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निवेशकों में हौका बैठा रहा है शेयर बाजार...

यह हालत तब है कि शेयर बाजार की धारणा बनाने वाली सारी ताकतों ने अपना पूरा दम लगा दिया. इनमें सरकार भी शामिल है जिसने यह प्रचारित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी कि निवेशकों में दहशत का उसके बजट से कोई संबंध नहीं है.

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निवेशकों में हौका बैठा रहा है शेयर बाजार...

प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर

बजट के बाद शेयर बाजार की दहशत कम होने का नाम नहीं ले रही है, बल्कि बढ़ती ही जा रही है. मंगलवार को भी निवेशकों के तीन लाख रुपये और डूब गए. मंगलवार को सेंसेक्स 561 अंक और नीचे चला गया. सोमवार को गिरा ही था. यानी बजट के पांच दिन बाद भी लगातार शेयरों का गिरना जारी है. यह हालत तब है कि शेयर बाजार की धारणा बनाने वाली सारी ताकतों ने अपना पूरा दम लगा दिया. इनमें सरकार भी शामिल है जिसने यह प्रचारित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी कि निवेशकों में दहशत का उसके बजट से कोई संबंध नहीं है. लेकिन लगता है कि निवेशकों ने सरकार के प्रचार को पूरी तरह से खारिज कर दिया. मंगलवार को पूरे दिन मीडिया सरकार के रुख को भांपने की कोशिश करता रहा कि क्या सरकार अपना रवैया बदल सकती है. लेकिन इस बदलाव का कोई संकेत मिला नहीं.

देश के लिए कितनी बड़ी है यह दहशत
शेयर बाजार ही है जो निवेशकों का पैसा देश में विनिर्माण और सेवा क्षेत्र में वृद्धि के लिए निजी निवेश का इंतजाम करता है. इसीलिए यही बाजार सबसे ज्यादा सतर्क होकर देखता है कि निकट भविष्य में इस तरह की उत्पादक गतिविधियों का माहौल कैसा रहने वाला है. इसीलिए बजट के विश्लेषण का एक यह निष्कर्ष निकाला गया कि देश के निवेशकों ने बजट के बाद शेयर बाजार को अपना पैसा लगाने के लिए जोखिमभरी जगह माना. यह संकेत देश में निकट भविष्य में आर्थिक गतिविधियों के लिए खतरे की घंटी  बजा रहा है.

रिजर्व बैंक के सामने फौरी चुनौती
रिज़र्व बैंक को कल ही अपनी कर्ज़ नीति बताना है. उसके सामने मुश्किल यह होगी कि वह बाजार की दहशत के माहौल में क्या करे. शेयर बाजार चाह रहा है कि कर्ज की नीति में बदलाव हो. यह नीति फौरन ही महंगाई पर असर डालने लगती है. यह सरकार के लिए राजनीतिक समस्या खड़ी कर देती है. सरकारें आमतौर पर महंगाई को लेकर ही डांवाडोल होती रही हैं. इस तरह से रिज़र्व बैंक को यह ध्यान रखना ही पड़ेगा कि बाजार में या उपभोक्ताओं की जेब में कर्ज रूपी पैसा ज्यादा न पहुंच जाए. उधर यह मुश्किल है कि शेयर बाजार से पैसा निकल जाने से कारोबार के लिए पैसे की कमी पड़ जाएगी.

लॉन्ग टर्म केपिटल गेन टैक्स से पिंड नहीं छूट रहा
शेयर बाजार में एक साल से ज्यादा समय तक पैसा लगाए रखने वालों पर टैक्स लगाने का फैसला अभी तक चर्चा में है. दरअसल इस बार के बजट से पहले इस आमदनी पर टैक्स नहीं लगने के कारण ही निवेशकों के लिए शेयर बाजार एक बड़ा आकर्षण था. अब इस आमदनी पर 10 फीसद टैक्स से वह आकर्षण जाता रहा. हलांकि यह भी एक समस्या है कि जो अपनी खर्चे को कम करके बचत करता है वह पैसा लगाए या रखे कहां? बैंकों में जमा पर ब्याज दरें सरकार ने इतनी कम करवा दी हैं कि जो बैंकों में जमा किया करते थे, ब्याज़ से उनकी आमदनी पिछले दो तीन साल में 30 फीसद तक घट गई है. ब्याज से होने वाली इस आमदनी पर टैक्स लग रहा है वह अलग. यानी इस दौरान निजी निवेशक खासतौर पर देसी निवेशक ऐसे चक्कर में फंस गए हैं कि अपनी बचत को बचाकर कैसे रखें. मानकर चलना चाहिए कि शेयर बाजार का मौजूदा संकट निवेशकों की अबूझ की स्थिति भी बता रहा है.

सरकार की मुश्किल
मंगलवार को मीडिया के लोग सरकार के समर्थ पदाधिकारियों से पूछते रहे कि आसन्न संकट के मद्देनजर सरकार क्या अपने महंगाई के लक्ष्य, वित्तीय घाटे के लक्ष्य, जीडीपी के लक्ष्य में संशोधन करेगी. वैसे पूछने वालों ने भी हद कर दी. अभी जुमे जुमे हफ्ताभर तो गुजरा नहीं है, इन लक्ष्यों का ऐलान हुए. कौन सी सरकार होगी जो इनमें बदलाव करके फजीहत मोल लेगी. खासतौर पर लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन टैक्स खत्म या कम करने में यह अड़चन है कि अगले वित्त वर्ष में धन के प्रबंध के लिए इसे सरकार की आमदनी का एक बड़ा जरिया दिखाया गया था. उधर वित्तीय घाटे पर नियंत्रण मौजूदा सरकार का बहुप्रचारित नारा है. इसे न साधने का आरोप बहुत भारी पड़ जाएगा. इसके अलावा जीडीपी सरकार की दुखती रग बन गया है. और महंगाई, ये तो ऐसा संवेदनशील मसला है कि चुनाव की तैयारियों के साल में वह इससे तो समझौता कर ही नहीं सकती. भले ही जेबखाली लोग सस्ती चीज़ें भी न खरीद पाएं. लेकिन सरकार उनकी जेब में कर्ज रूपी पैसा डालकर महंगाई का आंकड़ा बिल्कुल नहीं बढ़ने दे सकती. यह आम आदमी का स्वभाव बना दिया गया लगता है कि वह आठ फीसद महंगी चीज़ खरीदने लायक बनने की बजाए मुफलिस बनकर उसे न खरीद पाने के लिए राजी है. पिछले दो दशकों में उसका स्वभाव बनाने के लिए जितनी राजनीतिक मशक्कत हुई है उसके बाद आज उसे अर्थशास्त्र का यह नियम समझाने का जोखिम कौन ले सकता है कि महंगाई आर्थिक वृद्धि का एक संकेतक है. महंगाई रोकने के किसी भी उपाय का एक प्रभाव अनिवार्य रूप से आर्थिक वृद्धि रुकना भी है. इसीलिए कुछ सरकारें आर्थिक वृद्धि पर ध्यान लगाती हैं और महंगाई से समझौता कर लेती हैं. अब ये सरकारों की पसंद की बात है कि वे किसे ज्यादा तरजीह दें. अपनी सरकार की पसंद का एक रूप बुधवार को रिजर्व बैंक की कर्ज़ नीति में दिखाई देगा. उसका असर ढहते शेयर बाजार पर होगा या नहीं? और अगर होगा तो कितना होगा? इसका पता बुधवार को सेंसेक्स के जरिए चलेगा.

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(सुधीर जैन वरिष्ठ पत्रकार और अपराधशास्‍त्री हैं...)

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति NDTV उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं. इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार NDTV के नहीं हैं, तथा NDTV उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है.


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