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कादम्बिनी शर्मा के की-बोर्ड से : पब्लिक सब जानती है...

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कादम्बिनी शर्मा के की-बोर्ड से : पब्लिक सब जानती है...

सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव के जन्मदिन की तैयारियां

नई दिल्ली:

क्या आडंबर ही सच है...? या यूं कहें कि किताब का कवर ही उसकी सबसे बड़ी खासियत है...? मुलायम सिंह यादव 75 साल के हो गए हैं तो उनके खासमखास आज़म खान को लगता है कि इस मौके को ऐसे मनाना चाहिए, जैसे पहले कभी न हुआ हो...

...तो विलायत से बग्घी मंगाई गई, 75 किलो का केक भी, रंगारंग कार्यक्रम भी... सब कुछ चकाचक... इस समारोह में किसके कितने पैसे लगे, कहां से आए, पूछने पर आज़म खान उखड़ गए... कहा, "तालिबानी है, तालिबान से आया है, कुछ दाऊद ने दिए, कुछ अबू सलेम ने और कुछ मारे गए आतंकवादियों ने..." एक वाजिब सवाल पूछने पर उसे ऐसा मोड़ देने की कोशिश, जैसे उनके धर्म के कारण उन्हें निशाना बनाया जा रहा हो... वैसे बात सिर्फ समाजवादी समारोह की नहीं, उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती के जन्मदिन समारोह भी कुछ कम नहीं होते थे... जहां समाजवादी जन्मदिन के जश्न से उन्हें लगता है कि उनके समर्थकों का 'रुतबा' बढ़ता है, वैसे ही मायावती के हीरों के सेट की चकाचौंध शायद उनके समर्थकों की आंखों की चमक कई दिनों तक बरकरार रखती होगी और उनकी मूर्तियां (हैंडबैग सहित) परदे के अंदर से पुकारती रही होंगी, ऐसा उन्हें भी लगता होगा... कोई भी नेता किसी भी 'वाद' का नारा ज़रूर लगाता हो, लेकिन उसे अपने हिसाब से काट-छांटकर मॉडिफाई ज़रूर कर लेता है...

हर शोशा उसकी दीन-हीन जनता के स्वाभिमान का प्रतीक हो जाता है... यह प्रतीकों का वह पुराना मॉडल है, जो बिहार में लालू यादव भी अपना चुके हैं... बिहार में इस हथकंडे की एक्सपायरी डेट उसी दिन पार हो गई, जब आरजेडी को जनता ने बाहर का रास्ता दिखा दिया... मायावती भी चमक बरकरार नहीं रख पाईं और समाजवादी पार्टी भी लोकसभा चुनावों में इसका स्वाद चख चुकी है... लेकिन वह क्या है न, दिल है कि मानता नहीं... पुरानी और बुरी आदतें छूटने में बड़ा वक्त लगता है... और अब तो संदेश सिर्फ अपने क्षेत्र के भौंचक्के वोटरों तक ही नहीं, लाइव टीवी के ज़रिये पूरे देश तक पहुंचता है... 24-घंटे ख़बर की खोज में रहने वाले टीवी चैनल इवेन्ट ढूंढते हैं, और ऐसे कार्यक्रम तो 'मेड फॉर टीवी' हैं... कितना भव्य जलसा हुआ, कौन आया, किस अख़बार या चैनल ने कितनी जगह दी, सबसे स्टेटस तय होने लगा है... राजनीतिक स्टेटस का हौवा भी बनाया जाता है... ऐसा ही कुछ धर्मगुरु भी करते हैं... आलीशान आश्रम, भक्तों से रूबरू होने के लिए स्टेज, सिंहासन... उनके चरणों पर साष्टांग होने के लिए कभी बीमारी तो कभी अभाव से मुक्ति की कामना लिए, आखिरी उम्मीद लिए न जाने कितने गरीब और अभावग्रस्त... और एक वीआईपी लिस्ट - राज्यों के मंत्री, बड़ी पार्टियों के भारी-भरकम नेता, तो कभी पीएम भी... और फिर एक दिन वक्त करवट लेता है और धर्मगुरु, आसाराम और रामपाल हो जाता है... आश्रमों के अंदर की सड़ांध बाहर आ जाती है...

लेकिन जब तक आडंबर रहता है, जब तक लोग उसे मानते हैं, तब तक रास्ते खुले होते हैं, मौके बेशुमार होते हैं... क्यों मानते हैं आडंबर...? क्योंकि किसी सतह पर शायद हम वैसे होना चाहते हैं - इतने सशक्त कि दुनिया मुट्ठी में लगे, और कुछ भी असंभव नहीं... वैसा ही, जैसा कई बार फिल्में देखते हुए हीरो की जगह खुद को पाते हैं - ढिशुम-ढिशुम कर हर समस्या निबटाते हैं, लेकिन असल ज़िन्दगी में आडंबर की कीमत बहुत ज्यादा होती है... खूबसूरत कवर वाली किताबों के भी अंदर कुछ ऐसा लिखा होना ज़रूरी होता है कि कल वे रद्दी में न बेच दी जाएं... नेता हैं, तो उनकी उम्मीदें पूरी करना ज़रूरी है, जिन्होंने आपको नेता बनाया... और धर्म और आडंबर का तो दूर-दूर तक नाता नहीं... धर्म खुद ही आडंबर को लील लेगा... तो 'माननीयों', आप अपना काम ईमानदारी से कीजिए... अब स्वाभिमान खुद कमा लेने का जज़्बा लोगों में जाग चुका है, वे आपकी नौटंकी समझते हैं...

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