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कुमार विश्वास का पत्र आम आदमी पार्टी की राजनीतिक साख के ताबूत की आखरी कील?

कुमार विश्वास लिखते हैं कि "केजरीवाल की 'कुतार्किक' बातों को आम आदमी पार्टी के लाखों कार्यकर्ताओं और करोड़ों शुभचिंतकों ने यह सोच कर माना कि केवल चुनाव जीतने के लिए कोई ऐसी बात नहीं करेगा.

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कुमार विश्वास का पत्र आम आदमी पार्टी की राजनीतिक साख के ताबूत की आखरी कील?

हमारे नेताओं को जनता की याददाश्त पर अटूट विश्वास होता है. वे मान कर चलते हैं कि जनता की याददाश्त बेहद कमज़ोर होती है इसलिए वह न तो चुनाव के दौरान किए गए वादों को याद रख पाती है और न ही विरोधियों पर लगाए गए आरोपों को. इसीलिए चुनाव के वक़्त चाहे तो आप जेब से पर्ची निकाल कर किसी काल्पनिक स्विस बैंक खाते का ज़िक्र कर अपने विरोधी की प्रतिष्ठा को धूल में मिला कर राजनीतिक लाभ ले सकते हैं या फिर मंच पर नाटकीय अंदाज में अलमारी से कथित सबूतों की फाइल निकाल कर जनता के बीच लहरा सकते हैं.

चुनाव खत्म होने के बाद सब अपने-अपने काम पर लग जाते हैं. न जनता पूछती है उन आरोपों का क्या हुआ, न आरोप लगाने वाले को वे बातें याद रहती हैं और जिस पर आरोप लगता है, वो तो उन्हें भूलने में ही अपनी भलाई समझता है. लेकिन दिल्ली की राजनीति में कुछ ऐसा हुआ है कि अब शायद नेताओं को अपने विरोधियों पर आरोप लगाने से पहले दस बार सोचना होगा. ऐसा भी हुआ है कि अब खुद को छोड़ कर दुनिया के हर शख्स को बेइमान मानने वाले आम आदमी पार्टी के नेताओं की साख पूरी तरह से मिट्टी में मिल गई है. अगर अरविंद केजरीवाल और उनके सहयोगियों का माफीनामा ही काफी नहीं था तो अब कुमार विश्वास का अरुण जेटली को लिखा पत्र एक तरह से आम आदमी पार्टी की बची-खुची साख को पूरी तरह से मटियामेट कर देता है.

कुमार विश्वास का यह पत्र बेहद भावुक अंदाज़ में लिखा गया है. ज़ाहिर है वे कवि हैं तो कल्पना की उड़ान भरने की भी उन्हें स्वतंत्रता है और भावनाओं को शब्दों के ज़रिए व्यक्त करने की भी. लेकिन यह उस भावुक नौजवान की आत्मस्वीकृति के तौर पर है जो एक काल्पनिक क्रांति के नारों के बीच मदहोश हो कर जैसे अपना रास्ता भटक गया हो. कुमार विश्वास इस पत्र में जेटली के स्वास्थ्य को लेकर शुभकामनाओं से शुरू करते हैं. फिर वे बताते हैं कि 'कैसे व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन की आस लेकर उन्होंने अपने कुछ साथियों के साथ 2010 में एक राष्ट्रव्यापी आंदोलन की भूमिका तैयार की. कैसे लोगों का भरोसा जीतने के लिए अरविंद केजरीवाल कुछ कागज जमा कर उन्हें और उनके जैसे कार्यकर्ताओं और जनता को हर दल के नेता के भ्रष्टाचार के सबूत कह कर दिखाते रहे. कुमार विश्वास कहते हैं कि उन्होंन आंखें मूंद कर केजरीवाल की हर बात पर भरोसा किया.' यानी जैसे बिना सच-झूठ परखे, बिना अपने नेता पर शंका किए किसी तोते की तरह रटा-रटाया बयान देते रहे कुमार विश्वास और उनके साथी.


कुमार विश्वास लिखते हैं कि "केजरीवाल की 'कुतार्किक' बातों को आम आदमी पार्टी के लाखों कार्यकर्ताओं और करोड़ों शुभचिंतकों ने यह सोच कर माना कि केवल चुनाव जीतने के लिए कोई ऐसी बात नहीं करेगा." हालांकि कुमार विश्वास का दावा है कि निजी बातचीत में वे केजरीवाल को चेताते रहे. लेकिन उनके मुताबिक "केजरीवाल ने हर बार चीख-चीख कर कहा कि ये सारे तथाकथित सबूत स्वराज किताब की ही तरह असली हैं." कुमार विश्वास आरोप लगाते हैं कि "केजरीवाल को जब यह डर सताया कि इन आरोपों के चलते कहीं उन्हें जेल न हो जाए और मनीष सिसौदिया के लिए मुख्यमंत्री पद की कुर्सी न छोड़नी पड़े और ऐसा न हो कि सिसौदिया जेल से बाहर आने पर उन्हें कुर्सी न दे, तब उन्होंने विक्रम मजीठिया, कपिल सिब्बल, नितिन गडकरी और अरुण जेटली से माफी मांगने का सिलसिला शुरू किया."

कुमार विश्वास आगे लिखते हैं कि "माफी मांगने का फैसला केजरीवाल ने बिना साथियों से चर्चा के ले लिया. यह कुछ वैसा ही है जैसे युद्ध में साथी सिपाहियों की जान-जोखिम में डाल कर कोई कायर सेनापति मैदान छोड़ कर न केवल भाग खड़ा हो बल्कि सामने वाले योद्धाओं के तम्बू में जा कर उन्हीं के चरणों में गिर पड़े और साथियों की कीमत पर कमाया अपना राजमुकुट बख्श देने के लिए रोने-गिड़गिड़ाने लगे."

"क्या अब आगे केजरीवाल किसी के बारे में कुछ भी बोलेंगे तो वह बात सच है या झूठ, यह तो केवल उनकी कुर्सी खतरे में पड़ने पर ही पता चलेगा." कुमार विश्वास पूछते हैं कि "जब कोई सबूत था ही नहीं किस आधार पर इतना बड़ा वितंडा रचा गया?" वे लिखते हैं कि "किसके कहने पर केजरीवाल ने ऐसा किया, यह जानने के लिए जब भी उन्होंने फोन किया तो वे फोन पर ही नहीं आए. कुमार विश्वास के मुताबिक केजरीवाल अपने घर आए हर राजनीतिक मेहमान की वीडियो रिकॉर्डिंग करवाते हैं."

कुमार विश्वास आगे लिखते हुए भावुक हो जाते हैं. वे पूछते हैं "हम किससे माफी मांगें? अरुण जी आपसे? आपके परिवार से? नितिनजी सरीखे अन्य नेताओं या मीडिया मुगलों से? विवाद खत्म होने पर सब अपने घरों को लौट जाएंगे. लेकिन उन लाखों कार्यकर्ताओं से कौन माफी मांगेगा जिन्होंने एक सत्तालोलुप कायर झूठे के कहने पर अपना परिवार-कैरियर-सपने सब दांव पर लगा दिया. उन बच्चों से कौन माफी मांगेगा जिन्होंने एक कायर झूठे के कहे को सच समझ कर आप सब के खिलाफ सड़कों पर प्रदर्शन किया, पुलिस की लाठियां खाईं, लोगों के मज़ाक का पात्र बने."

आखिर में कुमार विश्वास कविता की चार पंक्तियां लिखते हैं :

"पराये आंसुओं से आंख को नम कर रहा हूं मैं,
भरोसा आजकल ख़ुद पर भी कुछ कम कर रहा हूं मैं,
बड़ी मुश्किल से जागी थी ज़माने की निगाहों में.
उसी उम्मीद के मरने का मातम कर रहा हूं मैं!"

वैसे कहा जा रहा है कुमार विश्वास का रिश्ता अब आम आदमी पार्टी से टूट की कगार पर है. शायद यह पत्र उस नाज़ुक रिश्ते की आखिरी कड़ी को भी तोड़ दे. यह भी कहा जा रहा है कुमार विश्वास की अगली राजनीतिक मंज़िल शायद बीजेपी हो जिसके कई बड़े नेता एक बार उनके जन्मदिन पर बधाई देने आ चुके हैं.

कुमार विश्वास की राजनीतिक नीयत जो भी हो, लेकिन यह तय है कि उनके पत्र ने आम आदमी पार्टी की बची-खुची राजनीतिक विश्वसनीयता को भी खत्म कर दिया है. अब सवाल यही है कि भविष्य में अगर केजरीवाल किसी राजनीतिक विरोधी पर आरोप लगाएंगे तो उस पर जनता कैसे भरोसा करेगी?

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(अखिलेश शर्मा एनडीटीवी इंडिया के राजनीतिक संपादक हैं)

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति एनडीटीवी उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं. इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार एनडीटीवी के नहीं हैं, तथा एनडीटीवी उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है.
 


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