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प्राइम टाइम इंट्रो : अमेरिका में नफ़रत की हिंसा में गई एक भारतीय की जान

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प्राइम टाइम इंट्रो : अमेरिका में नफ़रत की हिंसा में गई एक भारतीय की जान

श्रीनिवास की कैंसस में गोली मारकर हत्या कर दी गई

पिछली बार आपने कब नफ़रत और हिंसा की बातों का विरोध किया था. यह सवाल आप भारत में बैठकर पूछिये और भारत से अमरीका गए भारतीयों से पूछिये. मुझे नहीं मालूम कि अमरीका में जब अश्वेत को गोली मारी जाती है, तो उस हिंसा के ख़िलाफ़ उतरने वाले तमाम तरह के अमरीकी नागरिकों में भारतीय कितने होते हैं. कुछ न कुछ तो होते होंगे लेकिन अमरीका में रह रहे भारतीय समुदाय की ऐसी कोई पहचान है कि गांधी के देश से आए ये लोग नस्ली और मज़हबी हिंसा का हर हाल में विरोध करते हैं. क्या वहां रहने वाले लोग यहां होने वाली हिंसा की राजनीति के विरोध में सड़क पर उतरते हैं. कहीं ऐसा तो नहीं कि भारत को लेकर उनकी चुप्पी, अमरीका में एक भारतीय की हत्या को लेकर भी चुप कर रही है. जब वहां नहीं बोले तो यहां किस मुंह से बोलोगे. अमरीका में प्रदेश, भाषा, धर्म, जाति के हिसाब से भारतीयों ने संगठनों की दुकान खोल रखी है. उम्मीद है कि सब मिलकर नफरत के सुपर मॉल में बदलते जा रहे माहौल का विरोध कर रहे होंगे.

अमरीका के कैंसस के ओलेथ शहर में श्रीनु को एक अमरीकी नागरिक ने गोली मार दी. जवान बेटे को उसकी मां ने किसी दुर्घटना में नहीं खोया है बल्कि नफरत और हिंसा की लगातार फैलती लपटों के सामने हमारी आपकी सबकी चुप्पी ने मारा है. हम अमरीका में हो रही ऐसी बातों के खिलाफ लाचार और चुप नज़र आते हैं, हम भारत में हो रहे ऐसी बातों के खिलाफ लाचार और चुप नज़र आते हैं. पिता वैज्ञानिक रहे हैं. किसी को मुसलमान तो किसी को अश्वेत समझ कर निशानदेही हो रही है. हम सब ड्राईंग रूम में बैठकर ऐसी बातों को हवा दे रहे हैं. तरह-तरह की धारणाएं पाल रहे हैं. और अब हमें समझ नहीं आ रहा है कि जब इसी नफरत की आंधी ने श्रीनिवास की जान ले ली तो क्या करें.


विदेश मंत्री ने अमरीकी दूतावास से संपर्क किया है और घटना की निंदा की है. भारतीय दूतावास कैंसस की घटना पर नज़र रख रहा है और मदद की कोशिश कर रहा है. सुषमा स्वराज इस मामले में वैसे भी कभी पीछे नहीं रहती हैं. सवाल क्या भारतीय समुदाय वहां और यहां नफ़रत की राजनीति का विरोध कर रहा है, क्या वो उन खतरों को समझ रहा है जिसका शिकार वो ख़ुद हो सकता है. श्रीनिवास और आलोक कैंसस के एक मयखाने में अपनी शाम बिता रहे थे. टीवी पर बास्केटबॉल देख रहे थे. तभी नशे में धुत्त अमरीकी नागरिक एडम पुरींटन ने समझा कि ये लोग मध्य पूर्व देशों के हैं. यानी अरब हो सकते हैं, यानी मुसलमान हो सकते हैं यानी रंग से वे अमरीकी नहीं हैं तो ये ज़रूर अवैध तरीके से अमरीका में नौकरी कर रहे हैं. यह आदमी खुद ही श्रीनिवास और आलोक से उलझ गया कि मेरे देश से बाहर जाओ. यह आवाज़ आपको भारत में रोज़ सुनाई देती है मगर आप चुप रहते हैं. पुरींटन वहां के हिसाब से तो नौ सैनिक है. देशभक्ति का सर्टिफिकेट तो उसी के पास होगा क्योंकि वो सैनिक है. उसे न तो इतिहास मालूम, न मज़हब मालूम, न नागरिकता बस नफ़रत ने इतना सनका दिया था कि दक्षिण भारत के श्रीनिवास को देश छोड़कर जाने के लिए कहने लगा. यही भाषा टीवी चैनलों पर सेना से रिटायर हुए लोग रोज़ बोलते हैं. पुरींटन बार से गया और लौट कर आया. सीधे गोली मार दी. श्रीनिवास की मौत हो गई और उसका दोस्त आलोक घायल हो गया.

एक हिन्दू को मुसलमान समझ कर मार दिया. अगर आप इस बात से समझ सकते हैं तो ऐसे ही समझिये. रंग और हुलिये से हम कहां इतने अलग-अलग दिखते हैं. इसीलिए पूछा कि भारत से लेकर अमरीका में जब कोई नफ़रत की बात करता है तो क्या आप विरोध करते हैं. मगर रुकिये. 24 साल के इयान ग्रिलॉट के बिना यह कहानी कैसे पूरी होगी. इस लड़के ने पुरींटन की बातों का विरोध किया. उसे लगा कि पुरींटन की बंदूक में गोली नहीं है, वो रोकने के लिए आगे बढ़ा. पुरींटन ने सनक में अपने ही नागरिक को नहीं बख्शा. क्योंकि वो नौसैनिक है, देशभक्ति का सर्टिफिकेट लेकर घूम रहा होगा. छाती और हाथ में गोली मार दी. इयन ने कहा कि वो सिर्फ मानवता के नाते बचाने गया था. उसके दोस्त इसके इलाज के ख़र्चे के लिए चंदा मांग रहे हैं. अमरीका में भारतीय दूतावास को न सिर्फ श्रीनिवास और आलोक के परिवार को मदद करनी चाहिए बल्कि इयन ग्रिलॉट के इलाज का ख़र्चा भी उठाना चाहिए. यह वो जवान है जो इतिहास में इसी बात के लिए दर्ज होगा कि जब ताकतवर लोग प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति बनकर इशारों इशारों में या साफ साफ नफ़रत की बातें फैला रहे थे तो वह अपनी जान जोखिम में डालकर एक भारतीय की जान बचाने गया था.

हैशटैग चलाने वालों का राजनीतिक गिरोह अगर इस हिंसा पर नहीं बोल सकता है तो कम से कम इयान ग्रिलॉट के लिए तो बोल ही सकता है. एक इयान ग्रिलाट भारत में भी है. यहीं दिल्ली में. रामजस कॉलेज में हिंसा हुई तो छात्रों को बचाने के लिए गए. इतना मारा गया कि इनकी पसलियों में गहरी चोट आई है. प्रोफेसर प्रशांत चक्रवर्ती ने भी परवाह नहीं की, बस वे हिंसा में घिरे किसी छात्र को बचाने निकल गए. बताते हैं कि मफलर से उनका गला घोंटा गया. अब वे घर लौट आए हैं. मगर डॉक्टरों ने कहा है कि प्रशांत को दो हफ्ते के लिए आराम करना होगा.

इयान और प्रशांत की नियति एक सी है. ऐसे लोग हमेशा अकेले आगे बढ़ते हैं और अकेले रह जाते हैं. बाकी लोग ड्राईंग रूम में बैठकर नफ़रत की राजनीति पर ऐसे चुप रहते हैं जैसे उनका काम सिर्फ वोट देना है. इसीलिए हम न तो श्रीनिवास के लिए बोल पाते हैं न प्रशांत के लिए. खुलकर एक मज़हब को निशाना बनाया जा रहा है. नफरत यहां तक आ गई है कि मशहूर बाक्सर मोहम्मद अली के बेटे जब अमरीका के किसी एयरपोर्ट पर जमैका से पहुंचे तो उनसे पूछा गया कि तुम्हारा मज़हब क्या है. अधिकारी मूर्ख होगा जिसका नाम मोहम्मद अली होगा ज़ाहिर है मुसलमान ही होगा मगर उसका मकसद एक ही था, नाम और मज़हब और रंग देखकर किसी को अपमानित करना. डराना.

जनवरी का महीना था. ट्रंप शपथ ले चुके थे. चुनाव अभियान में ही औरतों को लेकर अनाप-शनाप बातें की जा रही थीं. दूसरे मुल्कों से आकर अमरीका में काम करने वालों को बाहर निकालने की बात की जा रही है. मुसलमानों के ख़िलाफ नफ़रत फैलाई जा रही है. इसके खिलाफ अमरीका भर से औरतें लड़कियां और पुरुष वाशिंगटन पहुंचे और वाशिंगटन को वैसे पोस्टरों बैनरों से भर दिया जिन पर लिखा था कि हमें इस तरह की बातें बर्दाश्त नहीं हैं. अमरीका के लोगों ने इतना तो किया कि शपथ ग्रहण के तुरंत बाद यह जता दिया लेकिन जब चुनाव चल रहा था तब इन लोगों ने नफरत की बातों को गंभीरता से नहीं लिया. जब बड़े नेता किसी समुदाय को ऐसे टारगेट करेंगे तो उनके कार्यकर्ता और समर्थक ऐसी सनक के शिकार होंगे ही. उन्हें भी लगेगा कि अमरीका की आर्थिक तंगी के लिए दूसरे मुल्क से आया कोई इंजीनियर दोषी है. इसलिए वो रंग के आधार पर उस इंजीनियर को मुसलमान समझता है और गाली मार देता है.

आपको नफ़रत की इस राजनीति का फार्मूला समझना होगा. यह सिर्फ मुसलमान के खिलाफ नहीं है. यह उनके खिलाफ भी है जिनका रंग श्वेत अमरीकियों जैसा नहीं है, उनके खिलाफ भी है जो दूसरे देश से आकर वहां नौकरी करते हैं. ज़हर इतना मिल गया है कि इन सबसे एक ही पहचान बनी है. कौन बाहरी है. कौन भीतरी है. जो बाहरी है वो मुसलमान होने के कारण भी मारा जा सकता है, आई टी इंजीनियर के कारण भी और हैदराबादी होते हुए भी सऊदी अरब का समझ कर मारा जा सकता है. आप इस राजनीति का फार्मूला भारत में भी खोज सकते हैं. आसानी से मिल जाएगा. लेकिन पूरी दुनिया ऐसी नहीं है.

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18 फरवरी, 2017 के दिन स्पेन के तमाम शहरों की सड़कों को लाखों लोगों ने भर दिया. बार्सिलोना, मैड्रिड सब जगह लोग इस बात को लेकर घरों से निकले कि उनकी सरकार सीरिया, अफगानिस्तान, इराक से आए शरणार्थियों को बसाने में देरी क्यों कर रही है. 17000 लोगों को बसाने का वादा था, अभी तक 1100 शरणार्थियों को ही क्यों बसाया गया. इन लाखों लोगों को इस बात से कोई भय नहीं है कि ये मुसलमान होंगे, ये दूसरे मुल्क से होंगे. मगर युद्ध और हिंसा के शिकार इन शरणार्थियों के जीने और बसने के हक में बाहर निकले. क्या आप ऐसे किसी प्रदर्शन की कल्पना भारत में कर सकते हैं.

श्रीनिवास का दोस्त आलोक मदासानी घायल है. उनके पिता जगनमोहन रेड्डी ने कहा है कि अमरीका में जिस तरह नफ़रत और अंध राष्ट्रवाद का माहौल है, उससे यह देश अब भारतीयों के लिए सुरक्षित नहीं लगता है. उन्होंने कहा कि यह पागलपन अच्छा नहीं है क्योंकि हमारे बहुत से बच्चे वहां रहते हैं. ये नफरत ठीक नहीं है.



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