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भारत के पास एशियाई देशों से सुनहरे संबंधों का सुनहरा मौका...  

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सिंगापुर में आयोजित 23वें आसियान शिखर सम्मेलन में जाना पहले की तुलना में अब इस मायने में ज़्यादा महत्व रखता है.

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भारत के पास एशियाई देशों से सुनहरे संबंधों का सुनहरा मौका...  

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सिंगापुर में आयोजित 23वें आसियान शिखर सम्मेलन में जाना पहले की तुलना में अब इस मायने में ज़्यादा महत्व रखता है कि भारत-प्रशांत क्षेत्र में चीन के साम्राज्यवादी मंसूबे कुछ अधिक तेज़ी से फैलते दिखाई दे रहे हैं. इस लिहाज़ से इसी सम्मेलन के दौरान क्वाड समूह के तीन अन्य देशों के साथ उनकी बातचीत अहम मायने रखती है. ये तीन अन्य देश जापान, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया हैं, जिनका प्रशांत महासागर से सीधा संबंध है.

जहां तक भारत का सवाल है, उसके लिए पूर्वी एवं दक्षिण-पूर्वी एशिया के देश केवल शक्ति संतुलन की दृष्टि से ही महत्वपूर्ण नहीं हैं, इनका आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व भी किसी मायने में कम नहीं. इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए भारत ने पिछली शताब्दी के अंतिम दशक से ही 'गुजराल सिद्धांत' को विस्तार देकर उसे 'पूर्व की ओर देखो' नीति का रूप दिया. इसे ही वर्तमान में अब हम 'एक्ट ईस्ट पॉलिसी' के रूप में देख रहे हैं. साढ़े चार साल पहले वर्तमान प्रधानमंत्री ने अपने शपथग्रहण समारोह में अपने पड़ोसी देशों को प्राथमिकता देने की जिस नीति की शुरुआत की थी, धीरे-धीरे उसके सकारात्मक परिणाम आने शुरू हो गए हैं. इस दृष्टि से प्रधानमंत्री द्वारा अपने पड़ोस के छोटे-छोटे देशों को भी अपने दौरे में पर्याप्त स्थान देना मायने रखता है. आने वाले दिनों में भी इस साल के अंत तक उनका नेपाल, भूटान और मालदीव जाने का कार्यक्रम है.

यदि हम उस पाकिस्तान की बात छोड़ दें, जिसने जानबूझकर भारत के साथ दुश्मनी का रवैया अपना रखा है, तो भारत के अपने अन्य सभी पड़ोसी देशों के साथ संबंध कमोबेश अच्छे ही हैं. नेपाल ज़रूर चीन की ओर झुकता हुआ जान पड़ रहा है. श्रीलंका के साथ भी लगभग नेपाल जैसी ही स्थिति हो गई थी, लेकिन ग्वादर बंदरगाह को विकसित करने के मामले पर चीन ने जिस अधिकारवादी भावना का प्रदर्शन किया, उससे वहां के लोगों में उसके प्रति आक्रोश का भाव पैदा हो गया है. यह भारत के पक्ष में है.


मालदीव ने भी पहले चीन के साथ दोस्ती का हाथ बढ़ाया था, लेकिन हाल ही में वहां हुए चुनाव में भारत ने जिस तरीके से वहां के लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति अपना राजनयिक समर्थन व्यक्त किया, उसके कारण अब उसकी स्थिति मजबूत हो गई है. अब वहां भारत का समर्थन करने वाली सरकार के आ जाने से उसके साथ संबंधों के बेहतर होने की उम्मीद की जा सकती है.

इस बीच, चीन ने भूटान पर अपना प्रभाव जमाने की हरसंभव कोशिश की. सच कहा जाए, तो चीन के साथ हुआ भारत का डोकलाम विवाद इस मामले में एक प्रकार से अग्निपरीक्षा ही थी, किन्तु भारत के सुदृढ़ विरोध तथा राजनयिक दूरदर्शिता ने चीन को कामयाब नहीं होने दिया और भूटान ने चीन के प्रभुत्व के सामने घुटने टेकने से स्पष्ट रूप से इंकार कर दिया.

यह बात भी कम महत्वपूर्ण नहीं है कि आरम्भ में चीन ने बांग्लादेश पर भी अपना आर्थिक जाल फेंका था, लेकिन बांग्लादेश ने बड़ी चतुराई के साथ अपने यहां चीन के सहयोग से करोड़ो डॉलर से विकसित होने वाली यातायात सुविधा के लिए सहयोग लेने से इंकार कर दिया.

जहां तक अफगानिस्तान का सवाल है, वह इस तरह के राजनीतिक अतिवादियों से दूर ही रहता आया है. भारत ने अपने स्थापित सिद्धांतों के विपरीत अफगानिस्तान पर हाल ही में मॉस्को में आयोजित होने वाले सम्मेलन में भाग लेकर उसके साथ अपने संबंधों को और घनिष्ठ बना लिया है. भारत की अफगानिस्तान के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका जारी है.

यदि सच पूछा जाए, तो इस पूरे क्षेत्र में पाकिस्तान ही चीन का एकमात्र ऐसा विश्वस्त मित्र है, जिस पर चीन सीधे-सीधे भरोसा कर सकता है. पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से सड़क निकाले जाने का विरोध करते हुए भारत ने चीन में आयोजित 'वन बेल्ट, वन रोड' सम्मेलन का जब बहिष्कार किया था, तब अनेक राजनयिकों ने इसकी आलोचना की थी, लेकिन अब ऐसा लगता है कि उस बहिष्कार का ही परिणाम रहा कि उसी लाइन पर अब अन्य कई देश भी सोचने लगे हैं. इसी के तहत म्यांमार ने सीधे-सीधे चीन की 'बेल्ट रोड नीति' का विरोध किया है. यह विरोध भारत के लिए इसलिए बहुत अधिक मायने रखता है कि म्यांमार भारत के लिए आसियान का प्रवेश द्वार है. न केवल भारत के उत्तर-पूर्वी क्षेत्र की सुरक्षा के लिए, बल्कि इस क्षेत्र के विकास के लिए भी आसियान देशों के साथ यातायात की सुविधा बहुत मायने रखती है. इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर भारत-म्यांमार-थाईलैंड के बीच एक राजमार्ग का निर्माण किया जा रहा है, जिसे भविष्य में बढ़ाकर कम्बोडिया, लाओस और वियतनाम तक ले जाने की योजना है.

भारत अब इस बात को अच्छी तरह समझ चुका है कि आसियान देशों के साथ संबंधों को बनाए रखने के लिए केवल ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक विरासत पर्याप्त नहीं है. उसके लिए राजनीतिक, कूटनीतिक एवं आर्थिक स्तर पर भी काम करना होगा. इस दिशा में भारत ने तेज़ी के साथ काम करना शुरू कर दिया है. यदि यह दिशा जारी रहती है, तो उम्मीद की जा सकती है कि भारत न केवल इस क्षेत्र में स्वयं को चीन की घेराबंदी से ही बचा सकेगा, बल्कि विश्व की एक शक्ति के रूप में उभरने के अपने मार्ग को भी प्रशस्त कर सकेगा.

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डॉ. विजय अग्रवाल वरिष्ठ टिप्पणीकार हैं...

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) :इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति NDTV उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं. इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार NDTV के नहीं हैं, तथा NDTV उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है.



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