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प्राइम टाइम इंट्रो : क्‍या AAP के साथ भेदभाव हो रहा है?

चुनाव आयोग ने ऑफिस ऑफ प्रॉफिट के मामले में आम आदमी पार्टी के 20 विधायकों की सदस्यता पर राष्ट्रपति के पास अपनी सिफारिश भेज दी है. हमारे सहयोगी ह्रदयेश जोशी के अनुसार आयोग की सिफारिश के बाद राष्ट्रपति के पास दस्तख़त करने के अलावा कोई विकल्प नहीं रह जाता है.

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प्राइम टाइम इंट्रो : क्‍या AAP के साथ भेदभाव हो रहा है?
सूत्रों और मुताबिक, इन दोनों का इतना जलवा रहा कि दिल्ली में चर्चा गुलज़ार रही कि आम आदमी पार्टी के 20 विधायकों की सदस्या जा चुकी है. चुनाव आयोग ने अपनी तरफ से औपचारिक ऐलान तो नहीं किया है मगर ऐसे गोपनीय मामले बाहर भी आ जाते हैं और बीजेपी कांग्रेस और आप आपस में भिड़ भी जाते हैं. सूत्रों के मुताबिक 20 विधायकों की सदस्यता का मामला है तो आखिर उनकी भी नौकरी जाने वाली है इसलिए नौकरी सीरीज़ में आज उनकी बात, आप नौजवान दुखी न हों, ख़ासकर झारखंड और राजस्थान वाले परीक्षार्थी, मेरे ध्यान में हैं, हम अगले हफ्ते या फिर जब भी समय मिलेगा मोर्चा संभालेंगे. एसएससी 2015 और 16 के पास हुए अभ्यर्थियों के लिए कितना अच्छा होता अगर 26 जनवरी से पहले उन्हें ज्वाइनिंग लेटर मिल जाता. कितनी ख़ुशियां आ जातीं. बहरहाल दिल्ली के विधायकों की तरफ मुड़ते हैं.

चुनाव आयोग ने ऑफिस ऑफ प्रॉफिट के मामले में आम आदमी पार्टी के 20 विधायकों की सदस्यता पर राष्ट्रपति के पास अपनी सिफारिश भेज दी है. हमारे सहयोगी ह्रदयेश जोशी के अनुसार आयोग की सिफारिश के बाद राष्ट्रपति के पास दस्तख़त करने के अलावा कोई विकल्प नहीं रह जाता है. उसके बाद अदालत में ही चुनौती दी जा सकती है. इस मामले की टाइम लाइन देख लेते हैं.

- 13 मार्च 2015 को मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने 21 विधायकों को संसदीय सचिव के तौर पर नियुक्त किया.
- 19 जून 2015 को वकील प्रशांत पटेल ने राष्ट्रपति के पास याचिका दी कि यह ऑफिस ऑफ प्रोफिट का मामला है, अर्थात इन विधायकों की सदस्यता रद्द होनी चाहिए.
- 24 जून 2015 को दिल्ली विधानसभा में removal of disqualification amendment bill 2015 पास करके राष्ट्रपति के पास भेजा.
- इसमें बैक डेट से संसदीय सचिवों को ऑफिस ऑफ प्रॉफिट मामले में छूट देने की बात कही.
- 13 जून 2016 को राष्ट्रपति ने बिल पर दस्तखत करने से मना कर दिया.
- 25 जून 2016 को केंद्र सरकार ने बिल विधानसभा को भेज दिया.
- 14 से 21 जुलाई 2016 के बीच चुनाव आयोग ने 21 विधायकों की पर्सनल सुनवाई की.
- 8 सितंबर 2016 को दिल्ली हाईकोर्ट ने 21 विधायकों को संसदीय सचिव बनाने के आदेश को निरस्त कर दिया.
- 8 सितंबर 2016 को चुनाव आयोग ने 21 विधायकों को कारण बताओ नोटिस जारी किया.
- 24 जून 2017 को चुनाव आयोग ने आप विधायकों की अपील रिजेक्ट कर दी.
- 9 अक्टूबर 2017 को फिर से नोटिस जारी कर आयोग ने विधायकों से सफाई मांगी.
- 19 जनवरी 2018 को आयोग ने सदस्यता रद्द करने की सिफारिश कर दी.

हाईकोर्ट ने इन विधायकों की नियुक्ति रद्द कर दी कि उप राज्यपाल के साइन नहीं थे, इसलिए अवैध हैं. इस पर बहस हुई कि जब नियुक्ति ही अवैध थी तो फिर ऑफिस ऑफ प्रॉफिट का मामला कैसे बनता है. तर्क दिया गया कि हाईकोर्ट के अवैध मानने के पहले तक तो आप के विधायक उस पद पर थे. अब दूसरा सवाल है कि क्या आप के विधायकों ने लाभ लिया, यानी सैलरी या भत्ता. तर्क दिया जाता है कि इन्हें कमरा मिला था और कमरे के रखरखाव पर खर्च हुआ था. पर सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों में साफ-साफ कहा गया है कि लाभ का पद यानी विधायक को लाभ मिल रहा हो. क्या लाभ का पद सिर्फ सैलरी से तय होगा, उन्हें पद पर रखने या हटाने के पैमाने से नहीं होगा. हमें नहीं मालूम कि चुनाव आयोग के पास क्या तथ्य हैं.

लाभ के पद का मामला कई बार सुप्रीम कोर्ट पहुंचा है और कोर्ट ने लाभ के पद क्या हैं, इसकी स्पष्ट व्याख्या की है. 21 अगस्त 1954 को लोकसभा के पहले स्पीकर जी वी मावलंकर ने राज्यसभा के चेयरमैन से सलाह कर ऑफिस ऑफ प्रॉफिट के लिए एक कमेटी बनाई. इस कमेटी के अध्यक्ष थे पंडित ठाकुर दास भार्गव, जिनके कारण इसे भार्गव कमेटी कहा जाता है. वे हिसार से सांसद थे. कमेटी का सुझाव था कि एक बिल लाकर साफ किया जाए कि कौन सा पद लाभ का है और कौन सा नहीं है. पीडीटी आचार्य ने अपनी किताब में इसके बारे में लिखा है. सुप्रीम कोर्ट ने ऑफिस ऑफ प्रॉफिट निर्धारित करने के लिए कुछ टेस्ट तय किए हैं. पहला टेस्ट यह है कि ऑफिस है या नहीं. दूसरा टेस्ट है कि प्रॉफिट हुआ या नहीं. सबसे अहम टेस्ट यह है कि क्या सरकार ने नियुक्ति की है. क्या सरकार विधायक को वेतन देती है, भत्ते का भुगतान करती है.

लाभ के पद के पीछे आदर्श कल्पना यह थी कि विधायक दूसरे काम न करें क्योंकि उसका काम सदन में होना और जनता की आवाज़ उठाना है. वह सरकार के नियंत्रण में नहीं होना चाहिए. वरना वह जनता की आवाज़ नहीं उठा पाएगा. पर क्या यह व्यावहारिक रूप में भी लागू होता है. अव्वल तो विधानसभाओं के सत्र भी बहुत कम दिनों के होते हैं. क्या यह नैतिक अपराध नहीं है. यही नहीं, विधायक सदन में व्हीप के आधार पर अपनी पार्टी के लिए वोट करता है. वह जनता का प्रतिनिधि कागज पर होता है मगर वोट पार्टी के व्हीप के हिसाब से होता है. फिर ऑफिस ऑफ प्रॉफिट की कल्पना का क्या मतलब रह जाता है. आप खुद भी सोचिए. एक बार पांडिचेरी के मेयर पद पर विधायक की नियुक्ति हो गई. इसे चुनाव आयोग ने ऑफिस ऑफ प्रॉफिट माना क्योंकि कई तरह के भत्ते मिलते थे. मगर इसे ऑफिस ऑफ प्रॉफिट नहीं माना गया क्योंकि मेयर का पद सरकार के नियंत्रण में नहीं आता था. कुल मिलाकर ऑफिस ऑफ प्रॉफिट की कोई एक मान्य व्याख्या नहीं मिलती है.

2006 में शीला दीक्षित ने कांग्रेस के 19 विधायकों को कई प्रकार के पद दिए. संसदीय सचिव से लेकर ट्रांस यमुना एरिया डेवलपमेंट बोर्ड के चेयरमैन, वाइस चेयरमैन के. नियुक्ति के बाद चुनाव आयोग ने 19 विधायकों को ऑफिस ऑफ प्रॉफिट का नोटिस भेज दिया. शीला दीक्षित अपनी सरकार बचाने के लिए एक विधेयक ले आईं. 14 कार्यालयों को ऑफिस ऑफ प्रॉफिट के दायरे से बाहर कर दिया.

शीला दीक्षित ने कहा था कि मेरी सरकार बचाना मेरा हक है और संवैधानिक तौर पर ऐसा कर रहे हैं. शीला दीक्षित ने राष्ट्रपति को विधेयक दोबारा भेजा और दस्तखत हो गया. अरविंद केजरीवाल के साथ ऐसा नहीं हुआ. उन पर आरोप लग रहा है कि रेट्रोस्पेक्टिव से कोई कानून नहीं लागू होता. संविधान विशेषज्ञ पीडीटी आचार्य कहते हैं कि कई राज्यों ने पहले नियुक्ति की और फिर बाद में कानून बनाकर उस पद को लाभ के पद के दायरे से बाहर किया और अदालत ने भी माना. जैसे राजस्थान के कांग्रेस विधायक कांता कथूरिया का एक मामला है. 1969 का है. इस केस में हुआ कि कांता कथुरिया की लाभ के पद पर नियुक्ति हुई. हाईकोर्ट ने ऑफिस ऑफ प्रॉफिट के कारण उनकी सदस्यता रद्द कर दी. सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर हुई तब विधानसभा ने कानून पास कर उनके पद को लाभ के दायरे से ही बाहर कर दिया. सुप्रीम कोर्ट ने इस आधार पर सदस्यता रद्द नहीं की. कोर्ट ने कहा कि आर्टिकल 191 में ऐसा कहीं नहीं लिखा है जिससे पता चलता है कि यह घोषणा रेट्रोस्पेक्टिव इफेक्ट से नहीं हो सकती यानी आप नियुक्ति करने के बाद कानून नहीं बना सकते, ऐसा कहीं नहीं है.

इसी तरह का बिल झारखंड और छत्तीसगढ़ में भी पास हुआ. फिर अरविंद केजरीवाल सरकार का बनाया कानून क्यों नहीं मान्य है. क्या ऑफिस ऑफ प्रॉफिट करप्शन है, क्या संवैधानिक नैतिकता का मामला है तो फिर हर राज्य में एक ही पैमाना होना चाहिए. अगर यह संवैधानिक नैतिकता का मामला है तो हर जगह एक होगा या अलग-अलग राज्य की संवैधानिक नैतिकता अलग-अलग होगी. इस मामले में बहुत कंफ्यूजन दिखता है. हरियाणा में भी 4 विधायकों को संसदीय सचिव बनाया गया. 18 जुलाई 2017 को पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट ने नियुक्ति रद्द कर दी. 50 हज़ार सैलरी मिलती थी और 1 लाख से ज़्यादा भत्ता मिलता था. लेकिन क्या इनकी सदस्यता गई, नहीं गई मगर नियुक्ति रद्द हो गई.

14 नवंबर 2017 को टाइम्स ऑफ इंडिया ने इसकी खबर छापी है कि राजस्थान हाईकोर्ट ने वहां के मुख्य सचिव, प्रधान सचिव और कैबिनेट सचिव को संसदीय सचिव के मामले में नोटिस जारी किया है. राजस्थान में दस संसदीय सचिव बनाए गए हैं जिन्हें राज्य मंत्री का दर्जा दिया गया है. क्या यह कोई करप्शन है, क्या इनकी सदस्यता जा रही है, चुनाव आयोग कुछ कर रहा है, मेरे पास कोई पुख़्ता जानकारी नहीं है. एक मामला और है. ममता बनर्जी ने दोबारा सत्ता में आने से पहले 24 विधायकों को संसदीय सचिव बना दिया था. कानून भी लेकर आईं मगर 2013 में एक जनहित याचिका दायर हो गई. कोलकाता हाईकोर्ट ने ममता बनर्जी के बनाए कानून को रद्द कर दिया. 24 विधायकों की नियुक्ति भी रद्द हो गई. मार्च 2015 को दिल्ली के 21 विधायक संसदीय सचिव बनते हैं. उसके दो महीने बाद मई 2015 में छत्तीसगढ़ में 11 विधायकों को रमन सिंह सरकार संसदीय सचिव बनाती है. छत्तीसगढ़ का फैसला आज तक नहीं आया, दिल्ली का आ गया. 1 अगस्त 2017 को न्यू इंडियन एक्सप्रेस ने छापा है कि छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने फैसला दिया है कि सभी ससंदीय सचिवों के अधिकार रद्द कर दिए जाएं. हाईकोर्ट ने कहा कि अगर इनकी नियुक्ति गर्वनर से नहीं हुई है तो इनकी नियुक्ति वैध नहीं मानी जाएगी. इसी तरह का फैसला तो दिल्ली के विधायकों के बारे में कोर्ट ने दिया था. 27 जून 2017 की एक खबर मिली. टेलिग्राफ और टाइम्स ऑफ इंडिया से. उसके अनुसार चुनाव आयोग ने मध्य प्रदेश सरकार से जवाब मांगा है कि क्या 109 विधायक और 9 मंत्री ऑफिस ऑफ प्रॉफिट के दायरे में आते हैं.

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आम आदमी पार्टी की शिकायत पर चुनाव आयोग ने मध्यप्रदेश से पूछा था. आम आदमी पार्टी की शिकायत थी कि 116 विधायक जनभागीदारी समिति के सदस्य थे, जो लाभ का पद है और दो मंत्रियों को स्काउट एंड गाइड का आयुक्त नियुक्त किया गया था. क्या बिजली मंत्री पारस जैन और स्कूली शिक्षा मंत्री दीपक जोशी ने लाभ के पद का उल्लंघन किया है.

चुनाव आयोग ने मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में लाभ के पद के मामले में क्या अंतिम रुख लिया है, कब लेगा, हमें नहीं पता. सदस्यता रद्द होने की खबर सुनने के बाद आप के कुछ विधायक दिल्ली हाईकोर्ट गए, हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग से आदेश के बारे में पूछा तो चुनाव आयोग के वकील ने कहा कि  अभी देर शाम को चुनाव आयोग से उनका संपर्क नहीं हो सका है और उन्हें समय दिया जाए . हाईकोर्ट ने विधायकों के व्यवहार पर सवाल उठाते हुए कहा कि विधायक  कोर्ट में मामला लंबित होने की आड़ ले रहे थे. इसके बाद कोर्ट ने कोई भी अंतरिम आदेश देने से इनकार कर दिया और अब मामले की सुनवाई सोमवार को होगी.


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