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रेलवे को लेकर सरकार के दावे ज़मीन पर कितने खरे?

30 मई 2018 की पीटीआई की खबर है कि रेल मंत्रालय ने दो दिनों की कार्यशाला आयोजित की है जिसमें सभी बड़े अधिकारी शामिल हुए हैं. इस न्यूज़ में मिशन रफ्तार का ज़िक्र है. पता चला कि तीन साल से मिशन रफ्तार चल रहा है.

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रेलवे को लेकर सरकार के दावे ज़मीन पर कितने खरे?

प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर

इधर कुछ दिनों में रेल मंत्री और रेलवे बोर्ड के चैयरमैन के लेट से चलने को लेकर कई बयान आए हैं. हम उन बयानों के ज़रिए समीक्षा करेंगे कि कारण क्या है, सवाल क्या है और सबके जवाब क्या हैं. क्या सभी एक बात कर रहे हैं या जो कह रहे हैं वो सही बात कर रहे हैं. 30 मई को रेलवे बोर्ड के चेयरमैन अश्विनी लोहानी ने अपने फेसबुक पर एक कमेंट किया है. शायद लेट चल रही गाड़ियों को लेकर उठ रहे सवालों के संदर्भ में यह उनका जवाब होगा. वे लिखते हैं कि 'मीडिया अक्सर उत्तर से पूर्व सेक्टर में चलने वाली ट्रेनों के लेट होने का मामला उठाता रहता है. हमारा ध्यान सुरक्षा कार्यों और बुनियादी ढाचों पर है जैसे डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर कारपोरेशन और लेवल क्रॉसिंग समाप्त करने पर है. हाल के दिनों में ट्रेनों की रिपोर्टिंग में सत्यता भी आई है जिसके कारण ट्रेनों के समय का आंकड़ा बहुत ख़राब दिखने लगा है. समय की सही रिपोर्टिंक के कारण 12 से 15 प्रतिशत अधिक दिखने लगा है. जबकि तथ्य यह है कि बुनियादी ढांचे के विस्तार के बग़ैर बिना सोचे समझे नई गाड़ियां चलाई जाती रही हैं. हमें दशकों की अनदेखी के कारण पैदा हुई समस्या को भी समझना होगा जिसे इतनी आसानी से नहीं दूर किया जा सकता है. दोनों तरफ से कीमत चुकानी पड़ेगी.'

अब इनके बयान के दो हिस्से हैं. एक बुनियादी ढांचे की अनदेखी और बिना सोचे समझे नई ट्रेनों को लांच करना और दूसरा हिस्सा है कि ट्रेनों के लेट चलने की रिपोर्टिंग अब सही हो रही है इसलिए डेटा में 12 से 15 प्रतिशत अधिक दिखने लगा है. डेटा में नहीं भी दिखता तो भी ट्रेनें लेट तो चली ही रही थीं और चल ही रही हैं. हम दूसरे हिस्से की बात करते हैं. क्या वाकई truthfull reporting हो रही है. हम सीधे चैलेंज नहीं कर सकते मगर हमारे पास एक केस स्टडी है. हम चाहते हैं कि अश्विनी लोहानी अपना रिकॉर्ड बुक ठीक से चेक करें.

31 मई को बिहार के सहरसा रेलवे स्टेशन से एक यात्री का फोन आता है कि नेशनल ट्रेन एन्कावयरी सिस्टम (NETS) में दिखा रहा है कि 13026 जनहित एक्सप्रेस सहरसा पहुंच गई है लेकिन मैं स्टेशन पर हूं और ट्रेन प्लेटफार्म पर नहीं आई है. वेबसाइट पर दिखा रहा है कि ट्रेन 3 बज कर 15 मिनट पर सहरसा स्टेशन पहुंच चुकी है. 25 मिनट की देरी से. उस यात्री से बात करते करते सवा चार हो गए थे मगर ट्रेन नहीं आई थी. हमारे सहयोगी कन्हैया भाग कर स्टेशन गए और स्टेशन के रजिस्टर में दर्ज ट्रेन के पहुंचने के समय का स्क्रीन शॉट लेकर हमें भेज देते हैं. जनहित एक्सप्रेस दानापुर से सहरसा जाती है. आप साफ-साफ देख सकते हैं कि इसमें लिखा है कि ट्रेन गंतव्य पर पहुंच गई है. अंग्रेज़ी में लिखा है कि reached destination, समय दिया है सवा तीन का. 25 मिनट की देरी से. इसके पहुंचने का सही समय है 2 बजकर 50 मिनट.

स्क्रीन शॉट में दिखता है कि रजिस्टर में हाथ से दर्ज किया गया है. तीसरे नंबर पर आप देख रहे हैं जनहित एक्सप्रेस का नंबर 13206. इसमें साफ लिखा है कि ट्रेन 4 बजकर 35 मिनट पर पहुंची है. आपने अभी-अभी देखा कि वेबसाइट पर ट्रेन एक घंटा लेट पहुंची है जबकि हकीकत में ट्रेन एक घंटा बाद पहुंचती है. अश्विनी लोहानी चेयरमैन रेलवे बोर्ड 1 जून को गोरखुपर मंडल के दौरे पर थे जहां हमारे सहयोगी सलीम के एक जनरल सवाल के जवाब में कहते हैं कि ट्रेन जिस समय पहुंचती है हम वही दर्ज करते हैं वेबसाइट में.

हम एक उदाहरण के दम पर चेयरमैन लोहानी के इस बयान को चुनौती तो नहीं देंगे क्योंकि वो बचकाना हो जाता है मगर उन्हें ज़रूर बताना चाहेंगे कि सहरसा पहुंचने वाली जनहित एक्सप्रेस का डेटा कौन फर्जी तरीके से भर रहा था ये वो पता करें. कैसे मुमकिन हुआ कि वेबसाइट में ट्रेन दोपहर सवा तीन बजे पहुंचती दिखती है और स्टेशन के रजिस्टर में सवा चार बजे पहुंचना दर्ज है. अब आते हैं उनके फेसबुक पोस्ट के पहले हिस्से पर कि बुनियादी ढांचे का विस्तार नहीं हुआ, मतलब लाइनें नहीं बिछीं, उनका नवीनीकरण नहीं हुआ और रेल मार्ग का दोहरीकरण नहीं हुआ. पिछली सरकारों की यह विरासत है. अगर ये सब नहीं हुआ तो फिर रेल मंत्री 29 मई को सोशल मीडिया की एक साइट क्वौरा पर क्यों लिखते हैं कि मोदी सरकार के चार साल के दौरान 407 रेलगाड़ियां चलाई गईं ताकि यात्रियों को सुविधा हो और punchuatlity यानी समय में सुधार हो.

जब ट्रैक की क्षमता का अधिकतम इस्तमाल हो चुका है तो मोदी सरकार के दौर में हर साल 100 से अधिक ट्रेनें क्यों लॉन्‍च की गईं. आपने ग़ौर किया होगा कि रेल मंत्री कह रहे हैं कि 407 ट्रेनें इसलिए लॉन्च की गईं ताकि puchuality में सुधार हो. फिर मंत्री जी ये भी बता दें कि चार साल में 400 ट्रेन राजनीतिक कारणों से लॉन्च हुई हैं या व्यावहारिक कारणों से. जबकि कई जगहों पर रेल मंत्री और रेल बोर्ड के चैयरमैन कहते हैं कि ट्रैक क्षमता की परवाह किए बग़ैर पिछली सरकारों ने गाड़ियां लॉन्च कर दीं जिसके कारण लेट हो रही हैं. क्या आपको अजीब नहीं लगता है.

'65 साल से मुंबई-चेन्नई के बीच सिंगल ट्रैक है. उत्तर पूर्व गाड़ियों पर 180 प्रतिशत ज्यादा है लोड. हम ठीक कर रहे हैं.' रेल मंत्री ने अपना यह बयान खुद ही ट्वीट किया है. यहां कारण साफ है कि ट्रैक की नवीनीकरण, दोहरीकरण और आमान परिवर्तन बड़ा कारण है. होगा भी. लेकिन हमें इतने बयानों में कहीं नहीं मिला कि इस रूट में इतने किमी पर काम चल रहा है, इतने दिनों से चल रहा है और इसकी ताज़ा स्थिति ये है. अब दो खबरों की बात करते हैं.

30 मई 2018 की पीटीआई की खबर है कि रेल मंत्रालय ने दो दिनों की कार्यशाला आयोजित की है जिसमें सभी बड़े अधिकारी शामिल हुए हैं. इस न्यूज़ में मिशन रफ्तार का ज़िक्र है. पता चला कि तीन साल से मिशन रफ्तार चल रहा है फिर इसका रिजल्ट उत्तर भारत की तरफ खराब क्यों है. पीटीआई की खबर में है कि मिशन रफ्तार के तहत अगले पांच साल में यात्री गाड़ी और माल गाड़ी की औसत रफ्तार में 25 किमी प्रति घंटे का इज़ाफ़ा किया जाएगा. इस वक्त यात्री गाड़ी की औसत रफ्तार 44 किमी प्रति घंटा है और माल गाड़ी की औसत रफ्तार 25 किमी प्रति घंटा है. इंटरनेट पर मिली एक पुरानी ख़बर के अनुसार 2010 में रेल मंत्री के तौर पर ममता बनर्जी ने विज़न 2020 लॉन्‍च किया था. चार बुलेट ट्रेन चलाने की बात थी उसमें और बाकी गाड़ियों की औसत रफ्तार 160-200 किमी प्रति घंटे किए जाने का लक्ष्य था. मगर पीयूष गोयल तो पांच साल में औसत रफ्तार 69 किमी प्रति घंटे करना चाहते हैं. अगर मेरे समझने में कोई चूक नहीं हुई है तो वो विज़न 2020 कहां गया जिसे एक रेलमंत्री ने जनता के पैसे लगाकर तैयार किया था और उसका स्टेटस क्या है.

रविवार और सोमवार को आपने कई समाचार पत्रों और चैनलों पर देखा होगा कि रेल मंत्री ने रेलवे के सभी 16 ज़ोन के अधिकारियों की जवाबदेही तय की है. कई लोग मुझे बधाई देने लगे कि रेल सीरीज का असर हो रहा है. जबकि इसी तरह की खबर लोहानी साहब के नाम से छप चुकी है कि उन्होंने ज़ोनल अधिकारियों से कहा है कि समय में सुधार करें. उस आदेश का क्या रिज़ल्ट निकला, वो बताना चाहिए था. तभी रेल मंत्री की बात सुनकर लगा कि कहीं पहले तो नहीं सुना है.

पीटीआई के हवाले से खबर आई है कि रेल मंत्री ने सभी ज़ोन प्रमुखों को चेतावनी दी है कि अगर एक महीने में ट्रेनों के लेट चलने में सुधार नहीं हुआ है तो उनके प्रमोशन के दौरान मूल्यांकन पर असर पड़ेगा. जबकि आपने रेल मंत्री और चेयरमैन रेलवे बोर्ड को कई बार कहते सुना कि 65 साल से ट्रैक की क्षमता में सुधार नहीं हुआ इसलिए ट्रेनें लेट चल रही हैं तो क्या 65 साल की समस्या ये ज़ोनल अधिकारी एक महीने में ठीक कर देंगे. रेल मंत्री को साफ कहना चाहिए कि समस्या कहां हैं. ट्रैक की क्षमता में है या अधिकारियों की कार्यकुशलता में है. या समस्या उनके तरह तरह के बयानों और फैसलों में है. अगर लेटलतीफी में अधिकारी प्रमोशन रुकने के डर से एक महीने में सुधार ला सकते हैं तो वाकई ये काम पहले किया जाना चाहिए था ताकि कई लोगों को नुकसान नहीं होता.

क्या रेलमंत्री पहली बार जागे हैं, पहली बार अधिकारियों को निर्देश दे रहे हैं, ऐसा बिल्कुल नहीं है. उन्हें ठीक से पता है कि उनके ट्विटर हैंडल पर रोज़ बड़ी संख्या में यात्री लेट होने की शिकायत करते हैं. 6 नवंबर 2017 वे अपूर्वा कुमार के जवाब में लिखते हैं कि 'शुक्रिया. ट्रेनों की समयबद्धता बढ़ाने के लिए सरकार ने बहुत सारे प्रयास किए हैं. जिनमें क्षमता विस्तार प्रोजेक्ट और समय सारणी का रिवीज़न भी है.' 7 मार्च 2018 को ट्वीट करते हैं कि 'पहले रेलवे की मानसिकता थी कि हमारे पास फंड की कमी है तो सब कुछ देरी कर दो. अब मानसिकता है कि हर चीज़ को आगे बढ़ाओ और तेज़ी से करो क्योंकि हमारे पास पर्याप्त फंड है.' 7 मार्च को ट्वीट करते हैं कि 'भारतीय रेल में हाथ से समयबद्धता को रिकार्ड करने का अभ्यास सभी ज़ोनों के 41 बड़े स्टेशनों से हटा दिया गया ताकि ट्रेनों की समयबद्धता बढ़ाई जा सके और सवारी को सही समय में ट्रेन की स्थिति की जानकारी दी जा सके.' 10 मार्च को रेल मंत्री फाइनेंशियल एक्सप्रेस की स्टोरी को ट्वीट करते हैं कि गुडबाई टू लेट ट्रेन्स यानी ट्रेनों का लेट होने को अब गुडबाई कह दीजिए. भारतीय रेलवे ने समयबद्धता को सुनिश्चित करने के लिए ये दस तरीके अपनाए हैं.'

फाइनेंशियल एक्सप्रेस की जिस स्टोरी को मंत्री ने ट्वीट किया था कि वो यह थी कि रेल मंत्री चाहते हैं कि भारतीय रेल स्वीटजरलैंड के रेल की तरह होनी चाहिए जहां घड़ियां ट्रेन के पहुंचने के टाइम से मिलाई जाती हैं. अब मैं आपको यहां एक तथ्य बताता हूं, रेल मंत्री को तो पता ही होगा. इसी 14 मार्च को संसद में रेल मंत्रालय ने जवाब दिया है कि रेल की नीति है कि 15 मिनट की देरी तक पहुंचने वाली गाड़ी को समय पर माना जाता है. मतलब 15 मिनट लेट को आधिकारिक रूप से राइट टाइम मानता है रेल मंत्रालय. नंवबर से मार्च के ट्वीट और उनके भाषण बताते हैं कि लेट चलने की बात उनके दिमाग में है मगर वही बता सकते हैं कि इस दौरान क्या सुधार हुआ. उनके पहले के निर्देशों का क्या नतीजा निकला. 14 मार्च को रेल राज्य मंत्री का ही जवाब है लोकसभा में कि मौजूदा वित्त वर्ष में हर दिन 451 गाड़ियां देरी से पहुंचती हैं. तो फिर उस दौरान मंत्री जी ने क्या एक्शन लिया, प्रमोशन रोक देंगे जैसे हेडलाइन वाले बयान से पहले के उनके बयानों का क्या रिज़ल्ट निकला.

हमने रेल सीरीज़ में दिखाया था कि पटना-कोटा कभी 20-25 घटे से कम लेट नहीं चलती है. अब उसमें सुधार आ गया है. लेकिन इसी उत्तर रेलवे में 10 अप्रैल 2017 से 10 मार्च 2018 के बीच 1341 राजधानी एक्सप्रेस, 632 दुरंतों, 1425 शताब्दी लेट से पहुंची. मतलब वीआईपी ट्रेन भी लेट से चल रही हैं और भागलपुर गरीब रथ का हाल तो पूछिए ही मत. चक्र आ जाएगा. पीटीआई ने प्रमोशन वाली खबर में बताया है कि सबसे अधिक ट्रेन उत्तर भारत में चल रही है. इस साल लेट होने की दर 49.59 प्रतिशत है यानी 50 प्रतिशत ट्रेनें लेट चलती हैं जबकि पिछले साल 31.74 प्रतिशत ट्रेनें लेट चली थीं. एक साल में इतनी वृद्धि कैसे हो गई, रेल मंत्री ही बता सकते हैं, क्या कोई नया प्रोजेक्ट लॉन्‍च हो गया, वो प्रोजेक्ट कहां लॉन्‍च हुआ है. अगर ट्रैक कारण है तो क्या उत्तर रेलवे के जनरल मैनेजर एक महीने के अंदर वाकई गाड़ि‍यों के समय से चलने में सुधार कर सकते हैं. उनका बीपी हाई हो रहा होगा, हम समझते हैं.

20 अप्रैल 2018 को प्रभात खबर की एक रिपोर्ट है. रक्सौल से नरकटियागंज के बीच 42 किमी लाइन पर नवीनीकरण, दोहरीकरण और आमान परिवर्तन यानी मीटर गेज से ब्रॉड गेज करने की योजना अभी तक अधूरी है जबकि यह 1 अप्रैल 2014 को लॉन्‍च हुई थी. पांच साल में 42 किमी लाइन नहीं बन पाई है. लंबी दूरी के लिए इस रूट के लोगों के लिए ट्रेन ही एकमात्र विकल्प है. रेल मंत्री पीयूष गोयल ने कौरा पर लिखा है कि 'मोदी सरकार के दौर में हर दिन 6.5 किमी के हिसाब लाइनों के नवीनीकरण, दोहरीकरण और परिवर्तन के प्रोजेक्ट लॉन्‍च होते हैं.' इस हिसाब से इस साल 1 जनवरी से 31 मई के बीच 981.5 किमी लाइनों की क्षमता में सुधार के प्रोजेक्ट लॉन्‍च हुए होंगे. इस हिसाब से पूरे साल में 2372.5 किमी लाइनों की क्षमता में सुधार के प्रोजेक्ट लॉन्‍च होंगे. क्या आपको पता है कि 2018-19 के बजट में लक्ष्य 18,000 किमी लाइन के डबल करने का है. इस हिसाब से 18000 किमी के सामने 2375 किमी लाइनों की क्षमता में सुधार का प्रोजेक्ट कुछ भी नहीं है.

बयान तो खूब मिलते हैं मगर प्रमाण नहीं मिलते हैं. अगर आप सुनें कि यूपीए के समय 4.5 किमी प्रति दिन रेल लाइन का प्रोजेक्ट लॉन्‍च होता था और अब 6.5 किमी प्रति दिन लॉन्‍च हो रहा है तो जल्दी प्रभावित हो जाएंगे मगर यह तो रेल के अपने ही लक्ष्य से बहुत कम है. इस तरह से अगर हम रेल मंत्री के बयानों की समीक्षा करें तो चिन्ताजनक स्थिति नज़र आती है.

सैम पित्रोदा कमेटी ने 2012 में सुझाव दिया था कि 2012-17 के बीच 18,000 किमी रेल लाइन को आधुनिक बनाया जाए. उस रिपोर्ट और लक्ष्य का क्या हुआ हम नहीं जानते जबकि उसे बनाने में जनता का ही पैसा और समय लगा होगा. क्या 2018-19 में 18000 किमी ट्रैक का दोहरीकरण, नवीनीकरण और परिवर्तन हो सकता है?

लक्ष्य बड़ा हो ठीक है मगर सही तो हो. 2014 से 2018 के बीच रेलवे कुल मिलाकर 18000 किमी ट्रैक की क्षमता में सुधार नहीं कर पाई तो एक साल में कैसे कर लेगी. इन आंकड़ों को देख कर यही लगता है कि बयान ही प्रमाण है. प्रमाण बेनिशान हैं. बजट में कुछ है, स्टैंडिंग कमेटी में कुछ और है. कोई पढ़ता भी है तो यहां हमी लोग पढ़ रहे हैं खासकर शिवांक ही पढ़ते रहते हैं जिनकी मदद से इन दस्तावेज़ों तक पहुंचा हूं. 2016-17 में 2828 किमी पुरानी लाइनों के नवीनीकरण का लक्ष्य था. 2017-18 के लिए भी इतना ही लक्ष्य था, दोनों का क्या स्टेटस है हम नहीं जानते.

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क्या यह सब कुछ हासिल ए हेडलाइन के लिए हो रहा है. अगर पीयूष गोयल को बुरा न लगे कि अश्विनी लोहानी के एक बयान का ज़िक्र करना चाहता हूं जो उन्होंने दूरदर्शन को दिए इंटरव्यू में कहा है. वे कहते हैं कि मेंटेनेंस पर ध्यान दिया जा रहा है जो पिछले साल तक पूरे तरीके से ध्यान नहीं दिया जा रहा था. जब दुर्घटनाएं हुईं तब ये निर्णय लिया गया. अब कर रहे हैं. लोहानी जी ने यह भी कहा कि लखनऊ और मुगलसराय लाइन पर मेंटेनेंस होना था मगर उसका काम नहीं हुआ. इसकी जवाबदेही किसकी थी या किसकी है. कोई बताएगा कि ट्रैक का मेंटेनेंस क्यों नहीं हो रहा था. क्यों इसकी उपेक्षा की गई? क्या पिछले साल गाड़ियां लेट नहीं चल रही थीं? हमने रेल सीरीज़ में बताया था कि कई गाड़ियां एक-एक साल से 30-30 घंटे लेट चल रही थीं. राजधानी, दुरंतों शताब्दी भी देरी से चल रही थीं. रेल मंत्री जी 407 गाड़ियां शुरू करने को उपलब्धि मानते हैं, रेलवे बोर्ड के चेयरमैन समस्या या चुनौती मानते हैं. बेहतर है दोनों आपस में बात कर लें. रेल बजट, स्टैंडिंग कमेटी, बोर्ड चेयरमैन और रेल मंत्री एक बात करें तो ठीक रहेगा. कम से कम रेल मंत्री और रेलवे बोर्ड के चेयरमैन को आपस में बात कर लेना चाहिए. अगर रेल मंत्रालय हमारे तथ्यों के संयोजन में कुछ कमियां उजागर करता है तो उसे छुट्टी से लौटने के बाद ज़रूर शामिल करूंगा. 2 जून के न्यू इंडियन एक्सप्रेस में रिपोर्ट छपी है कि पिछले दो साल में रेलवे को टिकट कैंसिलेसन ने 2,760 करोड़ रुपये मिले हैं. यह आंकड़ा हैरान करने वाला है. हवाई यात्री को टिकट कैंसिल करने से कोई शुल्क नहीं लगेगा, ऐसा प्रस्ताव जयंत सिन्हा देते हैं मगर रेल मंत्री पीयूष गोयल के मंत्रालय में टिकट कैंसल करने के इतने कड़े नियम हैं कि आम यात्री लुट रहा है.

जब ट्रैक पर बोझ है तो फिर रेलमंत्री ट्रेनों को लॉन्‍च क्यों कर रहे हैं. जिस समय वे नई ट्रेनों के लॉन्‍च को समस्या बता रहे हैं उसी समय यानी 2 जून को जोधपुर से बांदा के लिए हमसफर को लॉन्‍च क्यों कर रहे हैं जबकि एक बयान में वे कह चुके हैं कि बंबई चेन्ना मार्ग 65 साल से सिंगल पड़ा है. मगर उस मार्ग पर तो ट्रेन लेट नहीं है. लोहानी जी ने दूरदर्शन से कहा है कि ट्रेन ज्यादातर उत्तर में लेट चल रही हैं. एक महीने में जोधपुर से यह दूसरी नई ट्रेन चली है. उस मौके पर मंत्री जी के भाषण में आप सुन सकते हैं कि वे समय को लेकर कितना परेशान हैं. लगता है डाइनेमिक मंत्री जी प्राइम टाइम देखने लगे हैं. बात कारणों की नहीं है, बात है फोकस की. अगर इस सीरीज़ से फोकस बनता है तो फिर ठीक है.


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