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कैसे हैं हमारे बैंकों में कामकाज के हालात?

23 साल के भगत सिंह की चर्चा इसलिए कर रहा हूं कि तनाव और अपमान के कारण 23 साल का एक बैंकर अस्पताल में भर्ती हो गया. यह कोई एक दिन का किस्सा नहीं है, रोज़ का है.

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कैसे हैं हमारे बैंकों में कामकाज के हालात?

प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर

एक सवाल आप ख़ुद से कीजिए. 24 साल की उम्र में भगत सिंह नाम का नौजवान फांसी पर चढ़ गया. क्या इसलिए कि 2018 के साल में उसके हिन्दुस्तान में लाखों की संख्या में बैंकर और उनमें भी महिला बैंकर ख़ुद को कहें कि वे ग़ुलाम हैं. वे झूठ की बुनियाद पर खड़े आंकड़ों का संसार कब तक बचाए रखेंगे, कभी न कभी यह आंकड़ों की छत उन्हीं के सर पर गिरने वाली है. गिर रही है. 23 साल के भगत सिंह की चर्चा इसलिए कर रहा हूं कि तनाव और अपमान के कारण 23 साल का एक बैंकर अस्पताल में भर्ती हो गया. यह कोई एक दिन का किस्सा नहीं है, रोज़ का है.

बैंकों की दुनिया की भाषा की अपनी शब्दावली है. वे ट्रांसफर को trf कहते हैं, अटल पेंशन योजना को एपीवाई कहते हैं. टीएमटी का मतलब हुआ टाप मैनेजमेंट टाक. ऐसे ही एक बैंक के टीएमटी में कहा गया कि एनडीटीवी न देखें. बैंकों के चेयरमैनो और रीजनल मैनेजरों को क्यों ऐसा लगता है कि वे लोगों की पसंद को भी नियंत्रित कर लेंगे. एक न एक दिन लेदर की कुर्सी और उस पर रखा सफेद तौलिया छूट जाता है. सत्यनारायण बाबा की कथा से मुक्ति नहीं मिलती है, वहां भी बाबा देखते हैं कि इनके पीछे झूठ का अंबार कितना बड़ा है. इसलिए टीएमटी कीजिए टाप मैनेजमेंट टाक कीजिए, एनडीटीवी भी मत देखिए लेकिन 13 लाख लोगों की ज़िंदगी जिस झूठ को जी रही थी, वो बाहर आ चुकी है. सत्य तो एक दिन बाहर आ जाता है. सत्य नहीं आएगा तो एक दिन बैंकरों के चेहरे की उदासियां बाहर जाएंगी, उनके शरीर की बीमारियों से सत्य बाहर आ जाएगा. कोई ज़रूरी नहीं कि आप तथ्य के सहारे ही सत्य तक पहुंचें, चेहरे की झुर्रियां भी अपने आप में तथ्य बन जाती हैं. हमारी बातों में वज़न नहीं होता तो ऐसे आदेश न निकाले जाते. सभी चीफ मैनेजर/ब्रांच मैनेजर को यह आदेश भेजा गया है. इसमें सब्जेक्ट में एनडीटीवी इंडिया का प्रोग्राम लिखा है. लिखा है कि कंफर्म करें महिला और पुरुष के लिए अलग-अलग शौचालय की व्यवस्था कर दी गई है. ये सारी जानकारी 7 मार्च की शाम प्रशासनिक मुख्यालय तक पहुंच जानी चाहिए.

इसका मतलब है मुझ तक लोग सही जानकारी पहुंचा रहे हैं. सिंडिकेट बैंक ने भी 8 मार्च को अपने कार्यालयों में आदेश जारी किया है कि ग्राहकों के बैठने की उचित व्यवस्था की जाए, साफ सुथरा माहौल रहे. साफ सुथरा शौचालय हो. इस तरह के आदेश कई बैंकों ने जारी किए तब जब बैंकों के भीतर से तस्वीरें चल कर आने लगीं कि देखिए हमारी हालत है. यह न समझें कि यह सब दफ्तरों की आम शिकायतें हैं. सैंकड़ों लोगों से बात करने के बाद यह पैटर्न समझ आया है कि ब्रांच स्तर के मैनेजरों से किस तरह का व्यवहार हो रहा है. किस तरह फर्जी तरह से अटल बीमा योजना कराई जा रही है ताकि वो आंकड़े में बदल जाए और कामयाबी का दावा कर लिया जाए. यही हाल मुद्रा लोन का भी है. सिर्फ खंडन कर देने से सत्य नहीं ढंक जाता है. 8 मार्च को हमने बैंकों में ग़ुलामी पर चौथा लेख लिखा. इस लेख में उत्तर बिहार ग्रामीण बैंक के एक आदेश का ज़िक्र किया. आप उस आदेश को देखिए. भाषा देखिए. ऐसा लगता है कि बैंक के मैनजरों को शिकंजे से बांध कर किसी गुलाम की तरह हीरे के खान में ले जाया जा रहा है.

प्रधान कार्यालय द्वारा सभी कार्मिकों के लिए अवकाश में नहीं जाने देने का आदेश दिया गया है. आपको आदेश दिया जाता है कि यदि कोई कार्मिक बीमार होते हैं एवं चिकित्सा अवकाश में प्रस्थान करते हैं तो वे मुख्यालय में ही रहकर अपना इलाज करवाएंगे और संबंधित कापी क्षेत्रीय कार्यालय को प्रेषित करेंगे. अन्यथा आपके चिकित्सा अवकाश की स्वीकृति नहीं दी जाएगी साथ ही आपको अवैतनिक किया जाएगा.

अवैतनिक करना यानी सैलरी नहीं मिली. इस आदेश में ये लिखा है कि आपका जहां ब्रांच है उस जगह से बाहर नहीं जा सकते. मतलब ये हुआ कि मुज़फ्फरपुर के ब्रांच में किसी को हार्ट अटैक आया, लीवर में समस्या हुई तो वे ज़िले से बाहर पटना तक इलाज के लिए नहीं जा सकते हैं. क्या इस तरह के आदेश जारी किए जा सकते हैं, हकीकत यह है कि इस तरह के भयानक भयानक आदेश जारी किए गए हैं जो मानवाधिकार का सीधा सीधा उल्लंघन हैं. हमारे जीने के अधिकार, मौलिक अधिकार का उल्लंघन है. संविधान पढ़ते तो पता चलता कि आदेश देने वाले अफसर को ही जेल भेज देना चाहिए था. मगर जब हमने लिखा और बोला तो चंद घंटे में नया आदेश टाइप हो गया. पहला आदेश 5 मार्च का. नया वाला आदेश 8 मार्च का है. इसमें लिखा है, 'उक्त पत्र में आंशिक संशोधन करते हुए सभी शाखाओं को निर्देश दिया जाता है कि यदि कोई अधिकारी या कर्मी चिकित्सा अवकाश में मुख्यालय में प्रस्थान करते हैं तो इसकी सूचना सक्षम पदाधिकारी को देकर अनुमति लेना सुनिश्चित करेंगे.'

बैंकों में किसी को छुट्टी आसानी से नहीं मिलती है. उत्तर बिहार ग्रामीण बैंक की भी काफी समस्या है. आम तौर पर हम ऐसे बैंक के बारे में कम जानते हैं मगर इन बैंकों में ग्राहकों की कोई कमी नहीं रहती है. इनकी भूमिका भी काफी महत्वपूर्ण होती है. आम तौर पर ग्रामीण बैंक वैसी जगहों पर होते हैं जहां पर सरकारी या प्राइवेट बैंक नहीं पहुंच पाते हैं. हम आज इसके एक ब्रांच का हाल बताना चाहते हैं. पूर्वी चंपारण के एक गांव में एक बैंक है जहां हज़ारों लोग सीढ़ियों से चढ़कर रोज़ आते हैं. इस छोटे से कमरे में यह ब्रांच चल रही है जिसके पास 12,000 खाताधारक हैं और कर्मचारी सिर्फ दो हैं. बैंक के भीतर बहुत दिनों से कोई शौचालय नहीं था. अब जाकर छत पर शौचालय बनना शुरू हुआ है. चौकी पर फाइलें रखी हुई हैं. यहां पता चला कि ग्रामीण इलाके के कारण यहां पर इंटरनेट का लिंक कमज़ोर होता है. स्पीड कम होती है जिसके कारण फाइल अपलोड करने में इन्हें काफी दिक्कत आती है. थूकने के लिए तो सारा संसार है मगर बैंक के ग्राहक बैंक की दीवार पर ही ये कृपा करते हैं. यह बैंक का थूक केंद्र है. इसी के ऊपर आग बुझाने का यंत्र रखा है.

इसी उत्तर बिहार ग्रामीण बैंक का आदेश था कि बीमार पड़ जाएंगे तो ज़िले से बाहर इलाज के लिए नहीं जा सकेंगे, अब नए आदेश में इसका ज़िक्र नहीं है. 24 घंटे से कम समय में आदेश की भाषा बदल गई. अगर केबल वालों ने प्राइम टाइम के समय आवाज़ गायब कर देना, कार्यक्रम ही बंद कर देना, इस तरह का काम न किया होता तो ज़्यादा लोगों तक पहुंच कर बैंकों के भीतर की ज़िंदगी पर तेज़ी से असर हो सकता था. आपने देखा कि कैसे एक लेख लिखने से, सही सवाल उठाने से आदेश की भाषा बदल जाती है. पहले आदेश में साफ कहा गया है कि आप मुख्यालय से बाहर नहीं जा सकते, अब के आदेश में यह गायब है और कहा गया है कि अनुमति लेकर प्रस्थान कर सकते हैं. इसीलिए कहता हूं कि जिस तरह दर्शकों ने तीन महीने तक एक फिल्म पर डिबेट देखा है अगर दो महीने तक मेरे साथ बैंकों पर यह सीरीज़ देखे लें तो बैंकरों की जिंदगी में ख़ुशियां लौट आएंगी और बहुत सारे सरकारी झूठ की पोल खुल जाएगी. महिला दिवस पर महिला बैंकरों की दास्तान पर पुरुषों ने भी अच्छी प्रतिक्रिया व्यक्त की है. कइयों ने मेसेज किया है कि एक एक बात सही है.

एक महिला ने अपनी ज़िंदगी का हाल लिखा है, आप भी पढ़ि‍ए.. 'रवीश जी, हमारी शादी को सात साल हो गए, सात साल में हमारा तबादला सात जगहों पर हुआ है. वो भी कभी एक राज्य में नहीं हुआ. अलग-अलग राज्य में हुआ. मैं छत्तीसगढ़ में काम करती हूं तो पति का तबादला बंगाल में हो जाता है. शादी के सात साल हो गए मगर हम दोनों साथ नहीं रहे. ट्रांसफर का आदेश मिलने के आठ दिन के भीतर शिफ्ट होना पड़ता है. शिफ्ट होने का ख़र्चा भी हमें ही उठाना पड़ता है. कई बार एक लाख तक खर्च हो जाता है. बैंक देने में देरी करता है और देते समय भी 40-50 हज़ार काट लेता है. महिला दिवस पर आपने तकलीफ बताई अच्छा लगा. महिलाओं के साथ-साथ पुरुषों को भी काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है. टारगेट दूर करने के लिए घर परिवार से दूर रहना पड़ता है. हमारी तो कोई ज़िंदगी ही नहीं है. आपको कितना और क्या क्या बताएं.'

हम काफी कुछ जान गए हैं. बैंक के कर्मचारियों ने कभी ये नहीं कहा कि वे बैंक का काम नहीं करना चाहते हैं. वे काम तो कर ही रहे हैं. आजकल सीबीएसई के प्रश्न पत्रों का भी ठेका इन्हीं के सर पर है. सुबह आठ बजे आते और रात के आठ बजे जाते हैं. ये रूटीन सामान्य है और इतने काम के बाद भी टारगेट और ट्रांसफर की धमकी और तनाव. पति-पत्नी को साथ या नज़दीक पोस्टिंग के आदेश हैं, सरकार के आदेश हैं मगर लागू नहीं होता है. महिला बैंकरों को चाइल्ड केयर लीव आखिर किस साज़िश के तहत नहीं दी गई. जबकि केंद्र सरकार के सभी विभागों में मां बनने के बाद महिलाओं को चाइल्ड केयर लीव मिलता है. बैंक सीरीज़ का यह 11वां अंक है. अब तक तो कम से कम चाइल्ड केयर लीव की घोषणा हो जानी चाहिए थी. काश कि हमारे पास आंकड़े होते तो पता चलता कि कितनी महिलाओं ने टारगेट और ट्रांसफर की यातना से बचने के लिए प्रमोशन नहीं लिया है. यह तो महिला बैंकरों के साथ किया जाने वाला अपराध है. हमारी सीरीज़ के बाद एक महिला ने बताया कि पॉलिसी बेचने के लिए उनसे सजने संवरने के लिए कहा गया. यकीन नहीं होता है कि यह सब सरकारी बैंकों के भीतर हो रहा है. और हम टीवी पर दिखा रहे हैं कि एक महिला लड़ाकू विमान उड़ा रही है. उसके लिए बधाई लेकिन उन लाखों महिलाओं का क्या जो बैंकों के भीतर घुटन की ज़िंदगी जी रही हैं. जिनके सपने उड़ान नहीं भर पा रहे हैं. बैंक सीरीज़ के 9वें अंक में हमने यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया के आदेश का ज़िक्र किया था. उसमें कहा गया था कि ब्रांच मैनेजर, डिप्टी मैनेजर की सैलरी रोक दी जाएगी, एसी और जनरेटर हटा लिया जाएगा, मेडिकल बिल का भुगतान नहीं किया जाएगा.

ऑल इंडिया बैंक ऑफिसर्स एसोसिएशन ने इसकी कड़ी निंदा की. युनाइडेट बैंक ऑफ इंडिया ने अपना वो आदेश वापस ले लिया है. बैंक का एनपीए होगा तो सैलरी ब्रांच मैनेजर की बंद होगी या चेयरमैनों की होगी. सिम्पल सवाल है. क्या ऐसा भी आदेश जारी हो सकता है कि सैलरी नहीं दी जाएगी. क्या बैंकों के भीतर जो काम करते हैं उनके मौलिक अधिकार कुछ भी नही हैं.

बैंकरों की सैलरी नहीं बढ़ रही है. आईडीबीआई वाले तो 2012 से इंतज़ार कर रहे हैं. बाकी बैंकरों का कहना है कि 20 से 24000 की सैलरी में दिल्ली क्या छोटे शहर में भी रहना मुश्किल होता जा रहा है. इसके लिए बैंकर अब बोलने लगे हैं. 21 मार्च को जंतर-मंतर पर बैंकरों का एक समूह जमा होने वाला है. उनके पोस्टरों की भाषा और तेवर में बदलाव आने लगा है. उन्हें सैलरी बहुत कम मिल रही है. वे सिर्फ सैलरी की बढ़ोत्तरी नहीं चाहते बल्कि केंद्रीय कर्मचारियों की बराबरी चाहते हैं. दोनों में काफी अंतर है.

कुछ बैंकों में बैंकर ने एक बैज लगा लिया है कि मैं बैंकर हूं लेकिन मेरी सैलरी कम है. लोग धीरे धीरे अपना चेहरा पोस्टर पर डालने लगे हैं. जब चेहरा बाहर आ जाएगा तो एक दिन सच भी आ जाएगा. सरकारें अपने कर्मचारियों को सोशल मीडिया पर बोलने नहीं देती हैं. मंत्री ही बोलते रहते हैं. मामला अनुशासन का नहीं है, हर कर्मचारी अपना दायरा जानता है, मामला है कि झूठ कहीं बाहर न आ जाए.

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तबादले की कहानी तो ऐसी है कि पति और पत्नी के बीच 1400 किमी का फासला है. नौकरी में सिर्फ सैलरी ही सब कुछ नहीं होती. उसके साथ काम का माहौल भी महत्वपूर्ण होता. ऐसा कैसे हो सकता है कि सारे बैंक में इसके कारण लोग परेशान हैं. इस परेशानी का कारण है मिस सेलिंग, क्रांस सेलिंग. धोखे से बीमा बेचना, बिना जानकारी के बीमा बेचना. आज ही एक सज्जन ने लिखा कि उसके खाते से 500 रुपये कट गया और बीमा हो गया. बैंक गया तो उसी से कहा गया कि आप आवेदन दीजिए. इस तरह के अनुभव से न जाने कितने लोग गुज़रे होंगे. हालत यह हो गई है कि बैंकर के मां बाप, और अब उनके बच्चे भी पत्र लिख रहे हैं या उनसे लिखवाया जा रहा है ताकि कुछ तो असर हो.

मैं करीब करीब दो साल से बिजनेस अखबारों में बैंक पर छपने वाली हर खबर को एक बार देख लेता हूं. उसका हिन्दी अनुवाद कर अपने हिन्दी के पाठकों के लिए अपने ब्लॉग या फेसबुक पेज पर नियमित रूप से लिखता हूं. सारे लेख से बड़ी बड़ी बातों का पता चलता है मगर बैंक के भीतर की ज़िंदगी इतनी मुश्किल हो चुकी है इसका पता नहीं चलता है. मुमकिन है छपा भी हो और मुझसे छूट गया लेकिन आप भी गूगल कर देखिएगा कि छपा था या नहीं. इस सीरीज़ के कारण लोगों ने इतनी जानकारी दी है जितनी मैं जीवन भर में हासिल नहीं कर सकता था.


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