यह ख़बर 01 अप्रैल, 2014 को प्रकाशित हुई थी

चुनाव डायरी : क्या भाजपा ने सचमुच राहुल-सोनिया को चुनौती दी है...?

चुनाव डायरी : क्या भाजपा ने सचमुच राहुल-सोनिया को चुनौती दी है...?

नई दिल्ली:

...आखिरकार भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने लोकसभा चुनाव 2014 के लिए अमेठी और रायबरेली संसदीय क्षेत्रों से अपने उम्मीदवारों के नामों का ऐलान कर दिया... अमेठी सीट से टीवी कलाकार और भाजपा की राज्यसभा सांसद स्मृति ईरानी कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी को चुनौती देंगी, जबकि रायबरेली सीट पर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी का मुकाबला करने के लिए अजय अग्रवाल का नाम तय किया गया है... दूसरी ओर, कांग्रेस ने अभी तक बनारस में नरेंद्र मोदी खिलाफ अपने उम्मीदवार के नाम का ऐलान नहीं किया है, जबकि पंजाब की अमृतसर सीट पर अरुण जेटली का मुकाबला करने के लिए कांग्रेस ने एक मजबूत उम्मीदवार पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह को मैदान में उतारा है...

चुनावों में शीर्ष नेताओं के खिलाफ मजबूत उम्मीदवार उतारना कोई नई बात नहीं है, और ऐसा कई बार हो चुका है... इसके पीछे यह रणनीति भी होती है कि पार्टी के सबसे बड़े नेता को उसके चुनावक्षेत्र में ही घेर दिया जाए, ताकि उसे बाकी इलाकों में चुनाव प्रचार का वक्त ही न मिल सके... कई बार ऐसा हुआ है कि शीर्ष नेता को मुंह की खानी पड़ी है और चुनाव के बाद के सारे राजनीतिक समीकरण धरे के धरे रह गए...

आपातकाल के बाद हुए लोकसभा चुनाव में राजनारायण ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को रायबरेली से ही हरा दिया था... इस तरह उन्होंने वर्ष 1971 में हुई अपनी हार का बदला भी चुका लिया था... गौरतलब है कि इसी हार के खिलाफ दायर राजनारायण की याचिका पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 12 जून, 1975 को रायबरेली से इंदिरा गांधी के निर्वाचन को अवैध ठहराते हुए उनके चुनाव लड़ने पर छह साल की पाबंदी लगा दी थी, और इसी के बाद की घटनाओं के चलते इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लगा दिया था... पिछले साल दिल्ली में अरविंद केजरीवाल ने जिस तरह से शीला दीक्षित को हराया, उससे भी राजनारायण की यादें ताज़ा हो गई थीं...

इसी तरह वर्ष 1984 के लोकसभा चुनाव में भी ग्वालियर से अटल बिहारी वाजपेयी को चुनौती देने के लिए माधवराव सिंधिया मैदान में उतरे थे... दिलचस्प बात यह थी कि कांग्रेस ने वाजपेयी के खिलाफ सिंधिया का नाम बिल्कुल आखिरी वक्त पर घोषित कर भाजपा को चकमा दिया था, और इस चुनाव में सिंधिया ने भारी मतों से वाजपेयी को हराया था और 'जायंट किलर' कहलाए, और इस जीत से पार्टी में भी सिंधिया का कद बहुत ऊंचा हो गया...

वर्ष 1999 में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को भी भाजपा ने इसी तरह घेरने की कोशिश की थी, और रातोंरात सुषमा स्वराज को कर्नाटक की बेल्लारी सीट से उतारने का फैसला किया गया था... कानोंकान किसी को इसकी खबर नहीं हुई... आजादी के बाद से कांग्रेस ने यह सीट कभी नहीं हारी थी... सुषमा ने मैदान में उतरकर कन्नड़ में चुनाव प्रचार किया, और वह सोनिया गांधी से हार गईं... मगर सिर्फ 13 दिनों के प्रचार के बूते तीन लाख 58 हज़ार वोट हासिल किए और अपनी ओर सबका ध्यान खींचा...

बहरहाल, इन पैमानों से देखा जाए तो अमेठी में राहुल के मुकाबले स्मृति ईरानी और रायबरेली में सोनिया गांधी के खिलाफ अजय अग्रवाल किसी भी सूरत में बड़े नाम नहीं कहे जा सकते... भाजपा की कोशिश रायबरेली में उमा भारती को मैदान में उतारने की थी, लेकिन उमा इसके लिए तैयार नहीं हुईं... भाजपा में उन्हें झांसी और रायबरेली दोनों सीटों से चुनाव लड़ाने पर भी विचार हुआ, लेकिन बाद में तय हुआ कि मोदी के अलावा किसी और नेता के दो सीटों और खासतौर से एक ही राज्य की दो सीटों से लड़ने से गलत संदेश जाएगा, इसलिए अजय अग्रवाल को टिकट दिया गया, जो सुप्रीम कोर्ट के वकील हैं...

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बोफोर्स, सीडब्ल्यूजी, तेलगी और ताज कॉरीडोर जैसे मामलों में अजय अग्रवाल जनहित याचिकाएं दायर कर चुके हैं, जबकि तेज़तर्रार स्मृति ईरानी पार्टी में नरेंद्र मोदी की करीबी मानी जाती हैं... टीवी सीरियल 'क्योंकि सास भी कभी बहू थी' में 'तुलसी' की भूमिका अदा करने से घर-घर में मशहूर हुईं स्मृति की लोकप्रियता को भाजपा ने पिछले लोकसभा चुनाव में भी भुनाने की कोशिश की थी, और तब उन्हें दिल्ली में चांदनी चौक में कपिल सिब्बल के खिलाफ मैदान में उतारा गया था, लेकिन स्मृति हार गईं थीं और बाद में उन्हें गुजरात से राज्यसभा में भेजा गया...

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राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भाजपा ने राहुल-सोनिया के खिलाफ भारी-भरकम उम्मीदवार नहीं उतारे हैं... शायद इस उम्मीद में कि कांग्रेस भी बनारस में ऐसा ही करे... लेकिन राजनीति वह क्षेत्र है, जहां न स्थापित धारणाएं काम करती हैं, न ही प्रचलित सिद्धांत... तरकश का अंतिम तीर विरोधी को धराशायी करने के लिए ही इस्तेमाल होता है... देखना होगा कि कांग्रेस क्या करती है...