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गुजरात चुनाव : हिले-हिले से मेरे सरकार नजर आते हैं!

कांग्रेस हिल गई क्योंकि उसने सब कुछ सीखा लेकिन शहर की हवा बदलने का फार्मूला बीजेपी से नहीं चुरा पाई, हार्दिक को समझ नहीं आ रहा कि वराछा रोड शो पर जब लाखों लोग सड़क पर आए तो फिर वो सीट लंबे-चौड़े तरीके से कैसे हार गए? बीजेपी में इतना कुछ हिल-डुल गया है कि न हंसा जाए न रोया जाए...

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गुजरात चुनाव : हिले-हिले से मेरे सरकार नजर आते हैं!
पिछले 24 घंटों में गुजरात में बहुत कुछ बदला है. जो जहां था अब वह वहां नहीं है. यह नए गणित और समीकरणों की शुरुआत भी है. बीजेपी अब तीन बड़े शहरों अहमदाबाद, सूरत और वडोदरा की कर्जदार है, जिसने उसे मुसीबत से उबार लिया. सूरत ने तो मानो 180 डिग्री की पलटी खाई. जहां कैमरे व्यापारियों को नारे लगाते और लाठी खाते मजदूरों को दिखाते थे वहां जश्न बीजेपी का है.

अहमदाबाद और वडोदरा में अगर कांग्रेस कुछ खाता खोल देती तो सब बदला सा नज़र आता. कांग्रेस हिल गई क्योंकि उसने सब कुछ सीखा लेकिन शहर की हवा बदलने का फार्मूला बीजेपी से नहीं चुरा पाई. गांव वाले हार्दिक, जिग्नेश और अल्पेश चेहरे तो बने लेकन इनकी गुजराती शहरों में अपील नहीं थी. कांग्रेस डर गई कि शहरों को लुभाने के चक्कर में गांव न छूट जाएं.

हिली हुई कांग्रेस के साथी भी हिले हुए हैं. हार्दिक हिले हैं क्योंकि समझ नहीं आ रहा कि वराछा रोड शो पर जब लाखों लोग सड़क पर आए तो फिर वो सीट लंबे-चौड़े तरीके से कैसे हार गए? जब सूरत में लाठी-गोली चले तो फिर खून की पुकार का नारा काम क्यों नहीं आया? मेहसाणा में जिन उप मुख्यमंत्री की सरेआम खिल्ली उड़ाई जा रही थी वे जीत कैसे गए? जो चुनाव के पहले अहमदाबाद से सीट के जुगाड़ में थे वे मेहसाणा से कैसे आ गए? हारने वाले हार्दिक और जीतने वाले नितिन पटेल दोनों हिले हैं. किले ढह गए हैं. हार्दिक के संग हिलने वालों में तो अल्पेश और जिग्नेश भी हैं. अपने लोगों के लिए टिकट मांगे, लेकिन जिताने की बारी आई तो खुद की सीट बचाने भाग गए. वे इसलिए भी हिल गए कि नारे-रैली एक बात है, मोदी के गुजरात में जब जीत-हार की बात आएगी तो इतना बड़ा तंत्र खड़ा हो जाता है जिसका मुकाबला हिला देगा.

कांग्रेस के गुजराती नेता तो और भी हिले हुए हैं. त्रिमूर्ति खंडित हो गई. साबित हो गया कि कांग्रेस की पुरानी पीढ़ी की राजनीतिक पारी को बाय-बाय करने का टाइम है. और अब जिग्नेश अल्पेश बनेंगे.

हिली-हिली सी तो बीजेपी भी है. वहां तो इतना कुछ हिल-डुल गया है कि न हंसा जाए न रोया जाए.  अंदर खाने बीजेपी सवाल पूछ रही है कि इन किसानों का क्या करें? सवाल तो अब पार्टी चीफ खुद से भी पूछ रहे होंगे कि इतने मजबूत विपक्ष से क्या विजय रूपाणी निपट पाएंगे? हिल तो दिन में भी गए थे, जब नंबर पलट रहे थे, और जो खतरा बहुत दूर था अब वह उतना दूर भी नहीं, कई तीस मार खां हारते-हारते जीते हैं. सिम्पल मतवाली सरकार वैसे भी सिरदर्द है, कई सारे हाथ खड़े होंगे और अंदर खाने मोलभाव की ताकत कईयों को मिल जाएगी.

कुल मिलाकर गुजरात में यह हिलने-डुलने का टाइम है. जो जहां था वह अब वहां कब तक रहेगा किसी को नहीं पता.

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(अभिषेक शर्मा एनडीटीवी में रेसीडेंट एडिटर हैं)

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति एनडीटीवी उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं. इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार एनडीटीवी के नहीं हैं, तथा एनडीटीवी उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है.



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