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रिज़र्व बैंक के दिशा-निर्देशों पर कितनी गंभीरता ?

नीरव जैसे लोगों को पता है कि मीडिया की हेडलाइन जल्दी बदलने वाली है, महीनों वर्षों लग जाएंगे ये जांच वो जांच में और अंत में कुछ होगा नहीं. इसलिए वे आपको लव लेटर लिख रहे हैं. 

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रिज़र्व बैंक के दिशा-निर्देशों पर कितनी गंभीरता ?
हमें बताया गया कि 11,400 करोड़ का चूना लगाने वाले नीरव मोदी और मेहुल चौकसी को लेकर जांच एजेंसियां गंभीर हैं, मगर वो इतनी गंभीर कैसी हैं कि मेहुल चौकसी की अभी तक कोई खबर नहीं आई है और नीरव मोदी बकायदा बैंक को पत्र लिख रहे हैं. पंजाब नेशनल बैंक के जिन कर्मचारियों को गिरफ्तार किया गया है क्या उन्हें भी पत्र लिखने की छूट है.वैसे इसमें नीरव मोदी की कोई ग़लती नहीं है. नीरव जैसे लोगों को पता है कि मीडिया की हेडलाइन जल्दी बदलने वाली है, महीनों वर्षों लग जाएंगे ये जांच वो जांच में और अंत में कुछ होगा नहीं. इसलिए वे आपको लव लेटर लिख रहे हैं. 

वैसे पत्र तो पंजाब नेशनल बैंक को लिखा है, लेकिन आपको पढ़कर क्या गुदगुदी नहीं हुई कि 11,400 करोड़ लेकर भागने का आरोपी उसी बैंक को पत्र लिख रहा है कि आपने मामला पब्लिक कर दिया, इसलिए अब पैसा लौटाना मुश्किल हो गया. पत्र का हुलिया देखकर लगता है कि एफआईआर पंजाब नेशनल बैंक के खिलाफ नीरव मोदी ने की है, न कि बैंक ने नीरव मोदी के ख़िलाफ.

हमने नीरव मोदी के पत्र का सारा हिस्सा यहां अनुवाद नहीं किया है. मगर आपने देखा कि वो कितनी सफाई से कह रहे हैं कि अगर बात पब्लिक में नहीं आती, छापे नहीं पड़ते, ज़ब्ती नहीं होती तो वे अपनी कंपनी को बेचकर लोन चुका देते. उनका यह कहना सही है कि नीरव मोदी पर 11,400 करोड़ की देनदारी नहीं है. मीडिया गलत दिखा रहा है. उन्होंने ठीक से मीडिया की रिपोर्ट नहीं पढ़ी होगी. मीडिया लिख रहा है कि 5000 करोड़ की देनदारी तो उनके मामा की कंपनी मेहुल चौकसी पर भी है. नीरव मोदी ने अपने पत्र में यह नहीं बताया कि उन पर कितनी देनदारी है लेकिन वे ज़रूर कहते हैं कि 6500 करोड़ की कंपनियों की बेच को कर्ज़ा चुका सकते थे. पर क्या वे यह लिख गए कि मामला पब्लिक में आ गए, जांच एंजेंसियों ने ज़ब्त कर लिए इसलिए जो इन्हें बेचकर चुकाने का मौका था, वो चला गया.

कहां तो इस आदमी को सरेंडर करने के बारे में लिखना चाहिए था, कहां ये लव लेटर लिख रहे हैं. नीरव मोदी ने लिखा है कि एफआईआर में उनके भाई और पत्नी को गलत तरीके से जोड़ा गया है, जबकि वे बिजनेस में कहीं नहीं हैं. मामला क्या है, लेटर ऑफ अंडरटेकिंग जारी कर फ्रॉड तरीके से कई हज़ार करोड़ निकालने का है. जनाब क्या यह कह रहे हैं कि पैसा लौटा देंगे तो मामला ख़त्म हो जाएगा. अगर ऐसा है कि तो बहुत से लोग लूट का माल लौटा कर जेलों से बाहर जाएंगे. माल लौटा देने से अपराध नहीं कम हो जाता है. यहां तक कि सरकार भी नीरव मोदी के कारनामे को गंभीर फ्रॉड मानती है, जिसके आरंभ होने की तारीख 2011 के साल से बताती है. नीरव मोदी शायद सरकार को पत्र लिखना भूल गए. वैसे लगता है कि एजेंसी वालों ने लव लेटर पढ़ा नहीं, वो अभी भी नीरव मोदी के ठिकानों पर छापे मारने की भूल करते ही जा रहे हैं.

पंजाब नेशनल बैंक का यह घोटाला सामने आने पर सवाल उठा कि निगरानी करने वाली संस्थाएं क्या कर रही हैं. रिज़र्व बैंक क्या कर रहा था, केंदीय सतर्कता आयुक्त की तरफ से कैसे पंजाब नेशनल बैंक को सर्तकता पुरस्कार दिया गया. सरकार ने रिज़र्व बैंक से भी पूछा है. मगर रिज़र्व बैंक के पूर्व डिप्टी गवर्नर का एक भाषण है. 7 सितंबर 2016 को मुंबई में साइबर सिक्योरिटी पर एक सेमिनार में बोलते हुए डिप्टी गवर्नर एसएस मुंदरा ने भाषण दिया था. इस भाषण में स्विफ्ट सिस्टम को लेकर सख्त चेतावनी थी. 

मुंदरा साहब ने अपने भाषण में उस बैंक का नाम नहीं लिया जहां घोटाले को होने से रोका गया और उस बैंक का भी नाम नहीं लिया गया, जिन लोगों ने इस चेतावनी से सबक नहीं सीखा. इस भाषण से अंदाज़ा होता है कि भारतीय रिज़र्व बैंक ने स्विफ्ट सिस्टम के ज़रिए होने वाले फ्रॉड की चेतावनी दी होगी. हमारे सहयोगी मनीष कुमार ने रिपोर्ट  किया है कि रघुराम राजन ने अपने कार्यकाल के आखिरी दिनों में पांच पेज का सर्कुलर जारी किया था, जिसमें बैंकों को सख्त चेतावनी दी गई थी. उसके बाद भी ये घोटाला हुआ है. हमने बिहार के सृजन घोटाले में भी देखा है कि 2013 में रिज़र्व बैंक ने चेतावनी थी कि गड़बड़ी हुई है फिर भी भागलपुर का सृजन घोटाला होता रहा और आज तक कुछ नहीं हुआ. बहरहाल 3 अगस्त 2016 का भारतीय रिज़र्व बैंक के इस सर्कुलर में बैंकों से साइबर कंट्रोल सिस्टम मज़बूत करने के लिए कहा है. एक साइबर सिक्योरिटी पॉलिसी हो, जिसमें ख़तरों के बदलते स्वरूप से निपटने की व्यवस्था की जाए. मौजूदा व्यवस्था में खामियों का पता किया जाए और एक तय समय में उनसे निपटने के उपाय किए जाएं.

इस सर्कुलर में स्विफ्ट सिस्टम में ख़तरों को देखते हुए समय समय पर बदलाव की बात कही गई है. कहा गया है कि हर किसी की पहुंच स्विफ्ट सिस्टम तक नहीं होना चाहिए. सीधे स्विफ्ट के ज़रिए पेमेंट न हो. सेंट्रल बैंक यानी भारतीय रिज़र्व बैंक के ज़रिए पेमेंट हो. सिर्फ स्विफ्ट से होने वाली लेन देने पर निगाह रखी जाए. कौन-कौन इसका इस्तमाल कर सकता है उन अफसरों की सूची हर वक्त तैयार रहनी चाहिए. उन पर नज़र रखी जानी चाहिए. ये सब चेतावनी रिज़र्व बैंक अगस्त 2016 से दे रहा था, इसके बाद भी फरवरी 2017 में कई लेटर ऑफ अंडरटेकिंग जारी हुई और कई हज़ार करोड़ रुपये निकाले गए. 

भारतीय जनता पार्टी के सांसद यशवंत सिन्हा ने वित्त मंत्री अरुण जेटली से दस सवाल पूछ दिए हैं. यशवंत सिन्हा का पहला सवाल है कि अगर नीरव मोदी ने 2011 से घोटाला शुरू किया तो हर साल के हिसाब से बता दें कि किस साल कितनी लेटर ऑफ अंडरटेकिंग जारी की गई है. यशवंत सिन्हा के सवाल के जवाब में कौन फंसेगा. अगर ऐसी सूची बनी तो बतानी पड़ेगी कि 2017 के साल में भी एलओयू जारी की गई. हर एललोयू की राशि बताएं और उसके मान्य होने की समय सीमा यानी 90 दिनों के लिए थी या 365 दिनों के लिए.

सरकार बताए कि अन्य बैंकों की विदेशी शाखाओं से कितने पैसे निकाले गए. कितने मामले में घोटालेबाज़ों ने पैसे लेकर चुकता कर दिए. कितने मामले में पैसे लेकर नहीं चुकाए गए. अगर विदेशी शाखाओं को समय पर पैसे नहीं मिले तो क्या उन्होंने पंजाब नेशनल बैंक को बताया. ये सारे मामले विदेशी मुद्रा से संबंधित थी तो रिज़र्व बैंक का ध्यान कैसे नहीं गया

ह्रदयेश जोशी से बात करते हुए यशंवत सिन्हा ने कहा कि प्रधानमंत्री ने कहा था कि ना खाउंगा ना खाने दूंगा, खाया तो नहीं, लेकिन खाने भी दिया और भागने भी दिया. शत्रुध्न सिन्हा तो यहां तक कह रहे हैं कि हमारे ही लोगों का इसमें हाथ है. सरकार की तरफ से आज दो नए मंत्रियों ने नीरव मोदी मामले में बयान दिया. पहले रेल मंत्री पीयूष गोयल ने और फिर बाद में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने. अभी तक कानून मंत्री, मानव संसाधन मंत्री, रक्षा मंत्री बयान दे चुके हैं. वित्त मंत्री एसोसिएशन ऑफ डेवलपमेंट फिनांशियल इंस्टिट्यूशन इन एशिया एंड पेसिफिक की सभा में इस मामले पर टिप्पणी की है. पहले सुन लेते हैं.

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क्या इतना बड़ा घोटाला वाकई ऑडिटर्स या सीए की वजह से हो रहा है. क्या राजनीतिक हस्तक्षेप की कोई भूमिका नहीं है. जेटली कह रहे हैं कि ऑडिटर सही से काम नहीं कर रहे थे, लेकिन रेल मंत्री पीयूष गोयल बोल रहे हैं कि उनकी सरकार ने इतना काम किया सफाई छंटाई शुरू की सारी चीज़ें सामने आने लगीं. आप ही तय करें कि कौन सही बोल रहा है. जब ऑडिटर काम ही नहीं कर रहे हैं तो छंटाई सफाई कैसे हो जा रही है. क्या ऑडिटर की जवाबदेही तय होगी? पर रघुराम राजन ने तो सर्कुलर निकाला था कि बैंक सतर्क रहें. फिर बैंकों ने रिज़र्व बैंक की हिदायतों को नज़र अंदाज़ क्यों किया. आज यानी 20 फरवरी को रिजर्व बैंक ने एक प्रेस रीलीज़ जारी कर कहा है कि समय समय पर बैंकों को चेतावनी जारी की गई है. बैंकों में फ्रॉड के बढ़ते मामले को देखते हुए रिजर्व बैंक ने एक एक्सपर्ट कमिटि बनाने का फैसला किया है.

सुबह का अखबार देख लीजिएगा क्या पता मेहुल चौकसी का भी पत्र छपने वाला हो. मेहुल और नीरव पकड़ में नहीं आ रहे हैं मगर लोन कितना बंटा और एनपीए कितना हुआ इसे लेकर टहलाया जा रहा है. अगर सब यूपीए के समय का ही था तब फिर सरकार ने क्यों नहीं नाम बताया कि किस किस के खाते में कितने हज़ार या लाख करोड़ का लोन बाकी है. जब नाम ही नहीं बताया तो कौन सी पारदर्शिता बहाल हो गई.


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