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राष्ट्रीय प्रेस दिवस पर पत्रकारों, पारा शिक्षकों की पिटाई...

आज कल हर दिन कोई न कोई दिवस यानी डे आ जाता है. एक डे जाता नहीं कि दूसरा डे आ जाता है. हर डे की अपनी प्रतिज्ञा होती है और न भूलने की कसमें होती हैं, मगर ये उसी दिन तक के लिए वैलिड होती है.

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राष्ट्रीय प्रेस दिवस पर पत्रकारों, पारा शिक्षकों की पिटाई...

आज कल हर दिन कोई न कोई दिवस यानी डे आ जाता है. एक डे जाता नहीं कि दूसरा डे आ जाता है. हर डे की अपनी प्रतिज्ञा होती है और न भूलने की कसमें होती हैं, मगर ये उसी दिन तक के लिए वैलिड होती है. अगले दिन दूसरा डे आता है, पोस्टर बैनर सब बदल जाता है. नए सिरे से प्रतिज्ञा लेनी पड़ती है कि हम इनके आदर्शों को नहीं भूलेंगे. भूल जाते हैं कि पिछले दिन ऐसी ही एक प्रतिज्ञा ले चुके हैं. सरकारी तंत्र पर बेहद दबाव रहता है कि उस पर भूलने का इल्ज़ाम न लग जाए. आप देखेंगे कि देश भर में कहीं न कहीं किसी न किसी का डे मन रहा होता है. इन दिवसों की तैयारी पर कितना वक्त लगता है, विज्ञापन पर कितना पैसा ख़र्च होता है और मंत्रियों के आने जाने और लोगों के ले जाने और पहुंचाने में कितना संसाधन लगता है, इसका एक अध्ययन होना चाहिए.

बात किसी के अनादर की नहीं है, लेकिन इस वक्त में बाज़ार भी अपनी तरफ से कई डे ठेले रहता है और सरकार भी तो बहुत विकट स्थिति पैदा हो जाती है. इन दिवसों की अधिकता के बारे में सोचा जाना चाहिए. 16 नवंबर को व्हाटएसऐप से लेकर फेसबुक के इनबॉक्स में ढेर सारी बधाइयां पड़ी थीं, देखा तो राष्ट्रीय प्रेस दिवस की थी. उसी व्हाटसऐप में 15 नवंबर के कुछ वीडियो पड़े थे, जो झारखंड की स्थापना दिवस के थे. उस मौके पर लोगों के साथ जो हुआ वो भी बताएंगे मगर आप इस वीडियो में देखिए कि लोगों के साथ साथ पत्रकारों के साथ क्या-क्या हुआ.


ज़्यादा कुछ नहीं है, झारखंड का पुलिस तंत्र 16 नवंबर के राष्ट्रीय प्रेस दिवस के लिए पत्रकारों को प्रैक्टिस करा रहा था कि अब स्टेट की नज़र में प्रेस का मतलब क्या रह गया है. जो भीड़ है वो झारखंड के पारा शिक्षकों की है. जो जगह है वह मोरहाबादी मैदान में झारखंड सरकार स्थापना दिवस मना रही थी. वहां पर बड़ी संख्या में पारा शिक्षक पहुंच गए. पारा शिक्षकों का अलग मसला है. उसके बारे में हमने प्राइम टाइम किया था. फिर से बताएंगे कि क्या मसला है, लेकिन जब ये पारा शिक्षक अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन कर रहे थे, काले झंडे दिखा रहे थे तब पुलिस उग्र हो गई. पुलिस कहती है कि पारा शिक्षक उग्र हो गए थे जिसके कारण नियंत्रण के लिए लाठी चलानी पड़ी. फिर प्रेस वालों पर कैसे चल गई. 

पीले टी शर्ट वाले जागरण के फोटोग्राफर हैं पिंटू, आप प्रभात खबर के रिपोर्टर राजेश तिवारी हैं, जिनके घुटने में चोट आई है वो टीवी 18 के कैमरामैन हैं और इस तस्वीर में पुलिस जिस कैमरामैन पर लाठी ताने हुए हैं वो स्थानीय न्यूज़ चैनल ताजा ख़बर के कैमरामैन हैं. पत्रकारों का दावा है कि सात पत्रकारों को चोटें आईं हैं. इस मामले में एफआईआर दर्ज कराई गई है. रांची प्रेस क्लब ने इस घटना की घोर निंदा की है.

राष्ट्रीय प्रेस दिवस पर लाठी से चोट खाए इन पत्रकारों से क्या कहा जाए, आप ही तय करें. अब आते हैं पारा शिक्षकों की समस्या पर. इनका दावा है कि ये दस हजार की संख्या में झारखंड की स्थापना दिवस के मौके पर पहुंचे थे, ताकि सरकार उनकी बात को सुने. झारखंड में करीब 69 हज़ार पारा शिक्षक हैं जो पहली से लेकर आठवीं तक पढ़ाते हैं. कुछ लोग दसवीं में भी पढ़ाते हैं. पारा शिक्षक संघ के संरक्षक मनोज का कहना है कि 8400 से लेकर 10,164 रुपया मिलता है. मिडिल स्कूल वाले पारा शिक्षक को 10,164 ही वेतन मिलता है. पारा शिक्षक संरक्षक का दावा है कि करीब पचास हज़ार पारा शिक्षक 8400 रुपये मासिक वेतन पर ही पढ़ा रहे हैं. ज़ाहिर है ये बहुत कम है, और इनका कहना है कि बिना आंदोलन किए, लाठी खाए उनकी सैलरी बढ़ती भी नहीं है. कई बार छह-छह महीने की सैलरी नहीं मिलती है. अभी भी सरकार के पास इनकी कई महीने की सैलरी बाकी है. 8000 कमाने वाले की सैलरी भी नहीं मिलेगी तो पारा शिक्षक का जीवन कैसे चलेगा.

इसलिए हज़ारों की संख्या में ये पारा शिक्षक राज्य की स्थापना दिवस के समारोह में पहुंच गए और नारे लगाने लगे. काले झंडे दिखाए. इनकी उग्रता समझी जा सकती है, क्योंकि 6000 रुपये में पढ़ाने वाला प्राइमरी स्कूल का टीचर कैसे जीता होगा, आप कल्पना कर सकते हैं. इसलिए ये काले झंडे दिखा रहे होंगे लेकिन तभी वहां पर लाठी चार्ज हो गई. आप इन तस्वीरों में देख रहे हैं कि कैसे पुलिस दौड़ा-दौड़ा कर मार रही है. पारा शिक्षकों की मांग है कि जिस तरह से छत्तीसगढ़ में आठ साल तक अस्थायी काम करने के बाद परमानेंट हो जाता है, उसी तरह झारखंड में भी नीति बने.

छत्तीसगढ़ के पारा शिक्षकों की सैलरी 23 से 26 हज़ार तक हो गई है, वो फिर भी कुछ ठीक है, लेकिन झारखंड में 6 से 8 हज़ार की सैलरी में हमारा गुज़ारा नहीं होता है. 8 नवंबर को इनकी मुलाकात मुख्यमंत्री से हुई थी मगर कुछ सहमति नहीं बन सकी. बिहार में भी पारा शिक्षक 22,000 मिलता है तो छत्तीसगढ़ का पारा शिक्षक 8400 क्यों मिलता है. मनोज का कहना है कि पचास हज़ार पारा शिक्षक रांची पहुंच गए थे. 

इस तरह की समस्या कई राज्यों में हैं. सरकार नौकरी देने के नाम पर कई तरह की चालाकी करती है. लोग सरकारी नौकरी ले लेते हैं, इस उम्मीद में कि स्थायी हो जाएगी मगर होती नहीं है. ठेके पर रखे जाने वाले ऐसे कर्मचारियों की स्थिति बेहद खराब होती है. कई साल तक ये बहुत कम सैलरी में काम करते हैं. 15 साल से पारा शिक्षकों का आंदोलन चल रहा है. इतने साल पढ़ाने के बाद ये 10 000 की सैलरी पर पहुंचे हैं.

रांची से हरबंस ने बताया है कि करीब 300 पारा शिक्षकों को गिरफ्तार किया गया है और उन्हें रेडक्रॉस सोसायटी में रखा गया. बहुत से पारा शिक्षकों को रास्ते से पकड़ कर लाया गया. रेडक्रॉस के कैंपस में अदालत लगी और करीब 300 लोगों को जेल भेज दिया गया है. मनोज का कहना है कि खेलगांव में 1000 पकड़कर रखे गए हैं. इन शिक्षकों पर धारा 144, 341, 360, 353, 337 और 320 के तहत आरोप लगाए गए हैं. इनमें से कई गंभीर आरोप हैं जिससी सज़ा एक साल से अधिक है. बड़ी संख्या में पारा शिक्षक घायल भी हुए हैं. पुलिस की लाठी से कई शिक्षकों को चोट आई है. पारा शिक्षक पढ़ाते ही नहीं हैं, सरकार के बाकी सर्वे में भी लगाये जाते हैं.

राष्ट्रीय प्रेस दिवस है. हरियाणा के रेवाड़ी चलते हैं. यहां के पत्रकार ज़िला सचिवालय पर काली पट्टी बांध कर प्रेस दिवस मना रहे थे. उनका कहना है कि खबर लिखने के कारण पत्रकारों को निशाना बनाया जा रहा है. इनका कहना है कि रेवाड़ी के एक वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप नारायण ने आरटीए में भ्रष्टाचार की खबर छाप दी थी. जिसके बाद प्रशासन ने पत्रकार को ही टारगेट पर ले लिया और उसे आरटीए का दलाल बनाकर केस कर दिया. एडीसी दफ्तर से जो प्रेस नोट जारी हुआ था, उसमें लिखा था कि पत्रकार प्रदीप नारायण ने दलाल की भूमिका निभाते हुए फर्जी हैवी ड्राइविंग लाइसेंस बनवा ली थी. यह साफ नहीं है कि कथित रूप से इस आरोप में आरटीए का कोई कर्मचारी था या नहीं, उसके खिलाफ केस हुआ है या नहीं.

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पत्रकार प्रदीप का कहना है कि प्रशासन सबूत दिखाए. पत्रकारों का कहना है कि प्रशासन इस तरह के केस मुकदमों से प्रेस को डरा रहा है. रोज़ हमें किसी न किसी राज्य से छात्रों का समूह ईमेल करते रहता है. ये वो छात्र हैं जो परीक्षा देकर रिज़ल्ट का इंतज़ार कर रहे होते हैं और रिज़ल्ट आ जाता है तो ज्वाइनिंग का इंतज़ार कर रहे होते हैं. आज ही एक मेसेज आया कि हम लोग 78 उम्मीदवार हैं, जिन्हें ssc mts 2016 के तहत सिविल एविएशन डीजीसीए मिला था. 28 अप्रैल 2018 को ही अंतिम परिणाम आ गया था मगर अभी तक ज्वाइनिंग नहीं हुई है. अप्रैल से नवंबर आ गया है. जब डीजीसीए में फोन करते हैं तो कोई जवाब नहीं है. कभी-कभी यह कहा जाता है कि आपकी वैकेंसी समाप्त हो चुकी है. हम काफी परेशान हैं.

ऐसी ही एक चिट्ठी मध्य प्रदेश से आई है. छात्रों को लगता है कि अगर चुनाव के दबाव में ही रिजल्ट आ जाता तो अच्छा रहता. छात्रों को बताया जाता है कि आचार संहिता के कारण रिज़ल्ट नहीं आ रहा है. इस बात को लेकर छात्रों को अंदेशा है कि चुनाव बीत जाने पर फिर खेल हो जाएगा और रिज़ल्ट लंबे समय के लिए अटका दिया जाएगा. क्या पता कभी रिज़ल्ट ही न आए. इसलिए वे बार बार लिख रहे हैं कि एक बार प्राइम टाइम में दिखा दीजिए. हर बार और हर किसी का दिखाना संभव नहीं है क्योंकि आप जानते हैं कि यह समस्या इतनी विकराल है कि इसे कवर करने के लिए मेरे पास संसाधन भी नहीं है. लाखों की संख्या में देश भर में छात्र परेशान हैं. कोई पूछने वाला नहीं. आप इस पत्र को सुनिए. लिखा तो छात्रों ने है मगर आवाज़ हमारे सहयोगी की है. आपको अंदाज़ा होगा कि नौजवान किन हालात से गुज़र रहे होते हैं.


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