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शिक्षामित्रों की समस्या का समाधान कैसे निकले?

लखनऊ में 49 दिनों से शिक्षा मित्र धरने पर बैठे हैं. पिछले एक साल में कितना धरना दे चुके हैं, हिसाब करना मुश्किल है.

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शिक्षामित्रों की समस्या का समाधान कैसे निकले?
यह कहानी सिर्फ उत्तर प्रदेश की नहीं है, हर प्रदेश में ऐसी कहानी होगी जहां कर्मचारी कई साल तक सरकार के अलग-अलग विभागों में काम करने के बाद बाहर फेंक दिए जाते हैं. 10 साल, 20 साल सरकार के यहां नौकरी करने के बाद बाहर फेंक दिए गए ये लोग सचिवालयों और ज़िलाधिकारी कार्यालय के बाहर धरना देते हुए नज़र आते हैं. ऐसा नहीं है कि ये अदालतों से नहीं जीतते, जीतने के बाद भी इनकी नियुक्ति नहीं होती है और अगर हार गए तो कोर्ट के फैसले का बहाना बनाकर हमेशा के लिए इनकी सुनवाई बंद कर दी जाती है.

सरकार की नीति और अदालत के फैसले की सख्त समीक्षा की ज़रूरत है ताकि एक पैमाना बन सके कि किसी से दस बीस साल की सेवा लेकर उसे नियमों और मापदंडों का बहाना बनाकर इतनी आसानी से चलता नहीं किया जा सकता है. हम आज उत्तर प्रदेश के शिक्षा मित्रों की बात करने जा रहे हैं. ऐसा नहीं है कि मीडिया ने इनकी बात नहीं की, स्थानीय अखबार शिक्षामित्रों के आंदोलन और प्रदर्शनों से भरे पड़े हैं. न्यूज़ चैनलों ने भी दिखाया मगर इनकी समस्या का समाधान का कुछ अता पता नहीं है. जबकि यह मामला सौ दो सौ का नहीं एक लाख 70,000 से अधिक शिक्षा मित्रों का है. संख्या के लिहाज़ से भी सोचिए कि यह कितना बड़ा मामला है, मगर इसका समाधान क्या होगा किसी को पता नहीं. 

लखनऊ में 49 दिनों से शिक्षा मित्र धरने पर बैठे हैं. पिछले एक साल में कितना धरना दे चुके हैं, हिसाब करना मुश्किल है. इनकी कहानी इस तरह से है कि 2002 से 2009 तक 1 लाख 78 हज़ार शिक्षा मित्र नियुक्त किए जाते हैं. पहली और दूसरी कक्षा के बच्चों को पढ़ाने के लिए. उस वक्त प्रशिक्षित शिक्षक नहीं थे तो उनकी जगह इन्हें नियुक्त किया गया, क्योंकि देश में साक्षरता दर बहुत कम थी. इन शिक्षा मित्रों की सैलरी 2002 में 1850 रुपए थी जो 2014 में रेगुलर होने से पहले 3500 पर पहुंची थी. इतने कम पैसे पर इन्होंने 12 साल स्कूलों में पढ़ाया. 11 जुलाई 2011 को यूपी सरकार का आदेश निकलता है कि इन सभी को सरकारी संस्थान से दूरस्थ शिक्षा के ज़रिए बीटीसी का कोर्स कराया जाएगा. जब इनकी नियुक्ति हुई थी तब बहुत से इंटर पास थे. मगर ज्यादातर ने बीए की डिग्री हासिल कर ली और बीटीसी का भी सर्टिफिकेट मिल चुका था. 1 अगस्त 2014 से इन्हें करीब 40,000 वेतन मिलता है. मामला हाईकोर्ट में जाता है जहां से इनका रेगुलर होना रद्द हो जाता है. सुप्रीम कोर्ट जाते हैं वहां लंबी सुनवाई के बाद 25 जुलाई 2017 को केस हार जाते हैं. सरकार कहती है कि इनकी समस्या का समाधान निकालेंगे मगर एक साल बीत गया. 

इस वक्त एक लाख सत्तर हज़ार से अधिक शिक्षा मित्र सड़क पर हैं. उनकी नौकरी रेगुलर हुई थी जो अब नहीं है. सैलरी 40,000 मिल रही थी, जो अब 10,000 ही मिल रही है. इनकी समस्या का समाधान क्या निकलेगा किसी को पता नहीं है. कब निकलेगा इसका तो और भी पता नहीं. जब तक ये 12 साल तक 3500 की सैलरी पर पढ़ा रहे थे तब किसी को नहीं लगा कि ये बेकार हैं अयोग्य हैं, इन्हें निकाल देना चाहिए. ज़्यादातर साधारण घरों के लड़के हैं. आए दिन यूपी के अखबारों में छपता रहता है कि सदमे से शिक्षामित्र की मौत हो गई, अवसाद से मौत हो गई, किसी ने आत्महत्या कर ली तो कोई अवसाद का शिकार हो गया. 

2 जून को हापुड़ के एक शिक्षा मित्र महेश कुमार की ज़िंदगी समाप्त हो गई. मरने से पहले उन्होंने ज़िले के संगठन के अध्यक्ष से पूछा था कि उनका मानदेय कब आएगा. हापुड़ में शिक्षा मित्रों को मार्च से 10,000 भी नहीं मिल रहा था. ये नौजवान कैंसर से जूझ रहा था और दवा के पैसे नहीं थे. इसकी कहानी बताते हुए इसके साथी रो पड़े. जिसकी तनख्वाह 10,000 रुपये हो और वो भी तीन महीने से किसी को न मिले तो सोचिए उसकी हालत क्या हो गई होगी.

यूपी में ऐसा कोई नहीं जो शिक्षा मित्रों की समस्या से वाकिफ न हो. कई सांसदों और विधायकों ने इनकी समस्या के समाधान के लिए पत्र लिखे हैं. 2017 के विधान सभा चुनावों में भाजपा के संकल्प पत्र में लिखा है कि प्रदेश के सभी शिक्षा मित्रों की रोज़गार समस्या को 3 महीनों मे न्यायोचित तरीकों से सुलझाया जाएगा. तब तक हाईकोर्ट ने इनके रेगुलर किए जाने के फैसले को निरस्त कर चुका था. सरकार बनने के बाद सुप्रीम कोर्ट का फैसला आता है उसमें भी इनकी नौकरी निरस्त हो जाती है. 18 सितंबर 2015 को बनारस के सांसद के नेता प्रधानमंत्री मोदी ने दो बार अपने भाषणों में शिक्षा मित्रों का ज़िक्र किया है. आप सुनिए और देखिए कि वादा करके बाद भी आखिर इस समस्या का समाधान क्यों नहीं निकला.

लखनऊ में शिक्षा मित्र 49 दिनों से धरनारत हैं. प्रधानमंत्री ही बता सकते हैं कि वे इस शिक्षा मित्रों के साथ हैं या नहीं, अपनी योगी सरकार से इनकी समस्या के समाधान पर बात कर रहे हैं या नहीं. एक लाख सत्तर हज़ार लोगों की नौकरी, सैलरी और ज़िंदगी का मसला राम भरोसे या किसी कमेटी भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता है. मुख्यमंत्री योगी ने भी अपने चुनावी भाषणों में शिक्षा मित्रों के लिए कुछ कदम उठाने का आश्वासन दिया था. 

प्रधानमंत्री मोदी और मुख्यमंत्री योगी की ज़ुबान का क्या मतलब रह जाएगा अगर इनकी समस्या का समाधान नहीं निकलता है. उन्हें बताना चाहिए. इस वक्त इन्हें 10,000 मिल रहा है जो न्यूनतम मज़दूरी से कम है. कम से कम यही नाइंसाफी प्रधानमंत्री जी सुबह फोन कर यूपी सरकार से दूर करवा दें. प्रधानमंत्री शिक्षक दिवस को काफी महत्व देते हैं तो फिर वे कैसे बर्दाश्त कर सकते हैं कि यूपी के शिक्षा मित्रों को न्यूनतम मजदूरी से कम और दूसरे राज्यों से भी कम सैलरी मिल रही है.

हरियाणा में 12 महीने वेतन मिलता है और एक महीने का 21,714 रुपये मिलता है. पंजाब में 12 महीने वेतन मिलता है और एक महीने का 19,400 मिलता है. महाराष्ट्र में 12 महीने वेतन मिलता है और एक महीने का 35,000 मिलता है.

अब आते हैं सुप्रीम कोर्ट के फैसले के कुछ हिस्से पर. हमने शब्दश अनुवाद तो नहीं किया है, हिन्दी में फैसले तो लिखे नहीं जाते मगर किसी तरह आखिरी पैरे का सार पेश कर रहा हूं. सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में लिखा है कि 23 अगस्त 2010 के नोटिफिकेशन की तारीख के बाद शिक्षकों की नियुक्ति के लिए जो न्यूनतम पात्रता तय की गई है उसके तहत शिक्षा मित्र नहीं आते हैं, जिसके कारण उन्हें रेगुलर नहीं किया जा सकता है. इस न्यूनतम पात्रता के बग़ैर कोई नियुक्ति नहीं हो सकती है और इस केस में नियुक्ति 2010 के बाद हुई है.

शिक्षा मित्रों की नियुक्ति न सिर्फ ठेके पर हुई थी बल्कि शिक्षक बनने की पात्रता या शिक्षक को मिलने वाले मानदेय के हिसाब से भी नहीं हुई थी. इसलिए इन्हें शिक्षक के रूप में नियमित नहीं किया जा सकता है. सुप्रीम कोर्ट ने जो अपवाद स्वरूप फैसले दिए हैं वो मौजूदा केस के संदर्भ में लागू नहीं होते हैं. हमारा मानना है कि शिक्षा मित्र कभी भी शिक्षक के रूप में नियुक्त नहीं हुए थे और न ही ये सर्व शिक्षा अभियान कानून की धारा 23(2) के तहत मिली छूट के दायरे में आते हैं. इसलिए भी इनकी नियुक्ति नहीं हो सकती है. राज्य सरकार को अपनी तरफ से छूट देने का अधिकार हासिल नहीं है.

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एक तरफ हमारे सामने नियमों का उल्लंघन कर 1 लाख 78 हज़ार लोगों को नियमित किए जाने का दावा है तो दूसरी तरफ हमारा दायित्व है कि हम कानून के राज को कायम रखें. हमें इस बात का भी सम्मान रखना है कि सर्व शिक्षा अभियान के तहत 6 से 14 साल के बच्चों को उचित तरीके से प्रशिक्षित शिक्षकों से शिक्षा मिले. 

अदालत के फैसले को समझने के लिए हमने संविधान विशेषज्ञ फ़ैज़ान मुस्तफ़ा साहब की मदद लेने जा रहे हैं उनसे समझेंगे कि इस फैसले में क्या गुज़ाइश हैं, क्या विसंगितयां हैं. क्या इस फैसले के बाद यूपी सरकार के अधिकारियों और मंत्रियों के पास कोई रास्ता बचता है या नहीं बचता है. क्या शिक्षा मित्रों के पास कोई कानूनी रास्ता बचा है जिससे वे अपनी 40,000 की सैलरी वापस ले सकते हैं और रेगुलर हो सकते हैं. 14 साल तक सरकार के लक्ष्य को पूरा करने के बाद क्या किसी को ऐसा फेंका जा सकता है, 10,000 का मानदेय भी अस्थायी व्यवस्था है इस पैसे पर इनका जीवन कब तक चलेगा. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में लिखा है कि अगर स्टाप गैप यानी अस्थायी तौर पर किसी को पढ़ाने के लिए रखा जाए तो भी अंत में क्वालिफाइड टीचर की ही नियुक्ति होगी. अदालत ने स्टाप गैप शब्द का इस्तमाल किया है, पर आप सोचिए 2002 से 2014 तक ये लोग पढ़ाते रहे. क्या अदालत 12 साल की सेवा को स्टाप गैप मानती है, क्या उस 12 साल की सेवा के बदले मुआवज़ा नहीं मिलना चाहिए था.


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