अलविदा : यादें उस 'मछली' की जो रणथंभौर की रानी थी

अलविदा : यादें उस 'मछली' की जो रणथंभौर की रानी थी

वह झीलों की रानी थी. रणथंभौर की रानी भी. 'मछली' नाम पड़ गया, क्योंकि उसके चेहरे पर जन्म से ही 'मछली' की एक नैसर्गिक आकृति बनी हुई थी. रणथंभौर के अधिकांश जानकार मानते हैं कि वह 1996 में पैदा हुई. हालांकि मछली की संतानों का लेखा-जोखा मौजूद है, लेकिन यह ठीक-ठीक नहीं पता कि वह किसकी संतान थी. वह वन्य-जीवन की लीजेंड थी.

बाघों के रहस्यमयी आकर्षण ने मनुष्यों को जिस भय-मिश्रित आश्चर्य-लोक में बांधे रखा है, मछली उसी आकर्षण का एक दुर्लभ प्रतिबिंब थी. बाघ वनों में जिस गरिमा और औदात्य के लिए सुविज्ञ हैं, मछली उसी गरिमा और औदात्य की
परमोत्कर्ष थी.

आप हैरान हो सकते हैं कि एक बाघिन के लिए इतने भारी साहित्यशील उपमानों का प्रयोग क्यों? एक जानवर ही तो थी!उसकी मृत्यु एक घटना क्यों है? एक विलक्षण सूचना क्यों है? सब मरते हैं! बाघ भी मरते हैं! बाघ कोई वीआईपी तो नहीं जो उसके जीवन का पटाक्षेप एक सूचना हो जाए! हालांकि बाघों के संरक्षण के मौजूदा परिवेश में, बाघों की मृत्यु की सूचना एक 'सरकारी सूचना' है जो विभाग में ऊपर तक जाती है,लेकिन मछली का मरना 'एक सरकारी सूचना' से इतर था.

मछली ने 20 वर्षों तक वन्य-प्रेमियों के दिलों पर राज किया. कहा जाता है कि एक वक्त ऐसा भी था जब अकेली मछली की वज़ह से ही रणथंभौर का पर्यटन और आय एक रिकॉर्ड थी. मछली के दीवाने देश में तो थे ही, देश के बाहर से भी लोग उसे देखने के लिए रणथंभौर आते थे. यह माना गया कि दुनिया के खुले जंगलों में वह शायद सबसे अधिक फोटोग्राफ किए जाने वाली बाघिन थी. उसे राजस्थान सरकार द्वारा लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड भी दिया गया. भारत सरकार ने उसके ऊपर डाक टिकट जारी किया. उसकी शक्ल को रणथंभौर के प्रमुख प्रवेश द्वारों पर उकेरा गया. वह रणथंभौर की कथा-नायिका बन गई और बाघों के जटिल जैविक जीवन को जानने-समझने का जरिया भी.

जंगलों में बहुत कुछ घटता है. मछली मानो लोगों को बुला-बुलाकर बाघों के उस रहस्य-लोक को अनावृत कर देना चाहती थी जिसे शिकारियों और वन्य-प्रेमियों, दोनों ने समान रूप से जानना चाहा है. बाघ प्रकृति की खाद्य श्रृंखला में सर्वोच्च स्थान पर हैं. वह बने ही कुछ इस तरह हैं कि अपने से बड़े, विशालकाय लक्ष्य का भी शिकार कर सकें .जो कुछ मछली ने किया वह भले ही जंगल के अपने निविड़ अंधेरों में लाखों वर्षों से होता आ रहा हो लेकिन उसके जरिये पहली बार किसी इंसान ने न केवल उसे अपनी आंखों से देखा, बल्कि उसे फिल्माया भी.

मछली ने 2002 में रणथंभौर की एक झील पदम् तालाब के पास एक मगरमच्छ को दुस्साहसिक तरीके से शिकार कर दिया. इस घटना को देखने वाले प्रसिद्द वन्य-प्रेमी जैसल सिंह ने इस तरह लिखा- 

"दो साल के विकट सूखे ने रणथंभौर के सभी वन्य जीवों को अपनी चपेट में ले रखा था. यह दिसंबर का महीना था. एक दिन अपराह्न में मैं अपने कुछ दोस्तों के साथ जोगी महल गेट के ओर से रणथंभौर पार्क में दाखिल हुआ. मछली अपने शावकों के साथ देखी गई थी, इसलिए मैं उसी तरफ चल दिया. अचानक मछली दिखी. उसने कोई शिकार कर रखा था और अपने शावकों को वह उसी दिशा में लिए जा रही थी. हम सभी खुश थे.

फोटोग्राफी के लिहाज से यह हमारे लिए अच्छा दिन होने वाला था लेकिन अगले ही हम सिहर गए. जैसे ही मछली अपने बच्चों के साथ अपने किए हुए शिकार के पास पहुंची, अचानक ही गोली की गति के मानिंद वह दहाड़ती हुई एक ओर भाग गई. हमें लगा कि जरूर कोई घुमक्कड़ नर बाघ होगा. मछली के शावकों को खतरा था. लेकिन हम सभी उस नजारे को देखकर हतप्रभ हो गए. वहां कोई फक्कड़ बाघ नहीं था बल्कि सूख चुके पदम तालाब के कीचड़ से एक विशालकाय मगरमच्छ निकलकर मछली के इलाके में आ गया था. मछली मगर से भिड़ गई. वह एक बड़ा खतरा मोल ले रही थी. जरा सी चूक से उसका और उसके शावकों का जीवन खतरे में आ जाता.

मछली ने मगरमच्छ को गर्दन से पकड़ा. मगरमच्छ भी पलटकर हमलावर हो उठा. कुछ ही देर में अवसर पाकर बाघिन के दांत अपने शिकार की गर्दन में गड़ गए. मगरमच्छ ढेर हो गया. मछली आत्मविश्वास से भरी हुई थी और इस लड़ाई से डरे हुए शावकों को दिलासा देने उनके पास लौट आई. यह मेरे लिए एक अविस्मरणीय क्षण था. मैंने अपने डिजिटल कैमरे से ये दुर्लभ क्षण शूट कर लिए. खुले जंगलों के इतिहास में शायद यह पहली बार था जब बाघिन और मगरमच्छ की ऐसी लड़ाई को किसी ने कैमरे में कैद किया हो."  

(उक्त उद्धहरण जैसल सिंह के अंग्रेजी के मूल उद्धहरण का भावानुवाद है. यह उद्धहरण वाल्मीक थापर की किताब 'टाइगर फायर' से लिया गया है)

पदम् तालाब के पास घटित हुई इस अभूतपूर्व घटना के बाद मछली पूरी दुनिया में लोकप्रिय हो गई. अपने जीवनकाल में मछली ने 11 शावकों को जन्म दिया जिनमें से 7 मादा और चार नर शावक थे. मछली अपने शावकों की रक्षा के लिए अपने से बड़े फक्कड़ बाघों से भिड़ जाती थी. उसने अपने सभी शावकों को सभी से सुरक्षित और अनाहत रखा. आज रणथंभौर के आधे से ज्यादा बाघ मछली की वंश रेखा के हैं. हम मछली के ऋणी हैं. पूरा रणथंभौर उसका ऋणी है. क्या खुद बाघ उसकी कीर्ति से लाभान्वित होकर उसके ऋणी नहीं हैं?

मछली अपने साहस और शौर्य से अपनी वंश रेखा को 20 वीं से 21 वीं शताब्दी में प्रवेश करा सकी. क्या हम जंगल के इस 'जेंटलमेन' को अपनी पीढ़ियों के लिए जंगलों में जिंदा रख पाएंगे? क्या हम 'विकास' को सही संदर्भों में समझकर उस जीव जगत को भी अपना सहयात्री बनाएंगे जो इस मिट्टी, पानी और हवा का बराबर का हकदार है? हम एक प्रजाति के रूप में दूसरों का हक़ छीनने में जबरदस्त रूप से निपुण हैं.

चाहे वह बाघों का जंगलात पर हक़ हो या किसी परिदें का पेड़ों पर? हमने यूं भी बाघों के लिए उनके हक़ के तौर पर बहुत कम जमीन छोड़ी है. जो छोड़ी है, वह भी निरापद नहीं है. उन जंगलों के हालात तो और भी ख़राब हैं, जहां जिनकी कोख में खनिजों के खजाने हैं. बाघों के कॉरिडोर जो जंगलों को जोड़ते थे, 'राजमार्ग' बनते जा रहे हैं. जंगल बिखरते जा रहे हैं.

अच्छा हुआ मछली की मृत्यु वहीं उसके अपने जंगल में उसके अपने लोगों के बीच हुई. उसकी मौत को रणथंभौर के पार्क-प्रशासन ने अभूतपूर्व सम्मान दिया. मछली की अर्थी सजाई गई. श्रंद्धाजलि दी गई. पार्क के अधिकारियों और वन-विभाग के उन गार्डों ने जिन्होंने अंतिम दिनों में मछली को घर की बूढी दादी मां की तरह रखा, उसकी अर्थी को कंधा दिया. मछली चली गई. मछली की संतान-बाघों में उदासी तो जरूर होगी. जंगल आज रात ग़मज़दा तो रहेगा! मछली की पुरानी मादों में, जहाँ वह 'मातृत्व' निभाती थी, उसकी मृत्यु-गंध सूंघकर उसके बच्चे क्या वहां नहीं आएंगे! शायद न आएं! शायद आएं! जंगलों के रहस्यों से हम भी कहां पूरे परिचित हैं!

धर्मेंद्र सिंह, भारतीय पुलिस सेवा के उत्तर प्रदेश कैडर के अधिकारी हैं...

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