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सपा-बसपा की ताक़त बीजेपी पर भारी

यूपी की राजनीति में इस प्रणाम पाती से लंबे समय का समीकरण बनने वाला है. इस जोड़ी को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सांप छुछूंदर की जोड़ी कह दिया. उनकी यह बात न तो बुआ के घरवालों को पसंद आई और न ही भतीजे के गांव वालों को.

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सपा-बसपा की ताक़त बीजेपी पर भारी

यूपी उपचुनावों के नतीजों के बाद मीडिया के सामने अखिलेश यादव

बबुआ तो बुआ को लेकर सीरीयस है. तभी तो जीत के बाद बबुआ बुआ के घर पहुंच गया. राजनीति में नारे और प्रतीक कितनी जल्दी बदलते हैं. पिछले साल राहुल और अखिलेश की जोड़ी यूपी के लड़के कहलाए, नहीं चले तो अब बुआ बबुआ नारा चल निकला है. अखिलेश यादव गुलदस्ता लेकर बसपा नेता मायावती के घर मिलने पहुंच गए. यूपी की राजनीति में इस प्रणाम पाती से लंबे समय का समीकरण बनने वाला है. इस जोड़ी को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सांप छुछूंदर की जोड़ी कह दिया. उनकी यह बात न तो बुआ के घरवालों को पसंद आई और न ही भतीजे के गांव वालों को. योगी सांस छुछूंदर तो बोल रहे थे लेकिन उन्हें भी पता नहीं होगा कि उसी सांप वाली पार्टी से एक नेता निकल कर उनके दल में आ रहा है जो कभी व्हिस्की में विष्णु बसे और रम में बसे श्री राम टाइप का नारा दे चुका है. जब राम के प्रति अभद टिप्पणी करने वाला जय श्री राम वालों की पार्टी में आ सकता है तो बबुआ बुआ के घर तो जा ही सकता है. भारतीय राजनीति में एक दूसरे को सांप और छुछुंदर कहने की विनम्रता से अच्छा है चुप रहने का अहंकार पाल लेना.

विपक्ष के खेमे में उपचुनावों के नतीजों का उत्साह समझ आ सकता है. कई बार भारत की राजनीति उप चुनावों से ही आने वाले बदलाव का संकेत दे चुकी है मगर कई बार इनका सारा संदेश अगले चुनाव में लापता हो जाता है. गो रक्षा पीठ के महंत, हिन्दू युवा वाहिनी चलाने वाले योगी को गोरखपुर में कोई हराने की सोच भी नहीं सकता था. योगी वहां सिर्फ लोकप्रिय ही नहीं हैं या थे बल्कि उनके सामने किसी को कोई उम्मीदवार ही नज़र नहीं आता था. उनके मुख्यमंत्री बनने पर गोदी मीडिया उनकी गौशाला तक चला गया, हफ्तों चैनलों पर योगी योगी चला और इसी बहाने जनता के आम सवालों को मीडिया ने आराम से गायब कर दिया जैसे देश में कोई समस्या ही न हो. गोरखपुर में रहना होगा तो योगी योगी करना होगा. यह सवाल योगी खुद से पूछ रहे होंगे कि गोरखपुर में रहने के लिए उन्हें क्या कहना होगा. गोरखपुर में उनकी लोकप्रियता ही थी जो उन्हें यूपी के नेतृत्व तक ले गई. वो भी तब जब योगी अपने राजनीतिक जीवन के स्वर्णिम दिनों में हैं तब गोरखपुर में बीजेपी हारी है. फिर भी आप जोश में यह समझने की भूल न करें कि गोरखपुर में योगी ख़त्म हो गए या कमज़ोर हुए हैं, इसके बजाए यह समझें कि गोरखपुर में योगी हार सकते हैं तो भारतीय राजनीति में अब भी वो संभावना बाकी है कि कभी भी कुछ भी हो सकता है.

28 साल से गोरखपुर की सीट गो रक्षा पीठ के पास रही है. पहले महंत अवेद्यनाथ और फिर योगी आदित्यनाथ. जो लोग यूपी की सियासत को जानते हैं वो जानते हैं कि योगी होने का क्या मतलब है. गोरखुपर के गोरखनाथ मठ के बूथ पर बीजेपी को 43 मत मिले हैं, सपा को 1775 और कांग्रेस को 56 वोट मिले हैं.

बीजेपी की तरफ से कहा गया कि सरकार का संदेश जनता तक नहीं पहुंचा. आप फिल्म भी देखने जाइये तो वहां दूसरे उत्पादों से ज़्यादा सरकार का विज्ञापन है. अखबार से लेकर शहर होर्डिंग से भरे हैं. ट्विटर से लेकर फेसबुक पर सरकार की विज्ञापन है. गोदी मीडिया के चैनल और अखबार दिन रात ये काम कर रहे हैं. लगातार हिन्दू मुस्लिम टॉपिक पर बहस चल रही है, आप पिछली बार टीवी का हिसाब निकालेंगे तो पता चलेगा कि गोदी मीडिया ने चार साल विपक्ष पर हमला करने और हिन्दू मुस्लिम टापिक पर डिबेट में ही निकाल दिए. व्हाट्सऐप और टीवी के ज़रिए नौजवानों में ज़हर भरने का प्रयास हुआ ताकि नौजवान डाक्टर न बने दंगाई बन जाएं. कल तक आप अखबारों में पढ़ रहे थे कि बीजेपी संगठन वाली पार्टी है, उसका संगठन दिन रात जागा रहता है, एक हार से सुनने लगे कि संगठन शिथिल हो गया. वहां गोरखपुर में तो बीजेपी के अलावा हिन्दू युवा वाहिनी भी कम सक्रिय नहीं था.

आप इस शख्स को नहीं जानते जिसने योगी को गोरखपुर में हराकर इतिहास बनाया है. योगी 26 साल की उम्र में गोरखपुर से सांसद बने थे, प्रवीण कुमार निषाद 29 साल की उम्र में गोरखपुर से सासंद बने हैं. मैकेनिकल इंजीनियर हैं. इनके पिता डाक्टर संजय कुमार निषाद ने 2016 में राष्ट्रीय निषाद पार्टी बनाई थी. कभी पिता को चुनावी सफता नहीं मिली, उप चुनाव के समय सपा ने संजय निषाद की पार्ट के विलय का प्रस्ताव दिया. जब प्रवीण को टिकट दिया गया तो संजय निषाद मान गए. क्या यूपी में बीजेपी की कामयाबी के पीछे गठबंधन और विलय की यही तरकीब काम नहीं कर रही थी. क्या आपको याद है विधानसभा में बीजेपी ने कितने दलों से गठबंधन किया.

अखिलेश की एक बात पर ग़ौर कीजिए. जब योगी ने कहा था कि मैं हिन्दू हूं ईद नहीं मनाता. यह उचित नहीं था. चार साल तक विपक्षी दल ऐसे बयानों से डरे रहे कि कहीं हिन्दू बन चुका वोटर नाराज़ न हो जाए मगर उन्होंने हिन्दू वोटर को कम समझा. वह यह समझता है कि होली दीवाली और ईद सबका है. हिन्दू वोटर कब से इतना संकुचित हो गया कि वह ईद न मनाने की बात पर सीना फुलाएगा. संवैधानिक पद पर रहते हुए यह कहना कि मैं हिन्दू हूं, ईद नहीं मनाता, इससे किसका भला होता है.

हार जीत की थ्योरी अपरंपरार है. कहा गया कि ब्राह्मण मतदाता नाराज़ है मगर टिकट तो ब्राह्मण उम्मीदवार उपेंद्र दत्त शुक्ला को दिया गया जो गोरखपुर से राज्यसभा सासंद शिव प्रताप शुक्ला के करीबी हैं. शिव प्रताप शुक्ल को राज्यसभा में भेजा ही इसलिए गया था ताकि ब्राह्मण मतदाता बीजेपी के पाले में रहे. यह कहना कि उपेंद्र शुक्ला बगैर योगी के मंज़ूरी के उम्मीदवार बन गए होंगे इतनी आसानी से हजम नहीं होती और न यह भी कि बीजेपी का संगठन योगी के गोरखपुर में सक्रिय नहीं था. फिर अमित शाह की बीजेपी, संघ का घेरा यह सब थ्योरी क्या गोरखपुर में नहीं चली.

एक चीज़ और देखिए. गोरखपुर में निषाद और फूलपूर में पटेल उम्मीदवार की जीत हुई है. ये दोनों ही समाज बीजेपी के लिए लोकसभा और विधानसभा में जीत के आधार रहे हैं. अनुप्रिया पटेल के रूप में उनके पास युवा पटेल नेता और मंत्री है. हार के कारण जनता की ज़िंदगी में होते हैं. गोरखपुर का चीनी मिल अभी तक नहीं बना है. प्रधानमंत्री भी भाषण दे चुके हैं, योगी आदित्यनाथ भी भाषण दे चुके हैं. गोरखपुर रेलवे का महत्वपूर्ण सेंटर है. रेलवे की घटती नौकरियों ने इसकी परीक्षा की तैयारी कर रहे छात्रों को कुछ तो समझा दिया होगा कि 2 लाख 22 हज़ार पद खाली हैं और रेलवे संसद की स्थाई समिति से कहता है कि सभी पदों को भरने का इरादा नहीं है. पत्रकार मनोज सिंह ने दि वायर के लिए एक दिलचस्प विश्लेषण पेश किया है.

योगी को गोरखपुर में दो बार ही कड़ी चुनौती मिली है. 1998 और 1999 में दोनों बार सपा के यमुना निषाद ने ही चुनौती दी थी. एक बार योगी 26000 से जीते थे और 99 में सात हज़ार से अधिक मतों से जीते थे. इसी के बाद हिन्दू युवा वाहिनी बनाई और 1998 से उनकी जीत का अंतर बढ़ता चला गया.
दो बार निषाद उम्मीदवार से हारते-हारते योगी अंत में तीसरी बार हार ही गए. गोरखपुर में निषाद वोटर की संख्या साढ़े तीन लाख है और यादव और दलित की संख्या दो लाख है. जबकि ब्राह्मण डेढ़ लाख. इस जीत ने गोरखपुर में निषाद राजनीति की वर्चस्व की शुरुआत कर दी है. उनके पास इस क्षेत्र में एक विधानसभा भी है. गौर से देखिए तो उम्मीदवार न तो सपा का था, न बसपा का न कांग्रेस का. मगर सपा बसपा के साथ आने भर से ही खेल हो गया.

उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री अपनी सीट हार जाएं, उप मुख्यमंत्री अपनी सीट हार जाएं तो यह सिर्फ संदेश के नहीं पहुंचने से नहीं होता है. केशव प्रसाद मौर्य फूलपूर से सांसद थे. उप मुख्यमंत्री बनकर जब सीट छोड़ी तो लगा कि यह सीट बीजेपी के पास आ जाएगी मगर आखिरी वक्त में सपा-बसपा ने एकता का ऐलान कर चौंका दिया. सपा और बसपा का गंठबंधन भी तो 25 साल बाद हुआ, 1993 में आखिरी बार दोनों दल मिल कर लड़े थे. बुआ भतीजा जिंदाबाद के नारे क्या लगे कि इन्होंने 28 साल से जीत रहे योगी को गोरखपुर में हरा दिया. उत्तर प्रदेश की समस्या तो खत्म नहीं होती, सियासत बदल जाती है. दोनों में कोई संबंध नहीं है. राहुल गांधी ने इस जीत पर सभी उम्मीदवारों को बधाई दी है. नतीजों से साफ है कि मतदाताओं में भाजपा के प्रति बहुत क्रोध है और वो इस ग़ैर भाजपाई उम्मीदवार के लिए वोट करेंगे जिसके जीतने की संभावना सबसे ज़्यादा हो. कांग्रेस यूपी में नवनिर्माण के लिए तत्पर है, ये रातों रात नहीं होगा. तो क्या यूपी में सपा कांग्रेस की जगह सपा बसपा का गठबंधन खेल पलट सकता था. या अब ये तीनों के आने की संभावना मज़बूत है, कहीं ऐसा तो नहीं कि बाकी विपक्षी दलों के नेताओं की तरह सपा और बसपा के नेताओं के यहां छापेमारी तेज़ हो जाएगी और गिरफ्तारी से खेल बदला जाने लगेगा.

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अररिया, किशनगंज और पूर्णिया यह सब एक बेल्ट है. अररिया लोकसभा सीट राजद सांसद तस्लीमुद्दीन के निधन से खाली हुई थी. उस सीट पर सरफराज आलम ने बीजेपी के प्रदीप सिंह को 61 हज़ार से अधिक मतों से हरा दिया. भभुआ विधानसभा में बीजेपी की उम्मीदवार रिंकी रानी पांडेय कांग्रेस के उम्मीदवार शंभु सिंह पटेल से जीत गई हैं. 14 हज़ार से अधिक वोट से. जहानाबाद विधानसभा में राजद के कृष्ण मोहन यादव ने जदयू के अभिराम शर्मा को 29 हज़ार से अधिक वोटों से हराया है. बिहार में बीजेपी और जदयू का गठबंधन राजद कांग्रेस और जीतन राम मांझी के गठबंधन को खास चुनौती नहीं दे सका है.

किसी ने टिप्पणी की है कि बीजेपी उप चुनाव हार जाती है मगर चुनाव जीत जाती है ऐसा क्यों. 2019 की जीत और हार के समीकरण इसमें देखे जाएंगे, मगर जो सियासत का खिलाड़ी होता है वो चुपचाप कुछ और कर रहा होता है. बात ये है कि आपका हमारा जीवन बदलता तो नहीं है, हम और आप इन्हीं खिलाड़ियों के विश्लेषण को ही सारा खेल समझ कर उलझे रहते हैं.


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