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चुनाव डायरी : क्या है अयोध्या का मूड?

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चुनाव डायरी : क्या है अयोध्या का मूड?
नई दिल्ली: फैज़ाबाद होते हुए अयोध्या की ओर जाने वाली सड़क बेहतरीन है... अगर आप लखनऊ से अच्छा लंच करके निकले हैं तो इस बात की बड़ी संभावना है कि भगवान राम की नगरी तक पहुंचते-पहुंचते आपको झपकी आ जाए, लेकिन अयोध्या में घुसते ही आपको पर्यटक समझ कर आप पर इतने लोग टूटते हैं कि नींद खुद-ब-खुद खुल जाती है...

कस्बे का हाल जानने के लिए मैं हनुमानगढ़ी की ओर बढ़ता हूं... रास्ते में कुछ साधुओं से मुलाकात होती है जो नरेंद्र मोदी को लेकर काफी उत्साहित हैं...
'इस बार मोदी की सरकार बनेगी' मुज़फ्फरनगर से आया एक साधु हमारे कैमरे को देख कर चिल्ला कर कहता है.  
मैं उसके पास जाता हूं ..
'क्यों बाबा मोदी बनेंगे पीएम..'
'क्यों नहीं ज़रूर बनेंगे'  
'फिर बनेगा मंदिर' ...
'मंदिर भी बनेगा और देश का हाल भी ठीक होगा.'

मोदी का असर अयोध्या में साफ दिख रहा है। मैं मणि रामदास जी की छावनी का रुख करता हूं। नृत्य गोपाल दास से मिलने के लिए जो रामजन्म भूमि विवाद को लेकर पिछले कई सालों से लड़ रहे हैं।
 
नृत्य गोपाल दास तो मुझे यहां नहीं मिले, लेकिन उनके चेलों ने घेर लिया। सब बीजेपी की सत्ता वापसी की संभावना और मोदी को प्रधानमंत्री बनाने की बात करते हैं।

अयोध्या-फैज़ाबाद लोकसभा सीट में कुछ 16 लाख से अधिक वोटर हैं। सवा तीन लाख वोटर तो अयोध्या से ही हैं, जिनमें 18 हज़ार साधुओं के वोट हैं। यहां घूमिए तो हर ओर मंदिर ही दिखते हैं। हर घर में मंदिर है। कुल संख्या 40 हज़ार के पार है। इतने मंदिरों वाली अयोध्या में रामजन्म भूमि का मुद्दा पिछले 50 सालों से चल रहा है।

अयोध्या के बाज़ार में मुझे 37 साल के रवीन्द्र पांडे मिल जाते हैं। वो कहते हैं कि पिछले 10-15 सालों से मंदिर की राजनीति ठंडी पड़ गई है। शायद इसीलिए 2012 के विधानसभा चुनावों में सात बार से लगातार जीत रहे बीजेपी विधायक लल्लू सिंह हार गए और पिछले 10 सालों से लोकसभा सीट भी बीजेपी के पास नहीं है।
'आप दिल्ली से आए हैं'
'हां...'
'क्या कीजिएगा.'
प्रेस वाले हैं भाई, जनता का मूड जानने की कोशिश कर रहे हैं...
हमें जाते देख पांडे जी मुस्कुराते हैं...
    
अयोध्या-फैज़ाबाद लोकसभा सीट पर वोटों का जातीय समीकरण दिलचस्प है। सवा सोलह लाख वोटरों वाली इस लोकसभा सीट पर पांच लाख से अधिक दलित हैं, तो तीन लाख से अधिक मुस्लिम। तीन लाख यादव और करीब इतने ही ब्राह्मण इस सीट पर वोट देंगे। ऐसे में समाजवादी पार्टी ने सीपीआई और बीएसपी में रह चुके मित्रसेन यादव को टिकट दिया है जो पहले भी तीन बार सांसद रह चुके हैं। बीएसपी ने विधायक जितेन्द्र सिंह को उतारा है और कांग्रेस ने अपने मौजूदा एमपी निर्मल खत्री को ही टिकट दिया है। बड़ी संभावना है कि बीजेपी अयोध्या से सात बार विधायक बन चुके लल्लू सिंह को ही टिकट दे।

अयोध्या में इस बार लड़ाई कतई आसान नहीं हैं। मोदी का असर वोटों का ध्रुवीकरण करेगा तो मुस्लिम कहां जाएगा। बीएसपी के पास या समाजवादी पार्टी के पास।

85 साल के हाशिम अंसारी 50 साल से रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद मामले में मुद्दई हैं... लोगों से उनके घर का पता पूछा... सबने ये ज़रूर बताया कि उनके घर के बाहर कुछ पुलिस वाले मिल जाएंगे...

हाशिम अंसारी का गुस्सा सारी पार्टियों के खिलाफ है। वो कहते हैं
'मुसलमान का वोट सबके चाहिए लेकिन उसे अपनाने को कोई तैयार नहीं. इतने साल बाद अदालत का फैसला आया, लेकिन मुसलमानों को क़ब्ज़ा क्यों नहीं मिलता. हमें नौकरी क्यों नहीं देते ये लोग. हमारी हालात क्यों नहीं सुधारते.'
फिर हाशिम विवाद पर लौट आते हैं.

'अयोध्या में हर रोज़ मंदिर की सुरक्षा के लिए 35 लाख रुपये खर्च हो रहा है. पता है आपको. औऱ वो विवादित इलाका है. वहां जन्मभूमि क्यों लिखा है. बाबरी मस्जिद का ज़िक्र क्यों नहीं है.'

हाशिम साहब के गुस्से से मुसलमान के मूड का पता नहीं चला. मैं फिर बाज़ार की ओर निकलता हूं। 57 साल के मौलाना जलाल अशरफ से मुलाकात होती है, मुस्लिम मतदाताओं के दिमाग में झांकने के लिए एक झरोखा खोलते हैं।

'केंद्र में तो ना समाजवादी पार्टी कुछ कर सकती है ना बहन जी कुछ कर पाएंगी. अब मुस्लिम जाएंगे कहां. वो सब बीजेपी के खिलाफ हैं तो एक ही पार्टी बची ना.'  इतना कहकर वो ज़ोर से हंसते हैं. मैं पूछता हूं – 'मौलाना जी. मुसलनाम क्या कांग्रेस को वोट देगा.'
मौलाना -  क्यों, क्यों नहीं दे सकता है. दे सकता है.
ये तो नहीं माना जा सकता कि मुस्लिम कांग्रेस की डूबती नैय्या का खेवनहार बनेगा, लेकिन इतना ज़रूर पता चल गया कि बहुत सारे मुस्लिम वोटरों ने अभी ये तय नहीं किया कि वो किसका साथ देगा। अयोध्या से निकलते हुए हम एक बार फिर रवीन्द्र पांडे की दुकान पर रुकते हैं।

पता चला सर.. क्या मूड है...
मैं पहले से अधिक उलझन में था. आप ही बताओ सर. लोगों को यहां क्या चाहिए.
वो थोड़ा सोचता है.
लोगों को सिर्फ शांति चाहिए. हमें सिर्फ शांति चाहिए. 92 में बहुत छोटे थे पर याद है कैसे बाहर से आकर कारसेवकों ने मस्जिद तोड़ी. उसके बाद मंदिर तो कभी बना नहीं सड़कें भी टूटी हैं और पानी भी नहीं आता ऐसे में हम तो यही चाहते हैं कि ये शांति ना छिने।
कोई देगा शांति, सड़क और पानी.
राम जी से उम्मीद है सर.. वो ऊपर देखकर कहता है ... और मैं माइक ऑफ कर कार में बैठ जाता हूं।

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