सोचिए अगर एंबैसेडर कार वापस आ गई तो!

सोचिए अगर एंबैसेडर कार वापस आ गई तो!

फाइल फोटो

अंग्रेज़ी में अभी तक कोई लेख दिखा नहीं है, जहां पर सबसे प्रचलित मुहावरा पढ़ने को मिला हो, राइज़िंग फ़्रॉम द ऐशेज़, यानि राख़ से फिर से ज़िंदा होना. हो सकता है लिखा भी गया हो पर सोच रहा था कि हिंदी में क्या लिखूं? जहां मेरी जानकारी की कमी आड़े आई और सिर्फ़ पुनर्जीवित और पुनर्जन्म शब्द दिमाग़ में आया जब उस ख़बर के बारे में पढ़ रहा था. एंबैसेडर ब्रांड की बिक्री के बारे में. जब फ़्रेंच कंपनी प्यूज्यो या पूज्यो (फ़्रेंच नाम है Peugeot) ने एंबैसेडर ब्रांड को ख़रीदा तो अचानक ख़बरें फिर से सर्कुलेशन में आ गईं. एंबैसेडर पर बातचीत शुरू हुई, आर्टिकल लिखे जाने लगे हैं, नॉस्टैल्जिया के बक्से खुलने लगे हैं. लगने लगा कि केवल ब्रांड क्यों ख़रीदेगी कंपनी, कुछ ना कुछ तो करेगी एंबैसेडर जैसे ब्रांड के साथ. फिर प्यूज्यो की तरफ़ से संकेत की ख़बरें आ गईं कि कंपनी का आइडिया भी वही है, जिसकी उम्मीद की जा रही थी. जो ब्रांड भारत में इतना गहरा बसा हुआ है उसे लेकर कंपनी कुछ ऐसा करेगी जो हिंदुस्तान मोटर्स की अब तक की कोशिशों से बिल्कुल अलग होगा. क्लासिक और विंटेज वैल्यू वाली इस कार को कंपनी उसी कैटगरी में पोज़िशन करने का संकेत दे रही है और साथ ही तमाम संभावनाओं को भी जगा रही है.

हो सकता है 21वीं शताब्दी में बड़े होने वाले जेनरेशन में एंबैसेडर को लेकर उतनी उत्सुकता न हो, पर अस्सी-नब्बे की दशक में बड़े होने वालों के लिए तो सवालों का पिटारा खुल गया है. क्या वाकई कार वापस आएगी? आएगी तो कितनी बदल कर आएगी? नया इंजन लगेगा? बॉडी का शेप कैसा होगा? छत का डिज़ाइन तो नहीं बदल जाएगा? क्या पुराना डिज़ाइन जारी रह पाएगा? क्या आज के मार्केट में कुछ कर पाएगी? क्या कंपनी में नए ज़माने में भिड़ने वाली इच्छाशक्ति होगी? जैसा कहा जाता है, उम्मीद रणनीति नहीं हो सकती, और एंबैसेडर प्रेमियों को भले ही कितनी उम्मीद हो पर हिंदुस्तान मोटर्स के पास कोई रणनीति नहीं थी. क्या नई कंपनी केवल नाम का इस्तेमाल करेगी या विरासत का भी? उम्मीदों के साथ आशंकाएं भी हैं.
 
ब्रिटिश ऑक्सफोर्ड की तर्ज़ पर बनकर 1957 में जिस सफ़र की शुरुआत हुई वो मार्क 1, मार्क 2 से होते हुए नोवा, ग्रैंड, अवीगो होते हुए कई दशकों तक शानौशौक़त से चली. कम से कम मैंने इस कार के तीन फेज़ को देखा, एक वक्त में ये शान की सवारी, सड़कों की सरताज थी. फिर दिल्ली आने के बाद देखा कि दो तरह की एंबैसेडर कारें होती हैं, एक तो काली-पीली टैक्सी वाली और दूसरी वो जिस रूप से पूरा देश इसे पहचानता था. सफ़ेद एंबैसेडर कार और उस पर लगी लाल बत्ती. ऐसा लगता था कि सफ़ेद एंबैसेडर और लाल बत्ती एक-दूसरे के लिए ही बने हैं. जो ताक़त और सत्ता की निशानी थी, जो शासकों और ब्यूरोक्रेट की सवारी थी. लोकतंत्र में जो राजा बन गए थे, उनका रथ. फिर अगला फ़ेज़ देखा मैंने इस कार का जिसमें ये ऐंबी कही जाने लगी. जब दुनिया भर की कारों के भारत आने के बाद एंबैसेडर की विंटेज वैल्यू बढ़ गई थी तो कुछ लोगों ने इसी ख़ूबी की वजह से इसे ख़रीदा भी. तबके लेटेस्ट वर्ज़न ग्रैंड या अवीगो को. कुछ इससे भी आगे गए, एक से एक चटख़ीले रंग में पारंपरिक इंडियन डिज़ायन से इस कार को पेंट कर दिया. यहां तक कि लंदन में एक टैक्सी सर्विस ने केवल एबैंसेडर कारों की एक खेप बनाई थी, जो लंदन के लोगों को लंदन में हिंदुस्तानी सफ़र पर ले जाती थी. एंबैसेडर पॉप आर्ट का कैनवस भी बन गई.

और इस कहानी का अंत दिखा मई, 2014 में जब हिंदुस्तान मोटर्स ने उत्तरपारा फ़ैक्ट्री में प्रोडक्शन बंद किया. लगभग ढाई हज़ार कर्मचारियों की उम्मीदें ख़त्म हुईं, लाखों करोड़ों एंबैसेडर प्रेमियों का जुड़ाव ख़त्म हुआ. पर अब फिर से से लग रहा है कि ये कहानी ख़त्म नहीं हुई है.

(क्रांति संभव NDTV इंडिया में एसोसिएट एडिटर और एंकर हैं...)

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