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देश के कारोबार पर GST की मार: रवीश कुमार के साथ प्राइम टाइम

जयपुर में 20 सितंबर के बाद भी पोर्टल सही से काम नहीं कर रहा था. पूरे दिन मेसेज आते रहा कि आप क़तार में है.

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देश के कारोबार पर GST की मार: रवीश कुमार के साथ प्राइम टाइम

प्रतीकात्मक चित्र

नई दिल्ली: हमारी ज़िंदगी को राजनीति जितना प्रभावित करती है, उससे कहीं ज़्यादा अर्थव्यवस्था भी करती होगी, लेकिन जब यह संकट से गुज़र रही है, मौका है यह समझने का कि आख़िर तीन साल में हुआ क्या कि हम इस मोड़ पर आ पहुंचे हैं, तो राजनीति ने हिन्दू-मुस्लिम टॉपिक खोज लिया है. आज भी आप तमाम चैनलों पर देख सकते हैं किसी न किसी रूप में हिन्दू मुस्लिम टॉपिक की चर्चा है. ज़रूरी नहीं है कि जो आज संकट है, वो कल भी रहे. मगर जो आज है, उसकी बात तो होनी चाहिए. हमारी अर्थव्यवस्था संकट के दौर से गुज़र रही है. बाज़ार और बिजनेस में भारी गिरावट है. रोज़गार के अवसर इससे प्रभावित हो रहे हैं. क्या इन सवालों को टालने के लिए गोदी मीडिया लगातार हिन्दू मुस्लिम टॉपिक में घुसा हुआ है. जीएसटी को लेकर व्यापारियों, चार्टर्ड अकाउंटेंट और टैक्स वकीलों से जितनी बात करता हूं उतनी बार लग रहा है कि एक पत्रकार के नाते इस समस्या के एक प्रतिशत हिस्से तक भी नहीं पहुंच पा रहा हूं. ज़ाहिर संकट बड़ा है और आयाम भी बहुत हैं. आज हमने राजस्थान के टैक्स कंसल्टेंट संघ के सतीश गुप्ता से बात की. उनसे जो इनपुट यानी फीडबैक मिला है, वो मैं यहां एक सूची के रूप में पेश करना चाहता हूं.

जयपुर में 20 सितंबर के बाद भी पोर्टल सही से काम नहीं कर रहा था. पूरे दिन मैसेज आते रहा कि आप क़तार में है, दिन बीत गया क़तार नहीं बीता. व्यापारियों के साथ टैक्स वकील और सीए सभी दबाव में काम कर रहे हैं. अच्छा होता मासिक की जगह त्रैमासिक रिटर्न भरने की व्यवस्था होती. पोर्ट सिर्फ अंग्रेज़ी में है, इसके कारण व्यापारी न समझ पा रहे हैं न भर पा रहे हैं. ग़लती से बटन सबमिट हो गया तो सुधार करने की कोई गुज़ाइश नहीं है. जैसे कोई रकम, किसी दूसरे मद में जमा हो जाए तो उसे सुधारने का मौका नहीं मिल रहा है. सरकार कहती ही 3 बी फार्म भरने की देरी पर जुर्माना नहीं लगेगा, मगर लिया जा रहा है. एक दिन की देरी पर 200 रुपये जुर्माना है. अक्सर पोर्टल के कारण फार्म भरने में देरी हो रही है, तब भी जुर्माना लग रहा है.

यह धारणा सही नहीं है कि इस कारण से सीए और टैक्स वकील मौज कर रहे हैं बल्कि हकीकत यह है कि वे भी काफी परेशान हैं. व्यापारियों की परेशानी तो और भी बड़ी है. बिल से धंधा करने की आदत नहीं थी और अब बिल संभालते संभालते परेशान हैं. जिन व्यापारियों का सेट अप बड़ा है यानी जिनके यहां अकाउंटेंट वगैरह का सिस्टम है उन्हें कम परेशानी है लेकिन जनरल स्टोर, मेडिकल स्टोर या किसी भी रिटेल बिजनेस वालों के लिए जीएसटी ने सरदर्द बढ़ा दिया है. इन लोगों के पास पांच सौ हज़ार की संख्या में बिल होते हैं, जिसकी सूचना भरते भरते कई घंटे लग जाते हैं. पहले व्यापारी सीए को पूरे साल का 1500 रुपये देकर काम चला लेता था अब उसे पूरे साल के लिए बीस से पचीस हज़ार रुपये देने पड़ रहे हैं. जीएसटी ने लघु व मध्यम श्रेणी के बिजनेसमैन और उद्यमियों को परेशान कर दिया है. वे बाज़ार में टिकेंगे या नहीं, ये सवाल खड़ा हो गया है. हमने एक सवाल पूछा कि आखिरी दिन व्यापारी क्यों भरते हैं तो इसका जवाब यूं मिला
 
फिर आप बताइये कि ये लास्ट डेट रखा ही क्यों हैं. आपका सिस्टम लास्ट डेट के हिसाब से तैयार क्यों नहीं है. क्या व्यापारी सारा काम छोड़कर रिटर्न ही भरवाता रहे? सारे व्यापारी ख़ुद से जीएसटी नहीं भर सकते हैं?
    
टैक्स कंस्लटेंट से बात करने पर पता चला कि छोटे शहरों में स्थिति और भी ख़राब है. इंटरनेट चलता नहीं, चलता है तो स्लो चलता है. ऑफलाइन फॉर्म भरकर जब आप ऑनलाइन में माइग्रेट कराते हैं तो कई बार सिस्टम स्वीकार नहीं करता है. हालत यह है कि 250 क्लाइंट हैं, मगर तीन चार दिन लगने के बाद भी 50% की जीएसटी नहीं भरी जा सकी. रिफंड की समस्या व्यापारी खूब उठा रहे हैं. कह रहे हैं कि जब जुलाई का रिफंड 10 नवंबर के बाद मिलेगा तो अगस्त-सितंबर और अक्टूबर का रिफंड तो अगले साल मार्च के बाद मिलेगा. इस कारण व्यापारियों के हाथ में पैसा ही नहीं है. हर लेवल पर पेमेंट अटका हुआ है. जिन्होंने बैंक से लोन लिए हैं, वो बाद में अलग से ब्याज़ भी भरेंगे. हमने अखिल भारतीय ट्रांसपोर्ट संघ के एक पदाधिकारी से बात की उन्होंने हमें जो बताया उसे सूची बद्ध कर रहा हूं.

जीएसटी के आने के बाद से ट्रांसपोर्ट सेक्टर की हालत और ख़राब हो गई है. जुलाई में तो घंधा घटकर 20 फीसदी पर आ गया था, अगस्त में 50 फीसदी तक आया. सितंबर में 60 फीसदी तक पहुंचा है मगर अब भी 30-40 फीसदी बिजनेस डाउन है. ट्रकों के फेरे के समय में भी ख़ास अंतर नहीं आया है क्योंकि महाराष्ट्र को छोड़ आक्टराय हर जगह से हट गया था. दिल्ली मुंबई रूट पर ज़रूर ट्रक के पहुंचने के समय में दस घंटे की कमी आई है.
 
इसके कई कारण है. अभी भी बड़ी संख्या में व्यापारियों का रजिस्ट्रेशन नहीं हुआ है. बिना रजिस्ट्रेशन के ट्रांसपोर्टर उनका माल नहीं उठा सकता क्योंकि पकड़ा जाएगा. नया नियम ऐसा ही है. फिर भी जिन्होंने रजिस्ट्रेशन नहीं कराया है, उनका माल यहां से वहां जा तो रहा है. कैसे हो रहा है. ऐसे हो रहा है कि इसके लिए जोखिम उठाने वाले ट्रांसपोर्टर दुगना तिगुना चार्ज कर रहे हैं. इस वक्त सरकार चेकिंग करने की स्थिति में नहीं है. लेकिन बहुत बड़ी संख्या में ट्रांसपोर्टर चाहते हैं कि रजिस्ट्रेशन वाले व्यापारी का ही माल उठाएं, मगर जिन लोगों ने रजिस्ट्रेशन कराया है उनका बिजनेस 40 से 50 फीसदी कम हो गया है. उनके पास से ट्रांसपोर्टर को ऑर्डर नहीं मिल रहा है. इसलिए गोदामों में ट्रक बड़ी संख्या में ख़ाली खड़े हैं जो किसी बिजनेस या अर्थव्यवस्था के लिए शुभ संकेत नहीं है. बिजनेस डाउन होने का ट्रकों पर और असर पड़ा है.   

जैसे दिल्ली से जो ट्रक माल कर दक्षिण की तरफ गए हैं, वहां जाकर अटक गए हैं. क्योंकि वहां की फैक्ट्रियों में उत्पादन डाउन है, ट्रकों को माल नहीं मिल रहा है. इसलिए वापसी की जगह वे हफ्ते भर से दक्षिण के शहरों में अटके हैं. ट्रांसपोर्टर ने बताया कि कम से कम 1000 से लेकर 2000 तक ट्रक दिल्ली के वहां अटके होंगे. दिवाली के सीज़न में ऐसा कभी नहीं होता था.

ये सिर्फ ट्रक की बात है, अगर आप इसमें ट्रांसपोर्ट में इस्तमाल होने वाली ट्रेलर,छोटे ट्रक, टैंपो को भी शामिल करेंगे तो तस्वीर कुछ और नज़र आएगी. हमने ये सभी बातें बातचीत के आधार पर लिखी हैं जिससे पता चले कि ज़मीन पर क्या हो रहा है. किसी भी व्यापारी ने नहीं कहा कि वे टैक्स नहीं देना चाहते. सब देना चाहते हैं मगर प्रक्रिया और करों की दर से काफी परेशान हैं. मैंने राजस्थान के कुछ व्यापार संघों के प्रतिनिधियों से फोन पर बात की. राजस्थान में मार्बल, हैंडी क्राफ्ट और गोल्ड ज्वेलरी का कारोबार काफी अहम रखता है. पहले दोनों पर 28 फीसदी जीएसटी लगी है और गोल्ड ज्वेलरी पर 3 फीसदी जीएसटी लगी है.

स्टील संघ के सीताराम अग्रवाल साहब ने कहा कि हमारा बिजनेस 40 परसेंट डाउन हो गया है. टीएमटी सरिया, एंगल, पैनल इन सब की बिक्री बहुत ही कम रह गई है. फैक्ट्रियों में जहां तीन शिफ्ट चल रही थी वहां दो शिफ्ट चल रही है. ओवर टाइम करने वाले की कमाई कम हो गई क्योंकि ओवर टाइम बंद है या कम है. हर सेक्टर में दिहाड़ी मज़दूरों को काम नहीं मिल रहा है, सबसे प्रभावित यही है. वैसे भी बैंकों के एन पी ए में 39 फीसदी हिस्सा स्टील सेक्टर का ही है. राजस्थान में पेट्रोल और डीज़ल की खपत में साढ़े छह फीसदी की कमी आ गई है. हम सरकार को पॉज़िटिव सुझाव देते हैं, मगर कोई एक्शन नहीं होता. स्थानीय स्तर पर समस्याओं का निदान तो बंद ही हो गया है.

इसी तरह हमने जयपुर के पत्थरों को तराश कर फैंसी आइटम बनाने वाले एक कारोबारी से बात हुई. नाम न बताने की शर्त पर कहा कि उनके बिजनेस में 80 फीसदी की गिरावट आई है. 28 फीसदी जीएसटी के कारण चीज़ें इतनी महंगी हो गईं कि लोगों ने शौकिया ख़रीद बंद कर दी. पहले महीने का बिजनेस पचास से साठ लाख का होता था जो अब घटकर दस से 15 लाख पर आ गया है. इसका असर रोज़गार पर पड़ा है. उन्होंने बताया कि

हमारी फैक्ट्री में जो महंगे और स्थायी अकाउंटेंट थे उनको हटाना पड़ा. ऐसे कई लोगों की छंटनी की और उनकी जगह पार्ट टाइम काम लिया. तीन तीन कांट्रेक्टर थे, हरेक के पास 10 से 15 मज़दूर काम कर रहे थे. पहले महीने ही दो कांट्रेक्टर को वापस भेज दिया, अब बुलाया है. मगर अब किसी कांट्रेक्टर के पास दो से तीन मज़दूरों से ज्यादा का काम नहीं है यानी हर किसी के 10 से 12 मज़दूरों से काम छिन गया है.

हम जीएसटी की समस्या को पोर्टल तक ही सीमित न रखें, इसके कारण व्यापार जो मंदा पड़ा है और दिहाड़ी पर कमाने वालों के हाथ से जो काम छिना है, उसका कोई हिसाब नहीं है. एक प्रणाली और तीन टैक्स वाली जीएसटी के आगमन का स्वागत 15 अगस्त 1947 की मध्यरात्रि की तरह किया गया, जीएसटी के कारण जिनके पेट पर चोट पड़ी है, क्या उन्हें बुलाकर संसद में सम्मानित नहीं करना चाहिए. पिछली बार प्राइम टाइम में जब हम बैंक हड़ताल पर बात कर रहे थे तो एक आवाज़ सुनाई दी कि बैंकिंग सेक्टर में नौकरियां कम हो गई हैं. आम तौर पर इस साल तक बैंक भर्तियों के लिए आई बी पी एस को बता देती है,इंस्टीट्यूट आफ बैंकिंग पर्सनल सलेक्शन नाम की यह संस्था बैंक सेवाओं में भर्तियों के लिए परीक्षा आयोजित करती है. आई बी पी एस की वेबसाइट से जो डेटा मिला है, उसे देखते हैं.

2015 में 24, 604 क्लर्कों की भर्ती का विज्ञापन निकला था. 2016 में 19, 243 क्लर्कों की भर्ती का विज्ञापन निकला. एक साल में क्लर्कों की भर्ती में 5,361 की कमी आ गई. 2017 में 7,883 क्लर्कों की भर्ती की वेकैंसी आई है. 2016 से 17 के बीच 11,360 पद कम हो गए.

2015 की तुलना में सौलह हज़ार वैकेंसी कम हो गई है. नौजवान आज बेरोज़गारी के रेगिस्तान में खड़ा है और आपका नेता कब्रिस्तान की बात कर रहा है. इससे साफ साफ और इससे ज़्यादा कुछ नहीं कह सकता. अब आते हैं प्रोबेशनर आफिसर पीओ की संख्या पर. यहां भी कहानी दुखद है.

2015 में 12,434 पोस्ट पीओ का निकला था. 2016 में सीधा 3612 कम हो कर 8,822 हो गया. 2017 में 3,562 पीओ की ही वैकेंसी निकली है. यानी 2015 की तुलना में 2017 में करीब 9000 कम वेकैंसी आई है.

आज के ही इंडियन एक्सप्रेस प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना पर एक रिपोर्ट छपी है. आंचल मैगज़ीन और अनिल ससी की रिपोर्ट आप भी पढ़ियेगा. स्किल डेवलपमेंट मंत्रालय ज़िला स्तर पर मांग और आपूर्ति की समीक्षा कर रहा है, डेटा जमा कर रहा है. जुलाई 2017 के पहले हफ्ते तक के डेटा को देखने के बाद जो तस्वीर सामने आ रही है वो भयावह है. उसी से पता चलता है कि क्यों मीडिया रोज़गार की बात नहीं करता, क्यों हिन्दू मुस्लिम टापिक की बात करता है. एक्सप्रेस की इस रिपोर्ट में लिखा है कि

अभी तक कौशल विकास योजना के तहत 30 लाख 67 हज़ार लोगों को प्रशिक्षण दिया गया है या दिया जा रहा था. इनमें से मात्र 2 लाख 90 हज़ार को ही काम मिला है. 12,000 करोड़ की इस योजना के तहत चार साल में एक करोड़ युवाओं को ट्रेनिंग देने का लक्ष्य है.

अब ये चिंतन हो रहा है कि कहीं ट्रेनिंग की क्वालिटी तो औसत नहीं है. पर क्या क्वालिटी इतनी औसत थी कि 30 लाख में से तीन लाख को भी रोज़गार नहीं मिला तो फिर इस योजना के तहत ठीक क्या था. क्या यह आंकड़ा डराने वाला नहीं है, क्या अब भी आप नौजवानों के भविष्य की चिंता छोड़कर हिन्दू मुस्लिम टापिक पर बहस देखना चाहेंगे. करना क्या है, नौजवानों को दंगाई बनाना है या नागरिक बनाना है. हमारे देश में रोज़गार को लेकर कोई विश्वसनीय और पारदर्शी डेटा सिस्टम नहीं है. इतनी चीज़ों के ऐप बनते हैं, एक ऐप इसी का बन जाता जिससे यही पता चलता कि इस महीने सेंटर के किस विभाग ने या राज्य सरकारों के किस विभाग ने नौकरियां निकाली हैं. मगर सरकारें नहीं बताएंगी क्योंकि आप हकीकत जान जाएंगे. सुशील महापात्रा की रिपोर्ट देखिए, जीएसटी के असर पर क्या कहते हैं रिसाइक्लिंग फैक्ट्री वाले.


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