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सांस है तो आस है : मेक्सिको कर सकता है तो दिल्ली क्यों नहीं?

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सांस है तो आस है : मेक्सिको कर सकता है तो दिल्ली क्यों नहीं?
एक समय ऐसा था जब मेक्सिको सिटी को दिल्ली की तरह दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर माना जाता था। 1992 में यूनाइटेड नेशन्स ने मेक्सिको सिटी को सबसे प्रदूषित शहर का दर्जा दिया। 1998 तक मेक्सिको सिटी बच्चों के लिए सबसे खतरनाक शहर बन गया। एक समय मेक्सिको सिटी इतनी प्रदूषित हो गई था कि एक्सपर्ट्स मेक्सिको सिटी को 'मेक सिक को' यानी 'बीमार बनाता' है के नाम से बुलाते थे। क्योंकि प्रदूषण की वजह से काफी लोग बीमार पड़ते थे। मेक्सिको सिटी की हवा इतनी प्रदूषित थी कि कभी-कभी हवा में उड़ने वाले पक्षी प्रदूषित हवा के जहर से मरकर गिर जाते थे। सालाना मेक्सिको सिटी में कई हज़ारा बच्चे प्रदूषण की वजह से मर जाते थे।

क्या था प्रदूषण का कारण?
मेक्सिको सिटी में प्रदूषण की कई वजहें थीं। दिल्ली की तरह मेक्सिको सिटी की जनसंख्या ज्यादा है और ज्यादा से ज्यादा इंडस्ट्री होने की वजह से शहर में प्रदूषण बढ़ता रहता है। मेक्सिको सिटी के लोग ज्यादा से ज्यादा कार का इस्तेमाल भी करते थे। यह कहा जाता है कि मेक्सिको सिटी में इतना ट्रैफिक जाम होता है कि वहां के धनी व्यक्ति शहर के अंदर भी हेलीकॉप्टर का इस्तेमाल करते हैं और जरूरत पड़ने पर हेलीकॉप्टर को बड़ी-बड़ी इमारतों पर भी उतारा जाता है। मेक्सिको सिटी समुद्र तल से करीब 2300 फ़ीट की ऊंचाई पर है और इस वजह से वहां ऑक्सीजन कम होती हैं। गाड़ियों से काफी ज्यादा कार्बन मनो-ऑक्साइड गैस निकलती है जो प्रदूषण बढ़ाने में मदद भी करती है।

फिर मेक्सिको सरकार ने क्या किया?
मेक्सिको सरकार ने एक रिसर्च की, जिसके जरिए पता चला कि प्रदूषण कि वजह से ज्यादा से ज्यादा लोग बीमार हो रहे हैं और अस्पताल जा रहे हैं, जिसका खर्चा सरकार को उठाना पड़ रहा है। रिसर्च के दौरान यह नतीजा निकलकर आया कि अगर पीएम-10 को 10 प्रतिशत कम कर दिया जाए तो देश में सालाना 760 मीलियन डॉलर बचाए जा सकते हैं, जो लोगों के इलाज के लिए खर्चा किया जा रहा है। इसके साथ-साथ सालाना करीब 266 बच्चों को मौत से बचाया जा सकता है।

शुरू किए कई ट्रेनिंग प्रोग्राम
मेक्सिको की सरकार ने लोगों के अंदर बदलाव लाने के लिए कई कदम उठाए। कई ट्रेनिंग प्रोग्राम शुरू किए। सूचनात्मक प्रोग्राम भी शुरू किए गए। शुरुआती दौर में मेक्सिको सिटी के लोगों को लगता था कि सरकार जो कह रही है, वह गलत है और प्रदूषण की वजह लोग नहीं, बल्कि सरकार की गलत पॉलिसी है। लेकिन सरकार ने ट्रेनिंग के जरिए यह ऐहसास कराया कि प्रदूषण के लिए सरकार ज़िम्मेदार नहीं बल्कि खुद लोग ज़िम्मेदार हैं और लोगों को ही कदम उठाने पड़ेंगे। फिर धीरे-धीरे लोग अपनी गलती मानने लगे और सरकार के प्रोग्राम को आगे ले गए।

क्या था वह प्रोग्राम, जिसने सब कुछ बदल दिया?
1990 में मेक्सिको सिटी ने एक नया प्रोग्राम शुरू किया, जिसका नाम था 'प्रो-एयर' इस प्रोग्राम के दौरान कई ऐसे कदम उठाए गए, जिसकी वजह से प्रदूषण में कमी आई। शहर के अंदर जितनी पुरानी फैक्ट्रियां थी, उन्हें बंद कर दिया गया। हफ्ते में एक दिन कार बैन भी कर दी गईं। 20 साल से ज्यादा पुरानी कारों को हटाया गया। 'प्रो-बिकी' के नाम से एक प्रोग्राम शुरू किया गया, जिसके तहत लोग बाइक शेयर करने लगे।

बीआरटी मेट्रोबस और मेट्रो रेल की शुरुआत
'प्रो-एयर' प्रोग्राम के तहत मेक्सिको सरकार का जो सबसे बड़ा कदम था, वह है BRT मेट्रोबस सेवा की शुरुआत। 2005 में शुरू की गई इस सेवा की वजह से लोग धीरे-धीरे अपनी कार छोड़कर बस में सवारी करने लगे। सरकार ने मेट्रो ट्रेन भी शुरू की। अब मेक्सिको मेट्रो लैटिन अमेरिका में सबसे बड़ी मेट्रो है और सस्ती भी है। एक बार सफ़र करने के लिए करीब 18 रुपये खर्च करने पड़ते हैं, जिसकी वजह से लोग अपनी कार छोड़कर मेट्रो में सफ़र करते हैं। 2011 में मेक्सिको सरकार ने प्रो-एयर-IV प्रोग्राम शुरू किया है, यह प्रोग्राम 2020 तक चलेगा। इस प्रोग्राम के अंदर सरकार ने कई ऐसे कदम उठाने की बात की है जिससे प्रदूषण और कम हो सकता है।

फिर क्या था इसका नतीजा?
मेक्सिको सरकार के इस कदम की वजह से प्रदूषण में काफी कमी आई। 2008 से 2012 के बीच मेक्सिको सिटी में 7.7 मीलियन टन कार्बन उत्सर्जन में कमी आई। बच्चों और लीगों की मौत में कमी आई। प्रदूषण कम करने के लिए मेक्सिको को इस सराहनीय कदम के लिए 2013 मे सीमेंस क्लाइमेट लीडरशिप अवॉर्ड से नवाज गया।

अगर मेक्सिको सिटी कर सकती है तो दिल्ली क्यों नहीं?
मेक्सिको सिटी और दिल्ली के बीच कई सामंजस्य है। मेक्सिको सिटी की तरह दिल्ली की जनसंख्या ज्यादा है। यहां के लोग भी ज्यादा कार का इस्तेमाल करते हैं, जिसकी वजह ट्रैफिक जाम होता है। सरकार को मेक्सिको सिटी की तरह पब्लिक ट्रांसपोर्ट में सुधार लाना पड़ेगा। बस के साथ-साथ मेट्रो सेवा में बढ़ोतरी करनी पड़ेगी। बस और मेट्रो की टिकट सस्ती करनी पड़ेगी, जिसकी वजह से लोग पब्लिक ट्रांसपोर्ट में सफ़र करने लगेंगे। इससे सरकार को नुक़सान नहीं होगा। अगर प्रदूषण कम होगा, तो लोग कम बीमार होंगे और सरकार को स्वास्थ के ऊपर जो पैसा खर्च करना पड़ रहा है वह कम हो जाएगा। यह मैं नहीं कह रहा हूं, यह एक्सपेरिमेंट मेक्सिको सरकार कर चुकी है और यह सफल भी हुआ है।

मेक्सिको सरकार ने प्रदूषण कम करने के लिए बस की लेन पर पेड़ लगाए हैं और जहां भी खाली जगह है वहां पेड़ लगाने की कोशिश की जा रही है। यह कदम दिल्ली सरकार को भी उठाने चाहिए। मेक्सिको सरकार इसीलिए प्रदूषण कम करने में कामयाब हुई, क्योंकि लोगों को सचेत करने के लिए कई ट्रेनिंग प्रोग्राम शुरू किए गए। दिल्ली सरकार को भी इस तरह की कदम उठाने चाहिए।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति एनडीटीवी उत्तरदायी नहीं है। इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार एनडीटीवी के नहीं हैं, तथा एनडीटीवी उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।


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