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क्‍या राहुल की ताजपोशी वंशवाद का उदाहरण?

1998 के बाद 2001 में सोनिया गांधी जब अध्यक्ष बनने वाली थी तब जितेंद्र प्रसाद ने अपना नामांकन भरा था. और उनके साथ कई कांग्रेस नेता भी खड़े हुए. जितेंद्र प्रसाद हार गए मगर सोनिया गांधी को पहली बार चुनाव का सामना करना पड़ा.

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क्‍या राहुल की ताजपोशी वंशवाद का उदाहरण?

कांग्रेस अध्‍यक्ष पद के लिए नामांकन दाखिल करते राहुल गांधी

राहुल गांधी कांग्रेस अध्यक्ष बन गए हैं. उनके नामांकन के विरोध में किसी भी कांग्रेस नेता ने उम्मीदावारी का दावा नहीं किया है. परिवारवाद का आरोप राहुल गांधी का पीछा कर रहा है. सोनिया गांधी का भी पीछा कर रहा था, राजीव गांधी और इंदिरा गांधी का भी पीछा करता रहा है. 1998 के बाद 2001 में सोनिया गांधी जब अध्यक्ष बनने वाली थी तब जितेंद्र प्रसाद ने अपना नामांकन भरा था. और उनके साथ कई कांग्रेस नेता भी खड़े हुए. जितेंद्र प्रसाद हार गए मगर सोनिया गांधी को पहली बार चुनाव का सामना करना पड़ा. 2001 से 2017 तक सोनिया गांधी के खिलाफ़ कोई चुनाव नहीं हुआ. 2017 में राहुल गांधी को किसी चुनाव का सामना नहीं करना पड़ा है, उनके ख़िलाफ़ कोई मैदान में नहीं उतरा, मां के बाद बेटे को अध्यक्ष बनाया जा रहा है. नेहरू गांधी परिवारवाद की बात होती है लेकिन यह राजीव गांधी के बाद से ज्यादा स्पष्ट होती है. हमें आज और आज़ादी की लड़ाई के समय में कूदे परिवारों में अंतर करना होगा, मगर इस अंतर के साथ कि वो लड़ाई में देश की आज़ादी के लिए कूदे, ये सत्ता पर अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए अध्यक्ष या मंत्री बन रहे हैं.

जवाहर लाल नेहरू को महात्मा गांधी ने प्रधानमंत्री बनाया था. आज़ादी की लड़ाई के दौरान नेहरू 9 साल जेल में रहे थे. नेहरू की पत्नी कमला नेहरू ख़ुद स्वतंत्रता सेनानी थीं. नेहरू के पिता मोतिलाल नेहरू भी आज़ादी के नायक थे. नेहरू की बहन विजय लक्ष्मी पंडित स्वतंत्रता सेनानी थीं. नेहरू के जीवन में ही 1959 में इंदिरा गांधी कांग्रेस अध्यक्ष बन गई थीं. 1960 में नीलम संजीव रेड्डी अध्यक्ष बन गए थे. 1969 में सिंडिकेट से लोहा लेते हुए इंदिरा गांधी ने अपनी पार्टी बनाई.

इंदिरा गांधी को ज़्यादा साबित करना पड़ा राजनीति में. कांग्रेस आई बनाई थीं. हारी और जीतती रहीं वो अलग कहानी है. इंदिरा गांधी के समय में परिवारवाद की बुनियाद पड़ी. राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने मगर सोनिया गांधी अध्यक्ष पद पर ही रहीं, मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने. बीजेपी आरोप लगाती रही है कि सत्ता सोनिया के पास है, मनमोहन कठपुतली हैं. इसके बाद भी मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री रहते कांग्रेस ने 2009 में चुनाव जीता था. सोनिया गांधी अध्यक्ष थीं मगर वो चुनाव मनमोहन सिंह का था. मनमोहन सिंह 2014 में हार गए.

सरदार पटेल का भी परिवार राजनीति में रहा है. विट्ठल भाई पटेल सरदार वल्लभ भाई पटेल के सगे बड़े भाई थे. उन्होंने सी आर दास, मोतिलाल नेहरू के साथ स्वराज पार्टी बना ली थी. विट्ठल भाई पटेल 1925 में सेंट्रल लेजिस्लेटिव असंबेली के अध्यक्ष और स्पीकर थे. उन्हीं के छोटे भाई सरदार बल्लभ भाई पटेल गृहमंत्री बने. पटेल की पहचान विट्ठल भाई के छोटे भाई से नहीं, बारदोली के किसान आंदोलन से थी. सरदार पटेल की मौत के बाद नेहरू ने 1952 में उनकी बेटी मणिबेन को लोकसभा का टिकट दिया. विवाद होने पर नेहरू ने कहा कि वे बेटी हैं मगर 1930 से आज़ादी की लड़ाई में शामिल हैं. 1957 में पटेल की बेटी मणिबेन पटेल और बेटे दयाभाई पटेल दोनों लोकसभा का चुनाव लड़े, जीते. बाद में मणिबेन पटेल राज्य सभा की सदस्य भी हुईं मगर इसके बाद पटेल परिवार सुनाई नहीं दिया.

आज पटेल परिवार का उस विरासत पर कोई दावा नहीं है. उनकी कोई पार्टी नहीं है. लाल बहादुर शास्त्री का परिवार भी राजनीति में आया मगर उतने ईमानदार और सादे नेता के बेटों को खास राजनीतिक लाभ नहीं मिला. जबकि एक कांग्रेस में रहे और दूसरे बीजेपी में. बीजू पटनायक के बेटे नवीन पटनायक भी उसी की मिसाल हैं. भारत की राजनीति में परिवारों के दायरे से बाहर एक से एक नेता भी पैदा हुए जिन्होंने राजनीति बदल दी मगर उनकी बनाई पार्टी भी परिवारवाद की गोद में चली गई. राहुल गांधी बहुत दिनों तक इस परिवारवाद को लेकर संकोच में रहे मगर अब लगता है कि इस आलोचना से उबर गए हैं, मगर यह सवाल उनका पीछा करता रहेगा. लोकसभा चुनावों के समय राहुल गांधी ने टाइम्स नाउ को दिए इंटरव्यू में कहा था कि 'मैं अपने परिवार का बार बार नाम नहीं लेता हूं, एक या दो बार ही लिया होगा असली, मुद्दा यह है कि इस परिवार में मैं पैदा हुआ यह मेरा चयन नहीं था. मैंने दस्तखत नहीं किये थे कि मैं इस परिवार में पैदा होना चाहूंगा. मैं वंशवाद की अवधारणा के खिलाफ हूं.'

राहुल से भी पूछा जाना चाहिए और यही सवाल उद्धव ठाकरे, आदित्य ठाकरे, प्रकाश सिंह बादल, सुखबीर बादल, महबूबा मुफ़्ती, फारूक़ अब्दुल्ला, ओमर अब्दुल्ला, मुलायम सिंह यादव, अखिलेश यादव, लालू यादव, तेजस्वी यादव, करुणानिधि, स्टालिन, रामविलास पासवान, चिराग पासवान से भी पूछा जाना चाहिए. जवाब कोई नहीं देता है. क्या बीजेपी में कोई ऐसा नियम है कि जिनके पिता मुख्यमंत्री, मंत्री या सांसद रहे हैं वे कभी पार्टी अध्यक्ष या प्रधानमंत्री नहीं बनेंगे, क्या बीजेपी ने ऐसा कहा है. क्या जिन दलों में अध्यक्ष किसी परिवार का नहीं बनता है, वहां ज्यादा आंतरिक लोकतंत्र है, जवाब है नहीं. क्या वहां अध्यक्ष पद का लोकतांत्रिक भावना के अनुरूप निर्वाचन होता है, जवाब है नहीं. 2014 के एक प्राइम टाइम में इसी विषय पर मैंने पंजाब यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर आशुतोष से बात की थी तब उन्होंने कहा कि जैसे मुगल बादशाह अपनी सत्ता के विस्तार के लिए राजपूत राजाओं से शादियां किया करते थे वैसे ही पंजाब में कांग्रेस और अकाली भले ही अलग दल हैं मगर इनके बड़े नेता आपस में सास, बहू, बेटा, दामाद, बेटी और साला और साढ़ू लगते हैं. आशुतोष ने पंजाब यूनिवर्सिटी की छात्रा गुनरीत कौर के एमए में लिखे पर्चे का उदाहरण देते हुए कहा कि प्रकाश सिंह बादल के कैबिनेट मंत्री आदेश प्रताप सिंह उनके दामाद हैं. आदेश पंजाब में दस साल तक कांग्रेसी मुख्यमंत्री रहे प्रताप सिंह कैरों के बेटे हैं. कैप्टन अमरिंदर सिंह की पत्नी, सिमरनजीत सिंह मान की पत्नी और बेअंत सिंह के बाद कांग्रेस के मुख्यमंत्री हरचरण सिंह बरार की बहू आपस में बहनें हैं. उसी तरह मजीठिया परिवार कांग्रेसी माना गया लेकिन सुरजीत सिंह मजीठिया के बेटे विक्रम सिंह मजीठिया अब अकाली में हैं. उनकी बहन की शादी डिप्टी सीएम सुखबीर सिंह बादल से हुई है. विक्रम खुद भी अकाली से विधायक और कैबिनेट मंत्री हैं.

भारतीय राजनीति में परिवारवाद को लेकर पैट्रिक फ्रेंच ने एक गंभीर अध्ययन किया है. पैट्रिक ने 15वीं लोकसभा के 545 सांसदों की पारिवारिक पृष्ठभूमि का अध्ययन किया तो 156 सांसद पारिवारिक पृष्ठभूमि से संबंधित थे. पैट्रिक फ्रेंच ने दिखाया था कि 15वीं लोकसभा में राष्ट्रीय लोकदल 100 परसेंट खानदानी थी. इसके सभी सांसद खानदानी हैं. पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह, अजीत सिंह और उनके बेटे जयंत चौधरी. इस वक्त 16वीं लोकसभा चल रही है. कंचन चंद्रा की एक किताब है, democratic dynasties, state party and family in contemporary indian politics, कैंब्रीज यूनिवर्सिटी प्रेस से छपी यह किताब 7645 रुपये की है. इस किताब के अनुसार पीएमके, सीपीआई में 100 फीसदी सांसद परिवारवादी हैं. कांग्रेस के 47.73 प्रतिशत सांसद परिवारवादी हैं. बीजेडी में 40 फीसदी सांसद परिवारवादी हैं. एनसीपी में 33 फीसदी सांसद परिवारवादी हैं. बीजेपी में 14.89 प्रतिशत परिवारवादी हैं.

इन अध्ययनों से पता चलता है कि 2009 में 30.07 प्रतिशत सांसद परिवारवादी थे, उनका प्रतिशत 2014 में घट कर 21.92 प्रतिशत रह गया. पैट्रिक फ्रेंच और कंचन चंद्रा दोनों के शोध से यही निकला है कि बीजेपी में परिवारवाद तो है मगर कई प्रमुख दलों की तुलना में कम है. कल्याण सिंह राज्यपाल हैं, उनके बेटे राजवीर सिंह एटा से सांसद हैं और नाती संदीप सिंह विधायक हैं. राजनाथ सिंह के बेटे पंकज सिंह भी विधायक हैं. कैसरगंज के सांसद बृजभूषण सिंह के बेटे प्रतीक भूषण, लालजी टंडन के बेटे आशुतोष टंजन विधायक हैं. योगी मंत्रिमंडल में मंत्री रीता बहुगुणा जोशी भी परिवारवाद की उदाहरण हैं. जयंत सिन्हा, अनुराग ठाकुर, पीयूष गोयल सहित अनेक नेता पारिवारिक पृष्ठभूमि से आते हैं. परिवारवाद के कारण इन्हें मौका मिला लेकिन क्या इनमें से कई इसी खूबी के कारण राजनीति में टिके रहे? वरुण गांधी की अपनी राजनीतिक पहचान है, उस पहचान में संजय गांधी के पिता होने के संयोग के अलावा और क्या है. क्या वरुण गांधी ने सुल्तानपुर में 1 लाख 80 हज़ार वोट संजय गांधी के नाम पर पाया होगा या अपने काम पर. जनता क्यों वोट देती है, परिवार का नाम देखकर. क्या जनता से सवाल नहीं है.

आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्राबाबू नायडू के बेटे नारा लोकेश भी टीडीपी के महासचिव हैं, पिता की कैबिनेट में मंत्री हैं. तेलंगाना के मुख्यमंत्री के सी आर के बेटे के टी रमाराव भी पिता की कैबिनेट में मंत्री हैं.

क्या बीजेपी परिवारवाद के ख़िलाफ अपने सहयोगी दलों के ख़िलाफ़ भी आक्रामक है? बीजेपी ने उद्धव ठाकरे, सुखबीर बादल और चिराग़ पासवान के ख़िलाफ परिवारवाद का अभियान क्यों नहीं चलाया. राहुल गांधी के अध्यक्ष बनने को लेकर बीजेपी कांग्रेस पर आक्रामक है, जवाब में कांग्रेस पूछ रही है कि अमित शाह मनोनयन से अध्यक्ष बने थे या चुनाव से, बीजेपी इसका जवाब नहीं दे रही लेकिन यह सवाल पूछकर कांग्रेस भी बीजेपी के सवाल का जवाब नहीं दे रही है. सवाल यह है कि पार्टियों के भीतर आंतरिक लोकतंत्र है, क्या वहां है जहां परिवारवाद है, क्या वहां है जहां परिवारवाद नहीं है. अगर राहुल गांधी के चयन पर ईमानदारी से बहस करनी है तो इस सवाल पर टिके रहना होगा वरना कोई लाभ नहीं. आदर्श उदाहरण आपको भारत से नहीं मिलेगा. लंदन की राजनीति से मिल सकता है. जैसे लेबर पार्टी का ही उदाहरण लेते हैं.

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कोर्बिन और उनका गुट लेबर पार्टी में 30 साल से हाशिये पर था. कोर्बिन पार्टी के कार्यकर्ताओं के वोट से सांसद बनते रहे. जबकि नीतियों को लेकर उनका पार्टी नेतृत्व से सीधा विरोध है. लेबर पार्टी के दो दो प्रधानमंत्री हुए,जिनसे उनका विरोध रहा. स्थानीय स्तर पर कार्यकर्ताओं के वोट से जीतते रहे.

ब्रिटेन में कार्यकर्ता स्थानीय स्तर पर उम्मीदवार चुनते हैं, इसके लिए 25 पाउंड फीस देकर मेंबर बनते हैं. कार्यकर्ता ही सांसद और प्रधानमंत्री का उम्मीदवार चुनते हैं. उम्मीदवार बनने के लिए नेता बकायदा पार्टी के भीतर अपनी नीतियों को लेकर कार्यकर्ताओं के बीच प्रचार करते हैं, भाषण देते हैं जो भारत में नहीं होता है. इसके बाद भी ब्रिटेन और अमरीका में परिवारवाद की तरह दूसरी तरह का वाद पनमा धन और कुलीनता का. ब्रिटेन में तो कई प्रधानमंत्री एक ही स्कूल या कालेज के पढ़े हुए बनते रहे. यह भी अपने आप में एक तरह का कुलीनवाद है. फिर भी भारत के सिस्टम से यह कहीं बेहतर है कि पार्टी का उम्मीदवार कौन होगा कार्यकर्ता तय करेंगे न कि संघ परिवार न ही गांधी परिवार.


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