क्या नोटा को और अधिक प्रचारित करने की ज़रूरत है?

क्या नोटा को और अधिक प्रचारित करने की ज़रूरत है?

किसी पार्टी का कोई उम्मीदवार पसंद न हो तो आप क्या करते हैं। फिर भी वोट करते हैं या उसके ख़िलाफ नोटा का इस्तमाल करते हैं। आपकी ईवीम मशीन में NONE OF THE ABOVE, NOTA का गुलाबी बटन होता है। क्या आपने ग़लत उम्मीदवार देने के कारण किसी पार्टी के प्रति अपना विरोध जताया है। तीन साल से चुनावों में वोटिंग मशीन में नोटा का इस्तमाल हो रहा है। आम तौर पर चुनावों के दौरान मत देने के लिए तो प्रोत्साहित किया जाता है मगर नोटा का बटन दबाने के लिए कोई नहीं करता। लेकिन इसके बाद भी नोटा लोकप्रिय होता जा रहा है। हाल के विधानसभा चुनावों में पश्चिम बंगाल में 8,31,835 मतदाताओं ने नोटा का बटन दबाया है। कुल मतदान का डेढ़ प्रतिशत मतदान नोटा के ज़रिये हुआ है।

क्या नोटा शहरी क्षेत्रों में ज़्यादा लोकप्रिय हो रहा है। जब उम्मीदवार ही पसंद नहीं है और आप अपना वोट किसी विरोधी दल को नहीं देना चाहते तो आखिर किस अधिकार का इस्तमाल करेंगे। नोटा उसी का विकल्प है। प्रभात ख़बर ने लिखा है कि सबसे ज़्यादा नोटा का प्रयोग मध्य हावड़ा में हुआ। यहां 4135 मतदाताओं ने नोटा का बटन दबाया है। दक्षिण हावड़ा में 3816 मतदाताओं ने किसी भी प्रत्याशी को वोट नहीं दिया, शिवपुर में 3132 मतदाताओं ने किसी को भी मत नहीं दिया।

इतने वोटों से कोई उम्मीदवार जीत जाता है या हार जाता है। बंगाल की तरह करीब साढ़े आठ लाख मतदाताओं ने तमिलनाडु में नोटा तो नहीं दिया मगर यहां भी 5,57,888 मतदाताओं ने नोटा दबाया है। केरल में 1 लाख 7 हज़ार लोगों ने नोटा दबाया है।

कायदे से हर चुनाव के पहले नोटा का प्रचार होना चाहिए कि अगर कोई दल सही उम्मीदवार न दे तो आप वोट न करें। नोटा दबाएं। आंकड़ों से नोटा की कामबायी की बड़ी तस्वीर तो नहीं दिखती मगर नोटा अपनी जगह बनाए हुए है। लाइवमिंट अखबार में प्रशांत नंदा ने लिखा है कि बिहार विधानसभा चुनाव में नोटा को 9 लाख 47 हज़ार 276 वोट मिले जो कुल पड़े वोट का 2.5% है। भारतीय जनता पार्टी की एक सहयोगी हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा को कुल 8 लाख 64 हज़ार 856 वोट मिले थे जबकि नोटा को मिलने वाले वोटों की संख्या इससे अधिक थी। 2014 के लोकसभा चुनाव में करीब 60 लाख लोगों ने नोटा का विकल्प चुना। ये 21 पार्टियों को मिले वोटों से ज़्यादा है। और अगर 543 सीटों पर वोटिंग पर नज़र डालें तो करीब 1.1% वोटरों ने नोटा का विकल्प चुना। सबसे ज़्यादा 3% लोगों ने पुडुचेरी में नोटा का बटन दबाया।

आठ नौ साल की अदालती लड़ाई के बाद ये अधिकार आपको हासिल हुआ है। पीयूसीएल संस्था ने 2004 से इसकी लड़ाई लड़ी है। डॉक्टर विजय लक्ष्मी मोहंती रमनीत कौर ने नोटा पर एक शोध पर्चा लिखा है। 2014 के लोकसभा चुनावों में पहली बार नोटा का आगाज़ हुआ था। इन चुनावों में बिहार में 5 लाख 81 हज़ार 11 मतदाताओं ने किसी दल के उम्मीदवार को पसंद नहीं किया। गुजरात में चार लाख 54 हज़ार 880 मतदाताओं ने नोटा का बटन दबाया।
यहां तक कि वडोदरा सीट पर 18,053 मत नोटा के पड़े थे। इस सीट से भी प्रधानमंत्री मोदी उम्मीदवार थे।

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क्या नोटा को और अधिक प्रचारित करने की ज़रूरत है। कई लोगों का कहना है कि नोटा बेकार है क्योंकि इससे नतीजों पर कोई फर्क नहीं पड़ता और राजनीतिक दल नोटा को गंभीरता से नहीं लेते है। अदालत के सामने यह सवाल आया था कि अगर कोई उम्मीदवार पसंद नहीं तो अपना मत कैसे प्रकट करेंगे। इसी के अधिकार के रूप में नोटा आया था। दुनिया के 13 मुल्कों में नोटा है। हमारे पड़ीसो देश बांग्लादेश में भी है। पांच राज्यों के चुनाव में 16 लाख से अधिक मतदाताओं ने नोटा का बटन दबाया है। यानी इन्हें किसी दल का कोई भी उम्मीदवार पसंद नहीं आया है। इस बार तमिलनाडु विधानसभा चुनावों के दौरान ने एक संगठन ने नोटा के लिए खूब प्रचार किया है।

The Tamil Nadu Makkal Urimai Katchi (TMUK) नाम के नए संगठन ने 21 अप्रैल से अभियान चलाया कि भ्रष्ट नेताओं को वोट मत दो, नोटा को दो। तमुक के सदस्यों ने टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्टर को बताया था कि भ्रष्टाचार के कारण युवा मतदान नहीं करना चाहता है। लेकिन उसके मत की जगह कोई दूसरा न डाल दे इसलिए वोट करना भी ज़रूरी है। नोटा का बटन दबाने से भ्रष्ट नेताओं को सबक मिलेगा। इस संस्था का लक्ष्य था कि हर विधानसभा में जाए। काफी घुमाई फिराई की इस संस्था ने। इनका दावा था कि कई विधानसभा क्षेत्रों में नोटा के मतों की संख्या चौथे नंबर पर आएगी। तमिलनाडु में 6 लाख लोगों ने नोटा का बटन दबाया है। हमने ये तस्वीरें तमुक के फेसबुक पेज से ली है। इस पेज पर तीन हज़ार से अधिक फॉलोअर हैं। इन तस्वीरों से अंदाज़ा मिलता है कि इन लोगों ने नोटा को प्रचारित करने के लिए कितनी मेहनत की है।