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खूबसूरती की दुनिया को शब्‍द देने वाले गुलज़ार के नाम खत...

बारिश की बूंदें कैसे सपनों को पंख दे दिया करती हैं, एक उम्‍मीद का बीज कैसे सपनों को रंगीन बना जाता है, यह भी तो तुम्‍हीं ने बताया.

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खूबसूरती की दुनिया को शब्‍द देने वाले गुलज़ार के नाम खत...

गीतकार एवं शायर गुलजार (फाइल फोटो)

यार जुलाहे,

बचपन की यादों को जवानी की दहलीज तक संजोए रखने वाले, करामाती शब्‍दों को रचने वाले, तेरे शब्‍दों के साथ साथ जाने कितने लोगों ने अपने जीवन को जीया है. बचपन की किलकारी, हंसी और जवानी के ठहाके, उदास लम्‍हे, कुछ ख्‍वाब, कुछ ख्‍याल, कुछ उम्‍मीद, मौत में भी जिंदगी ढूंढने वाले पल, सब कुछ तेरे शब्‍दों से जाना है. बारिश की बूंदें कैसे सपनों को पंख दे दिया करती हैं, एक उम्‍मीद का बीज कैसे सपनों को रंगीन बना जाता है, यह भी तो तुम्‍हीं ने बताया.

मेरी और मेरे जैसे लाखों लोगों की उम्र उतनी ही रही होगी जब तूने मोगली की दुनिया से हमारी पहचान कराई. 'जंगल-जंगल बात चली है पता चला है... चड्डी पहन के फूल खिला है, फूल खिला है'. आज भी जब कहीं यह गीत सुनाई पड़ता है तो हम बचपन की उसी दुनिया में लौट जाते हैं. एक हंसता खिलखिलाता बचपन. किलकारी मारता बचपन. क्‍या दिन थे... टेलीविजन के पर्दे पर इस धुन के आते ही पैर उधर ही मुड़ जाते थे. छलांगें वैसी ही मोगली की तरह. कितने सारे तो दोस्‍त बन गए थे. जानवरों का नाम उनके चेहरे को सामने ला देता था.

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आज भी वो दयार याद आता है. वो ड्योढ़ी, वो नीम का पेड़, वो... उस दहलीज को हम भी छोड़ आगे बढ़ गए. लेकिन बचपन आज भी अपना सा लगता है. 'छोड़ आए हम वो गलियां...' आज भी अपनों की याद दिला जाता है. कहना न होगा इसमें तुम्‍हारा भी दर्द शामिल है. इन शब्‍दों में तुम्‍हारी एक अलग जादूगरी है... तेरे गीतों के बोल जैसे-जैसे जवान होते गए, हमारी उम्र के भी पंख लग गए. उम्र के नये एहसास ने बचपन को भुला दिया. ऐसा ही है तेरा जादू... कितनी आसानी से एक दुनिया से दूसरी दुनिया में लिए चले जाते हो. अहसासों की किताब तुम्‍हारे पास न जाने कितने पन्‍नों की होगी... अंदाजा भी नहीं लगा सकता.

लाखों नौजवानों ने जब जुबां पर 'नमक इस्‍क का' चखा होगा, तब भी तेरे शब्‍दों ने ही इसका अहसास कराया होगा. बोल ही ऐसे होते हैं तेरे. 'चुन्‍नी ले के सोती थी कमाल लगती थी...' मेरे लिए तो खूबसूरती की दुनिया को शब्‍द देने वाले तेरे ही ये बोल थे. उनसे मिलने की खुशी दिन का एहसास कराती थी. बिछड़ने को शाम ढलने जैसी संज्ञा देने वाले तुम्‍ही थे. 'कमर के बल नदी मुड़ा करती थी...' तब से मुझे तो नदी भी खूबसूरत लगने लगी थी. अभी तक नदी का किनारा सुकून देता था लेकिन अब पूरी नदी और लहरें उसका एहसास कराने लगी थीं.

जिम्‍मेदारियों के बीच भी रूमानियत को कहां कम होने देते हैं तुम्‍हारे शब्‍द. जिंदगी की डोर को उलझाते-सुलझाते एक पहेली बना देते हैं, और इस पहेली में वो यादें भी होती हैं और वो सामान भी. 'हजार राहें मुड़ के देखीं...' पर तुम्‍हारे जैसा शब्‍द चितेरा नहीं दिखा.

यार जुलाहे...   तुम ऐसे ही शब्‍दों को उकेरते रहो... रचते रहो. तुम्‍हारे हरेक शब्‍द अहसास बनाए रखते हैं. जीवन को अर्थ दे जाते हैं.

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सुरेश कुमार ndtv.in के संपादक हैं...

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति NDTV उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं. इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार NDTV के नहीं हैं, तथा NDTV उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है.


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