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न्याय की चौखट पर इतना अन्याय क्यों? रवीश कुमार के साथ प्राइम टाइम 

17 साल का था नितिन आगे जब 28 अप्रैल 2014 को उसकी हत्या हो गई. पिता का आरोप है कि ऊंची जाति की एक लड़की से नितिन बात करता था. लड़की दसवीं कक्षा में पढ़ती थी. ऊंची जाति के लोगों को यह बात अच्छी नहीं लगी. नितिन को गांव के बीच पीट-पीट कर मार डाला गया.

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न्याय की चौखट पर इतना अन्याय क्यों? रवीश कुमार के साथ प्राइम टाइम 
मीडिया के कारखाने में हर दिन एक बड़ी कहानी पैदा होती है. अब तो मीडिया के लिए हर दिन कहानियां पैदा भी की जाती हैं, जैसे आप पानी में जहाज़ ले आए या अगले दिन मंदिर की सीढ़ियां चढ़ते हुए दर्शन के लिए चले गए. मीडिया पहले अपने पत्रकारों को ट्रेनिंग देता है कि आज की कहानी ही बड़ी कहानी होती है और फिर उसके साथ आपको ट्रेनिंग मिलती चली जाती है कि जो आज है वही कहानी है. अगले दिन जब यह कहानी मीडिया से धक्का देकर बाहर की जाती है तब क्या हम पत्रकारों या फिर आप दर्शकों में से किसी को पता भी रहता है कि ये कहानियां कैसे अपनी यात्रा करती हैं. कौन उन कहानियों को मंज़िल तक ले जाता है. कौन कहानियां झूठी साबित हो जाती हैं और किस कहानी का कभी कोई अंत ही नहीं होता. उसे कोई अपनी पीठ पर ढो रहा होता है.

मीडिया में आने के बाद भी और मीडिया से बाहर हो जाने के बाद भी कहानियों का अंजाम इंसाफ़ की मज़िल तक पहुंचेगा, इसकी कोई गारंटी नहीं है. न्याय हासिल करने से पहले की जो सीढ़ियां हैं, उन्हें बहुत पैसे वाला ही चढ़ सकता है. ग़रीब भी चढ़ जाता है मगर वह टूट जाता है. सिस्टम के सितम में हम आपको एक घर दिखाना चाहते हैं. हम चाहते हैं कि आप कल्पना करें कि उस घर में आप रह रहे होते तो क्या न्याय के लिए लड़ने का साहस जुटा पाते.

टिन के इस घर में रहते हुए क्या आप तीन साल तक अपने बेटे, भाई, या पिता की मौत का इंसाफ़ पाने की लड़ाई लड़ सकते हैं. हम जिस भारत का जश्न टीवी पर मनाते हैं, पानी में उस जहाज को उतार सीना फुलाते हैं जो द्वितीय विश्व युद्ध से दुनिया भर में पानी में उतर रहा है, क्या उस भारत के इस मकान में रहते हुए आप समाज और न्याय व्यवस्था से लड़ते हुए इंसाफ पा सकते हैं. क्या मकान की ये हालत आपको हिम्मत देती है, आपको दिलासा दे रही है कि लड़ेंगे मगर इंसाफ लेकर रहेंगे. अगर आपमें इंसाफ के लिए लड़ने की हिम्मत आती है तो आप वाकई कमाल के व्यक्ति हैं. आप उन चंद लोगों में हैं जो अपना सब गंवा देते हैं मगर इंसाफ की लड़ाई नहीं छोड़ते हैं. लेकिन हमारा सिस्टम क्या उस लड़ाई को आसान बनाता है, जितनी आसानी से साबरमती में पानी का जहाज़ उतर गया और उड़ गया. क्या उतनी आसानी यह सिस्टम उड़ान भरने देता है. 

सिस्टम के सितम में आज हम टिन के इस मकान में रहने वाले एक पिता राजू आगे की बात करेंगे. महाराष्ट्र का एक ज़िला है अहमदनगर, इस ज़िले के जामखेड़ तालुका का एक गांव है खरडा. इसी गांव के रहने वाले हैं राजू आगे. आइये आपको खर्डा गांव ही ले चलते हैं. गांव के बाहर आपको कस्बे का अहसास कराएगा. चहल पहल के हिसाब से गांव से ज़्यादा लगता है. 15 हज़ार की आबादी वाला यह बड़ा गांव है. इसी गांव के एक छोर पर है राजू आगे का यह मकान जो टिन का बना है. इसकी छत पर डिश एंटिना है. घर के भीतर टीवी है मगर दीवार पर अंबेडकर हैं, बुद्ध भगवान हैं और दोनों के बगल में एक लड़के की तस्वीर है जिसका नाम है नितिन आगे. नितिन आगे की तीन साल पहले हत्या कर दी गई थी, जिसके इंसाफ के लिए राजू आगे लड़ाई लड़ रहे हैं.

राजू आगे और नितिन आगे की जाति का उल्लेख बहुत ज़रूरी है क्योंकि जाति के कारण ही नितिन आगे की हत्या हुई थी. 15 हज़ार की आबादी में दलितों की आबादी मात्र 1 हज़ार है. नितिन उस वक्त ग्यारहवीं का छात्र था. कारण आगे बताऊंगा पहले आप उस घर और परिवार को ठीक से देख लीजिए जो सिस्टम से लड़ रहा है. नितिन के पिता राजू आगे मज़दूरी करते हैं. पत्थर तोड़ने का काम करते हैं. महीने में तीन से चार हज़ार कमा लेते हैं. कर्ज़ लेकर बेटे का मुकदमा लड़ रहे हैं. ढाई से तीन लाख खर्च कर चुके हैं. 

महार जाति के हैं राजू आगे. 17 साल का था नितिन आगे जब 28 अप्रैल 2014 को उसकी हत्या हो गई. पिता का आरोप है कि ऊंची जाति की एक लड़की से नितिन बात करता था. लड़की दसवीं कक्षा में पढ़ती थी. ऊंची जाति के लोगों को यह बात अच्छी नहीं लगी. नितिन को गांव के बीच पीट-पीट कर मार डाला गया. एक 17 साल के लड़के की ज़िंदगी इसलिए ख़त्म कर दी गई क्योंकि वह दलित था. नितिन की हत्या किसने की यह साबित नहीं हुआ मगर नितिन की हत्या हुई है, इसे साबित करने की ज़रूरत नहीं है. बताना भूल गया, हम राजस्थान के राजसमंद में एक मज़दूर इफराज़ुल के मार दिए जाने, जला दिए जाने और वीडियो बनाने की घटना से स्तब्ध हैं. नितिन के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ, लोगों ने उसे पीट-पीट कर मार दिया और फिर पेड़ पर लटका दिया. पेड़ से लटका दिया. वसुधैव कुटुंबकम वाला भारत, अहिंसा वाला भारत, वहां एक दलित लड़को को मार कर पेड़ पर लटका दिया जाता है, क्योंकि उसने एक ऊंची जाति की लड़की से बात करता था. पेड़ पर लटकाने से पहले उसे मारने के लिए गांव के कई लोग जमा होते हैं. 

पुलिस ने नितिन की हत्या के मामले में 13 लोगों को आरोपी बनाया था. 13 में से एक आरोपी की जेल में ही मौत हो गई. 12 में से 3 आरोपी नाबालिग थे. 28 अप्रैल 2014 को नितिन की हत्या हुई थी. 23 नवंबर 2017 को अहमदनगर के एक कोर्ट ने सबूतों के अभाव में सभी आरोपियों को रिहा कर दिया. पिता का आरोप है कि हत्या से पहले न्यू इंग्लिश हाई स्कूल खर्डा में नितिन के साथ कुछ लड़कों की हाथापाई हुई. वहां पर शिक्षक और प्राध्यापक भी मौजूद थे. उन सबने बाहर जाकर झगड़ा करने को कहा जैसा कि हर जगह होता है.

राजू के अनुसार स्कूल के बाहर लेकर जाकर नितिन को कथित रूप से नंगा कर दिया गया, पीटा गया और गरम सरिया से बदन पर वार किया गया. फिर फांसी पर लटका दिया गया. राजू मराठी बोलते हैं. मज़दूर हैं टीवी का कायदा मालूम नहीं, प्रवक्ताओं की तरह हेडलाइन की शैली में भी नहीं बोल पाते हैं, इसलिए आपसे अनुरोध है कि राजू की बात को धीरज से सुनिये, मराठी बिल्कुल अच्छी और सरल भाषा है, ध्यान से सुनने पर समझ आ जाती है. 

यहां यह भी सावधानी ज़रूरी है कि कई बार मीडिया को भी मैन्युपुलेट कर खबरें छपवाई जाती है और जो आरोपी नहीं होते उन्हें भी बना दिया जाता है. हमारे देश में फर्जी मुकदमा दायर करने, किसी को झूठे केस में फंसा देना आम बात है. यह सावधानी बेहद ज़रूरी है इसी कहानी के लिए नहीं बल्कि सभी कहानी के लिए. फिर भी 2014 में इस घटना को मीडिया ने काफी कवर किया था. उस वक्त देश में लोकसभा का चुनाव हो रहा था, ज़ाहिर है गहमागहमी किसी और बात को लेकर थी फिर भी सम्राट, जनप्रवास, लोकमंथन. पुण्य नगरी, पुणे मिरर, न्यू इंडियन एक्सप्रेस, हिन्दू, नवभारत टाइम्स, महाराष्ट्र टाइम्स, लोक सत्ता ने इस घटना को छापा था. कुछ अखबार राष्ट्रीय हैं कुछ स्थानीय और कुछ महाराष्ट्र के बड़े अखबार हैं.

6 दिसंबर को नितिन आगे के पिता राजू आगे बीजेपी राज्यसभा सांसद अमर सांबले के साथ मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़णवीस से मिले थे. मुख्यमंत्री ने राजू आगे को आश्वासन दिया कि उन्हे न्याय मिलेगा. यह घटना राजनीतिक रूप से भी संवेदनशील था, हम इस बात को भी बताना चाहते हैं ताकि आपको ध्यान रहें कि नेताओं के पीड़ित परिवारों से मिलने, आश्वासन पाने, फोटो खींचाने और प्रदर्शनों से क्या हासिल होता है. क्या उनका कुछ असर होता है.

दिवंगत गोपीनाथ मुंडे भी इस पीड़ित परिवार से मिले थे. घटना के बाद रामदास अठावले सबसे पहले पीड़ित परिवार से मिले और सांत्वना दी. रामदास अठावले आजकल केंद सरकार में मंत्री हैं. महाराष्ट्र के तात्कालीन गृहमंत्री आरआर पाटिल भी पीड़ित परिवार से मिले थे. उन्होंने कहा था कि यह मामला फास्ट ट्रैक कोर्ट में चलाया जाएगा और विशेष सरकारी वकील की नियुक्ति की जाएगीउस वक्त विरोधी पक्ष के नेता और बीजेपी के राधाकृष्ण विखे पाटिल भी मिले थे. अहमदनगर के तात्कालीन पालक मंत्री मधुकर पिचड़ भी मिले थे. प्रकाश अंबेडकर, प्रकाश गजाभिमे जैसे नेताओं ने भी पीड़ित परिवार से मुलाकात की थी. कांग्रेस नेता रमेश बागवे ने भी पीड़ित परिवार से मुलाकात की थी. शिवसेना के नेता नीलम गोन्हे भी पीड़ित परिवार मिले थे. महाराष्ट्र प्रदेश कांग्रेस के तात्कालीन अध्यक्ष माणिकराव ठाकरे भी मिलने गए थे.

इतनी मुलाकातों से खबर तो बन जाती है. इलाके में लोग जान जाते हैं कि इतने नेता आ रहे हैं तो इंसाफ मिल रहा है. इन सबको अरुण जाधव नज़दीक से देख रहे थे. अरुण जाधव वकील भी हैं और सामाजिक कार्यकर्ता हैं. अरुण राजू आगे की मदद भी कर रहे हैं. हमने अरुण से पूछा कि वकील होकर भी और एक पीड़ित परिवार के साथ होकर लड़ते हुए उन्होंने सिस्टम को कैसे देखा. 

तीन साल से नितिन आगे की हत्या के मामले में दोषी साबित नहीं होता है. जो गिरप्तार होते हैं, एक एक कर छूट जाते हैं. इस पूरे मामले में 26 गवाह थे. इसमें वे भी थे जिन्होंने नितिन के घर जाकर मारपीट की सूचना दी थी. स्कूल के शिक्षक और प्राध्यापक भी गवाह थे. अदालत में सभी अपने बयान से मुकर गए. राजू आगे ने बताया कि कुछ लोगों ने गवाही के लिए उनसे भी पैसे मांगे थे. हमने उनके आरोपों की पुष्टि नहीं की है. साल में जो पत्थर तोड़कर 18 हज़ार भी नहीं कमाता होगा क्या उसे पैसे के दम पर इंसाफ हासिल कर सकता है.

एक बार फिर से इस घर को देखिए. क्या इस घर में रहने वाला, पत्थर तोड़ने वाला एक मज़दूर गवाहों को पैसे दे सकता है? क्या वह मुकदमा लड़ सकता है? राजू ने बताया कि जब 23 नवंबर को फैसला आया तब उन्हें जानकारी भी नहीं थी कि फैसला आने वाला है. राजू के रिश्तेदारों ने बताया कि आरोपी रिहा हो गए हैं. अदालत का फैसला आ गया है. अगर राजू आगे का यह आरोप सही है तो चिंता की बात है. काश हम पुष्टि कर पाते लेकिन आप सोचिए कि ग़रीब को इंसाफ ऐसे मिलेगा. क्या आप अपने बारे में सोचिए कि कहीं किसी दिन सिस्टम की गाड़ी के नीचे आ गए तो क्या आप इतनी आसानी से और बहुत जल्दी इंसाफ ले लेंगे. अदालती फैसलों का आधार जांच व्यवस्था पर टिका है. आखिर हमारी पुलिस जांच को पेशेवर तरीके से मंज़िल पर क्यों नहीं ले जा पाती है. इसी अंधेरे में कुछ नौजवान वकील भी मिल जाते हैं जो अपने खर्चे पर मदद की कोशिश करने लगते हैं. शायद यही कुछ लोग हैं जिनके मिल जाने से भरोसे की उम्र थोड़ी लंबी हो जाती है. मुंबई के वकील नितिन संकेत को जब राजू आगे ने अपना किस्सा सुनाया तो रो बैठे.

राजू आगे अप्रैल 2014 से कोर्ट, पुलिस और नेताओं के चक्कर लगा रहे हैं. इस दौरान उनका काम भी छूट जाता है. क्या राजू के बेटे के हत्यारों का इसलिए नहीं पता चला क्योंकि वो ग़रीब हैं, कमज़ोर हैं. अगर वो कमज़ोर हैं तो फिर अंतिम आदमी की सेवा करने वाले नेता लोग कहां हैं. औरंगाबाद के कोर्ट ने अपने फैसले में लिखा है कि रिकॉर्ड दिखाते हैं कि अभियोजन पक्ष नितिन और पूजा के बीच प्रेम था. इस बात को लेकर सिर्फ मौखिक गवाही से साक्ष्य पेश कर पाया, कोई ठोस साक्ष्य पेश नहीं कर सका. अभियोजन पक्ष लड़की जिसका नाम पूजा है उसे इग्ज़ामिन करने यानी पूछताछ करने में असफल रहा. पूजा आरोपी नंबर एक सचिन की बहन है. नितिन की हत्या का मकसद साबित करने के लिए अभियोजन पक्ष ठोस साक्ष्य पेश करने में असफल रहा.

अदालत ने अपने फैसले में कहा है कि रिकॉर्ड पर जो साक्ष्य आए हैं वो नितिन की मौत और आरोपियों के संबंध को साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं. ये साक्ष्य नहीं साबित करते हैं कि नितिन की हत्या में आरोपी शामिल थे. इसलिए ये आरोपी बरी किए जाते हैं. ज़ाहिर है सबूतों के आधार पर ही सज़ा होगी. क्या सबूतों को जुटाने में पेशेवर तरीके अपनाए गए, पुलिस ने बिना दबाव के काम किया. यह सब सवाल तो हैं ही. अगर इन आरोपियों के खिलाफ पुलिस साक्ष्य नहीं जुटा सकी तो नितिन की हत्या कैसे हुई. इसका जवाब अभी तक नहीं मिला है. महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने कहा है कि वे इस मामले में अपील फाइल करवाएंगे. अदालतों में यह मामला तो चलता रहेगा लेकिन क्या पुलिस के स्तर पर कोई जांच होगी, कुछ ऐसा होगा जिससे पत्थर तोड़ने वाले मज़ूदर राजू आगे को भरोसा हो कि उसके बेटे के हत्यारों को सजा मिलेगी. 

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ज़रूर इस कहानी में दूसरा पक्ष नहीं है, लेकिन इंसाफ की लड़ाई के दौरान की जो यात्रा क्या उसका कोई दूसरा पक्ष हो सकता है. क्या इस बात का दूसरा पक्ष होना चाहिए कि बेटे को सरेआम मार कर लटका दिया और तीन साल तक कोई पकड़ा ही नहीं गया. हमारे सहयोगी सोहित मिश्र की इस कहानी पर नज़र न पड़ती अगर ये लोग 6 दिसंबर को मुंबई के शिवाजी पार्क में यह नाटक मंडली नितिन आगे के हत्यारों को पकड़वाने के लिए नुक्कड़ नाटक न कर रही होती. सोहित मिश्र उस दिन बाबा साहब अंडेबकर के महापरिनिर्वाण के अवसर पर आज़ाद मैदान गए थे. वहां बहुत से संगठन जमाकर होकर उन्हें याद करते हैं. इसी अंधेरे में कुछ कलाकार मिल जाते हैं, कुछ नौजवान मिल जाते हैं जो बेआवाज़ को आवाज़ दे देते हैं. ये नौजवान ये भी दिखा रहे हैं कि न्याय के तराजू पर जाति व्यवस्था का पलड़ा भारी रहता है. अक्सर हम या आप इन नौजवानों को किसी और निगाह से देखते हैं. साफ-साफ कहें तो इन्हें फालतू समझते हैं, पर सोचिए यही वो लड़के हैं जो एक मज़दूर के पिता के बेटे के लिए नाटक भी खेल रहे हैं.

समाज सिर्फ न्यूज़ चैनल के एंकर और राजनीतिक दल के नेता से नहीं चलता है. यही लोग चला रहे होते हैं. यही नहीं सात दिसंबर को मुंबई में राजू आगे के साथ कानून की पढ़ाई पढ़ने वाले कुछ लड़के भी साथ आए. एक प्रेस कांफ्रेंस भी की. मुझे पता है आपका फोकस तुरंत बेहद अच्छी नीयत वाले इन साहसिक नौजवानों पर शिफ्ट हो जाएगा. होना भी चाहिए, मगर आप अपनी नज़र उस सिस्टम पर टिकाए रखिए और पूछिए कि क्या किसी कस्बे के थाने में बैठी पुलिस भीड़ और राजनीतिक दलों के दबाव को टालते हुए किसी ग़रीब को इंसाफ दिला सकती है.  


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