरह के धर्मांतरण से उसे शायद उसे ऐतराज नहीं। धर्म के अफीम के इन बीजों के जरिये उसे अपनी राजनीतिक सत्ता उत्तर प्रदेश के मैदानों में भी लहलहाने का भरोसा तो है ही, साथ ही इस तरह के कामों में लगे रहने से अलग-अलग अनुषांगिक हिंदूवादी संगठनों की व्यस्तता भी रहेगी और उनकी रोजी-रोटी भी चलती रहेगी। नहीं तो पार्टी से वो कोई और काम मांगेगे। दूसरा रोजगार मांगेंगे। वे बिगड़ गए तो धर्म के सहारे राजनीति का सारा ताना-बाना बिखर सकता है। इसलिए पैदल सैनिक जो कर रहे हैं, दिल्ली की सत्ता से उसे ज़िम्मेदारी से रोकना अपने हिंदू वोटों पर असर कम करने जैसा होगा। ये सौदा सत्ता की सेहत के लिहाज से ठीक नहीं होगा।

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आगरा धर्मांतरण का एक पहलू झारखंड धर्मांतरण से इस मामले में अलग है कि यहां कथित तौर पर मुसलमानों को हिंदू बनाया गया। बीजेपी के विनय कटियार जैसे नेताओं के नजरिये से ऐतिहासिक तथ्यों को माने तो भारत में अभी जो मुसलमान हैं, उनकी पांचवीं-छठी पीढ़ी पहले के लोग हिंदू थे। मुगलों के समय में बड़े पैमाने पर धर्म परिवर्तन हुए। तो क्या उनके कहने का यह मतलब निकाला जाए कि अब क्योंकि मोदी जी की सरकार इतनी पीढ़ियां बाद आईं है, तो घर वापसी का प्रोग्राम भी अब तेजी पकड़ रहा है? तो क्या कानून इस घर वापसी को कानूनी रास्ता देने के लिए चाहिए? जवाब के लिए कानून के ड्राफ्ट तक इंतजार करना पड़ेगा। वो धर्मांतरण के मुद्दे पर बीजेपी की मंशा का दस्तावेज़ होगा।

और हां, समाजवादी पार्टी कानून के पक्ष में क्यों खड़ी होगी! मुजफ्फरनगर तो धर्मांतरण का मुद्दा नहीं था और दंगा रोकने के लिए प्रशासन के पास तमाम कानूनी अख्तियार थे। फिर भी दंगे न सिर्फ हुए, बल्कि लंबे खिंचे भी। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट और मुसलमान मिलकर अजीत सिंह को वोट किया करते थे। इस दंगे ने उनको अलग-अलग कर दिया। बेशक फायदा समाजवादी पार्टी को सीटों के तौर पर न हुआ हो, लेकिन नुकसान मुलायम के विरोधी अजीत सिंह को कितना हुआ, ये सामने आ चुका है।

तो जो पार्टी कानून पर अमल राजनीतिक जरूरत से करती या न करती हो, उसके लिए एक और कानून का क्या मतलब। मामला ऐसे ही उठता रहेगा, तो माइलेज ऐसे ही मिलता रहेगा। मुलायम ने धर्मांतरण पर संसद में बहस की मांग में जोर-शोर से हिस्सा लिया और जब बहस हुई तो मुकर गए कि आगरा में कोई धर्मांतरण की कोशिश हुई। कहा कि अखबार में छपी खबर से संसद चलेगी क्या?

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कुल मिलाकर धर्मांतरण को लेकर हर पार्टी के एजेंडे में अंतर है। पर इसे सच में रोकना है तो विकास को अंतिम आदमी तक जोड़ना होगा। मिशनरीज अपने छोटे से बजट में जब लाखों लोगों को हिंदू से ईसाई बनाने का कूव्वत रखती हैं, तो सरकार के पास उसके मुकाबले कई लाख करोड़ ज्यादा पैसा है। वह विकास का रास्ता ले, तो कानून की जरूरत नहीं पड़ेगी। जब हिंदू धर्म में ही सबकुछ मिलने लगेगा, तो 'घर वापसी' भी खुद ब खुद हो जाएगी। घर छोड़कर फिर कोई जाएगा भी नहीं। आपको प्रपंच भी नहीं करना पड़ेगा।