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प्राइम टाइम इंट्रो: केरल की खून से रंगी सियासत

केरल की हिंसा पर रिसर्च करते हुए लगा कि स्थिति वाकई भयावह है. हिंसा के इस खेल में दोनों ही पक्ष शिकार भी हैं और शिकारी भी यानी दोनों ही पक्षों के लोग मारे भी जा रहे हैं और एक दूसरे को मार भी रहे हैं.

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प्राइम टाइम इंट्रो: केरल की खून से रंगी सियासत

34 साल के राजेश को कई लोगों ने घेर कर मार दिया (फाइल फोटो)

केरल की राजनीतिक हिंसा पर हिन्दी प्रदेशों में सूचना कम है, धारणा ज़्यादा है. हिंसा को लेकर एक छवि बन गई है, मगर वहां के हालात की न तो कोई रिपोर्टिंग है या न किसी प्रकार की सूचना जिससे वहां के हालात को समझने का मौका मिले. केरल की हिंसा पर रिसर्च करते हुए लगा कि स्थिति वाकई भयावह है. हिंसा के इस खेल में दोनों ही पक्ष शिकार भी हैं और शिकारी भी यानी दोनों ही पक्षों के लोग मारे भी जा रहे हैं और एक दूसरे को मार भी रहे हैं. राजनीति तराजू लेकर नहीं की जाती है. इसलिए एक पक्ष खुद को ही पीड़ित के रूप में पेश करता है, अपने ख़िलाफ़ हुई हिंसा को उभारता है मगर आपको कभी नहीं बताता कि उसकी तरफ से भी हिंसा का यह खेल खेला गया है. केरल का एक ज़िला है कन्नूर. यहीं से राज्य के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन आते हैं. 1960 के दशक से यह ज़िला राजनीतिक हिंसा की गिरफ्त में हैं.

30 जुलाई को केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम में संघ कार्यकर्ता की हत्या कर दी गई. हत्या के आरोप में पांच लोग हिरासत में लिए गए हैं. घटना के बाद गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने केरल की हिंसा पर चिंता ज़ाहिर की थी और कहा था कि लोकतंत्र में राजनीतिक हिंसा स्वीकार्य नहीं है. 34 साल के राजेश को कई लोगों ने घेर कर मार दिया. बायां हाथ काट दिया गया और कई जगहों पर भयंकर चोटें आई हैं. बीजेपी ने इस हत्या के पीछे सीपीएम पर आरोप लगाया है. सीपीएम ने खंडन किया है. कांग्रेस के नेताओं ने हिंसा की इस राजनीति के ख़िलाफ़ उपवास रखा है. सोमवार को केरल की हिंसा को लेकर मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने एक बैठक भी बुलाई. बीजेपी आरएसएस के नेताओं से बात की और राजनीतिक मतभेद को दूर करने के उपायों पर बात की. बैठक शुरू होने से पहले मुख्यमंत्री ने आपा भी खो दिया और वहां आए मीडिया से गेट आउट कह दिया. आज कल मीडिया को नेता इसी लायक समझने लगे. आप जनता का भविष्य बहुत उज्ज्वल है. जब पूछने वाले की ये हालत है तो याद रखिये कोई आपके बदले पूछने वाला नहीं बचेगा. गोदी मीडिया सिर्फ दिल्ली में नहीं है, वो हर राज्य में है. इसका नतीजा आप दर्शकों को भुगतना होगा. अपनी समस्या लेकर पत्रकार को व्हाट्सऐप करते रह जाएंगे और वो आपके लिए कुछ नहीं कर सकेगा. नेताओं को पता लग गया है कि आप दर्शकों को इससे फर्क नहीं पड़ता. इसका मतलब यह है उन्हें आपकी भी परवाह नहीं है. मुख्यमंत्री कार्यालय ने कहा कि मीडिया को आने की अनुमति नहीं थी. यही बात तरीके से भी कही जा सकती थी, गेट आउट के बग़ैर. बैठक के बाद बीजेपी और सीपीएम के नेताओं ने कहा कि वे हिंसा के ख़िलाफ जागरूकता लाएंगे. यह भी तय हुआ है कि बीजेपी आरएसएस और सीपीएम के काडर के बीच शांति वार्ता कई ज़िलों में आयोजित की जाएगी ताकि आपसी संवाद बने.

केरल में हिंसा की यह कोई पहली घटना नहीं है, हिंसा के दौर के कई दशक बीत जाने के बाद सीपीएम, बीजेपी संघ के कार्यकर्ताओं की शांति बैठक से उम्मीद की जानी चाहिए. वर्ना हालत यह है कि दोनों पक्ष एक दूसरे पर हमला करने में एक मिनट भी नहीं सोचते हैं. बहरहाल, जो हिंसा 1960 के दशक से चली आ रही है, वो क्यों जारी है, यह जानने का प्रयास करेंगे. इस हिंसा पर रिसर्च करते हुए केरल का जो स्वरूप समझ में आता है वो भयानक है. हत्या सिर्फ हत्या नहीं बल्कि विभत्स तरीके से हत्या होती है. ऐसी कि आप हत्या का डिटेल नहीं बता सकते हैं. केरल पर बात करने के लिए सीमित संसाधनों के बीच हमने एक तरीका निकाला है. कुछ वेबसाइट और अख़बारों में छपे लेख और विश्लेषण को आधार बनाया है. हो सकता है कि इससे कुछ चूक हो लेकिन पूरी सावधानी बरती है कि कोई बड़ी ग़लती न हो जाए. केरल की हिंसा हम सबके लिए शर्म की बात है और राज्य में सक्रिय राजनीतिक दलों के लिए तो और भी शर्म की बात है. हम चाहें खुद को अहिंसक कह लें, सहिष्णु कह लें लेकिन इस तरह की घटनाएं भारत के इस खोखले गौरव से पर्दा उठा देती हैं.

thewire.in, scroll.in, dailyo.in, firstpost.com, indiaspend.com, hindustan times, the hindu, indian express जैसे अखबारों का सहारा लिया है. ये सभी अंग्रेज़ी के समाचार माध्यम हैं. इनके ही ज़्यादातर प्रतिनिधि हैं वहां. कुछ संवादताओं विश्लेषकों के नाम लेने ज़रूरी हैं. बी आर पी भास्कर, राजीव रामचंदरण, एन एन पियरसन, यूनिवर्सिटी ऑफ केप टाउन में लेक्चरर रुचि चतुर्वेदी. इन खबरों से गुज़रते हुए केरल की हिंसा की जो तस्वीर सामने आती है, वो नेशनल मीडिया या दिल्ली में होने वाले प्रेस कांफ्रेंस के दावों से काफी अलग है. हमने एक साथ इन माध्यमों का ज़िक्र कर दिया क्योंकि हो सकता है कि आगे किसी तथ्य या विश्लेषण का ज़िक्र करते वक्त किसी एक का नाम न ले सकें, वैसे कोशिश होगी कि जिसकी सामग्री होगी, उसका नाम ज़रूर लिया जाए. हमने हत्या की कई रिपोर्टिंग देखी, ऐसा लगता है कि मारे जाने वाले ज़्यादातर नौजवान हैं. 19 साल से लेकर 34 साल के बीच के युवा ही इस राजनीतिक हिंसा के शिकार हैं.

30 जुलाई को संघ कार्यकर्ता की हत्या की गई लेकिन केरल की हिंसा का रिकार्ड देखें तो सीपीएम के कार्यकर्ता भी उसी तादाद में मारे जा रहे हैं. अगर संघ बीजेपी के कार्यकर्ता मारे जाते हैं तो आरोपी हमेशा सीपीएम के होते हैं और सीपीएम के कार्यकर्ता मारे जाते हैं तो आरोपी हमेशा संघ बीजेपी के होते हैं. कन्नूर की हिंसा की शुरुआत 1960 के दशक में भारतीय जनसंघ के कार्यकर्ता रामकृष्णन की हत्या से होती है. इस हत्या के बदले में सीपीएम कार्यकर्ता की हत्या कर दी जाती है. जिस तरह से तवे पर रोटी पलटते हैं, उसी तरह से कन्नूर में बदले की हिंसा होती है. ऐसा लगता है कि दोनों आदमी की लाश से फुटबाल खेलने के आदी हो गए हों.

- 11 जुलाई 2016 की रात साढ़े दस बजे कन्नूर में सीपीएम नेता सी वी धनराज की हत्या होती है. ढाई घंटे के अंदर ही रात एक बजे बदले की कार्रवाई में बीजेपी कार्यकर्ता और ऑटो रिक्शा ड्राइवर सी के रामचंद्रन की उसके ही घर में हत्या कर दी जाती है.
- 12 मई 2017 को धनराज की हत्या का आरोपी बीजू मार दिया जाता है.
- 11 जुलाई 2017, धनराज की हत्या की बरसी पर सीपीएम कार्यकर्ताओं पर बम से हमला होता है. थोड़ी देर बाद सीपीएम कार्यकर्ता एक संघ कार्यालय को फूंक देते हैं. दोनों पक्षों के 20 घरों में आग लगा दी जाती है.
- 20 अगस्त 2016 को बीजेपी कार्यकर्ता दीक्षिथ की बम बनाते वक्त मौत हो जाती है. वायर ने लिखा है कि संघ बीजेपी नेता विलसन थिल्लनेकीर ने टीवी की बहस में कहा कि जब राज्य फेल हो जाए तो बचाव में बम बनाने पड़ते हैं.
- 20 सितंबर को थिल्लेनकेरी में बीजेपी वर्कर 26 साल के विनेश की हत्या होती है. इसी दिन इस हत्या के थोड़ी देर बाद सीपीएम के छात्र संगठन के जिजेश पर बम से हमला होता है. जिजेश पर स्थानीय संघ नेता की हत्या का आरोप था.
- 10 अक्टूबर को पिदुविलाई के सीपीएम नेता के मोहनन की हत्या होती है.
- 24 घंटे के भीतर 19 साल के बीजेपी वर्कर रीमिथ की हत्या कर दी जाती है.
- 19 मई 2016 को जब सीपीएम की सरकार बनी तो विजय जुलुस पर बम फेंक दिया गया.
- सीपीएम समर्थक सी रविंदरण की हत्या हो जाती है. आरोप संघ पर लगता है.

केरल की हिंसा की कोई भी ख़बर देखिये. एक की हत्या होती है तो तुरंत उसका बदला हत्या से लिया जाता है. एक बात का ध्यान रखियेगा, समर्थक, नेता, कार्यकर्ता की हत्या हो रही है. कई जगहों पर हमने अगर समर्थक को नेता या कार्यकर्ता को नेता कह दिया हो तो इतनी ग़लती बर्दाश्त कर लीजिएगा. अगर किसी हत्या में सीपीएम या किसी हत्या में संघ का ज़िक्र आता है तो उसका संदर्भ यह है कि उन पर शामिल होने का आरोप लगा है. अब आगे बढ़ते हैं. आपने पिछले साल के दो तीन महीनों की घटनाओं का रिकार्ड देखा. साफ है कि दोनों पक्ष लाश की राजनीति कर रहे हैं. दिल्ली में भले ही एक पक्ष खुद को पीड़ित बताता हो लेकिन मारे गए और आरोपों की सूची देखकर लगता है कि दोनों का पाक साफ नहीं हैं. कन्नूर में 1960 के दशक से हिंसा जारी है और अब केरल के कई ज़िलों में फैल चुकी है.

एक आंकड़े के अनुसार कन्नूर की हिंसा में अब तक 210 लोग मारे गए हैं. दोनों तरफ से. एक आंकड़े के अनुसार कन्नूर की हिंसा में अब तक 300 से अधिक लोग मारे गए हैं. दोनों तरफ से. दि वायर में विश्व हिन्दू परिषद के एक आरोप को चुनौती दी गई है. विहिप का कहना है कि 300 से ज्यादा संघ समर्थक मारे गए हैं और आधे दलित हैं. बी आर पी भास्कर ने लिखा है कि यह सही नहीं हैं.
300 लोग मारे गए हैं मगर इसमें सीपीएम और संघ दोनों के हैं. और आधे दलितों की बात सही नहीं है.

केरल की हिंसा पर रिसर्च करने वाली यूनिवर्सिटी ऑफ केप टाउन की लेक्चरर रुचि चतुर्वेदी ने लिखा है कि कन्नूर की हिंसा में थिय्या जाति के लोग मारे गए हैं. केरल में इस जाति को ओबीसी का दर्जा हासिल है. बहुत कम ज़मीन है और साधारण परिवेश के लोग हैं. क्यों इस जाति के युवा दोनों तरफ की हिंसा में शामिल रहे हैं, शिकार हुए हैं, शिकार किया है, इस पर अलग से बात होनी चाहिए. रुचि ने कहा है कि हिंसा में मारे गए 80 फीसदी हिन्दू हैं और इसमें 70 फीसदी युवा बेरोज़गार थे. इसका मतलब यह नहीं कि इस हिंसा का कोई सांप्रदायिक रूप है. दिल्ली की मीडिया में या दिल्ली से केरल को लेकर कई तरह के प्रोपेगैंडा हो रहे हैं. डेली ओ डॉट इन पर मलयाली लोगों के एक समूह ने लिखा है. इस समूह को मीन अवियल कहते हैं. इनका दावा है कि इनके समूह में सभी दल के मलयाली लोग शामिल हैं.

इस समूह ने एक प्रोपेगैंडा को चुनौती दी है कि कन्नूर में 38 फीसदी मुस्लिम हैं. 2011 की जनगणना के अनुसार 29.43 प्रतिशत मुस्लिम हैं. एक प्रोपेगैंडा में कोट्टायम ज़िले को मुस्लिम बहुल बताया गया है जबकि उस ज़िले में मुसलमानों की आबादी 6 प्रतिशत है.

क्या केरल की हिंसा का संबंध हिन्दू मुस्लिम राजनीति से है. इस तरह का प्रोपेगैंडा फैलाया जा रहा है ताकि हिन्दी भाषी प्रदेशों में ये बातें आसानी से फैल जाएं. सांप्रदायिक स्वरूप भी है तो इस पर भी खुलकर बात हो सकती है. रुचि चतुर्वेदी ने लिखा है कि कन्नूर में 1983 से सितंबर 2009 के बीच 91 लोग मारे गए. संघ बीजेपी के 31 समर्थक मारे गए हैं. सीपीएम के 33 समर्थक मारे गए हैं. क्या सिर्फ सीपीएम और संघ के समर्थक ही मारे गए? 14 मामलों में कांग्रेस के कार्यकर्ता भी मारे गए. ज़्यादातर में आरोप सीपीएम पर लगा. बीजेपी और कांग्रेस के कार्यकर्ता भी एक दूसरे की हत्या के आरोप में शामिल हैं. इंडियन मुस्लिम लीग और सीपीएम कार्यकर्ताओं ने भी एक दूसरे को मारा है. आरोप सीपीएम और संघ पर लगा लेकिन मारे गए कार्यकर्ताओं में सीपीएम, संघ, बीजेपी, कांग्रेस और इंडियन मुस्लिम लीग के शामिल हैं. एक रिपोर्ट में एक और आंकड़ा है जिसे पेश कर रहा हूं. केरल पुलिस के अनुसार 2000 से 2006 के बीच कन्नूर में 69 राजनीतिक हत्याएं हुई हैं. 31 संघ परिवार के मारे गए हैं और 30 सीपीएम के. पांच इंडियन मुस्लिम लीग के और 3 नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट के.

कई बार मीडिया दोनों हत्याओं को दिखाकर विश्लेषण नहीं करता है. 30 जनवरी 2017 को कन्नूर में 63 साल के कांग्रेसी कार्यकर्ता पर संघ कार्यकर्ता हमला करते हैं. उस दिन शाम आठ बजे बीजेपी के 32 साल के साजिथ पर हमला होता है, हत्या हो जाती है और आरोप सीपीएम पर लगता है. केरल के मीडिया में दोनों घटनाओं की रिपोर्टिंग हुई लेकिन नेशनल मीडिया में सिर्फ संघ प्रचारक की हत्या को ही दिखाया गया और प्रोपेगैंडा किया गया. हिंसा प्रतिहिंसा के इस दौर में पुलिस की भूमिका पर भी बात होनी चाहिए. क्या किसी घटना में दोनों पक्षों के आरोपियों को सज़ा हुई है.

हिन्दू में 19 दिसंबर 2016 की रिपोर्ट है. सीपीएम कार्यकर्ता की हत्या में 11 संघ कार्यकर्ताओं को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई जाती है. ट्रायल कोर्ट ने 2008 में सीपीएम नेता वी विष्णु की हत्या के आरोप में यह सज़ा सुनाई थी. हमने ये सब इंटरनेट सर्च के सहारे ही पाया है. सीपीएम नेताओं की गिरफ्तारियों की कई खबरें मिली हैं. 21 अप्रैल 2011 के टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी ख़बर के अनुसार

सेशन्स कोर्ट ने सीपीएम के 24 कार्यकर्ताओं को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई थी. संघ कार्यकर्ता के अंतिम संस्कार से लौट रहे दो लोगों की हत्या कर दी गई थी. ये घटना 23 मई 2002 की थी. इस तरह से आप देख रहे हैं कि केरल की हिंसा में कैसे राजनीतिक दलों को ख़ून लग गया है. आप तर्कों से इधर उधर करते रहिए मगर सोचिये उस समाज के बारे में भी जो इन दलों के हितों के लिए किसी की हत्या कर रहा है, मारा जा रहा है. साधारण परिवार के लोग आजीवन कारावास भुगत रहे हैं और इन दलों के नेता बड़े आराम से राजनीतिक चमका रहे हैं और दिल्ली में बैठकर प्रोपेगैंडा कर रहे हैं. राजनीतिक दल आम लोगों की ये हालत कर देते हैं. इसलिए ज़रूरी है कि केरल की हिंसा पर पूरे देश के सामने बात हो कि एक ज़िला क्यों इस तरह ख़ूनी प्रयोगशाला बना हुआ है. इनके सत्ता हासिल कर लेने से जनता का कौन सा कल्याण हो गया है. हत्या और हिंसा की इस राजनीति को खारिज कर देना चाहिए.

इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट के मुताबिक मई 2016 में सीपीएम की अगुवाई वाली एलडीएफ़ सरकार के सत्ता में आने के बाद से कन्नूर में राजनीतिक हिंसा के 400 मामले सामने आ चुके हैं. इस रिपोर्ट के मुताबिक बीते तीन साल में राजनीतिक हिंसा में 30 फीसदी का इज़ाफ़ा हुआ है. हिंसा के इन मामलों में सीपीएम के 600 कार्यकर्ता, आरएसएस-बीजेपी के 300 कार्यकर्ता और कांग्रेस के 50 कार्यकर्ता गिरफ़्तार हो चुके हैं.

केरल से संबंधित रिपोर्ट और विश्लेषण पढ़ते वक्त दोनों पक्षों के नेताओं के बयान देख रहा था. सबको अपनी दलीलों पर इतना भरोसा है कि कोई अपनी ग़लती मानने के लिए तैयार नहीं है. सबके पास जायज़ कारण है कि हिंसा वो नहीं, सामने वाला कर रहा है. किसी में किसी भी पक्ष के मारे गए लोगों के प्रति संवेदना नहीं दिखती है. बदले की आग है. बदला लेना है और बदला ले लिया जाता है. उम्मीद की जानी चाहिए कि शांति कमेटियों और बैठकों का नतीजा निकलेगा. सीपीएम और संघ के कार्यकर्ता जब आमने सामने बैठेंगे तो एक दूसरे की नज़रों का लिहाज़ करेंगे और कुछ शर्म भी. प्रतिशोध की राजनीति ने कितनों को मरवा दिया और कितनों को जेल भिजवा दिया. एक तरफ से सवाल आएगा कि सीपीएम के दफ्तर पर संघ के लोगों ने बम क्यों फेंका तो दूसरी तरफ से सवाल आएगा कि संघ बीजेपी के दफ्तर पर सीपीएम के लोगों ने बम क्यों फेंका. आपसी राजनीति के लिए इतने बम कहां से आ जाते हैं वो भी तब जब देश खुद को आतंकवाद से लड़ने वाला चैंपियन घोषित कर चुका है. क्या बमों पर लिखा होता है कि ये आतंकवाद के लिए है और ये राजनीतिक हत्या के लिए है.


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