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दर्द-ए-दिल्ली पार्ट 3 - क्या कार वाले हैं फसाद की जड़?

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दर्द-ए-दिल्ली पार्ट 3 - क्या कार वाले हैं फसाद की जड़?

प्रतीकात्मक तस्वीर

पंद्रह दिन के एक-एक घंटे को टटोल टटोल कर मत काटिए... नतीजा नाटकीय नहीं होने जा रहा है, ना तो उतना सकारात्मक, जितनी उम्मीद आप समर्थक कर रहे हैं और ना नकारात्मक जैसी मोदी समर्थक उम्मीद कर रहे हैं। नतीजा यही होगा कि हो सकता है कि प्रदूषण में कुछ प्वाइंट्स कमी आएगी, ट्रैफ़िक में राहत मिल सकती है। लेकिन अपने राजनीतिक पूर्वाग्रहों के प्रोजेक्शन को दिल्ली में ऑड-ईवन की सफलता के थर्मामीटर में तब्दील कीजिए। क्योंकि हर मुद्दे पर अगर पॉलिटिक्स का ऐसा ही चूरन डाला जाएगा तो ना घर के रहेंगे ना घाट के। ये भी सच है कि कारों पर बंदिश लगाकर, वो भी सीमित संख्या में, कुछ ज़्यादा हासिल नहीं होगा। लेकिन ये भी सच है कि सरकारों को कुछ ना कुछ तो करना ही है, और आबोहवा की दुर्गति तो ऐसी है कि कुछ भी किया जाए, वह आज की तारीख़ में बहुत है।

एक सच्चाई ये भी है कि ऑड-ईवन को लागू करके केजरीवाल कोलकाता में यह दावा कर रहे हैं कि अब साबित हो गया है कि आम आदमी पार्टी को सरकार चलाना आ रहा है। लेकिन यह भी सच्चाई है कि सरकार तो कोर्ट की झाड़ पड़ने के बाद ही हरकत में आई, बाक़ी उससे पहले तो सरकार सैलरी बढ़ाने में लगी है और पीएम की भी सैलरी बढ़ाने की वकालत कर रहे थे। वहीं एक तीसरी सच्चाई यह भी कि अगर आम आदमी पार्टी ने कुछ नहीं किया तो फिर केंद्र ने ही दिल्ली की हवा पर क्या तीर मार लिया? ज़ोर तो एनजीटी और हाईकोर्ट का रहा है। कहने का मतलब यह है कि जब तक फ़ैनगिरी की कहानी को किनारे नहीं रखेंगे, तब तक बेमतलब नूराकुश्ती नहीं रुकेगी। पहले यह तो समझा जाए कि दरअसल मुद्दा है क्या? सरकारें कार्रवाई तो कर रही हैं, लेकिन आधी अधूरी।

क्या वाकई कार वाले असल सिरदर्द हैं?
माना कि दिल्ली में सबसे ज़्यादा बदमिज़ाज़ी कार वाले ही दिखाते हैं। माना कि दिल्ली की जो बदनामी देश के बाक़ी मेट्रो में होती है, उसमें ज़्यादा बड़ी वजह कार वाले ही हैं। ये भी माना कि ट्रैफ़िक वॉयलेशन में सबसे आगे वही होते हैं। ये भी माना कि अगर हॉर्न को सभ्य देशों की तरह गाली मानें, तो सबसे बदतमीज़ यही कार वाले हैं। लेकिन इन सबके बावजूद क्या वाकई दिल्ली के लिए सबसे बड़ी पनौती कार वाले ही हैं? क्या वाकई अगर कारो को रेगूलेट कर दिया जाएगा तो दिल्ली स्वच्छ हो जाएगी? हो सकता है कि बहुत से नकली समाजवादी या छोटे शहर की कुंठा पाले आलसी बौद्धिक कहना चाह रहा हो कि हां, लेकिन जवाब एक ही है, नहीं।

कारें दरअसल सबके लिए आसान शिकार होती हैं। और इसीलिए सबसे पहले आपको कुछ करना होता है तो कारों पर कार्रवाई करते हैं। बीआरटी में उनकी जगह लेते हैं और प्रदूषण बढ़ने पर ऑड ईवन पर बांटते हैं, उनके नाम पर सड़कें चौड़ी करते हैं और फिर पैसे खाकर उन पर रेहड़ी वालों को बिठाते हैं। तो अगर कार वाले दिल्ली के लिए समस्या नहीं हैं, या यों कहें कि बाक़ियों से ज़्यादा बड़े नहीं तो फिर मुद्दा क्या है? मुद्दा यह है कि ये हेडलाइन बेहतर बनाते हैं। बाक़ी आप ही सोचिए, कुल प्रदूषण में दस फीसदी के आसपास कारों का दिया होता है और उनमें से तमाम छूट पाए गाड़ियो को छोड़ भी दें तो कितनी प्रदूषण कम हो जाएगा? 4-5 फ़ीसदी? तो क्या केवल ऑड ईवन से कुछ बदल पाएगा? शायद नहीं।

आख़िर प्राथमिकता है क्या?
कई आर्टिकल देखे, जहां पर बहुत से लेखकों को सिर्फ़ इस बात से ख़ुशी मिल रही है कि बड़ी कारों में घूमने वालों को मजबूरी में बसों में बैठना पड़ेगा, ग़रीब-मज़दूरों के साथ बैठना पड़ेगा, उनके पसीने की गंध को झेलना पड़ेगा, खड़े होकर सफ़र तय करना होगा। यह तो पता नहीं कि ये विचारधारा की मजबूरी है, पैसेवालों से कुंठा है, लेकिन इन सब लफ़्फ़ाज़ी में भी वही सोच सामने आ रही है जो सरकारों की अब तक रही है, वो ये कि पब्लिक ट्रांसपोर्ट सबसे निकृष्ट साधन हैं यातायात के, जिन्हें केवल मजबूर ही इस्तेमाल करते हैं। और कारवालों को इन जगहों पर भेजकर ही सीख दी जा सकती है। और ये पूरी सोच अजीब कुंठित सोच लगती है मानो हर कारवाले ने घूस कमा कर, चोरी करके, भ्रष्टाचार, ग़रीबों का हक़ मारकर, किसानों की जानलेकर कार ख़रीदी है। तो गाली दी जाए या फिर बेमतलब तरजीह, सबके ज़ेहन में अर्बन ट्रांसपोर्टेशन की बात आते ही कार वालों का ही ज़िक्र आता है। और ये ऐसी बेवकूफ़ी वाली सोच है जो किसी भी शहर के भविष्य के लिए ख़तरनाक होगी। ज़रूरी है कारों की बात छोड़ी जाए, फ़ोकस सही किया जाए।

फ़ोकस सही कीजिए
समस्या कारें नहीं हैं, लोग नहीं हैं, बसें नहीं हैं, मेट्रो भी नहीं। समस्या ये है कि पॉलिसी बनाने वाले हमारे विज़नरी नेता ऐसे रहे हैं जिन्होंने इस पहलू पर कभी ध्यान नही दिया। आम लोगों के लिए सरकारों की क्या प्राथमिकता रही है ये तो पता चल जाता है जब बसों, साइकिल यात्रियों और पैदल यात्रियों की हालत हम देखते हैं। एक प्लानर आते हैं, बीआरटी बनाते हैं और बोलते हैं कि सड़कों पर कार चलाना इतना मुश्किल कर दीजिए कि कार वालों को बसों में आना ही पड़े। आधा अधूरा रास्ता बनाते हैं और आख़िरकार ना तो बस वाली जनता का भला होता है और ना ही कार वाली। सोचिए, आधी से ज़्यादा आबादी बस से चलती है, लेकिन सच्चाई क्या है, सच्चाई यह है कि पिछले चार-पांच सालों में बसों की संख्या कम हुई है बढ़ी नहीं है, और पिछले दो साल से बसों की ख़रीद का हल्ला ही सुनाई दे रहा है। फिर पैदल यात्रियों के देखते हैं। पिछले साल दिल्ली में सड़कों पर मरने वालों में से चालीस फ़ीसदी से ऊपर पैदल यात्री रहे, लेकिन उस मुद्दे पर बौद्धिक चर्चा सुनाई नहीं पड़ती कि दिल्ली में पैदल यात्रियों को चलने की सहूलियत दी जाए, उनका हर दिन ख़ौफ़ में ना गुज़रे। क्योंकि ज़्यादातर बुद्धिजीवी की कार किसी ना किसी फ़ुटपाथ पर पार्क पाई जाती है। इस साल आठ सौ के आसपास लोग दिल्ली की सड़क पर चलते चलते जान गंवा चुके हैं, लेकिन उससे बौद्धिक उद्वेलन नहीं हो रहा है। और साइकिल वालों की तो बात ही मत कीजिए। जब तक राहगीरी जैसे अपमार्केट कोशिशें नहीं हुई थीं साइकलिस्टों के लिए, लगता ही नहीं था कि हर रंग की साइकिल पर नौकरी करने निकले लोग इंसान भी थे। क्या साइकिल यात्रियों के लिए लेन नहीं बनाया जा सकता है औऱ अगर सुरक्षित लेन बन जाए तो क्या लोग साइकिल पर सफ़र नहीं करेंगे? करेंगे बिल्कुल करेंगे, मैं भी तैयार हूं, मुझ जैसे बहुत तैयार हैं। लेकिन साइकिल लेन ऐड में अच्छा साउंड नहीं करेगा, कारों पर बैन करेगा।

तो प्राइवेट गाड़ी वाले सॉफ़्ट टार्गेट हैं?
सॉफ़्ट टार्गेट ना सही, लेकिन दिल बहलाने के लिए ईज़ी टार्गेट ज़रूर है। आप याद कीजिए कि दिल्ली में सबसे ज़्यादा धुंआ आपने कहां देखा था? याद कीजिए? आपको याद आएगा, दिल्ली एनसीआर के बढ़ते अनरीयल-एस्टेट का आंगन में, किसी ना किसी टोल प्लाज़ा पर, आधी रात के ट्रैफ़िक पुलिस के बैरिकेड पर, ख़राब से मैनेज ट्रैफ़िक लाइट पर, संकरे रास्तों वाली कॉलनी में लगे ट्रैफ़िक जाम में और टैक्सियों के टेलपाइप से। आमतौर पर तो धुंआ यहीं का याद आता है। इनमें से कितनों के ख़िलाफ़ क्या क्या कार्रवाई हम देखते हैं। जब ग़ौर से सोचिएगा तो पता चलेगा, इन आइटमों पर कार्रवाई करेंगे तो बहुत मेहनत करनी पड़ेगी, चलो कारों पर ही बैन लगा दो। तो कार वालों को गरियाने से हेडलाइन बनता है, कारों पर बंदिश लगाने से ट्रैफ़िक कम भी होता है, लेकिन क्या इनमें से कुछ भी आम आदमी का भला करेगा? नहीं। फ़ोकस सही करने की ज़रूरत है, प्राथमिकता सही करने की ज़रूरत है।

क्रांति संभव एनडीटीवी इंडिया में एसोसिएट एडिटर और ऐंकर पद पर हैं।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति एनडीटीवी उत्तरदायी नहीं है। इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार एनडीटीवी के नहीं हैं, तथा एनडीटीवी उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।
 


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