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जस्टिस गोगोई को राज्यसभा भेजने के मामले में कैसे सरकार ने जेटली और गडकरी के सवालों को नज़रअंदाज़ किया

कई लोग यह सोच रहे थे कि हो सकता है कि जस्टिस गोगोई अपनी तरफ से मना कर देंगे,सरकार के इस ऑफर को ठुकरा देंगे.

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जस्टिस गोगोई को राज्यसभा भेजने के मामले में कैसे सरकार ने जेटली और गडकरी के सवालों को नज़रअंदाज़ किया

सितंबर 2012 की बात है, बीजेपी के लीगल सेल ने एक सेमिनार का आयोजन किया था जिस में अरुण जेटली ने कहा था कि "रिटायरमेंट के पहले के फैसले, रिटायरमेंट के बाद किसी भी पद की प्रति इच्छा से प्रभावित होते हैं, रिटायरमेंट के बाद जॉब के प्रति मांग न्यायपालिका के निपक्षता पे असर डालता है" उस समय जेटली राज्य सभा में विपक्ष के नेता थे और ऐसे भी जेटली जानेमाने वकील भी थे. इस सेमिनार में जेटली ने कहा था कि किसी भी जज को ट्रिब्यूनल और कमीशन में कोई भी पोस्ट पर अपॉइंट करने से पहले दो साल का कूलिंग पीरियड जरूरी है. जेटली की बातों को समर्थन करते हुए उस समय के बीजेपी अध्यक्ष नितिन गडकरी जो वहां मौजूद थे, ने जेटली का साथ देते हुए कहा था कि दो साल का कूलिंग पीरियड होना चाहिए.

इस सेमिनार में जेटली ने कहा था कि रिटायरमेंट के बाद भी कुछ जज रिटायर्ड होना नहीं चाहते थे. इसका मतलब यही था कि रिटायरमेंट के बाद कई जज कमीशन, ट्रिब्यूनल और अथॉरिटी के साथ जुड़ जाते हैं जो नहीं होना चाहिए. जेटली यही कहना चाहते थे कि रिटायरमेंट के बाद जजों को किसी भी पद से दूर रहना चाहिए. जेटली की उस दिन की स्पीच काफी शानदार थी. सिर्फ बीजेपी के नेता के रूप में नहीं एक अच्छे वकील के रूप में भी जेटली ने न्यायपालिका में जो कुछ हो रहा था उसे लेकर सवाल उठाये थे. जेटली ने पूरी जिम्मेदारी के साथ यह बात कही थी. 

जेटली ने कहा था "मैं पूरी जिम्मेदारी के साथ कहता हूं सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट जज के रिटायरमेंट से पहले यह तय हो जाता है कि कौन से कमीशन में वो जाएंगे और जॉइन करेंगे" न्यायपालिका को लोकतंत्र की जीवन रेखा मानने वाले जेटली ने जजों की नीयत पर भी कई सवाल उठाए थे. जेटली ने कहा था कि दो तरह के जज होते हैं एक तो वो हैं जो कानून को को जानते हैं और कुछ कानून मंत्री को.


जेटली खासकर UPA सरकार और उस समय के कानून मंत्री सलमान खुर्शीद की आलोचना कर रहे थे. जेटली के आरोपों का जवाब देते हुए सलमान खुर्शीद ने कहा था कि "कानून मंत्री के रूप में मेरा काम है कि जजों के साथ अच्छा कामकाज रिश्ता रखूं लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उनकी ईमानदारी से कोई समझौता किया जाता है". जेटली ने जो सवाल उठाया था वो कोई छोटा सवाल नहीं था. न्यायपालिका की आलोचना ऐसे भी कम होती है लेकिन इस सेमिनार में जेटली ने न्यायपालिका को कठघरे में खड़ा कर दिया था. न्यूज़ पेपर ने जेटली के इस बयान को विस्तार से छापा था. टीवी चैनल पर बड़े बड़े वकील और पूर्व जज जेटली के बयान का समर्थन करते हुए नज़र आये थे.

एनडीटीवी के एक प्रोग्राम में प्रशांत भूषण ने भी जेटली का साथ दिया था. जेटली इस दुनिया में नहीं रहे लेकिन आज एक बार फिर उनके बयान को याद किया जा रहा है, जेटली के भाषण को सुना जा रहा है क्यों कि जिस मुद्दे को जेटली ने उठाया था उस मुद्दों को दरकिनार करते हुए बीजेपी ने कुछ महीने पहले रिटायर्ड हुए सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस रंजन गोगोई को राज्य सभा के लिए मनोनीत किया है. यह अलग बात है कि 2014 से लेकर 2019 के बीच NDA सरकार कई जजों को अलग अलग पद दिया है लेकिन यह पहली बार हो रही है जब NDA सरकार किए जज को राज्य सभा भेज रही है.

कई लोग यह सोच रहे थे कि हो सकता है कि जस्टिस गोगोई अपनी तरफ से मना कर देंगे,सरकार के इस ऑफर को ठुकरा देंगे, कई लोगों ने सोशल मीडिया के जरिये उनसे अपील की थी कि वो सरकार के ऑफर को ठुकरा दें लेकिन जस्टिस गगोई  ने भी राज्य सभा जाने के लिए मन बना लिया है. जस्टिस गोगोई ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि राष्ट्र निर्माण के लिए न्यायपालिका और कार्यपालिका को एक साथ काम करने की जरूरत है. जस्टिस गोगोई ने कहा राज्यसभा में वह न्यायपालिका का मत रखेंगे. आगे जस्टिस गोगोई कुछ भी सफाई दें लेकिन उनके ऊपर जो सवाल उठाया जा रहा है और न्यायपालिका की निपक्षता को लेकर जो सवाल उठाया जा रहा है वो कम होने वाला नहीं है. 

सिर्फ गोगोई नहीं सरकार की नियत पर भी सवाल उठ रहा है. कई महत्वपूर्ण केस की सुनवाई कर चुके जस्टिस गोगोई को इस तरह इतनी जल्दी राज्य सभा नॉमिनेट करने के बाद अब लोग अरुण जेटली की पुराने बातों को याद कर रहे हैं. UPA  ने जिस चिंगारी में आग लगाई थी कायदे से NDA को उस चिंगारी को बुझाना चाहिए था लेकिन सरकार अब उस आग में घी डालने का काम कर रही है. 2014 में कूलिंग पीरियड को लेकर तब उम्मीद जगी थी जब उस समय के लॉ कमीशन के चेयरपर्सन जस्टिस एपी शाह ने कानून मंत्री रवि शंकर को इस के बारे में सिफारिश की थी और कहा था जजों के रिटायरमेंट के बाद दो साल का कूलिंग पीरियड होना चाहिए.

जस्टिस शाह के प्रस्ताव पर कोई अमल नहीं हो पाया बल्कि 2014 में NDA सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस पी सतशिवम को केरल का राज्यपाल बनाया. जस्टिस सतशिवम अप्रैल 2014 में सुप्रीम कोर्ट से रिटायर्ड हुए थे और सितंबर 2014 को सरकार ने राज्यपाल के रूप में मनोनीत किया यानी दो साल नही रिटायरमेंट के सिर्फ पांच महीने के अंदर उन्हें राज्यपाल बनाया गया.  

उस समय जेटली NDA सरकार में मंत्री थे लेकिन चुप रहने के सिवा उनके पास और कोई चारा नहीं था. सिर्फ सतशिवम नहीं पिछले छह साल में बीजेपी और कई जजों को भी रिटायरमेंट के बाद पद दिया है. जिस बीजेपी ने 2012 में कूलिंग पीरियड की बात की थी सरकार बनाने के बाद वो पीछे हट गई. जेटली ने जो सवाल उठाए थे, उस समय के बीजेपी के अध्यक्ष नितिन गडकरी ने कूलिंग पीरियड को लेकर जो सलाह दी थी बीजेपी सरकार ने उसे कभी आगे नहीं बढ़ाया.

फरवरी 2019 में राज्य सभा में एक सवाल जवाब देते हुए राज्य कानून मंत्री पीपी चौधरी ने कहा था कि रिटायर्ड जजों के लिए सरकार कूलिंग पीरियड के बारे में सोच भी नहीं रही है. चौधरी ने यह भी कहा था कि संसद के द्वारा बनाये गए कई कानून कहते हैं कि रिटायरमेंट के बाद सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के रिटायर्ड जज कई कमीशन, ट्रिब्यूनल और अथॉरिटी के चेयरपर्सन या सदस्य बन सकते हैं. 

लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि यह कानून पहले बना था और इस कानून के तहत UPA सरकार ने कई जजों को रिटायरमेंट के बाद कई संस्थाओं में सदस्य भी बनाया. अरुण जेटली खुद कानून मंत्री रह चुके थे और वकील भी थे. अरुण जेटली को अच्छी तरह पता होगा कि संसद ने कानून बनाया है लेकिन फिर भी 2012 में वो जो सवाल उठाए थे वो जायज़ था. यह उम्मीद की जा रही थी कि NDA की सरकार बनने के बाद कानून में कुछ बदलाव होगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ. सिर्फ दो साल के कूलिंग पीरियड की बात हो रही थी. अगर किसी भी जज को किसी भी पद पर नियुक्ति करना है तो दो साल के बाद भी किया जा सकता है. लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है. जेटली तो नहीं रहे लेकिन नितिन गडकरी भी चुप हैं.

दो साल के जो कूलिंग पीरियड की मांग हो रही है वो आज नहीं बल्कि कई सालों से हो रही है. सिर्फ जस्टिस एपी शाह नहीं लॉ कमीशन के सदस्य रहते हुए 1958 में कानूनविद एमसी सेतलवाड़ ने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट जजों की स्वावलंबन की रक्षा करना जरूरी है इसीलिए रिटायरमेंट के बाद सुप्रीम कोर्ट के जजों को किसी भी दूसरे पद पर नियुक्त नहीं करना चाहिए. जरूरत पड़ने पर रिटायरमेंट के बाद उन्हें सिर्फ एडहॉक जज के रूप में नियुक्ति किया जा सकता है. 2005 में स्वामीनधान मेमोरियल लेक्चर के दौरान पूर्व चीफ जस्टिस जेएस वर्मा ने भी रिटायरमेंट के बाद जजों को दिया जा रहा पद को लेकर चिंता जाहिर की थी. वर्मा ने कहा था रिटायर होने से पहले भी कई जजों को सरकारी पदों के लिए सिफारिश किया जाता है जो चिंताजनक है. 

रिटायरमेंट के बाद जजों की नियुक्ति को लेकर कई सवाल उठाए गए लेकिन किसी भी सरकार ने इस पर ध्यान नहीं दिया. चाहे वो UPA हो या NDA किसी ने कानून में संसोधन नहीं किया और जो दो साल के जो कूलिंग पीरियड की मांग हो रही थी उस पर अमल नहीं किया. सभी सरकारों ने अपनी सुविधा के हिसाब से जजों के रिटायरमेंट के बाद पदों पर नियुक्ति किया. 1983 में पहली बार इंदिरा गांधी सरकार ने जस्टिस बी इस्लाम को रिटायरमेंट के बाद राज्य सभा भेजा. उस समय यह आरोप लगाया गया था कि जस्टिस इस्लाम ने बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र को पटना अर्बन कोऑपरेटिव स्कैम से बरी करने का इनाम मिला था. ऐसे कई ऐसे और जजों को भी रिटायरमेंट के बाद पद दिया गया है. 

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2016 में विधि सेन्टर फ़ॉर लीगल पॉलिसी ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा था कि फरवरी 2016 तक रिटायर्ड हुए 100 जजों में से 70 जज अलग-अलग स्थाई और एडहॉक बॉडी में नियुक्ति हुए हैं. यह कोई छोटी बात नहीं. न्यायपालिका पर लोग भरोसा करते हैं. जजों की अखंडता बने रहना बहुत जरूरी है. अगर जस्टिस गोगोई राज्य सभा पद ठुकरा देते तो न्यायपालिका के प्रति लोगों का विश्वास बढ़ता. जस्टिस गोगोई द्वारा दिये गए फैसले को लोग अब संदेह की नज़र में देखने लगे हैं जो एक न्यायपालिका के साथ साथ लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है.



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