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क्या सरकार के दबाव में है भारतीय रिज़र्व बैंक?

1949 में भारतीय रिज़र्व बैंक अपने मौजूदा स्वरूप में आता है, और तब से लेकर आज तक उसके इतिहास में इतना पैसा कभी रिजर्व बैंक से भारत सरकार को नहीं गया है.

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क्या सरकार के दबाव में है भारतीय रिज़र्व बैंक?

भारतीय रिजर्व बैंक 1 लाख 76 हजार 51 करोड़ रुपये भारत सरकार को देगा. यह पैसा रिजर्व बैंक की आकस्मिक निधि और सरप्लस का है जिसे अंग्रेज़ी में कंटीजेंसी फंड कहते हैं. 1949 में भारतीय रिज़र्व बैंक अपने मौजूदा स्वरूप में आता है, और तब से लेकर आज तक उसके इतिहास में इतना पैसा कभी रिजर्व बैंक से भारत सरकार को नहीं गया है. चीन के साथ युद्ध के वक्त रिजर्व बैंक की आकस्मिक निधि से पैसा लिया गया था, लेकिन यह पैसा है उसके बारे में क्यों कहा जा रहा है कि यह आरबीआई के इतिहास में पहली बार है जब इतना पैसा आकस्मिक निधि से निकाल कर सरकार को देने का फैसला किया गया है. वैसे भी इस साल के बजट में उम्मीद जताई गई थी कि रिज़र्व बैंक 90,000 हज़ार करोड़ रुपया मिलेगा, लेकिन उससे भी 86000 करोड़ अधिक रुपया आने वाला है. मतलब सरकार ने जितना मांगा उससे भी अधिक. इस सदी का हिसाब देखते हैं. 2004 से 2014 के बीच औसतन 20,000 करोड़ दिए गए. 2015 से 2019 के बीच औसतन 54,000 करोड़ दिए गए. 2019-20 यानी अकेले इस एक वित्त विर्ष में 1,76,000 करोड़ दिए जाएंगे.

1991 में चंद्रशेखर जब प्रधानमंत्री थे तब विदेशी मुद्रा का संकट आया था. भारत के पास सिर्फ 15 दिनों के आयात के लिए पैसा था, तब भारतीय रिज़र्व बैंक के पास रखा हुआ 47 टन सोना, बैंक ऑफ इंग्लैंड के पास गिरवी रखा गया था. क्या हम उस स्थिति से तुलना कर सकते हैं, इसका ठोस जवाब मेरे पास नहीं है. क्या आज कोई अलग स्थिति है जिसे समझने की ज़रूरत है तो हम प्रयास कर सकते हैं. भारतीय रिज़र्व बैंक जो पैसा देगा वो अपने दो खातों से देगा.


1,23,414 करोड़ रुपया आकस्मिक निधि से दिया जाएगा. 52,637 करोड़ रुपया अधिशेष यानि सरप्लस फंड से दिया जाएगा. बिमल जालान कमेटी ने एक हफ्ता पहले ही कुछ सुझाव दिया और जल्दी ही सारे सुझाव मान लिए गए. भारतीय रिज़र्व बैंक के केंद्रीय बोर्ड ने पौने दो लाख करोड़ रुपया हस्तांतरित करने का फैसला ले लिया. दिसंबर 2018 में बिमल जालान के नेतृत्व में कमेटी बनी थी जिसके एक सदस्य सुभाष चंद गर्ग ने असहमति जताई थी और साइन करने से इंकार कर दिया गया. गर्ग को दूसरे मंत्रालय में भेज दिया गया और उनकी जगह वित्त सचिव राजीव कुमार नए सदस्य के रूप में आ गए और उसके बाद कमेटी के फैसले पर सबने सहमति ज़ाहिर कर दी.

भारतीय रिज़र्व बैंक ने लंबी चौड़ी प्रेस रिलीज़ जारी की है. इसमें बताया गया है कि भारतीय रिज़र्व बैंक ने इस फैसले पर पहुंचने से पहले दुनिया भर के रिजर्व बैंक के जोखिम का अध्ययन किया गया. यह भी देखा गया कि कितना पैसा रिज़र्व बैंक में रखा जाना चाहिए तब जाकर फैसला लिया गया. रिज़र्व बैंक दो तरह की परिस्थिति के लिए पैसा बचाकर रखता है. मौद्रिक संकट के समय और दूसरा वित्तीय संकट के समय. दोनों संकटों की परिभाषा अलग-अलग है. बिमल जालान कमेटी ने बताया है कि आकस्मिक निधि कितनी हो.

रिज़र्व बैंक के बैलेंस शीट का 6.5 से 5.5 प्रतिशत के रेंज में रखी जा सकती है. रिजर्व बैंक ने न्यूतनम रेंज को अपने लिए स्वीकार कर लिया. अधिकतम को नहीं. इस कमेटी के पहले रिजर्व बैंक की आकस्मिक निधि 6.8 प्रतिशत हुआ करती थी. बैलेंस शीट के हिसाब से रिज़र्व का प्रतिशत ऊपर नीचे होता रहा है. क्या जालान कमेटी ने न्यूनतम रेंज देकर रिजर्व बैंक की मदद कर दी. भारत के पूर्व मुख्य सांख्यिकी अधिकारी प्रणब सेन का कहना है कि न्यूनतम रेंज के कारण अब रिज़र्व बैंक के पास कोई स्कोप नहीं बचा है. आने वाली सरकारें या यही सरकार आने वाले समय में न्यूनतम रेंज पर ही ज़ोर देती रहेगी. आप जानते हैं कि रिज़र्व बैंक को इस नतीजे पर पहुंचने से पहले इसके विरोध के कई दौर से गुज़रना पड़ा है. गवर्नर उर्जित पटेल ने रिजर्व पैसा देने से मना कर दिया और समय से पहले अपना पद छोड़कर चले गए. व्यक्तिगत कारणों से.

नवंबर 2018 में इंडियन एक्सप्रेस के सन्नी वर्मा की खबर थी कि रिज़र्व बैंक ने सरकार को 3 लाख 60,000 करोड़ देने से मना कर दिया है. तब सवाल उठा था कि सरकार रिजर्व बैंक की स्वायत्तता पर हमला कर रही है तब सरकार ने कहा था कि मौजूदा नियम रूढ़ीवादी सोच के आधार पर बने हैं. सरकार और रिज़र्व बैंक को मिलकर रास्ता निकालना चाहिए कि 9.56 लाख करोड़ के सरप्लस का कैसे इस्तमाल हो. इस सोच का सबसे मुखर विरोध डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने किया था. बाद में उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया. अक्तूबर 2018 में विरल आचार्य ने कहा था कि अर्जेंटीना की सरकार भी रिज़र्व बैंक के ख़ज़ाने को हथियाना चाहती थी. वहां के गवर्नर ने विरोध में इस्तीफा दे दिया और वहां तबाही आ गई. सरकार जो योजना बना रही है वह टी-20 मैच की तरह है, लेकिन रिजर्व बैंक बहुत आगे की सोच कर योजना बनाता है.

विरल आचार्य के बयान के बाद पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने सीएनबीसी चैनल की एंकर लता वेंकटेश से कहा था कि सरकार को रिज़र्व बैंक पर हाथ डालने का प्रयास नहीं करना चाहिए, यह अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा नहीं है. अगर आप अपना रिज़र्व सरकार को दे देंगे तो भारत की रेटिंग नीचे आ जाती है. हम क्यों नहीं इस रिज़र्व को बचाकर रख सकते हैं. रघुराम राजन का कहना है कि सरकार को अतिरिक्त लाभांश देने के लिए रिजर्व बैंक को अतिरिक्त स्थायी रिजर्व का सृजन करना होगा जैसे और अधिक नोट छापने होंगे. यानी जितना देंगे उतना आपको लाना होगा. उन्होंने कहा था कि हर साल हम इस बात का ख्याल रखते हैं कि स्थायी रिजर्व में कितनी वृद्धि हो रही है, अर्थव्यवस्था में कितनी नगदी की ज़रूरत है और मुद्रास्फीति का लक्ष्य क्या है, लेकिन पूर्व गवर्नर डी सुब्बाराव का तर्क था कि केंद्रीय बैंक अपनी आशंकाओं को कुछ ज़्यादा ही बढ़ाचढ़ा कर देखने लग जाते हैं. सरकार और रिजर्व बैंक मिलकर रास्ता निकाल सकते हैं. पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम ने आर्थिक सर्वे में कहा था कि कोई खास कारण नज़र नहीं आता कि रिज़र्व बैंक क्यों नहीं अपना सरप्लस सरकार को दे. मौजूदा स्तर पर ही रिज़र्व बैंक के पास काफी पूंजी है. दुनिया में अधिक पूंजी वाले बैंक में से एक है. अगर रिज़र्व बैंक 4 लाख करोड़ लौटा दे तो उसका कई तरीके से इस्तेमाल हो सकता है. यहां पर हम आपको एक बात की याद दिलाना चाहते हैं. श्रीनिवासन जैन ने 9 जुलाई 2019 को एनडीटीवी डॉट कॉम पर एक लेख लिखा. उसमें बताया कि आर्थिक सर्वे में सरकार ने जितनी वास्तविक कमाई बताई थी और बजट में जो अनुमान बताया था दोनों में काफी अंतर था.

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2018-19 के बजट में 17.3 लाख करोड़ की कमाई का अनुमान बताया गया था. आर्थिक सर्वे में सरकार ने अपनी कमाई 15.6 लाख करोड़ दिखाई थी. यानी 1.70 लाख करोड़ का हिसाब कहां गया. यह सवाल प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य रथिन रॉय ने ही उठाया था. इस अंतर को लेकर कई हलकों में चिन्ता जताई गई थी. क्या रिजर्व बैंक का पैसा उसी की भरपाई करेगा? सरकार इस पैसे का कहां इस्तेमाल करेगी, वही जानती है. क्या वह वित्तीय घाटे की भरपाई करने में करेगी या अन्य मदों में. रिजर्व बैंक के पूर्व निदेशक विपिन मलिक से हिमांशु शेखर ने बात की. उनका कहना है कि इस पैसा का इस्तेमाल पूंजी निवेश में करे. बैंकों को मज़बूत करने में ताकि वे अधिक से अधिक कर्ज़ दे सके.

विपक्ष को यह रास नहीं आया. विपक्ष का कहना है कि रिज़र्व बैंक की स्वायत्तता पर हमला तो है ही, यह कदम बताता है कि भारत की आर्थिक स्थति बहुत ख़राब है. राहुल गांधी ने कहा कि प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री को समझ नहीं आ रहा है कि जो आर्थिक त्रासदी खुद पैदा की है उसका हल कैसे निकाले. रिज़र्व बैंक से पैसे लेने से काम नहीं चलेगा, यह गोली से लगे घाव पर डिस्पेंसरी से बैंड एड चुराकर लगाने जैसा है. इसका जवाब वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने दिया कि जनता ने उनके चोर वाली बात का सटीक जवाब दे दिया है. उनकी परवाह नहीं है. वित्त मंत्री ने कहा है कि अभी नहीं बता सकती कि रिज़र्व बैंक से मिले पैसे का इस्तेमाल कैसे होगा? 2013 तक रिज़र्व बैंक जितना सरप्लस कमाता था, उसका कुछ प्रतिशत आकस्मिक निधि में जमा किया जाता था. 2010 से 2013 के बीच 32 से 45 प्रतिशत के बीच जमा होता था, लेकिन 2013 के बाद पूरा का पूरा सरप्लस सरकार को दे दिया गया. आकस्मिक निधि में नहीं जमा हुआ. 2016-2017 से दोबारा जमा होना शुरू हुआ, लेकिन अब सरप्लस का मात्र 6 से 7 प्रतिशत ही आकस्मिक यानी इमरजेंसी फंड में जमा हो रहा है. 



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