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बेरोज़गारी के आंकड़े का अज्ञान

प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद ने कमाल की बात बात बताई है. वैसे नई-नई बनी इस परिषद की यह पहली बैठक थी. प्रधानमंत्री को सलाह देने के लिए यह परिषद महीने भर से तैयारी कर रही थी.

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बेरोज़गारी के आंकड़े का अज्ञान
प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद ने कमाल की बात बात बताई है. वैसे नई-नई बनी इस परिषद की यह पहली बैठक थी. प्रधानमंत्री को सलाह देने के लिए यह परिषद महीने भर से तैयारी कर रही थी. बुधवार को बैठक हुई. उम्मीद थी कि इस बैठक के बाद किसी गेम चेंजर कार्यक्रम चालू करने की सलाह निकलकर आएगी. लेकिन बैठक के बाद इसके अध्यक्ष विवेक देबराय ने जो बताया उसे सुनकर मीडिया चौंक गया. इसके अध्यक्ष ने बताया कि देश में रोजगार के बारे में सटीक आंकड़े उपलब्ध नहीं है. रोजगार के आंकड़े नहीं है यानि बेरोजगारी के आंकड़े नहीं हैं. अब ये पहले से तय बात है कि आंकड़ों के बिना नीति या कार्यक्रम नहीं बन सकता. शायद इसीलिए प्रधानमंत्री की सलाहकार परिषद किसी गेमचेंजर योजना या कार्यक्रम के बारे में सलाह नहीं बना पाई. यह तो सिर्फ बेरोजगारी की बात थी. इसके अलावा इस बैठक में क्या हुआ यह भी कम दिलचस्प नहीं है.
 
और क्या हुआ
चूंकि परिषद के अध्यक्ष के मुताबिक उसका काम प्रधानमंत्री को सिर्फ अपनी सिफारिशें देने का है सो पहली औपचारिक बैठक में परिषद ने विचार के लिए दस क्षेत्रों को चुन लिया है. चुन लिया है यानि चिन्हित कर लिया है. इन क्षेत्रों में कुछ क्षेत्रों के नाम हैं, आर्थिक वृद्धि, रोजगार और रोजगार सृजन, असंगठित क्षेत्र का या उससे समन्वय,राजकोषीय स्थिति, मौद्रिक नीति, सरकारी खर्च, आर्थिक क्षेत्र के संस्थान, कृषि और मछली पालन, उपभोग की प्रवृत्ति और उत्पादन और सामाजिक क्षेत्र. बाकी तो व्यवस्था की पूरी दुनिया ही इन क्षेत्रों में समा सकती है. लेकिन सामाजिक क्षेत्र में यह आर्थिक परिषद क्या सिफारिश करेगी उसे देखना बड़ा दिलचस्प होगा.
 
परिषद ने मौद्रिक नीति का नाम जोर से लिया
इस पर उसने जोर तो दिया लेकिन मीडिया के ज्यादा सवाल करने पर यह भी बोला कि मुक्ष्य रूप् से यह काम मौद्रिक नीति समिति और आरबीआई का है सो हम जो काम करेंगे वह उनसे मिलकर ही करेंगे. उन्होंने यह भी जोड़ा कि परिषद आरबीआई की पूरक की भूमिका में होगी. इस मामले में परिषद ने अब तक जो सोच पाया है वह ये है कि वित्तीय मजबूती के लिए जो भी काम हो रहा है उसे जारी रहना चाहिए. यानी उन्होंने यथास्थिति बनाए रखने का सुझाव देकर सबकुछ ठीक-ठाक चलने पर मुहर लगाई.
 
कुछ और नहीं तो मौजूदा कार्यक्रमों की समीक्षा ही कर लेते
परिषद के पास यह एक अच्छा मौका था कि आर्थिक क्षेत्र में इस समय चल रहे तमाम महत्वाकांक्षी कार्यक्रमों की ही समीक्षा कर लेती. रोजगार के मकसद से ही मेक इन इंडिया, मेड इन इंडिया, स्आर्टअप, स्किल इंडिया जैसे दसियों कार्यक्रम चालू हैं. लेकिन पता नहीं चल पा रहा है कि इनमें कहां और क्यों कमी दिख रही है. आाखिर यह आर्थिक सलाहकार परिषद प्रधानमंत्री की सलाहकार परिषद है. वह जो भी सुझाती उस पर हर हाल में गौर होता. हां ये अड़चन जरूर थी कि परिषद अगर मौजूदा कार्यक्रमों की समीक्षा करती तो कुछ निराशासूचक शब्द निकल पड़ते.
 
बेरोज़गारी की बजाए रोज़गार कहने का मतलब
किसी भी राजव्यवस्था के लिए बेरोजगारी शब्द निराशासूचक  माना जाता है. इसलिए बेरोजगारी की बजाए बार बार रोजगार के आंकड़ों के उपलब्ध न होने का जिक्र करके परिषद के अध्यक्ष ने निराशावादी भाषा से अपने आपको बचाया. लेकिन इस तरह के बचाव से क्या बेरोजगारी जैसे भयावह संकट के जिक्र से निजात मिल सकती है? लिहाज़ा यह विमर्श भी हाल के हाल कर लिया जाना चाहिए कि निराशासूचक शब्दों से परहेज के चक्कर में कहीं हम वास्तविकता देखने से आंख तो नहीं मूंद रहे हैं. वैसे भी सलाहकार परिषद के अध्यक्ष संयोग से देश की शक्ल बदलने वाले राष्ट्रीय आयोग यानी नीति आयोग के भी सदस्य हैं. देश में अगर बेरोजगारी की हालत ठीक हो गई तो नीति आयोग को भी अपनी पीठ थपथपाने का मौका मिल जाएगा.
 
बेरोज़गारी के बारे में क्या बिल्कुल भी पता नहीं
बेरोज़गारी की समस्या अपने आकार के कारण ही देश की सबसे बड़ी समस्या मानी जाती है. मौजूदा सरकार ने सत्ता में आने के लिए जब देश की दो तिहाई आबादी यानी युवा वर्ग को आश्वासन दिया था तो कहा था कि हर साल कम से कम दो करोड़ रोजगार पैदा किए जाएंगे. यानि तब यह अंदाजा रहा होगा कि आठ दस करोड़ युवा बेरोजगारी से जूझ रहे हैं. लेकिन सामान्य पर्यवेक्षण बता रहा है कि हर साल दो करोड़ की रफ्तार से बेरोज़गारी और बढ़ती जा रही है. इस तरह आज की तारीख में कम से कम 15 करोड़ युवाओं के पूर्ण बेरोजगार होने का अनुमान लगाना कठिन नहीं है. वैसे दो साल पहले इसी स्तंभ में बेरोज़गारी पर एक विशेषज्ञ आलेख में बेरोज़गारी के सभी रूपों के आंकड़े का अनुमान लगाया गया था. (देखें आलेख, सिर्फ बेरोजगारी पर ध्यान देने का यह बिल्कुल सही समय)
 
युद्ध स्तर की रोजगार परियोजना सुझा सकती थी यह परिषद
प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सभी सदस्य उम्र के लिहाज से इतने वरिष्ट तो हैं ही कि उन्होंने पुरानी सरकार के समय मनरेगा जैसी गेम चेंजर रोजगार योजना को जरूर देखा होगा. लिहाज़ा वे चाहें तो अगली बैठक में रोजगार के आंकड़ों के उपलब्ध नहीं होने की बात की बजाए युद्ध स्तर की अपनी किसी नई रोजगार सृजन परियोजना को सोचकर प्रधानमंत्री को सुझा सकते हैं. वे कितनी भी बड़ी योजना सुझा दें कोई भी दावे से कह सकता है कि उसे सफल बनाने के लिए बेरोजगार युवकों की संख्या की कमी नहीं पड़ेगी.
 
सुधीर जैन वरिष्ठ पत्रकार और अपराधशास्‍त्री हैं...

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