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समाज की पुरुष प्रधान मानसिकता कैसे ख़त्म होगी?

बलात्कार की घटना के प्रति कई बार हम इतने सामान्य हो जाते हैं कि फर्क ही नहीं पड़ता और कई बार इतना गुस्सा हो जाते हैं कि बहुत से लोग फांसी की बात करने लगते हैं.

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समाज की पुरुष प्रधान मानसिकता कैसे ख़त्म होगी?
जिस देश और समाज में बात-बात में औरतों को मार देना आसान हो, वहां औरतों के खिलाफ होने वाली हिंसा को लेकर हम कभी ईमानदार नहीं हो सकते हैं. बलात्कार की घटना के प्रति कई बार हम इतने सामान्य हो जाते हैं कि फर्क ही नहीं पड़ता और कई बार इतना गुस्सा हो जाते हैं कि बहुत से लोग फांसी की बात करने लगते हैं. हाथ काट लेने से लेकर चौराहे पर बांध कर पत्थरों से मारने की बात करने लगते हैं. वे बताते हैं कि उन्हें इतना गुस्सा आ गया है ऐसी ख़बरों को सुनकर. उनके भीतर हिंसा की ऐसी विभत्स कल्पनाएं कैसे पनपने लगती हैं, इसका कोई अध्ययन नहीं है.

उड़ीसा के संबलपुर की अदालत परिसर में ही रमेश कुंभार ने तलवार से अपनी 18 साल की पत्नी संजीता पर हमला कर दिया. यही नहीं अपनी सास और संजीता की ढाई साल की भतीजी पर भी हमला कर दिया. कोर्ट परिसर में तलवार ही नहीं गोली बम बंदूक का चल जाना कोई बड़ी बात नहीं है. ये इंडिया है. दिल्ली के मंगोलपुरी में एक शराबी पति ने अपनी पत्नी को हथौड़े से मार डाला. संकट तो है मगर क्या इसका समाधान फांसी है. क्या हम वाकई इस बात में यकीन रखते हैं कि अगर फांसी की सज़ा होती तो भारत भर में दर्ज होने वाले बलात्कार के 38, 947 मामले नहीं होते. इनमें कोई भारी कमी आ जाती  

दिल्ली हाईकोर्ट की एक्टिंग चीफ जस्टिस गीता मित्तल और जस्टिस सी हरी शंकर ने केंद्र से पूछा है कि क्या आपने कोई वैज्ञानिक मूल्यांकन किया है कि फांसी से बलात्कार रुक सकता है? क्या किसी पीड़िता से भी पूछा गया है. अगर हत्या और बलात्कार की सज़ा एक ही होगी तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं. क्या आप कल्पना कर सकते हैं, कितने अपराधी बलात्कार के बाद ज़िंदा छोड़ेंगे, अगर उन्हें फांसी की सज़ा का भय होगा. अदालत ने केंद्र से यह भी पूछा है कि अपराधियों को शिक्षित करने का कोई कदम उठाया है क्योंकि ज़्यादातर अपराधी 18 साल से कम के होते हैं. 

बलात्कार के मामले में ज़्यादातर परिवार के लोग होते हैं. क्या वे गवाही देंगे? आप जानते हैं कि नया अध्यादेश लाकर पॉक्सो एक्ट में यह जोड़ा गया है कि 12 साल तक की बच्ची के साथ बलात्कार करने की सज़ा के मामले में दोषी पाए जाने पर फांसी की सज़ा होगी. राष्ट्रपति ने इस अध्यादेश पर हस्ताक्षर भी कर दिए हैं. बलात्कार के कारणों को लेकर भी आप अजीब-अजीब तरह के बयान सुनते हैं.

मध्य प्रदेश के मंत्री कहते हैं कि पोर्न साइट देखने से बलात्कार की घटनाएं बढ़ रही हैं. दूसरी तरफ खबर आती है कि विधानसभा में पोर्न साइट देखने वाले तीन विधायकों को बीजेपी ने टिकट दिया है. जांच हुई तो इनमें से दो बरी हो गए थे और एक के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश की गई थी. फिर भी बलात्कार के मामले में कहीं से कोई कुछ भी बोल रहा है. इन सबके बीच बहुत से लोग गंभीरता से यह जानना चाहते हैं कि आखिर वो बीमारी क्या है, क्या है वो कारण जिसके असर में कोई छोटी बच्ची को हवस का शिकार बना लेता है. क्या ऐसे आरोपियों को लेकर कोई अध्ययन हुआ है, क्या हम बलात्कार की मानसिकता के बारे में कुछ भी ठोस रूप से जान सके हैं, लोगों को बता सकते हैं ? 

जस्टिस वर्मा कमेटी ने भी फांसी की सज़ा को पीछे ले जाने वाला कदम बताया था और कहा था कि इससे बलात्कार में कोई कमी नहीं आएगी. 2015 में जस्टिस एपी शाह के नेतृत्व में लॉ कमीशन ने अपनी रिपोर्ट में कहा था, पीड़ितों के लिए न्याय का अंतिम मतलब सिर्फ फांसी पर ज़ोर देने से न्याय का पुनर्स्थापन और पुनर्वास संबंधी पहलु नज़रअंदाज़ हो जाता है. ज़्यादा फांसी-फांसी करने से आपराधिक न्याय प्रणाली की दूसरी समस्याओं जैसे कि ख़राब जांच, अपराध की रोकथाम और अपराध के पीड़ितों के अधिकार पर से ध्यान हटा देता है. ज़रूरी है कि गवाहों की सुरक्षा की योजना बने. बेहतर और प्रभावी जांच और अभियोजन के लिए पुलिस सुधारों की आवश्यकता है. इन सब पर प्राथमिकता से काम करने की ज़रूरत है. यह आयोग शुद्ध हृदय से आशा करता है कि मृत्युदंड को पूर्णरूप से समाप्त करने की दिशा में गति तीव्र होगी और उस गति में कोई बदलाव नहीं होगा. 

लॉ कमीशन की रिपोर्ट में कहा गया है कि बेलारूस को छोड़कर यूरोप के सभी देशों में फांसी की सज़ा को औपचारिक रूप से समाप्त कर दिया है या फिर उस पर रोक लगा दी है. अक्तूबर 2014 में 17 अफ्रीकी देशोंन ने औपचारिक रूप से फांसी की सज़ा समाप्त कर दी थी. 25 अन्य अफ्रीकी देशों में दस साल में एक भी फांसी नहीं दी थी. पुलिस सुधार, फास्ट ट्रैक कोर्ट इन सब पर कुछ भी भरोसे लायक नहीं होता है. पुलिस किन परिस्थितियों में काम करती है, हम जानना भी नहीं चाहते, सीधे फांसी-फांसी करने लगते हैं. फांसी की सज़ा में मेरा ज़रा भी यकीन नहीं है, फिर भी आप चाहें जितनी दलील ले लें लोगों के मन में फांसी को लेकर एक विश्वास है तभी वे बार बार पूछते हैं. आज जब दिल्ली हाईकोर्ट की एक्टिंग जस्टिस गीता मित्तल एक स्कूल में गईं तो वहां भी उन्हें इन्हीं सवालों का सामना करना पड़ा. 

जस्टिस गीता मित्तल के सवाल भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं, जितने छात्रों के. दिसंबर 2012 की घटना के बाद कितना कुछ हुआ मगर बलात्कार में कोई कमी नहीं आई. सख्त कानून बना, फंड बना, सब हुआ लेकिन हालत यह है कि जस्टिस वर्मा कमेटी के ही कई सुझाव आज तक लागू नहीं हो सके. एक दिक्कत और है. कभी भी भीड़ के दबाव में कानून नहीं बनाना चाहिए. उस भीड़ में फांसी ही एकमात्र मांग थी, ऐसा सुनाई तो नहीं दिया मगर सरकारों को यही सुनाई देता है. जम्मू कश्मीर सरकार ने भी 12 साल से कम उम्र की बच्ची से बलात्कार के आरोपी को दोषी पाए जाने पर फांसी का एलान कर दिया. इस एलान के बाद भी बलात्कार की घटनाएं नहीं रुकी हैं. कई बार ऐसा लगता है कि हम जिस दायरे में इसे लेकर बात करते हैं वो बात समाज के अंतिम छोर पर नहीं पहुंच पाती है. 

पिछले साल दिसंबर में मध्य प्रदेश की विधानसभा में दंड विधि मध्य प्रदेश संसोशन विधेयक 2017 पास किया. इस कानून के अनुसार 12 साल की लड़की या उससे कम के साथ बलात्कार के आरोपी को फांसी की सज़ा दी जाएगी. उसी दौरान राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो की 2016 की रिपोर्ट आई थी. जिसमें बताया गया था कि भारत में सबसे अधिक बलात्कार की घटनाएं मध्य प्रदेश में दर्ज होती हैं. रिपोर्ट के मुताबिक उस साल मध्य प्रदेश में 4,717 मामले दर्ज हुए थे. उसके बाद यूपी और महाराष्ट्र का नंबर आता है. 

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क्या उसके बाद मध्य प्रदेश में बलात्कार में कमी आई है, या फिर सरकार ने एलान को ही काम बताकर जनता का सामना कर लिया. क्या यह कदम श्रेय लूटने के लिए उठाया गया कदम था, क्या राज्य सरकार इंडियन पीनल कोड में बदलाव कर सकती है? आज तक इस बिल को मंज़ूरी नहीं मिली है. क्यों नहीं मिली है? टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार मध्य प्रदेश के अलावा हरियाणा, अरुणाचल प्रदेश और राजस्थान ने भी फांसी की सज़ा का विधेयक पास किया हुआ है. हरियाणा, राजस्थान और अरुणाचल ने इसी मार्च महीने में कानून पास किया है. 

12 वर्ष की उम्र को लेकर भी अलग-अलग राय है. सभी लोग फांसी की मांग नहीं करते हैं. कुछ लोग ज़रूर करते हैं. उनके और रिसर्चर के बीच एक दूरी है. वो दूरी कभी कम नहीं होती. दूसरी तरफ लोग हैं जो विधायक का समर्थक बन कर उन्नाव की सड़कों पर मार्च करते हैं कि हमारा विधायक निर्दोष हैं. कठुआ में भी तिरंगा लेकर आरोपियों को बचाने का प्रयास होता है. इन दोनों मामले में अदालत के सामने भीड़ खुद को अदालत बनाने का प्रयास करती है. इस माहौल में अगर तर्कों और तथ्यों के लिए जगह बची है तो हम फिर से कोशिश करते हैं. यह भी देखा गया है कि अधिकतम सज़ा कभी नहीं मिलती, कोर्ट हमेशा न्यूनतम सज़ा देती है. पॉक्सो के तहत स्पेशल कोर्ट की बात होती है, वैसे ये कोर्ट स्पेशल भी नहीं होते हैं. एन सी आर बी के तहत 2016 की रिपोर्ट के अनुसार पॉक्सो के तहत 89 प्रतिशत मामले में ट्रायल लंबित हैं. बलात्कार केस में सज़ा की दर मात्र 29 फीसदी है. 94.6 प्रतिशत मामलों में जो बच्चों के साथ होता है, अपराध करने वाला परिचित होता है.


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