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वर्दी पर लगा खून और डस्टबिन की सियासत

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वर्दी पर लगा खून और डस्टबिन की सियासत
नई दिल्ली: 'सर हमें यहां शहीद करवाएंगे क्या...? प्लीज़ हमारी बदली (ट्रांसफर) करवा दीजिए न... कभी भी आकर ठोक देंगे ये मा****...'

ये शब्द अब भी मेरे कान में बजते हैं। सुकमा से करीब 50 किलोमीटर दूर चिंतागुफा कैंप के इस जवान ने वर्ष 2010 में कई हफ्तों तक लगातार मुझे फोन किया। उसे लगता था कि दिल्ली में रहने वाला यह पत्रकार बड़े अफसरों से बात कर उसे इस वार-ज़ोन से बाहर निकाल सकता है। चिंतागुफा के पास चिंतलनार कैंप के 75 सीआरपीएफ जवानों को उस साल माओवादियों ने घेरकर मारा था। मेरे सहयोगी सुधी रंजन सेन और मैं उन चंद पत्रकारों में थे, जो उस नक्सली हमले के बाद सबसे पहले मौके पर पहुंचे थे।

नक्सलियों के हमले की रिपोर्टिंग के बाद हमने इस इलाके में माओवादियों से लड़ रहे सुरक्षा बलों की बदहाली और मुश्किलों पर रिपोर्ट बनाई। उस वक्त लगता था कि जवानों के पास न ट्रेनिंग है, न माओवादियों से लड़ने का हौसला। सारे जवानों का मनोबल टूटा हुआ था।

'सर हमें मालूम ही नहीं कि यहां करना क्या है... इस अंधे जंगल में कुछ समझ नहीं आता...' चिंतागुफा में एक सहमे हुए जवान ने मुझे यह कहा था। उन जवानों के चेहरे (पहचान) छिपाकर हमने वह रिपोर्ट टीवी पर दिखाई थी। बाद में कई जवानों ने हमें फोन कर बताया कि उन्हें सीनियर अफसरों से डांट पड़ी। मीडिया को सच्चाई बताना सर्विस कोड का उल्लंघन था, लेकिन वहीं सीआरपीएफ के जवानों के परिवार वालों ने मुझे फोन कर सच दिखाने के लिए बधाई दी।

अगले साल 2011 में हमने फिर से दंतेवाड़ा का दौरा किया। माओवादियों के उस ग्रुप से मिलने की कोशिश की, जिसने उस घटना को अंजाम दिया था। 2011 में पूरा देश क्रिकेट विश्वकप के बुखार में डूबा हुआ था। इत्तफाक ही कहिए कि सुधी और मैं उसी रात माओवादियों के गढ़ में घुसने में कामयाब हुए, जिस रात मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम में धोनी की टीम ने विश्वकप जीता।

माओवादियों के एक कमांडर ने हमें जगरगुंडा से कुछ किलोमीटर दूर बताया कि नक्सलियों की सबसे बड़ी ताकत उनके मुखबिरों का नेटवर्क है, जो लगातार मज़बूत हो रहा है। सीआरपीएफ के जवानों को इस अंधे जंगल का कुछ पता नहीं और उनके पास मुखबिरों की बेहद कमी है। नक्सलियों की जनताना सरकार में गांव वालों और संगम सदस्यों का घना नेटवर्क कभी भी सुरक्षा बलों को एम्बुश में धकेल सकता है।

हमने उस वक्त देखा कि माओवादियों के खिलाफ लड़ाई में सुरक्षा बलों की सामरिक शक्ति ज़रूर बढ़ी थी। अब उनके पास अत्याधुनिक हथियार और कम्युनिकेशन नेटवर्क था, लेकिन नक्सली हमलों में जवान अब भी लगातार मर रहे थे।

चिंतलनार कैंप के 75 सीआरपीएफ जवानों के मरने के साढ़े चार साल बाद मैं यह सब क्यों लिख रहा हूं। जवान अब भी मर रहे हैं। जब लगता है कि माओवादी शांत हो गए हैं, वे अचानक हमला कर देते हैं।

यही गुरिल्ला रणनीति है...

"दे एडवांस, वी रिट्रीट...
दे कैम्प, वी हैरेस...
दे रेस्ट, वी अटैक...
दे रिट्रीट, वी एडवांस..."


माओ की यह रणनीति वर्ष 2009 में एक माओवादी कमांडर मंगतू ने मुझे याद दिलाई थी। जब सुरक्षाबल ज़रा-सा ढीला पड़ें, हम हमला करते हैं। चकमा देना और 'एलिमेंट ऑफ सरप्राइज़' गुरिल्ला वारफेयर का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है।

हम इस गुरिल्ला वारफेयर को समझें हो या नहीं, लेकिन जवानों की मौत का शोषण करना नहीं चूकते। राष्ट्रीय मीडिया के लिए भी नक्सल समस्या सिर्फ मरे हुए जवानों की लाशें गिनने तक सीमित हो गई है। वर्ष 2013 में कांग्रेसी नेताओं के काफिले पर हमला हुआ तो लगा था कि अब सरकारें इसे गंभीरता से लेंगी, लेकिन मरे हुए जवानों की वर्दी को कूड़े के ढेर में पाए जाने को लेकर जो विवाद उठा, उससे लगता है कि अभी भी नक्सलियों के खिलाफ गुस्सा भड़काना, जवानों की शहादत के गीत गाना और राष्ट्रीयता को हवा देना ही हमारे नक्सल विरोधी नीति है।

यह बताना ज़रूरी है कि गर्मी में अब भी हमारे जवान कोला या फैंटा की बोतल लेकर 40 से 45 डिग्री के तापमान में सर्च और एरिया डोमिनेशन के लिए जाते हैं। इतनी चिलचिलाती धूप में कई बार उनका पानी कुछ घंटे में खत्म हो जाता है।

'सर, जहां हम पानी भरने जाते हैं, वहां भी साले लैंडमाइन लगाकर रखते हैं...' एक जवान ने मुझे दक्षिण बस्तर के दौरे के वक्त बताया था, यानि, इन जंगलों में प्यासे जवानों के लिए पानी भरना तक दुश्वार है। ऐसे में इस बात पर बहस करना महत्वपूर्ण है कि जवानों की वर्दी कूड़े में पाई जा रही है, या यह सवाल उठाया जाना ज़रूरी है कि जगदलपुर या सुकमा में एक मल्टी-स्पेशलिटी अस्पताल क्यों नहीं खुलता, ताकि अगर जवानों को गोली लगे तो उन्हें चिकित्सा मिलने में देर न हो। यह सवाल क्यों नहीं उठता कि राष्ट्रीयता के नारे लगाने के बजाए सुकमा में चार हेलीकॉप्टर हर वक्त क्यों नहीं खड़े किए जाते, ताकि हमले में घायल जवानों को तुरंत निकाला जा सके।

सुकमा से चिंतलनार तक की सड़क करीब 100 किलोमीटर लंबी होगी और इस रास्ते में कम से कम 10 सीआरपीएफ कैंप हैं, लेकिन यह सड़क अब भी जर्जर है। आखिर यह सड़क क्यों नहीं बनती...? क्या 1,500 जवान 100 किलोमीटर लंबी सड़क के बनने के लिए महीने भर पहरेदारी नहीं कर सकते या फिर नेताओं और प्रशासन के लिए प्राथमिकताएं कुछ और हैं।

सवाल कई हैं, लेकिन सड़ी-गली राजनीति और घनघोर भ्रष्टाचार में दबकर रह जाते हैं। यूपीए सरकार के वक्त नीति बनाई गई - 'विन हार्ट एंड माइंड ऑफ पीपुल' यानी जवानों पर ज़िम्मेदारी है कि वे गोली भी चलाएं और आदिवासी जनता का दिल भी जीतें। नेता अपने हिस्से का काम भी जवानों से करवाना चाहते हैं। वे कभी आदिवासी इलाकों में जाकर कैम्प नहीं करते और न ही जनता से संवाद स्थापित करते हैं। (वर्ष 2013 में कांग्रेस काफिले में हुआ हमला एक अपवाद था, जिसमें सुरक्षा की चूक बड़ा मुद्दा था)

इन इलाकों में चुनाव जीतने के लिए स्थानीय नेता नक्सलियों से हाथ मिलाते हैं। पत्रकार शुभ्रांशु चौधरी ने तो अपने किताब 'उसका नाम वासु नहीं' में इस बात का विवादास्पद खुलासा किया है कि कैसे छत्तीसगढ़ के कुछ नेताओं के रिश्ते माओवादियों से रहे। ऐसे में नक्सलियों को देश के दुश्मन कहने वाले हमारे नेताओं की क्या विश्वसनीयता है।

सवाल कई है, लेकिन उन्हें उठाना कठिन इसलिए है कि आज हमारे सामने अंध-राष्ट्रवाद की एक दीवार खड़ी की गई है और कई कड़वे तथ्य उजागर करना राष्ट्रभक्ति के खिलाफ हो जाता है। क्या यह सच नहीं कि नक्सली ही कई बार गरीब आदिवासियों के हाशिये पर पड़े सवालों को उठाते हैं और इसीलिए जनता उनका साथ देती है...? क्या यह सच नहीं कि सरकार और नेताओं की गैरमौजूदगी का फायदा उठाकर नक्सली आदिवासियों को एक समानान्तर / वैकल्पिक सरकार की मौजूदगी का एहसास कराते हैं...? क्या यह भी सच नहीं कि कई बार नक्सलवादी आदिवासियों को शोषक और भ्रष्ट तंत्र से राहत भी देते हैं...? लेकिन यह सब कहना राष्ट्रद्रोह हो जाता है। नक्सलवाद से लड़ने के लिए इन सवालों का सामना करना होगा कि जवानों को आज भी बस्तर के तिलिस्म में क्यों छोड़ा गया है...? नेता जंगलों में रहने वाले लोगों से मिलने के बजाय रायपुर या दिल्ली से सियासत क्यों कर रहे हैं। हमारे मारे गए जवानों की वर्दी कूड़े में ढूंढने से कुछ हासिल नहीं होगा, क्योंकि सियासत और प्रशासन दोनों भ्रष्टाचार के डस्टबिन में हैं।

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