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#मैंऔरमेरीहिन्दी : अवचेतन की भाषा को भुला बैठना ही है भारत की समस्या...

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#मैंऔरमेरीहिन्दी : अवचेतन की भाषा को भुला बैठना ही है भारत की समस्या...

जैसे-जैसे संचार (कम्युनिकेशन) का प्रभुत्व बढ़ रहा है, भाषा पर होने वाली बहसें इस तथ्य पर सिमटती जा रही हैं कि "बस, आपको अपनी बात दूसरों तक पहुंचानी भर है, फिर चाहे उसे आप कैसे भी पहुंचाएं... यहां तक कि यदि भाषा का चेहरा (लिपि, वर्तनी) भी बिगड़ता है, तो कोई बात नहीं... चलेगा... ज़रूरी केवल यह है कि आपकी बात उस तक पहुंचे...'' यह टेक्नोलॉजी द्वारा फैलाया गया एक भाषायी भ्रम है, क्येंकि इससे उसे सहूलियत हो जाती है. और निःसंदेह, उन्हें भी, जिन्हें भाषा का उपयोग करना है. ऐसा पूरी दुनिया में हो रहा है लेकिन निःसंदेह हमारे यहां कुछ ज़्यादा हो रहा है.

क्या सचमुच भाषा जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण, मूलभूत और चेतनागत संवेदनशील प्रश्न को टेक्नोलॉजी के रहमोकरम पर छोड़कर हमें निश्चिंत होकर बैठ जाना चाहिए...? यदि इसका उत्तर 'हां' में है, तो न केवल यह उत्तर ही उथला है, बल्कि यह भविष्य के मनुष्य के लिए सबसे खरतनाक संकेत भी है.

मनुष्य जिसे जीता है, वह जो कुछ भी करता है, वह सब मूलतः उसके अवचेतन के स्तर पर होता है. यहां तक कि सोचने और विचारने का काम भी. चेतन के स्तर पर तो, जो हमें होता हुआ दिखाई देता है, केवल अवचेतन की अभिव्यक्ति भर है. अवचेतन और चेतन के बीच जो सूत्र है, जो दोनों को एक-दूसरे से जोड़कर एक बनाए रखता है, जो उनमें संतुलन और सामंजस्य कायम करता है, वह भाषा ही है, एकमात्र भाषा ही. इसी भाषा के ज़रिये ये दोनों एक-दूसरे से निरंतर संवाद करते हुए एक-दूसरे के संपर्क में रहते हैं.


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अब यहां देखना यह होगा कि इन दोनों को जोड़ने वाली यह भाषा होगी कौन सी...? इसका उत्तर देते समय हमें इस सच्चाई को ध्यान में रखना होगा कि अवचेतन और चेतन के बीच की यह आदान-प्रदान की प्रक्रिया बच्चे के जन्म लेते ही शुरू हो जाती है. तभी तो बच्चा सोते हुए मुस्कुराता भी है. स्पष्ट है, उस समय उसके दिमाग में कुछ चल रहा होता है, जिसे आप चाहें तो 'स्वप्न देखना' कह सकते हैं. बच्चे द्वारा देखे जाने वाले इस स्वप्न में जहां दृश्य होते हैं, वहीं कुछ ध्वनियां भी होती हैं, जिन्हें भाषा का संवादपरक प्रारंभिक रूप कहा जाता है. यदि बच्चा इस पूरे स्वप्न को देखकर मुस्कुरा रहा है, तो इसका अर्थ है कि वह इसे समझकर इसका आस्वादन भी कर रहा है. अब यहां सोचने की बात केवल इतनी-सी है कि फिलहाल यह बच्चा जिस भाषा को समझ रहा है, वह कौन-सी हो सकती है...? उत्तर एकदम सरल है. यह वह भाषा है, जिसे उसने तब सुना और सीखा है, जब वह अपनी मां के गर्भ में था... इसीलिए मातृभाषा शब्द अस्तित्व में आया, पितृभाषा नहीं.

यानी, हमारे अवचतेन की भाषा हमारी मातृभाषा ही होती है. फिर चेतना की भाषा कौन-सी होती है...? दरअसल, सारी भाषायी जद्दोजहद इसी प्रश्न के उत्तर की खोज में निहित है.

समाज की भाषा, शिक्षा की भाषा, व्यवसाय की भाषा तथा आज के संदर्भ में निःसंदेह, टेक्नोलॉजी की भाषा ही वह है, जिससे हमारी चेतना की भाषा का निर्माण होता है. यदि यह भाषा वही है, जिसका हमारे अवचेतन में मेल खा रहा है, तो यह व्यक्ति के लिए वरदान बन जाती है. इस स्थिति में भाषा केवल ज्ञान और कम्युनिकेट करने मात्र की भाषा न रहकर बोध की भाषा बन जाती है, अनुभव करने की भाषा बन जाती है. बोध का स्तर ही वह स्तर होता है, जहां रचनात्मकता का, नवीनता का, अनुसंधान का तथा असाधरणता का विपुल-अद्भुत भंडार हमारी राह देख रहा होता है.

वर्तमान में भाषा के संकट ने अवचेतन तक पहुंच पाने के हमारे संकट को कई-कई गुना बढ़ाकर उसे असंभव बना दिया है, क्योंकि न तो चेतन की भाषा को अवचेतन समझ पा रहा है, और न अवचेतन की भाषा (जो संकेतों में, कोड में, स्वप्न के दृश्यों में होते हैं) को चेतन डीकोड कर पा रहा है. भाषा की इस खाई ने 'इनोवेशन' की हमारी सारी संभावनाओं की भ्रूण-हत्या कर दी है.

भारत में यह आज से ही नहीं हो रहा है... यह तब से हो रहा है, जब से भारत अपनी दो ताकतों को भुला बैठा - सोचने की खुली छूट को और अपने अवचेतन की भाषा को...

डॉ. विजय अग्रवाल वरिष्ठ टिप्पणीकार हैं...

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