NDTV Khabar

कमाल की बात : क्या 'योगी मॉडल' को 'मोदी मॉडल' का विकल्प बनाया जा रहा है?

हालांकि कल्याण सिंह अपने वक्त में योगी से बड़े रामभक्त थे, लेकिन योगी ने राम से प्रेम प्रदर्शन में उन्हें बहुत पीछे छोड़ दिया.

871 Shares
ईमेल करें
टिप्पणियां
कमाल की बात : क्या 'योगी मॉडल' को 'मोदी मॉडल' का विकल्प बनाया जा रहा है?

योगी आदित्यनाथ और पीएम नरेंद्र मोदी की फाइल तस्वीर

एक नई बहस छिड़ी है कि क्या आरएसस 'योगी मॉडल' को 'मोदी मॉडल' का विकल्प बना रहा है. इसकी वजह यह है कि केरल में अमित शाह ने योगी के साथ सीपीएम के खिलाफ मार्च निकाला और जिस गुजरात में मोदी ने 12 साल हुकूमत की और हिंदू हृदय सम्राट कहलाए, वहां चुनाव में योगी आज स्टार प्रचारक हैं. तो सवाल उठना लाजिमी है कि उनकी ऐसी क्या यूएसपी है कि गोरखपुर के एक मंदिर का महंथ पहले एमपी बनता है, फिर सीधे यूपी का मुख्यमंत्री और अब उसे राष्ट्रीय स्तर पर शोकेस किया जा रहा है. और कहा यही जाता है कि वो मोदी की नहीं, बल्कि आरएसएस की पसंद हैं. योगी आदित्यनाथ से पहले यूपी में कोई साधु या महंथ सीएम नहीं बना. अखबार और टीवी मंदिरों और तीर्थयात्रियों की उनकी तस्वीरों से भरे पड़े हैं. वो सीएम बनते ही अयोध्या, मथुरा, काशी, प्रयाग सारे तीर्थों में दर्शन-पूजन कर चुके हैं. एक मल्टी-कल्चरल सोसायटी में वो सिर्फ एक धर्म के प्रचारक लगते हैं. इसलिए सवाल उठता है कि क्या संघ उन्हें हिंदू वोट जुटाने का जरिया बना रहा है?

हालांकि कल्याण सिंह अपने वक्त में योगी से बड़े रामभक्त थे, लेकिन योगी ने राम से प्रेम प्रदर्शन में उन्हें बहुत पीछे छोड़ दिया. अयोध्या में दिवाली पर सरकारी हेलिकॉप्टर से राम-सीता-लक्ष्मण आसमान से उतरते हैं. त्रेता में भरत ने उनकी अगवानी की थी, कलियुग में योगी करते हैं और नारे लगाते हैं 'सरयू मैया की जय, जय-जय श्रीराम'. यही नहीं राम के आगमन पर सरकार के हेलिकॉप्टर आसमान से फूल बरसाते रहे.

यह भी पढ़ें : योगी आदित्यनाथ ने कहा, 2019 तक पूरा हो जाएगा उत्तर प्रदेश में 'राम राज्य' का सपना

योगी ने त्रेता की यादें ताजा करने के लिए अयोध्या में ऐसी दिवाली मनाई, जैसी पहले कभी न हुई थी. राम की पैड़ी पर करीब पौने दो लाख दिए जले. मंदिरों पर रंगीन रोशनी की गई. योगी कहते हैं, "आपको आज से हजारों वर्ष पहले त्रेता युग की उन स्मृतियों के साथ छोड़ने का प्रयास कर रहे हैं, जब 14 वर्षों के बाद मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम का अयोध्या आगमन हुआ होगा. अयोध्या में उस समय क्या दृश्य रहा होगा."

योगी महंथ की हैसियत से चाहे जितना धर्म-कर्म करें, उन पर अंगुली नहीं उठती, लेकिन जब एक मल्टी-कल्चरल समाज में मुख्यमंत्री योगी हर वक्त मंदिरों में दिखें तो सवाल उठते हैं. सीएम बनने के बाद योगी 3 बार रामलला के दर्शन, 3 बार हनुमान गढ़ी के दर्शन, 2 बार सरयू की आरती, 1 बार काशी में बाबा विश्वनाथ के दर्शन, 1 बार काल भैरव के दर्शन, 1 बार विंध्यवासिनी देवी के दर्शन, 1 बार संगम पर गंगा आरती, 1 बार संगम पर लेटे हनुमान जी के दर्शन, 1 बार वृंदावन में बांके बिहारी के दर्शन, 1 बार चित्रकूट में मंदाकिनी की आरती और 1 बार कदमगिरी पर्वत की परिक्रमा कर चुके हैं. यही नहीं एक बार वह गोरखनाथ मंदिर पर गुरुपूर्णिमा पर गुरु के रूप में नजर आए. फिर उन्होंने वहीं दशहरे के दिन दशहरे की शोभा यात्रा की अगुवाई की.

यह भी पढ़ें : ताजमहल भारतीय मजदूरों के खून और पसीने से बना : योगी आदित्यनाथ

मायावती ने आजमगढ़ में अपनी जनसभा में इसपर व्यंग्य कसते हुए कहा, पूर्वांचल के लोगों को लगा था कि पूर्वांचल का मुख्यमंत्री वहां का विकास करेगा. लेकिन वो विकास तो तब करे, जब उसे पूजा-पाठ से फुर्सत मिले.

आधुनिक समाजशास्त्री त्रेता युग को यानी अतीत को याद करने के खिलाफ नहीं हैं. लेकिन उनका मानना है कि अगर अतीत वर्तमान पर हावी हो जाए, तो हम आगे की बजाय पीछे चलने लगेंगे. और यही समस्या धर्म के साथ भी है. क्योंकि आधुनिकता एक साइंटिफिक सोच, रैशनेलिटी और रिजनिंग से आती है, जबकि धर्म आस्था को बढ़ावा देता है. इसीलिए आज प्रगतिशील लोग धर्म के आधुनिक अर्थ और संदर्भ ढूंढने पर जोर दे रहे हैं.

कार्ल मार्क्स ने 1843 में 'Critique of Hegel’s Philosophy of Right' में लिखा था कि धर्म अवाम के लिए अफीम है. क्या आज भी कोशिश है कि आम आदमी धर्म के नशे में अपनी तकलीफ भूला रहे. अखिलेश यादव का कुछ ऐसा ही मानना है. वो कहते हैं कि बीजेपी वाले जेब में अफीम की पुड़िया लेकर चलते हैं...और उन्हें पता है कि उसका कैसे इस्तेमाल करना है. इसमें उनकी पीएचडी है.

धर्म को राजनीति से जोड़ देने के सबसे भयानक नतीजे पाकिस्तान में हम देख चुके हैं. 1977 में भुट्टो को कैद कर जिया-उल-हक ने वहां हुकूमत पर कब्जा कर लिया. सरकारी पाकिस्तानी टीवी पर हिजाब पहने एंकर पेश हुई और उसने मुल्क में निजामे मुस्तफा यानी मोहम्मद साहब का कानून लागू करने का ऐलान कर दिया और जाने से पहले 'खुदा हाफिज' की जगह 'अल्लाह हाफिज' कहा. खुदा फारसी का शब्द है और अल्लाह अरबी का. यह इस बात का ऐलान था कि अब वहां अरब का वहाबी शरिया कानून चलेगा. तब से वहाबी मुसलमान अल्लाह हाफिज बोलते हैं. राजनीति में धर्म के ओवरडेज का नतीजा यह है कि आज पाकिस्तान की सरकार जिहादियों की मेहरबानी पर चलती है. और हम उसे एक 'फेल्ड स्टेट' कहते हैं. इसलिए हमें पाकिस्तान को याद करना और उससे सबक लेना बहुत जरूरी हो गया है.

कमाल खान एनडीटीवी इंडिया के रेजिडेंट एडिटर हैं.

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति NDTV उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं. इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार NDTV के नहीं हैं, तथा NDTV उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है.


Hindi News से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर पर फॉलो करे...

Advertisement