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पेट्रोल-डीजल के बढ़े दामों से निपटने की सरकार की कोशिश

तेल को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्थिति जो पहले थी वैसी ही अभी भी है. सब कुछ अंतरराष्ट्रीय नहीं है. कुछ भारत के भीतर की भी समस्या है.

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पेट्रोल-डीजल के बढ़े दामों से निपटने की सरकार की कोशिश

प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर

आख़िर कब तक सरकार भी देखती और कब तक लोग भी देखते. पेट्रोल, डीज़ल और रसोई गैस के दाम बढ़ते-बढ़ते कहां तक जाएंगे किसी को नहीं पता. कई महीनों से जनता पेट्रोल डीज़ल और रसोई गैस के दाम दिए जा रही थी और यह मान लिया गया था कि जनता इस बार उफ्फ तक नहीं कर रही है क्योंकि वह सरकार के ख़िलाफ़ नारे नहीं लगा रही है. तेल को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्थिति जो पहले थी वैसी ही अभी भी है. सब कुछ अंतरराष्ट्रीय नहीं है. कुछ भारत के भीतर की भी समस्या है. देखते देखते देश के कई शहरों में 90 रुपये लीटर से अधिक दाम पर पेट्रोल बिकने लगा था. सरकार ने आज कुछ कदम उठाया है, जो थोड़ी बहुत राहत पहुंचेगी वो कितनी देर तक राहत रहेगी किसी को पता नहीं है. अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल का भाव 85 डॉलर पहुंच गया है जो नवंबर 2014 के बाद सबसे अधिक है. वित्त मंत्री जेटली खुद प्रेस कांफ्रेंस करने आए और उन्होंने कहा कि सरकार पेट्रोल और डीज़ल पर डेढ़ रुपया कम कर दिया है. तेल कंपनियां अपनी तरफ से एक रुपया प्रति लीटर दाम कम करेंगी. कुल मिलाकर केंद्र सरकार और तेल कंपनियों ने मिलकर ढाई रुपये प्रति लीटर दाम कम किए हैं.

अरुण जेटली ने कहा, 'आज हमने इंटरमिनिस्टिरियल डिस्कशन में तय किया और प्रधानमंत्री को प्रस्ताव भेजा और उनहोंने स्वीकार किया. एक्साइज ड्यूटी हम लोग डेढ़ रुपया कम करेंगे. ऑयल मार्केटिंग कंपनी एक रुपये की कटौती अपनी प्राइसिंग में करेंगे, केंद्र की ओर से हम लोग ढाई रुपए तुरंत कंज़्यूमर्स को रिलीफ देंगे, पेट्रोल और डीज़ल दोनों में रेवेन्यू डिपार्टमेंट विल एब्जॉर्ब 1.50 रु केंद्र का जो रेवेन्यू फिक्स होता है, क्रूड ऑयल का प्राइस फिक्स होता है. राज्य सरकारों का जो वैट है, वो एड वैलोरेम है, परसेंटेज में है, कुछ का 31 परसेंट है कुछ का कम है. स्टेट्स का 29 परसेंट है. क्रूड का दाम बढ़ता है तो सेंटर का रेवेन्यू उतना ही रहता है. क्रूड ऑयल का दाम बढ़ने से स्टेट्स का रेवेन्यू बढ़ता जाता है. सभी राज्य सरकारों को लिख रहा हूं कि जैसे ढाई रुपये केंद्र सरकार एब्जॉर्ब कर रही है उसी तरह राज्य सरकारें भी लोगों को राहत दें. ढाई रुपए वो वैट से एब्ज़ॉर्ब करें.'


वित्त मंत्री ने इस प्रेस कांफ्रेंस में दो बात कही. पहला कि जब कच्चे तेल के दाम बढ़ते हैं तो सेंटर का राजस्व उतना ही रहता है. राज्यों की कमाई बढ़ती है. ऐसा क्यों होता है. क्योंकि सेंटर जो एक्साइज़ ड्यूटी लगाती है वह पिछले साल अक्तूबर से अबतक 19 रुपये 48 पैसे पर फिक्स ही है. राज्यों की कमाई इसलिए बढ़ती है क्योंकि डीलर को जिस दाम पर तेल कंपनियां देती हैं उस पर वैट लगाती हैं. तेल कंपनियां जितना महंगा तेल डीलर को देंगी, वैट से उतनी ही कमाई राज्य सरकारों की बढ़ती जाएगी. हम आपको बता दें कि मोदी सरकार के कार्यकाल के पहले चार साल में पेट्रोलियम सेक्टर से कुल कमाई कितनी हुई. कस्टम, एक्साइज, वैट, क्रूड ऑयल सेस सहित कई प्रकार के टैक्स से 18 लाख 23, हज़ार 760 करोड़ कमा चुके हैं. इसमें से भारत सरकार की कमाई 11 लाख 4 हज़ार 72 करोड़, राज्यों की कुल कमाई 7 लाख 19,688 करोड़ रही.

ये आंकड़े मार्च 2018 तक के हैं. मार्च से लेकर अब तक कितनी कमाई हुई होगी, पिछले साल की कमाई के आधार पर अनुमान लगाएं तो इसमें आप ढाई लाख करोड़ से ज्यादा की राशि और जोड़ दीजिए. यानी चार साल में केंद्र और राज्यों ने पेट्रोलियम पदार्थों पर टैक्स लगाकर करीब 21 लाख करोड़ से ज्यादा कमाई है. ये सारे आंकड़े पेट्रोलियम मंत्रालय के हैं. हमारे सहयोगी हिमांशु शेखर मिश्रा ने पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के राज्यसभा में दिए गए बयान के आधार पर बताया है कि अप्रैल 2014 में पेट्रोल पर सेंटर का उत्पाद शुल्क 9 रुपये 48 पैसे था. 4 अक्तूबर को ढाई रुपये की कटौती के बाद भी 16 रुपये 98 पैसे है. अप्रैल 2014 के हिसाब से देखें तो पेट्रोल पर करीब 70 परसेंट टैक्स बढ़ा है. जबकि अप्रैल 2014 में डीज़ल पर एक्साइज़ ड्यूटी 3 रुपये 65 पैसे लीटर थी जो आज की कटौती के बाद भी 12 रुपये 83 पैसे लीटर है. अप्रैल 2014 की तुलना में आज केंद्र सरकार डीज़ल पर करीब 300 परसेंट ज़्यादा टैक्स ले रही है.

1 जनवरी 2018 से अब तक दिल्ली और मुंबई में पेट्रोल करीब 14 रुपया महंगा हुआ है. आज की कटौती के बाद 5 रुपये सस्ता होगा तो कितनी राहत होगी. 1 जनवरी 2018 को मुंबई में पेट्रोल 77.87 रुपये लीटर था. 31 अगस्त को मुंबई में पेट्रोल 85 रुपया 93 पैसे लीटर था. 4 अक्तूबर को मुंबई में पेट्रोल 91.34 पैसे लीटर है. सेंटर, तेल कंपनियां और महाराष्ट्र ने मिलकर 5 रुपये कम किए हैं. 5 अक्तूबर से मुंबई में पेट्रोल 86 रुपये 34 पैसे हो जाएगा. क्या 86 रुपये 34 पैसे लीटर राहत है?

मनोरंजन भारती ने एक सवाल किया कि जब तेल के दाम बढ़ते हैं तब सरकार प्रेस कांफ्रेंस नहीं करती है. जब दाम कम होंगे यह बताने के लिए प्रेस कांफ्रेंस करती है. 2017 से पेट्रोल डीज़ल के दाम रोज़ घटने बढ़ने लगे थे. सितंबर महीने में कई राज्यों ने पेट्रोल डीज़ल के दाम घटाए थे मगर उसका ख़ास लाभ नहीं हुआ. राजस्थान ने ढाई रुपये लीटर, कर्नाटक और आंध प्रदेश ने 2 रुपये प्रति लीटर, केरल और पश्चिम बंगाल ने 1 रुपये प्रति लीटर दाम घटाए थे. तब महाराष्ट्र ने टैक्स घटाने से मना कर दिया था और कहा था कि पेट्रोल डीज़ल को जीएसटी के अंदर लाना चाहिए. लेकिन 4 अक्तूबर को वित्त मंत्री के प्रेस कांफ्रेंस के बाद देवें फडणवीस ने घोषणा करने में देरी नहीं की.

बिहार ने जल्दबाज़ी नहीं दिखाई है. उप मुख्यमंत्री ने कहा है कि वित्त मंत्री का पत्र मिलने पर विचार करेंगे. अन्य पक्षों के बारे में सोचेंगे. मध्य प्रदेश, गुजरात, यूपी, छत्तीसगढ़, असम और त्रिपुरा ने भी ढाई रुपये कम कर दिए हैं. जबकि झारखंड ने डीज़ल की कीमतों में ढाई रुपये की कमी तो की मगर पेट्रोल के दाम नहीं घटाए हैं.

क्या सरकार इतना ही कर सकती थी, आने वाले दिनों में जब दाम बढ़ेंगे तो तब क्या करेगी. रसोई गैस की कीमतों के बारे में कुछ फैसला हुआ. दाम वहां भी बढ़ रहे हैं. 1 अप्रैल 2018 को 14.2 किलोग्राम का गैस सिलेंडर 653 रुपये का था. 1 अगस्त 2018 को इसी वज़न का सिलेंडर 789.50 रुपये का हो गया. 1 अक्तूबर को 14.2 किलोग्राम का गैस सिलेंडर 879 रुपया हो गया है. यानी अप्रैल से लेकर अक्तूबर के बीच 226 रुपया बढ़ चुका है. 19 किलोग्राम वाला कमर्शियल सिलेंडर भी 7 महीनों में 336 रुपया महंगा हो चुका है. 5 किलोग्राम का सिलेंडर भी अप्रैल से अक्तूबर के बीच 80 रुपया महंगा हो गया है.
सब्सिडी वाला सिलेंडर भी 1 अक्तूबर से 59 रुपया महंगा हो गया है.

कुछ शहरों में तो गैस का सिलेंडर 900 से 1000 तक चला गया है. गुजरात में 905 रुपया का है. जम्मू कश्मीर में 1000 का है. आगरा के पास 910 का और लखनऊ में 917 का है. जो भी है सरकार चाहती है तो पेट्रोल 5 रुपये सस्ता हो जाता है. सरकार ने तेल कंपनियों के तरफ से भी एलान किया कि वे एक रुपये की कमी करेंगी. वित्त मंत्री ने जिस वक्त इसकी घोषणा कर रहे थे उस वक्त शेयर बाज़ार का सेंसेक्स फिर से धड़ाम धड़ाम गिरने लगा जो सुबह से ही 800 अंक से अधिक गिर चुका था.

दोपहर तीन बजे हिन्दुस्तान पेट्रोलियम, भारत पेट्रोलियम, इंडियन ऑयल और ओएनजीसी के शेयर बहुत तेज़ी से गिर गए. वित्त मंत्री अरुण जेटली ने जैसे ही एलान किया कि ऑयल मार्केटिंग कंपनियां अपनी ओर से डेढ़ रुपए प्रति लीटर दाम कम करेंगी तो हिंदुस्तान पेट्रोलियम का शेयर 248 रुपए से गिर कर 194 रुपए पर आ गया. भारत पेट्रोलियम का शेयर 368 रुपए से गिरकर 306 रुपए पर आ गया. इंडियन ऑयल का शेयर 155 रुपए से गिरकर 129 रुपए पर आ गया. ओएनजीसी का शेयर 180 से 163 रुपए पर आ गया.

भारत की आर्थिक चुनौतियां अभी कम नहीं हुई हैं. आईएलएफएस कंपनी समूह की खस्ता हालत के कारण बाज़ार में अभी भी आशंका बनी हुई है. आज भी सेंसेक्स 870 से अधिक अंक नीचे गिरा है. डालर के मुकाबले रुपया आज वहां पहुंचा जहां कभी नहीं पहुंचा था. एक डालर कभी भी 73 रुपये 77 पैसे का नहीं हुआ था. आज वो भी हो गया. 4 अक्तूबर के दिन रुपया 44 पैसे कमज़ोर हुआ ह. एक समय तो 73 रुपये 81 पैसा तक जा पहुंचा था. अगस्त के शुरू में जानकार दिसंबर तक 74 रुपये तक जाने की बात कर रहे थे लेकिन अब बात होने लगी है कि कभी भी एक डालर के मुकाबले रुपया 75 तक जा सकता है. नवंबर में ईरान पर अमरीकी प्रतिबंध शुरू हो रहा है. तब और चुनौतियां बढ़ेंगी. लेकिन सऊदी अरब ने कहा है कि जितना तेल ईरान से लिया जाता है उसकी भरपाई कर देगा. शुक्रवार को अगर रिज़र्व बैंक ने रेट बढ़ा दिए तब और तबाही मचेगी. होम लोन और महंगा होने जा रहा है.

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अभी भी क्रूड आयल 90 डॉलर प्रति बैरल नहीं हुआ है. 86 डालर प्रति बैरल है. 2012 में पेट्रोल डीज़ल के दाम बढ़े जिसके खिलाफ बीजेपी के एक प्रदर्शन में अरुण जेटली ने कहा था कि जब कच्चा तेल 90 डालर प्रति बैरल है तो पेट्रोल 50 रुपये से ज्यादा नहीं होना चाहिए. वही जेटली अब वित्त मंत्री हैं. 91 रुपये लीटर पेट्रोल हो गया है. 5 रुपये की राहत को बड़ी राहत बताई जा रही है.

पुरानी बातों को इसलिए याद दिलाना ज़रूरी है ताकि याद रहे कि जनता के बीच जो बोला जाता है वो जनता याद रखती है. कितना आसान होता है विपक्ष में रहते हुए बोल देना कि 90 डालर प्रति बैरल है तो पेट्रोल 50 रुपये लीटर होना चाहिए मगर सरकार में आने के पेट्रोल के दाम तब भी 50 रुपये नहीं हुए जब कच्चे तेल की कीमत 50 डालर प्रति बैरल से कम हो गई. सोचिए कितना टैक्स दिया है जनता ने. यही नहीं रुपये को लेकर जिस तरह की राजनीति हुई उसे भी याद रखना चाहिए. किस तरह से उसे आर्थिक संदर्भों से काटकर सम्मान और स्वाभिमान से जोड़ दिया गया. चुनाव से पहले और चुनाव के दौरान ही नहीं हुआ बल्कि सरकार में आने के बाद भी प्रधानमंत्री ने रुपये की मज़बूतों को सम्मान और स्वाभिमान से जोड़ते रहे. सवाल है कि अब किससे जोड़ना चाहेंगे.



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