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एक पत्र आया है, चर्चा इस पर कीजिए

आज हम आपको एक ऐसी व्यवस्था के बारे में बताने जा रहे हैं जो किसी भी स्वतंत्र प्रजातांत्रिक देश के मुंह पर एक तमाचा है.

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एक पत्र आया है, चर्चा इस पर कीजिए

रवीश कुमार (फाइल फोटो)

आज हम आपको एक ऐसी व्यवस्था के बारे में बताने जा रहे हैं जो किसी भी स्वतंत्र प्रजातांत्रिक देश के मुंह पर एक तमाचा है. आप कल्पना भी नहीं कर सकते आजाद भारत में एक ऐसी व्यवस्था भी चल रही है जो की पूर्णता असंवैधानिक अनैतिक तथा मानव मूल्यों के खिलाफ है. और यह व्यवस्था किसी साहूकार या निजी कंपनियों द्वारा नहीं चलाई जा रही है बल्कि यह व्यवस्था स्वयं शासन के द्वारा चलाई जा रही है. जी हां, मैं बात कर रहा हूं मध्य प्रदेश पॉलिटेक्निक अतिथि व्याख्याताओं के लिए बनाए गए नियमों के बारे में इन नियमों के तहत अतिथि अध्यापकों को प्रति कालखंड सिर्फ 275 का भुगतान किया जाता है. अगर किसी दिन किसी भी कारण से कक्षा नहीं लगती है तो उस दिन अतिथि व्याख्याताओं को कोई भी भुगतान नहीं किया जाता है. अतिथि व्याख्याताओं को सप्ताहिक अवकाश यानी रविवार के दिन कोई भी भुगतान नहीं किया जाता. अतिथि व्याख्याताओं को दशहरा, दीपावली, ईद, रक्षाबंधन किसी भी शासकीय अवकाश पर कोई भी भुगतान नहीं किया जाता. और तो और इन अतीथि व्याख्याताओं को 15 अगस्त तथा 26 जनवरी जैसे राष्ट्रीय पर्व पर किसी भी प्रकार के वेतन देने का कोई नियम नहीं है. अगर अतिथि व्याख्याता की तबियत खराब होती है और वह किसी कारण से महाविद्यालय में कक्षा नहीं ले पाते हैं उस दिन उन्हें कोई भी भुगतान नहीं किया जाता है. इन्हें किसी भी प्रकार के आकस्मिक मेडिकल तथा किसी भी प्रकार की छुट्टियों की पात्रता नहीं है. अब हम बात करते हैं व्याख्याताओं के लिए क्या योग्यता है. जी हां पॉलिटेक्निक महाविद्यालय में अतिथि व्याख्याताओं की योग्यता इंजीनियरिंग से स्नातक तथा पोस्ट ग्रेजुएशन यानी Mtech है. कई अतिथि व्याख्याता पीएचडी डिग्री है.

अतिथि व्याख्याता, जी हां सुनने में यह पद बड़ा ही गरिमा में गौरव का प्रतीत होता है. व्याख्याता अतः शिक्षक जो राष्ट्र निर्माण में तथा छात्रों के चरित्र निर्माण में संपूर्ण भूमिका का निर्वहन करते हैं. दूसरा अतिथि, जैसे हमारे देश की परंपरा है अतिथि देवो भव, किंतु इतना गरिमामय नाम होने के पश्चात भी इनके साथ बंधुआ मजदूरों तथा नौकर-चाकर जैसा व्यवहार किया जाता है. अतिथि व्याख्याताओं को सेमेस्टर शिक्षा प्रणाली होने के कारण प्रति सेमेस्टर 6 माह की वेतन मिलती है. अतः प्रतिवर्ष सिर्फ 6 महीने की वेतन का भुगतान किया जाता है बाकी के 6 महीने इन्हें बिना वेतन के ही गुजारा करना पड़ता है. अतिथि व्याख्याता अन्य नियमित व्याख्याताओं के समान ही परीक्षा में ड्यूटी देने से लेकर के महाविद्यालय में अनुशासन बनाए रखने से लेकर एडमिशन करवाने से लेकर कॉपियों के मूल्यांकन तक का समस्त कार्य देखते हैं तथा विगत कई वर्षों से विधिवत संचालित करते हैं. अगर मध्य प्रदेश तकनीकी एवं शिक्षा विभाग की जानकारी निकाली जाबे तो कम से कम 90% कॉपियां चेक करने का कार्य अतिथि व्याख्याताओं के द्वारा ही किया जाता है. अतः इनकी योग्यता में कोई कमी नहीं है. इनकी कार्य क्षमता में कोई कमी नहीं है. फिर भी इन्हें एक समान वेतन तो छोड़ो इतना वेतन भी नहीं दिया जाता है कि यह अपने घर का निर्वहन भी चला सकें. अतिथि व्याख्याता को एक सरकारी चपरासी से भी कम तनख्वाह मिलती है. मध्य प्रदेश पॉलिटेक्निक अतिथि व्याख्याता संघ के अध्यक्ष योगेश इंदौरिया ने बताया कि व्याख्याताओं को प्रतिमाह औसतन 3000 मिलते हैं.

नियमों में स्पष्ट कमियों को देखते हुए शासन द्वारा उच्च शिक्षा विभाग के अतिथि व्याख्याताओं को 30000 प्रतिमाह वेतन वर्तमान सत्र से कर दिया गया है किंतु पॉलिटेक्निक महाविद्यालय के अतीथि व्याख्याताओं को अभी भी प्रति कालखंड के हिसाब से ही भुगतान किया जाता है. क्या शासन को इस तरह से दोहरे मापदंड अपनाने का अधिकार है? क्या शासन उच्च शिक्षा विभाग के अतीत व्याख्याताओं को 30000 प्रतिमाह दे और तकनीकी शिक्षा एवं प्रशिक्षण विभाग शिक्षा के अंतर्गत पॉलिटेक्निक महाविद्यालय के शिक्षकों को मात्र 275 का भुगतान करे. यह न्याय की कसौटी में सही है?

सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार मध्य प्रदेश के पॉलिटेक्निक महाविद्यालय शासन तथा प्रशासन की अनदेखी के कारण विगत कई वर्षों से नए पद का सृजन नहीं किया गया है जबकि एआईसीटीई नॉर्म्स के अनुसार मध्यप्रदेश में लगभग 700 से लेकर 750 व्याख्याताओं के पद की आवश्यकता है तथा वर्तमान में पॉलिटेक्निक महाविद्यालय में आवश्यकता के अनुसार जिससे की कक्षाओं का संचालन सुचारू रूप से हो सके उतनी ही संख्या में अतिथि व्याख्याताओं की नियुक्ति की गई है. परंतु शासन तथा प्रशासन की गलती के कारण उतनी संख्या में नए पद सृजित नहीं किए गए हैं. इस कारण से पॉलिटेक्निक महाविद्यालय के अतिथि व्याख्याताओं को 30000 का लाभ नहीं मिल पा रहा है. कुल मिलाकर शासन और प्रशासन की गलती का पूरा खामियाजा अतिथि व्याख्याताओं तथा छात्र छात्राओं को उठाना पड़ रहा है.

अब हम बात करें अतिथि व्याख्याताओं द्वारा किए गए संघर्ष की. जी हां, यह संघर्ष है देश के पढ़े-लिखे नव युवाओं का जो कि संख्या बल की दृष्टि से तथा आर्थिक दृष्टि से काफी कमजोर है फिर भी उन्होंने संवैधानिक तरीके से अपनी लंबी लड़ाई लड़ी है और शासन तक अपनी बात को पहुंचा दिया है. अब शासन का फर्ज है कि वह है अतिथि व्याख्याताओं की मांगों को पूरा करे तथा उनके साथ इंसाफ करे. मध्य प्रदेश पॉलिटेक्निक अतिथि व्याख्याता संघ के आवाहन पर मध्य प्रदेश के सभी पॉलिटेक्निक महाविद्यालयों के अतिथि व्याख्याताओं ने सभी प्रशासनिक अधिकारियों जैसे कलेक्टर, SDM इत्यादि को समय समय पर अपनी मांगों को लेकर के ज्ञापन सौंपा समस्त जनप्रतिनिधियों सांसदों विधायकों मंत्रियों को ज्ञापन सौंप कर के शासन तक अपनी बात पहुंचाई है तथा पिछले 10 दिन 29 अगस्त 2018 से लेकर के 7 सितंबर 2018 तक हड़ताल की इस दौरान अतिथि व्याख्याता नियमित रूप से संवैधानिक तरीके से ज्ञापन के माध्यम से अखबारों के माध्यम से मीडिया के माध्यम से अपनी बात सरकार तक पहुंचाते रहे. इसी तारतम्य में अतिथि व्याख्याताओं ने 5 सितंबर को भोपाल जाकर शांतिपूर्वक ढंग से धरना प्रदर्शन किया तथा सभी 67 पॉलिटेक्निक महाविद्यालय के लगभग 500 अतिथि व्याख्याताओं ने काली टोपी पहनकर के हाथ में तख्तियां लेकर के तथा नारेबाजी करके विधायक विश्रामगृह से लेकर राज्यपाल भवन तक पैदल मार्च निकाला तथा राज्यपाल को अपनी मांगों को लेकर महामहिम राष्ट्रपति के नाम अपना ज्ञापन सौंपा तथा मांगे पूरी ना होने की स्थिति में माननीय महामहिम राष्ट्रपति से इच्छा मृत्यु मांगी है.

यह कैसा लोकतंत्र है, यह कैसा प्रजातंत्र है जहां पर अतिथि शिक्षकों को दाने दाने के लिए मोहताज किया जा रहा है क्या यह अतिथि शिक्षक अपने छात्र छात्राओं को गौरव और स्वाभिमान शिक्षा दे पाएंगे यह एक बड़ा प्रश्न है.

आज सरकार हर तरफ डिजिटल इंडिया कौशल विकास तथा कौशल्य विकास जैसी योजनाओं के बदौलत भारत को स्वर्णिम शिखर पर ले जाने का ख्वाब देख रही है वहीं दूसरी ओर BE, MTech, PhD किए हुए युवाओं को 275 कालखंड पर कार्य करने के लिए विवश कर रही है. आखिर किसकी बदौलत भारत बनेगा डिजिटल इंडिया, आखिर किसके कंधों पर कौशल विकास तथा कौशल्य विकास जैसी योजनाओं का क्रियान्वयन किया जाएगा. निश्चित ही इंजीनियर के कंधों पर किंतु जब एक सरकारी सिस्टम में ही इंजीनियर के साथ अमानवी व्यवहार होगा असंवैधानिक व्यवहार होगा तो हम कैसे तकनीकी में दक्ष इंजीनियर को पैदा कर पाएंगे?

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नोट- पत्र मध्य प्रदेश का है मगर कई राज्यों में ऐसी हालत है. अगर ऐसी नीतियां नहीं बदलीं तो आप नौजवानों का क्या होगा. पंजाब, बंगाल, बिहार, राजस्थान, यूपी, दिल्ली हर जगह ये स्थिति है.

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) :इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति NDTV उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं. इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार NDTV के नहीं हैं, तथा NDTV उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है.


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