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क्‍या सुप्रीम कोर्ट ने एससी/एसटी एक्‍ट को कमजोर नहीं किया है?

एससी/एसटी एक्ट में एफआईआर दर्ज करने की प्रक्रिया के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट के नए फैसले के ख़िलाफ़ उत्तर भारत के कई जगहों पर हिंसा हुई है. इस हिंसा में 7 लोग मारे गए और कई लोग घायल हुए हैं.

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क्‍या सुप्रीम कोर्ट ने एससी/एसटी एक्‍ट को कमजोर नहीं किया है?

सोमवार को देशभर के कई हिस्‍सों में दलितों ने प्रदर्शन किया

आज़ादी के बाद दलित राजनीति का एक बड़ा पक्ष रहा है बिना हिंसा के आंदोलन, आज वो टूट गया. हिंसा किसने की, कैसे हुई इसका आधिकारिक पक्ष आता रहेगा मगर तस्वीरों में जो दिख रहा था, वह दलित आंदोलन का हिस्सा कभी नहीं रहा. एससी/एसटी एक्ट में एफआईआर दर्ज करने की प्रक्रिया के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट के नए फैसले के ख़िलाफ़ उत्तर भारत के कई जगहों पर हिंसा हुई है. इस हिंसा में 7 लोग मारे गए और कई लोग घायल हुए हैं. बड़ी संख्या में सरकारी और प्राइवेट संपत्तियों को नुकसान पहुंचा है. हिंसा का समर्थन नहीं किया जा सकता है. एक भीड़ जब हिंसा का सहारा लेती है तब वह अपने आंदोलन से नियंत्रण खो देती है. ठीक है कि दूसरी तरह की भीड़ अक्सर हिंसा का सहारा लेती है मगर दलित आंदोलन का इतिहास संवैधानिक रास्तों पर चलने का रहा है. तो क्या यहां से कोई नया मोड़ आ गया है. सुप्रीम कोर्ट के आदेश के खिलाफ राय रखी जा सकती है मगर हिंसक प्रदर्शन करने का तरीका उसी संविधान के खिलाफ है जिसकी रक्षा के लिए कई जगहों पर आंदोलनकारी सड़कों पर उतरे थे.

आखिर टीवी चैनलों पर दिख रहा पिस्तौल चलाने वाला शख्स कौन है, जो दीवार के सहारे से निकलता है और पीछे से भीड़ के ऊपर गोली चला देता है. ग्वालियर के इस शख्स की पहचान अभी तक क्यों नहीं हो सकी है. इसके बारे में सोशल मीडिया में कई तरह की बातें हो रही हैं. वीडियो से पता नहीं चल रहा है कि गोली चलाने की वजह क्या रही है, पीछे से गोली क्यों चलाई जा रही है. इस चेक शर्ट वाले नौजवान के हाथ में बंदूक कहां से आई, बंदूक लेकर आंदोलन में आने की अनुमति किसने दी. मध्य प्रदेश में ग्वालियर, भिंड, मुरैना में पांच लोग मारे गए हैं. यूपी के आज़मगढ़ में दो बसों में आग लगाई गई है. दर्जनों बसों में तोड़ फोड़ हुई है. इन बसों में विदेशी पर्यटक भी थे. मुज़फ्फरनगर में बैंक के एटीएम में आग लगा दी गई. बैंक के अफसरों की गाड़ियां भी जला दी गई हैं. मेरठ में भी टकराव हुआ लेकिन यहां पुलिस लोगों को घर से निकाल कर मारती दिखी. मेरठ में एक आंदोलनकारी को गोली लगी है जिसे अस्पताल में भर्ती कराया गया है. पत्रकारों के भी कैमरे तोड़ दिए गए हैं. वाहनों को आग लगाई गई है. घरों से निकाल कर भी पुलिस मारती दिखी है. कमाल खान ने बताया कि पश्चिम उत्तर प्रदेश में इसका प्रभाव ज़्यादा है. फिरोज़ाबाद, झांसी में प्रदर्शन आक्रामक हो गया. राजस्थान के अलवर में भी हिंसा हुई है. दो जगहों पर फायरिंग हुई है. इंटरनेट सेवा बंद करनी पड़ी है. अलवर में भी दो लोगों की मौत हुई है. सीकर में भी धारा 144 लागू कर दी गई है. बिहार के कई ज़िलों में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए हैं. लोग बड़ी संख्या में सड़कों पर सुप्रीम कोर्ट के नए फैसले के खिलाफ उतरे थे. मगर हिंसा की इन तस्वीरों ने आंदोलन की बहस किसी और दिशा में मोड़ दी है. यमुनानगर में पुलिस आंदोलनकारियों को पीटती नज़र आई है. तो दोनों तस्वीरें हैं. एक तरफ आम लोगों की हिंसा की तस्वीरें हैं तो दूसरी तरफ पुलिस द्वारा बल प्रयोग की तस्वीरें भी हैं. पुलिस ने इन्हें पीटा भी है. कई जगहों पर पुलिस ने लाठी चार्ज किया है.

आंदोलन के बाद हिंसा की निंदा और आंदोलन से पहले हिंसा न करने की अपील के बाद भी हिंसा नहीं टली. मगर बहुत जगहों पर आंदोलन शांतिपूर्ण भी रहा. प्रशासन की हालत देखकर लग रहा था कि इसकी तैयारी बिल्कुल नहीं थी. कई जगहों पर पुलिस की आक्रामकता भी दिखी. वैस आक्रामकता कर्णी सेना के वक्त कहीं नहीं दिखी थी या उन जगहों पर तो बिल्कुल नहीं जहां सांप्रदायिक तनाव भड़काने के मकसद से जुलूस निकाले जाते हैं. कई जगहों पर भीड़ भी पुलिस पर हमले कर रही थी. आम दुकानदारों पर भी हमला हुआ.

इस आंदोलन के दो पक्ष थे. एक जो अपने साथ हुई नाइंसाफी के लिए लड़ रहा था तो एक व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी में इसे जाति का ज़हर बताकर अनाप शनाप बातें फैला रहा था. ये वही लोग हैं जो अन्य दिनों में धार्मिक उन्माद फैलाने वाले मेसेज भेजते रहते हैं. एक एक्ट के प्रावधान में बदलने की लड़ाई को व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी में आरक्षण बचाओ बनाम आरक्षण मिटाओ में बदल दिया गया. यह खेल भीतर भीतर खेला जा रहा था मगर इन्हें पता नहीं था कि भारत सरकार मज़बूती से सुप्रीम कोर्ट में उसके फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दायर करने के लिए बढ़ चुकी थी. सरकार का हर हिस्सा सुप्रीम कोर्ट के आदेश से असहमति जता रहा था. प्रकाश आंबेडकर ने कहा, 'किसने भारत बंद का आह्वान किया किसी को पता नहीं लेकिन सोशल मीडिया पर लोगों का इस आदेश के प्रति इतना रोष था कि लोग अपने आप सड़कों पर आ गए.'

सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश ने भारत के राजनीतिक दलों में बेचैनी पैदा कर दी है. एक तरफ पासवान सरकार की तरफ से मोर्चा ले रहे थे तो दूसरी तरफ राहुल गांधी कह रहे थे कि दलितों को समाज के सबसे नीचले पायदान पर रखना आरएसएस और बीजेपी के डीएनए में है, जो इस सोच को चुनौती देता है, उसे हिंसा से दबाते हैं. मगर पासवान की यह बात समझ नहीं आई कि रामविलास पासवान प्रकाश आंबेडकर से इतने नाराज़ क्यों हैं.

सच्चाई यह है कि समाज में हम इतने स्तरों पर बंटे हैं, एक दूसरे खिलाफ इतनी तरह की धारणाएं पाल कर रखते हैं कि कब कौन सी चिंगारी आग में बदल में जाए, कहा नहीं जा सकता. जाति को लेकर अलगाववाद आज भी उसी तरह से है जैसा पहले था. हमारी संस्थाएं अगर सक्षम होतीं तो सामाजिक तबकों के बीच अविश्वास इतना गहरा न होता और जाति के नाम पर हिंसा करने की हिम्मत नहीं होती.

इन सबके बीच मगर देश भर के दलित अपने मुद्दों को साफ-साफ देख रहे थे कि उनके खिलाफ जातिवादी हिंसा जो अभी तक जारी है, उसके खिलाफ जो भी कानूनी संरक्षण है, वो कमज़ोर किया जा रहा है. खुद से पूछिए कि क्या समाज में छूआछूत मौजूद नहीं है, अपने आस-पास या अपने व्यवहार या सामाजिक अनुभवों में झांक कर देखिए तो इसकी तस्वीर नज़र आ जाएगी. इस सच्चाई से भागते भागते धर्म की आड़ में छिपने से कुछ नहीं होने वाला है. हर अपराध का संबंध जाति से नहीं है मगर क्या यह सच नहीं है कि दलितों के साथ जाति के कारण भी अपराध किया जाता है. घोड़ा ख़रीद लिया तो मार दिया गया. शादी के लिए घोड़ी पर चढ़ गया तो मार दिया गया. आए दिन जाति को लेकर हिंसा की खबरें आती रहती हैं. रविवार के इंडियन एक्सप्रेस में एक खबर थी, आपको पढ़नी चाहिए. हाथरस में एक दलित युवक संजय कुमार ने इलाके के थानेदार से लेकर डीजीपी से लेकर मुख्यमंत्री से लेकर अनुसूचित जाति जनजाति आयोग, स्थानीय अखबारों सबको पत्र लिखा है कि उसे ठाकुर बहुल गांव से अपनी बारात ले जाने की अनुमति दी जाए. 15 मार्च को संजय ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में भी याचिका दायर की है. आप हैरान हो जाएंगे ने एसपी ने पूरे रूट की जांच की है और यह भी पता लगाया है कि पिछले 20 साल में किसी जाटव ने शाही तरीके से शादी की है या नहीं.

भारत में घड़ी चोरी की एफआईआर कराने जाइये तो पसीने छूट जाते हैं. जांच की क्या साख है इस पर समय बर्बाद करने की ज़रूरत नहीं. इसलिए व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के तथ्यों पर भरोसा करने से से पहले राष्ट्रीय अपराध शाखा ब्यूरो के आंकड़े देख लेने चाहिए. 20 मार्च को इंडियन एक्सप्रेस ने एससी/एसटी एक्ट के मामलों पर लंबी रिपोर्ट छापी थी, एनसीआरबी आंकड़ों के अनुसार] 2010 से 2016 तक आईपीसी के तहत एससी के खिलाफ अपराध में वृद्धि रही 10%, एसटी के खिलाफ 6%. इन वर्षों में अनुसूचित जाति के मामलों में लंबित मुकदमों की संख्या 78% से बढ़कर 91% हो गई और अनुसूचित जनजाति के मामलों में लंबित मुकदमों की संख्या 83% से बढ़ कर 90% हो गई. जबकि 2007-17 के बीच दलितों के खिलाफ़ 66% अपराध बढ़ा. पिछले दस साल में दलित महिलाओं से बलात्कार लगभग दोगुना हो गया.

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इसका मतलब सज़ा की दर कम हो गई. फैसला आने में देरी बढ़ती जा रही है. जिन मामलों में ट्रायल पूरा हुआ उनमें भी आरोपियों के छूटने की दर अधिक है. इसका एकमात्र मतलब यह नहीं आरोप झूठे थे. आखिर क्या हुआ कि एससी एसटी एक्ट के तहत 2010 में सज़ा की दर 38 प्रतिशत थी जो 2016 में 10 फीसदी हो गई. इतनी गिरावट क्यों आई. 1996 के बथानी टोला हत्याकांड के 23 रणवीर सेना के आरोपियों को पटना हाई कोर्ट ने 2012 में बरी कर दिया. 1997 के लक्ष्मणपुर बाथे हत्याकांड के 26 रणवीर सेना को आरोपियों को पटना हाईकोर्ट ने 2013 में बरी कर दिया.

इन दोनों हत्याकांड में 79 दलितों की मौत हो गई थी, सबके बरी होने के बाद क्या मान लें कि मुकदमा फर्जी रहा होगा. क्या आप यह नहीं समझ सकते कि किन ताकतों को किन लोगों ने बचाया. कमज़ोरी पुलिस व्यवस्था में है तो सज़ा समाज को क्यों मिले. वैसे भी अगर आपके खिलाफ कोई झूठा मुकदमा करता है, द्वेषपूर्ण केस करता है तो उसके खिलाफ भी मुकदमा करने के कानून हैं. उसे सज़ा होगी और आप को मुआवज़ा मिलेगा. इस मामले में हर पक्ष पीड़ित है क्योंकि भारत की न्याय प्रणाली वाकई थका देने वाली है. अगर किसी ने गलत सबूत दिए हैं तो उसे आईपीसी की धारा 193 के तहत सात साल की सज़ा हो जाती है. झूठा केस दर्ज करने पर आईपीसी की धारा 182 और 211 के अंतर्गत सज़ा भी हो सकती है. कायदे से अदालत को इसका रिकॉर्ड देखना चाहिए. सवाल है कि अगर एससी/एसटी एक्ट में एफआईआर के लिए एसएसपी से अनुमति लेनी होगी, इसके लिए एसएसपी को कारण बताना होगा और मजिस्ट्रेट उन कारणों की जांच करेगा. अगर यही तरीका है तो फिर हर मामलों में ये प्रावधान होना चाहिए क्योंकि दुरुपयोग तो वहां भी होता है या हो सकता है.


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