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परीक्षा से लेकर नतीजों तक इतनी देरी क्यों?

युवा छोटे छोटे समूह में लड़ते हुए खुद के लिए बेरोज़गार जैसे शब्द का इस्तमाल तो करता हुआ समूह है. यही कारण है कि हमारा युवा अपनी लड़ाई तो लड़ रहा है मगर उसका दायरा इतना सीमित है कि नेताओं को कोई फर्क नहीं पड़ता है.

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परीक्षा से लेकर नतीजों तक इतनी देरी क्यों?

प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर

नौकरी सीरीज़ के 19वें अंक में आपका स्वागत है. मुझे लगता था कि बेरोज़गार एक सामूहिक शब्द है. इस शब्द के इस्तेमाल से सभी बेरोज़गारों के कान खड़े हो जाते हैं. लेकिन नौकरी सीरीज़ के दौरान सैकड़ों मैसेज से गुज़रते हुए लगा कि युवा अपनी नौकरी, अपनी परीक्षा को लेकर अलग-अलग समूह में बंटे हैं. एक समूह का दूसरे समूह की बेरोज़गारी या परेशानी से कोई मतलब नहीं है. रेलवे का बेरोज़गार, बीपीएससी की परीक्षा के बेरोज़गार से अलग है और दोनों का एक दूसरे से कोई मतलब नहीं है. यही पैटर्न आप हर दो समूह के भीतर देखेंगे. यही कारण है कि संख्या में अधिक होने के बाद भी युवाओं की कोई राजनीतिक हैसियत नहीं है, न ही उनकी परीक्षाओं को चार चार साल टाल कर किसी दल या सरकार को फर्क पड़ता है. युवा छोटे छोटे समूह में लड़ते हुए खुद के लिए बेरोज़गार जैसे शब्द का इस्तमाल तो करता हुआ समूह है. यही कारण है कि हमारा युवा अपनी लड़ाई तो लड़ रहा है मगर उसका दायरा इतना सीमित है कि नेताओं को कोई फर्क नहीं पड़ता है. अभी भारत के युवाओं को चार पांच साल और घटिया परीक्षा व्यवस्था के साथ जीना ही होगा. न युवा अपनी बर्बादी के कारणों को पहचानते हैं न उनके समझदार मां बाप. हमारे युवाओं की पोलिटिकल क्वालिटी या समझ वाकई बहुत ख़राब है. मध्य प्रदेश में 18 फरवरी को राज्य सेवा एवं वन सेवा की प्रारंभिक परीक्षा हुई. चार दिन बाद आयोग ने जब अपनी वेबसाइट पर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर डाले तो छात्र हैरान रह गए. वे समझ नहीं पाए कि सवाल ही ग़लत पूछा गया है या जवाब ग़लत दिया गया है. करीब करीब 15 ऐसे प्रश्न थे जिन्हें लेकर विवाद हो गया.

मध्य प्रदेश के अख़बार इन विवादित प्रश्नों से भरे हैं. जैसे भारत छोड़ो का नारा किसने दिया था, इस सवाल के जवाब में जवाहर लाल नेहरू लिखा है जो कि ग़लत है. यूसुफ़ मेहर अली ने यह नारा दिया था. यही नहीं, अब किसी छात्र को यह बताना है कि जवाब ग़लत है तो इसके लिए उसे एक सवाल के लिए 100 रुपये की फीस भरनी होगी. इस बार 15 सवाल को लेकर विवाद है तो 1500 रुपये की फीस भरेंगे तब जाकर आप आयोग को चुनौती दे सकेंगे कि आपने जो उत्तर पेश किया है वो ग़लत है. दुनिया में ऐसी नायाब व्यवस्था आपको कहीं नहीं दिखेगी. ग़लती आयोग की है तो उसे खुद ही सुधार करने चाहिए मगर हो यह रहा है कि आयोग अपनी ग़लती बताने वाले छात्रों से 1500 रुपये मांग रहा है. ठीक वैसे है जैसे कल कोई मुख्यमंत्री कहे कि आपको मेरी ग़लती बतानी है तो आपको 1500 रुपये फीस देनी होगी. क्या आप इस व्यवस्था को तर्कसंगत मानेंगे. आयोग कह सकता है कि बड़ी संख्या में छात्र चुनौती देने लगते हैं, देने ही चाहिए जब सवाल ग़लत होंगे, जवाब ग़लत होंगे तो लाखों छात्रों को चुनौती देनी चाहिए लेकिन इसके बदले क्या उनसे फीस ली जाएगी. क्या यह सही नहीं रहता कि आयोग खुद सुधार करता और अपनी तरफ से जवाब छापता कि यही जवाब है, हमारा जवाब ग़लत नहीं है. इस परीक्षा के बाद छात्र परेशान हैं कि फीस देकर आयोग की ग़लती साबित करें या आंदोलन करें, यह सब करेंगे तो पढ़ेंगे कब. छात्रों ने ज्ञापन तैयार कर लिया है. वे मुख्यमंत्री से लेकर राज्यपाल सभी को दे रहे हैं. सचिव वगैरह को भी ज्ञापन दे रहे हैं. नई दुनिया ने लिखा है कि 2010 के साल में तो 40 सवाल बदलने पड़े थे. आठ साल बाद इतना सुधार हुआ है कि 15 सवालों पर सवाल उठ गए हैं. आप चाहें तो इसी को विकास समझ सकते हैं. ज़ाहिर है छात्रों की नींद उड़ गई है.

क्या हमें एक ईमानदार और बेहतर परीक्षा व्यवस्था नहीं चाहिए, यह क्यों हैं कि हर राज्य में युवा परेशान हैं मगर किसी राज्य में यह सवाल नहीं है. क्या युवाओं ने यह तय कर लिया है कि उनका भविष्य सिर्फ और सिर्फ हिन्दू मुस्लिम डिबेट जैसे टॉपिक से है. अगर युवा अपनी-अपनी परीक्षा को लेकर रोते रहेंगे तो उनके राज्य में कभी एक बेहतर परीक्षा व्यवस्था नहीं बनेगी. तो अपने लिए नहीं दूसरे के लिए भी बोलिए. रेलवे अप्रेंटिस के छात्र प्रदर्शन करें तो वन सेवा वाले भी उसमें जाएं और बीपीएससी के छात्र प्रदर्शन करें तो उसमें बैंकिंग परीक्षा वाले भी जाएं, वर्ना क्रांति का वो गाना रोज़ सुना कीजिए, वो जवानी जवानी नहीं, जिसकी कोई कहानी नहीं. कुछ समझ नहीं आ रहा है तो फिलहाल टीवी कम देखिए. स्लोगन में स्वर्ग नहीं होता है.

मध्य प्रदेश में नर्मदा बांध से प्रभावित ग़रीब किसानों ने जब प्रदर्शन का यह तरीका निकाला तो राज्य के युवाओं में से कम ही ने उनका साथ दिया होगा लेकिन अब जब खुद पर बीती है तो उन किसानों के प्रदर्शन का आइडिया चुराकर प्रदर्शन कर रहे हैं. मध्य प्रदेश में स्वास्थ्य विभाग में संविदा यानी एडहॉक पर काम करने वाले इन दिनों अनिश्चित कालीन हड़ताल पर हैं. वे परमानेंट किए जाने की मांग कर रहे हैं. कहते हैं वो जितना काम करते हैं, उतने ही काम को परमानेंट करने वालों को दुगना पैसा मिलता है. सिवनी ज़िले में जब इन नौजवानों को अपना तंबू तक लगाने नहीं दिया गया तो ये वाण गंगा नदी में उतर गए. सुबह साढ़े ग्यारह बजे से लेकर शाम चार बजे तक पानी में रहते हैं. जब तक सब अलग अलग समूह में लड़ेंगे नदी के बाद नाले में भी उतर जाएंगे तो भी सिस्टम को फर्क नहीं पड़ेगा. ये बेसिक बात समझनी ही पड़ेगी. चाहे आप प्राइम टाइम देखें या न देखें. ये लोग 12 से 18 साल से काम कर रहे हैं, अभी तक परमानेंट नहीं हुए हैं. योजना बंद करने और कार्यसमीक्षा के नाम पर 2000 निकाल भी दिए हए हैं. ये लोग सिवनी ज़िला अस्पताल, सिविल अस्पताल, सामुदायिक स्वास्थ्य सेवा केंद्र में नर्स हैं, फार्मासिस्ट हैं, डेटा एंट्री ऑपरेटर हैं.

उत्तराखंड से हमारे सहयोगी दिनेश मानसेरा ने बताया है कि राज्य भर में बेरोज़गारों के अलग अलग प्रकार के कई आंदोलन हो रहे हैं. जिस तरह से मुझे बेरोज़गार शब्द के बारे में ज्ञान प्राप्त हुआ उसी तरह से दिनेश मानसेरा को एक ज्ञान प्राप्त हुआ है. वह यह कि राज्य में सरकार ने कई भर्तियों को विज्ञान और कला में बांट कर बेरोज़गारों को ही आपस में भिड़ा दिया है. जैसे रेलवे की भर्ती को लेकर आईटीआई और ग़ैर आईटीआई के छात्र आपस में भिड़े हुए हैं.

26 फरवरी को उत्तराखंड मुख्यमंत्री आवास के सामने प्रदर्शन कर रही करीब 30 महिलाओं को पकड़ कर बस में ले जाया गया. उन सबके पास नर्सिंग में डिप्लोमा है. 15 मार्च 2016 यानी आज से दो साल पहले उत्तराखंड में महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ता के लिए 440 पदों का विज्ञापन निकला. 300 और 600 की फीस जमा कर 6600 से ज्यादा एएनएम डिप्लोमा धारी महिलाओं ने आवेदन किया. नई सरकार आई तो कैटेगरी बदल गई. कहा गया कि 440 पदों पर उन्हीं नर्सिंग डिप्लोमा वालों को मौका मिलेगा जिन्होंने 12वीं में साइंस पढ़ा है. अब इस एक फैसले से 5500 महिलाएं बाहर हो गईं जिन्होंने 12वीं आर्ट्स पढ़ा था. जबकि इन महिलाओं ने उत्तराखंड सरकार से मान्यता प्राप्त सरकारी और प्राइवेट नर्सिंग कॉलेज से पढ़ने के लिए तीन साल में तीन से चार लाख रुपये खर्च किए हैं. तभी सरकार को यह नीति बनानी चाहिए थी कि आर्टस से पास होने वाली महिलाएं नर्सिंग की डिग्री नहीं ले सकती हैं. सरकारी नर्सिंग कॉलेज में भी आर्टस और साइंस दोनों से ग्रेजुएशन करने वाली महिलाओं नर्सिंग कर सकती हैं. फिर नौकरी देने में यह बंटवारा क्यों. बहाली की प्रक्रिया को विवादित बना देना कोई रणनीति लगती है ताकि इसी में केस मुकदमा होता रहे और टाइम कट जाए. नौकरी मिली नहीं, अब ये लड़कियां प्रदर्शन कर रही हैं, पैसे जुटाकर केस लड़ रही हैं. यही नहीं फारेस्ट गार्ड, उद्यान विभाग, वन निगम की भरियों में भी साइंस और आर्ट्स का बंटवारा कर दिया गया है. बेरोज़गार वैसे ही बंटे हुए हैं, इन शर्तों से और बंट जाएं इससे बेहतर स्थिति क्या हो सकती है.

टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज़ में पांच दिनों से छात्र प्रदर्शन कर रहे हैं. मुंबई कैंपस ही नहीं, टिसस के बाकी तीन कैंपस में भी प्रदर्शन चल रहा है. प्रशासन के साथ बैठक तो हुई मगर समाधान नहीं निकला है. आप कभी टिस के छात्रों से मिलिएगा, इनकी क्वालिटी काफी अच्छी है, पढ़ाई में योग्य तो हैं ही, समाज सेवा में भी इन छात्रों ने कमाल किया है. पर ये प्रदर्शन इसलिए कर रहे हैं क्योंकि अनुसूचित जाति, जनजाति और ओबीसी के छात्रों को मिलने वाली छात्रवृत्ति की सुविधा भारत सरकार ने वापस ले ली है. टिस ने आदेश जारी किया है कि 2016-18, 2017-19 बैच के छात्र ट्यूशन फीस, हॉस्टल फीस और डाइनिंग फीस का भुगतान करें. इन छात्रों को पोस्ट मैट्रिक स्कॉलरशि‍प की सुविधा मिल रही थी जो अब बंद हो गई है. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार टिस प्रशासन का कहना है कि छात्रवृत्ति नहीं रोकी गई है. इंडियन एक्सप्रेस की प्रियंका साहू से बात करने हुए टिस प्रशासन ने कहा है कि संस्थान अपने स्तर पर संसाधन जुटाने का प्रयास कर रहा है. यह अजीब तर्क है. जब सरकार स्कॉलरशिप दे रही थी तो वो मिलनी चाहिए.

अब एक ऐसी समस्या का ज़िक्र होगा जिसका समाधान मुझे पता नहीं. सांसद से लेकर छात्रों ने कई बार यूपीएससी से कहा मगर इनका समाधान नहीं होता. जब भी यूपीएससी का फार्म निकलता है ये छात्र एक चांस दिए जाने की उम्मीद में बेचैन हो उठते हैं. तमिनलाडू और केरल से भी छात्रों ने संपर्क किया तब लगा कि बात रख देते हैं. आप जानते हैं कि 2011 में यूपीएससी की प्रारंभिक परीक्षा में सीसैट लागू किया गया था. इसे लेकर खूब सवाल उठे और बवाल हुआ. छात्रों का कहना था कि नई प्रणाली इस तरह से है कि साइंस, इंजीनियरिंग और अंग्रेज़ी माध्यम के छात्रों को फायदा हो. आर्टस के छात्र पीछे रह जाएंगे और हिन्दी माध्यम के छात्रों को नुकसान हो.

सीसैट का आंदोलन ने एक बार ज़ोर पकड़ा था तब बड़े बड़े नेता इनके समर्थन में आए थे. 29 जनवरी 2018 को यूपीएससी के सामने छात्रों ने प्रदर्शन किया था. 2015 में सरकार ने सीसैट को क्वालिफाइंग राउंड से हटा दिया. सरकार ने यह भी फैसला किया कि जिन छात्रों ने 2011 में पहली बार यूपीएससी की परीक्षा दी थी उन्हें एक बार और परीक्षा देने का मौका दिया जाएगा. लेकिन 2012-13, 2013-14 में जिन छात्रों को सीसैट के कारण नुकसान हुआ वो चाहते हैं कि उन्हें भी एक चांस मिले. उनका मानना है कि सीसैट जैसी व्यवस्था के कारण उनका चांस भी बर्बाद हुआ है. इस साल जब जम्मू-कश्मीर के छात्रों को यूपीएससी सिविल सर्विस परीक्षा में बैठने के लिए उम्र सीमा में पांच साल की छूट दी गई तो फिर से ये छात्र आशान्वित हो गए और बेचैन भी. इनका कहना है कि जब सीएम महमूबा मुफ्ती के प्रयास से इन्हें छूट मिल सकती है तो हमें क्यों नहीं मिल रही है. शायद ये छात्र हिन्दू-मुस्लिम डिबेट के नाम पर टीवी ने कश्मीर को जिस तरह से पेश किया और ये उसके ग्राहक बने अब ठगे हुए से महसूस कर रहे हैं.

हम नहीं जानते कि यूपीएससी क्या फैसला लेगी लेकिन अगर इन छात्रों को यही लगता है कि प्राइम टाइम में उठा देने भर से उनका काम हो जाएगा तो यही सही. इन छात्रों को एक सवाल खुद से भी पूछना चाहिए जब दूसरी परीक्षाओं के छात्र प्रदर्शन करते हैं तो क्या वे उनमें जाते हैं, उनके दुखों से उन्हें तकलीफ होती है, अगर सवाल का जवाब ना में है तो प्राइम टाइम में भी उठाने से कुछ नहीं होगा. दुआ करूंगा कि इन्हें एक चांस मिल जाए. गुज़ारिश करूंगा कि हिन्दू मुस्लिम डिबेट बंद कराने में सक्रिय भूमिका अदा करें वर्ना वो जवानी जवानी नहीं जिसकी कोई कहानी नहीं वाला गाना सुनना पड़ेगा. आप देख रहे हैं नौकरी सीरीज़ का 19वां अंक. सेंट्रल बैंक आफ इंडिया ने अभी तक 700 से अधिक छात्रों को ज्वाइनिंग लेटर नहीं दिया है जबकि परीक्षा पास किए हुए साल बीत गए हैं. आप ही बताइये 700 से अधिक छात्र परीक्षा पास कर चुके हैं, मेरिट लिस्ट में आ जाने के बाद कइयों ने नौकरी छोड़ दी, अब उन्हें 11 महीने से ज्वाइनिग लेटर नहीं मिल रहा है. क्या आपको नहीं लगता कि पोलिटिकिल फिक्सिंग वाले मैच से कहीं ज़्यादा ये बड़ी ख़बर है. ख़बरों का अपना स्वाद और प्राथमिकता बदल लीजिए वर्ना आपके साथ बहुत बड़ा धोखा होने वाला है बल्कि हो चुका है.

इलाहाबाद में उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग का दफ्तर है, इसके सामने छात्रों ने पिछले शुक्रवार को प्रदर्शन किया. ये छात्र इंजीनियर हैं. सहायक इंजीनियर और जूनियर इंजीनियर की भर्ती के लिए 2013 में लिखित परीक्षा हुई थी. जेई के 3222 पद थे और असिस्टेंट इंजीनियर के 952 पद थे. विज्ञापन निकला 2013 में, लिखित परीक्षा हुई तीन साल बाद 11-12 अप्रैल 2016 को. जेई की लिखित परीक्षा हुई 22-23 मई 2016 को. इसके बाद से दो साल बीत गया मगर रिज़ल्ट नहीं आया है. 11 दिसंबर 2017 को आयोग के सामने इन नौजवानों ने प्रदर्शन किया तो लिखित आश्वासन मिला कि 15 फरवरी को अस्सिटेंट इंजीनियर और अप्रैल में जूनियर इंजीनियर का रिज़ल्ट निकाल देंगे. 15 फरवरी को भस्म हुए 11 दिन हो गए हैं. यह भारत देश में ही हो सकता है कि 2013 की परीक्षा का परिणाम फरवरी 2018 तक नहीं आया है. तभी मैं कहता हूं भारत के नौजवानों को काफी बढ़ा चढ़ा कर पेश किया जाता है जबकि इनकी पोलिटिकल क्वालिटी बहुत ख़राब है. ख़राब न होती तो इस तरह की ठगी उनके साथ हर राज्य में नहीं होती. मेरी बात बुरी लग सकती है मगर वे खुद से चेक कर लें मेरी ही बात सही लगेगी.

पटना में हमारे सहयोगी मनीष कुमार से शारीरिक चुनौतियों वाले छात्र मिलने आए. इन्होंने जो हाल बताया वो सुनकर आप बेहाल हो जाएंगे. 2010 में ये लोग परीक्षा पास कर विभिन्न पदों के लिए चुने गए थे. इनकी संख्या 49 है. इन्होंने ज्वाइन तो किया मगर आठ महीने बाद बिहार कर्मचारी चयन आयोग ने नौकरी से हटा दिया. ठीक उसी तरह जैसे झारखंड में दारोगा की दो साल की ट्रेनिंग देकर, ज्वाइनिंग करा कर उन्हें नौकरी से हटा दिया गया. कारण बताया गया कि विकलांगता आरक्षण का सही पालन नहीं हुआ है. इस परीक्षा का विज्ञापन 2010 में निकला था, तीन साल बाद 24 अगस्त 2013 को रिज़ल्ट आया था. जनवरी 2014 से लेकर अगस्त 2014 तक नौकरी पर रहे मगर बाद में हटा दिए गए. इन्हें प्राइम टाइम की नौकरी सीरीज़ से उम्मीद हो गई है कि शायद सरकार सुन ले.

आप सोच रहे होंगे कि इस देश में अदालत है या नहीं. बिल्कुल अदालत है और पटना हाईकोर्ट ने 20 अगस्त 2015 को आर्डर भी दिया था कि इन 49 विकलांगों को फिर से बहाल किया जाए. अभी तक बहाली नहीं हुई है. ये दोबारा हाईकोर्ट गए और दिसंबर 2016 में फिर से हाई कोर्ट ने कहा कि इनकी बहाली हो. मगर नहीं हुई. आपको लगता है कि हाईकोर्ट के दो दो आदेशों से जब किसी को फर्क नहीं पड़ा तो प्राइम टाइम से फर्क पड़ेगा.

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हमने नौकरी सीरीज़ की शुरुआत स्टाफ सलेक्शन कमीशन की परीक्षा से की थी. पिछले एपिसोड में हमने ज़िक्र किया था कि महाराष्ट्र सर्किल के पोस्टल विभाग से ज्वाइनिंग के लिए 353 नौजवान चिट्ठी का इंतज़ार कर रहे थे. हमने प्राइम टाइम की नौकरी सीरीज के 17वें अंक में महाराष्ट्र सर्किल पर ज़ोर दिया था. आज महाराष्ट्र सर्किल की वेबसाइट पर पोस्टिंग की खबर आ गई है. 353 नौजवानों को बता दिया गया है कि किसकी पोस्टिंग किस ब्रांच और शहर में होगी. यह हमारे लिए भी खुशी की बात है. अगर एक शो से 353 छात्रों के जीवन पर असर पड़ सकता है तो नौकरी सीरीज़ मई की जगह जुलाई तक करूंगा. क्या हमारे भारत के नौजवान एक ईमानदार परीक्षा व्यवस्था नहीं हासिल कर सकते हैं, इरादा कर लेंगे तो हासिल भी कर लेंगे.

स्टाफ सलेक्शन कमिशन की परीक्षा सीजीएल 2016 के छात्रों के लिए भी एक खुशखबरी है. हमने इस परीक्षा का भी सवाल उठाया था कि पास कर चुके नौजवानों को ज्वाइनिंग लेटर नहीं दिया जा रहा है. आयकर विभाग की संस्था सीबीडीटी के लिए 1114 पदों के लिए परीक्षा पास कर ज्वाइनिंग का इंतज़ार कर रहे थे. पहले एपिसोड में भी इसका ज़िक्र किया था. आठ महीने बाद अब चिट्ठी मिलेगी. इनकम टैक्स इंस्पेक्टर के पद पर जिनकी नियुक्ति हुई है उन्हें निर्देश दिया जाता है वे अपनी पसंद की जगह पाने के लिए चुनाव करें और फार्म जमा करें. चलिए ये भी पूछ रहे होंगे कि होली कब है, कब है होली...


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