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भारत का ICJ जाना- कितना सही कदम?

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भारत का ICJ जाना- कितना सही कदम?
भारत ने इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस में पाकिस्तान में बंदी पूर्व नेवी अधिकारी कुलभूषण जाधव की फांसी पर रोक के लिए और काउंसलर एक्सेस के लिए गुहार लगाई है. कोर्ट के चीफ रॉनी अब्राहम ने इस मामले में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को चिट्टी भी लिखी है. इस पूरे मसले में कुछ सवाल उठे हैं. 

पहला सवाल है कि क्या ये मामला ICJ के दायरे में आता है. इसका जवाब है कि आता है, क्योंकि दोनों भारत और पाकिस्तान ने इस मामले में एक प्रोटोकॉल पर दस्तखत किए हुए हैं। ये हैं... Optional Protocol to the Vienna Convention on Consular Relations concerning the Compulsory Settlement of Disputes, 1963. इस पर भारत ने नवंबर 1977 में दस्तखत किए तो पाकिस्तान ने मार्च 1976 में. और इसके मुताबिक अगर कोई विवाद इस बारे में होता है तो ICJ को उसके निबटारे का हक होगा. Vienna Convention on Consular Relations, the 1963 एक अंतरराष्‍ट्रीय समझौता है, जिसके तहत एक देश का नागरिक अगर दूसरे देश में बंदी होता है तो उसे अपने देश के उच्चायोग या दूतावास के अधिकारियों से मिलने का अधिकार होगा. पाकिस्तान अब तक खुद के और भारत के बीच द्विपक्षीय समझौते के आधार पर कहता आया है कि उसे अधिकार है कि वो एक्सेस दे या ना दे, लेकिन भारत इसे अंतरराष्‍ट्रीय कानूनों का उल्लंघन बता रहा है. 16 बार भारत काउंसलर एक्सेस मांग चुका है पर मिला एक बार भी नहीं.. और इस बीच पाकिस्तान की मिलिट्री कोर्ट ने जाधव को मौत की सज़ा सुना दी.

इसके बाद सवाल ये उठ रहा है कि बिना कोई सुनवाई हुए क्या ICJ जाधव की फांसी पर रोक लगा सकता है? असल में ICJ के नियमों के ही आर्टिकल 74, पैरा 4 के तहत ICJ के चीफ किसी भी सदस्य देश से ऐसा अनुरोध कर सकते हैं. ये कानूनी तौर पर लागू होता है. इसी के तहत बताया जा रहा है कि फ्रांस के जज रॉनी अब्राहम, जो फिलहाल ICJ के चीफ जज हैं, ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ को चिट्ठी लिखकर जाधव की फांसी पर रोक की बात की है.

अब सवाल ये कि क्या इस तरह से ICJ जाने का ग़लत असर नहीं होगा? क्या भविष्य में पाकिस्तान ये ही काम कश्मीर से जुड़े मामलों में नहीं करेगा? इसका जवाब वहां मिल गया, जब विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता गोपाल बागले ने कहा कि ICJ जाने का फैसला बहुत सोच-समझकर किया गया है. इसका सीधा मतलब है कि अगर 46 साल बाद भारत ने ICJ जाने का फैसला किया तो निश्चित तौर पर इस पर मंत्रालय में और सबसे ऊंचे स्तर पर गहन विचार हुआ होगा और निष्कर्ष ये निकाला गया होगा कि ICJ जाना बेहतर कदम है, क्योंकि अपील का आधार वियना कन्वेंशन के कानूनों का उल्लंघन है और ऐसे ही मामलों में इस कोर्ट में जाने का प्रावधान भी. आगे के लिए भी ये स्थिति साफ हो जाएगी कि कौन सा समझौता भारी पड़ेगा- द्विपक्षीय या अंतरराष्‍ट्रीय.

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सवाल ये भी है कि भारतीय सेना के अधिकारी सौरभ कालिया की यातना और हत्या के लिए भारत क्यों ICJ नहीं गया. 2015 में सुप्रीम कोर्ट में सरकार का पक्ष रखते हुए न्यायविद वीएस मणि ने कहा था कि ये मामला ICJ के दायरे में नहीं आता, क्योंकि भारत के 18 सितंबर, 1974 के डिक्लेरेशन के मुताबिक (1) कॉमनवेल्थ देशों के बीच विवाद दायरे से बाहर है. (2) दुश्मनी, लड़ाई, आत्मरक्षा से जुड़े विवाद भी इसके दायरे में नहीं. (3) उन सभी समझौतों से उपजे विवाद जिसमें सभी पक्ष समझौते का हिस्सा नहीं हैं या इस पर सरकार की सहमति न हो.

और अब आखिरी सवाल, क्या पाकिस्तान ICJ के निर्देश को मानेगा? आम तौर पर जब देश अंतरराष्‍ट्रीय समझौतों के हिस्सा होते हैं तो आदेशों को मानना कानूनी बंधन होता है, लेकिन पाकिस्तान में वहां की सेना का फैसला आखिरी होता है ये हमने कई मामलों में देखा है. शरीफ सरकार अगर मानना भी चाहे तो क्या सेना उसे मानने देगी? क्या सरकार सेना को समझाने में सफल हो पाएगी कि ऐसे समझौतों से पीछे कदम खींचने का नुकसान क्या हो सकता है और मानने के फायदे क्या? ये तो सिर्फ वक्त ही बता सकता है.


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