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हमारे जंगल का समाज

हमारे समाज में अपनी ज़रूरत से ज़्यादा खाने की भूख होती है लेकिन जंगल का समाज उतना ही उपभोग करता है जितनी पेट इजाज़त देता है.

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हमारे जंगल का समाज

प्रकृति की खूबसूरती.

जंगलों को जब बहुत क़रीब से देखो तो वो जंगल नहीं लगते, एक समाज सा लगते हैं इंसानी समाज से ज़्यादा व्यवस्थित, ज़्यादा उदार, ज़्यादा सभ्य. हमारे समाज में अपनी ज़रूरत से ज़्यादा खाने की भूख होती है लेकिन जंगल का समाज उतना ही उपभोग करता है जितनी पेट इजाज़त देता है. इस जंगली समाज का क़रीब से अध्ययन करते हुए हमें कई दिलचस्प बातें पता चलती हैं. ऐसी ही एक जानकारी संक्षेप में आपसे बांटना चाहती हूं. 
 
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(फोटो क्रेडिट - हिमानी नौटियाल)

ये जून से सितंबर 2016 के बीच की बात है. केदारनाथ वाइल्ड लाइफ़ सेंक्चुअरी के रुद्रनाथ इलाके में 3300 मीटर से लेकर 3800 मीटर के बीच मैं अपने सहयोगियों के साथ हिमालयन लंगूरों (Semnopithecus schistaceus) के खाने की आदतों का अध्ययन कर रही थी. हमारे नीचे जंगल ख़त्म हो रहे थे, ऊपर हरे-भरे बुग्याल (Alpine Meadows) थे. जून से सितंबर, ये वो समय होता है जब बांज यानी ओक (quercus semecarpifolia) के पेड़ पर फल (Acorn या Oak nut) पकने लगते हैं. ये एकॉर्न लंगूरों के पसंदीदा होते हैं, पोषक तत्वों यानी न्यूट्रिएंट्स से भरे हुए. इसमें फैट भी काफ़ी मात्रा में पाया जाता है. एक जगह हमने पाया कि ओक की ऊंची डालियों पर बैठे लंगूर एकॉर्न तोड़ कर खा रहे थे और काफ़ी कुछ गिरा भी रहे थे. नीचे एक मादा भालू (Himalayan black bear) और उसका बच्चा इन एकॉर्न्स से अपना पेट भर रहे थे. वैसे तो ये भालू ज़रूरत पड़ने पर मांसाहारी भी हो जाते हैं और इन लंगूरों तक को भी अपना शिकार बना लेते हैं लेकिन यहां जो तस्वीर हमने देखी उसने हमें काफ़ी कुछ सोचने पर मजबूर कर दिया. हमने क़रीब से जानने की कोशिश की तो इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि जंगल में ये भी एक तरह का एसोसिएशन यानी आपसी संबंध है. 
 
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(फोटो क्रेडिट - ताखे बामिन)

आगे बढ़ने से पहले ये बताना ज़रूरी है कि इस तरह के संबंध को हम वैज्ञानिक भाषा में इंटरस्पेसिफिक फीडिंग एसोसिएशन (IFA) कहते हैं. साधारण शब्दों में कहें तो जंतुओं की दो अलग-अलग प्रजातियों के बीच का संबंध. एशिया और अफ्रीका में इस तरह का संबंध प्राइमेट्स (जैसे बंदर, लंगूर, चिंपांजी वगैरह) और उंगूलेट्स (हिरन, बारहसिंगा वगैरह) के बीच अक्सर देखा गया है, इसे वैज्ञानिक विधियों से रिकॉर्ड किया गया है और इसका विश्लेषण भी हुआ है. लेकिन प्राइमेट्स और किसी कार्निवोर यानी मांसाहारी जंतु के बीच इस तरह का एसोसिएशन बहुत ही कम देखा गया है. केदारनाथ वाइल्ड लाइफ़ सेंक्चुअरी में अपनी रिसर्च के दौरान हमने प्राइमेट्स (हिमालयन लंगूर) और हिमालयन ब्लैक बियर के बीच इंटरस्पेसिफिक फीडिंग एसोसिएशन के तीन अलग-अलग उदाहरण देखे और उनका विश्लेषण किया.

ओक के पेड़ की ऊंची डालियों पर बैठे लंगूरों के गिराए एकॉर्न (ओक नट) भोजन के लिए इस मादा भालू की पसंद या प्राथमिकता क्यों बने?
 
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(फोटो क्रेडिट - ताखे बामिन)

हमने पाया कि मादा भालू के लिए अपना और अपने बच्चे का पेट भरने का उस समय यही सबसे आसान और कारगर तरीका था. वैसे तो भालू ख़ुद पेड़ों पर चढ़कर एकॉर्न तोड़ लेते हैं लेकिन इस मादा भालू के लिए ये समय इसके लिए उपयुक्त नहीं था. इस काम में ऊर्ज़ा ज़्यादा लगती जबकि कम ऊर्जा की खपत में ही उसे अपना भोजन नीचे ही मिल रहा था. आने वाली सर्दियों के लिए उसे अधिक से अधिक ऊर्जा और वसा (फैट) की ज़रूरत थी जो लंगूरों द्वारा पेड़ों से गिराए जा रहे एकॉर्न्स से उसे आसानी से मिल रही थी. 
 
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(फोटो क्रेडिट - हिमानी नौटियाल)

एक वजह और थी. ये मादा भालू अपने बच्चे को जंगल के अनजान खतरे में कुछ देर के लिए भी अकेला छोड़ने का जोखिम नहीं उठा सकती थी. मध्य जून से मध्य अगस्त के बीच का समय भालुओं का ब्रीडिंग सीज़न भी होता है. इस समय मादा भालू को पाने या लुभाने की होड़ में नर भालुओं के बीच खूब संघर्ष होते हैं और अक्सर वो छोटे बच्चों को भी मार डालते हैं जिसे इन्फेंटिसाइड कहा जाता है. निश्चित ही ये मादा भालू ये ख़तरा उठाना नहीं चाहती होगी. 
तीसरी वजह ये थी कि एकॉर्न जिन टहनियों पर मिलते हैं वो पेड़ के सबसे ऊपरी या बाहरी हिस्से में होते हैं, पतली और कमज़ोर टहनियों पर. एक एडल्ट वज़नी भालू के लिए वहां पहुंचना एक ख़तरे को न्योता देने के बराबर है जबकि उस ख़तरे को उठाने की ज़रूरत इस वक़्त यहां नहीं थी. 

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(फोटो क्रेडिट - हिमानी नौटियाल)
 
इस घटना को हमने वैज्ञानिक दृष्टि से भी परखा और ज़रूरी प्रयोग भी किए, भालू के मल यानी एक्सक्रीटा का भी विश्लेषण किया और इस सबके नतीजों को एक रिसर्च पेपर में भी छापा गया. 

इस घटना को बताने का मक़सद ये है कि जंगल में जानवरों के बीच का तालमेल कई बार हमें कितना कुछ सिखा जाता है. जंगलों से जितना दूर इंसानी समाज की ओर जाती हूं तो सोचते लगती हूं कि जंगल मेरे पीछे था, या जंगल मेरे आगे है. 
 
himani nautiyal 650
लेखिका हिमानी नौटियाल नेशनल ज्योग्राफ़िक फेलो हैं और वर्तमान में प्राइमेट रिसर्च इंस्टिट्यूट, क्योटो यूनिवर्सिटी, जापान से पीएचडी कर रही हैं. उनसे उनके ई-मेल himani.nautiyal08@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति NDTV उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं. इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार NDTV के नहीं हैं, तथा NDTV उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है.


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