बीजेपी की नजर में बिहार में करारी हार के 10 कारण

बीजेपी की नजर में बिहार में करारी हार के 10 कारण

प्रतीकात्मक चित्र

पटना:

बिहार विधानसभा चुनाव के परिणाम को अब एक महीने होने वाला है, जहां जनता दल (यूनाइटेड), लालू यादव की राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस परिणाम से खुश हुए वहीं बीजेपी ने हार के कारणों को जानने के लिए परिणाम के तुरंत बाद से समीक्षा शुरू कर दिया। हालांकि हार के कारणों का पता लगाने के लिए लोक जनशक्ति पार्टी के अध्यक्ष, रामबिलास पासवान ने भी एक बैठक की लेकिन इसे औपचारिकता के अलावा कुछ और नहीं कहा जा सकता। वैसे बिहार के चुनावी परिणाम से दो बड़ी बातें स्पष्ट हो जाती हैं।

एक, अगर बीजेपी और उनके सहयोगी दलों के खिलाफ विरोधी पार्टियों का भी गठबंधन बन जाए तो बीजेपी को रोकना या चुनाव में पराजित करना आसान हो सकता है।

दूसरा, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली में भले बड़ी-बड़ी भीड़ पार्टी द्वारा जुटाई जाए लेकिन वो इस बात की गरंटी नहीं की मतदान में या चुनाव में बीजेपी के उम्मीदवार वो सीट जीत जाएं। कम से कम बिहार में भागलपुर, बेगुसराई, सीतामढ़ी, बेतिया समेत कई शहरों के बीजेपी प्रत्याशी इस बात के उदाहरण हैं। यही नहीं बिहार में कुछ ब्लॉक मुख्यालय में जैसे नौबतपुर और मढ़ौरा में प्रधानमंत्री की सभा करने के बाद स्थानीय सीट बीजेपी जीत नहीं पाई।

लेकिन, बीजेपी की समीक्षा में आखिर हार के क्या कारण सामने आए हैं। अभी तक सूत्रों के अनुसार कुछ बातें साफ़ हुई हैं जिनमें प्रमुख हैं-

1. नीतीश कुमार, लालू यादव और कांग्रेस पार्टी का महागठबंधन का सामाजिक समीकरण बीजेपी नेतृत्व वाली राष्ट्रीय लोकत्रांतिक गठबंधन से कहीं बड़ा और प्रभावी था। ये बात अलग है कि पिछले लोकसभा चुनाव की तुलना में इस बार जीतन राम मांझी भी इनके साथ थे, लेकिन राष्ट्रीय लोकत्रांतिक गठबंधन को लोकसभा चुनाव की तुलना में इस बार 10 लाख कम वोट मिले।

2 .प्रशांत किशोर का नीतीश का चुनाव प्रबंधन सम्भालना बीजेपी के लिए भी एक महंगा सौदा रहा। बीजेपी के नेता अब मानते हैं कि शहर में होर्डिंग पोस्टर से लेकर चुनाव के दिन तक प्रशांत किशोर का चुनावी प्रबंधन का मुकाबला बीजेपी नहीं कर पाई और प्रशांत किशोर के मुकाबले बीजेपी ने जिन लोगों पर विश्वास किया वे उनके सामने टिक नहीं पाये और बीजेपी के नेता मानते हैं कि अगर अहंकार की लड़ाई में पार्टी अध्यक्ष, अमित शाह ने प्रशांत किशोर को जाने नहीं दिया होता तो शायद आज बिहार में बीजेपी की सरकार बन सकती थी।

3. महागठबंधन ने नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित कर चुनाव की हवा का रुख बदल दिया। बीजेपी या गठबंधन को या एक चेहरा देना चाहिए था, लेकिन चुनाव को नीतीश कुमार बनाम नरेंद्र मोदी कर अपने विरोधियों को मुद्दा दिया और बीजेपी में कई नेता जैसे सुशील मोदी, प्रेम कुमार, राधा मोहन सिंह सभी मुख्यमंत्री के उम्मीदवार बने थे जिससे मतदाताओं में बहुत भ्रान्ति फैली।

4. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली से भी पार्टी को नुकसान उठाना पड़ा। कई प्रत्यशियों ने यहां तक शिकायत की जब वो जनसंपर्क करते तब उन्हें मोदी जी की रैली के लिए भीड़ जुटाने में अपना ध्यान देना पड़ा जिससे आखिर में उन्हें नुकसान उठाना पड़ा। लेकिन पार्टी के वरिष्ठ नेता मानते हैं कि प्रधानमंत्री की अधिक से अधिक रैली के लिए बिहार के नेतृत्व ने ही दबाव बनाया था। लेकिन प्रधानमंत्री की रैली में भीड़ जीत की गरंटी नहीं रही।

5. पार्टी के नेताओं ने अपने फीडबैक में ये भी बताया है कि पार्टी के वरिष्ठ नेताओें की वो रणनीति की लालू यादव और जंगलराज की खूब चर्चा किया जाए भी सकारात्मक असर करने के बजाय लालू यादव के समर्थक जातियां को उनके समर्थन में और अधिक गोलबंद कर दिया जिससे आखिरकार नुकसान उठाना पड़ा। हालांकि बिहार बीजेपी के नेता कहते हैं कि नीतीश कुमार के नेतृत्व में जब भी वो चुनाव लड़ते थे तब लालू यादव को कभी निशाना नहीं बनाया जाता था, लेकीन इस बार चुनाव के मैनेजर बिहार की जातियों की सचाई और उनमें होने वाली प्रतिक्रिया की सचाई से कोसों दूर थे।

6. बिहार बीजेपी के नेता ये भी मानते हैं कि इस बार जहां महागठबंधन अपने अंतर्गत वोट जैसे यादव, मुस्लिम, कुर्मी के अलावा कुशवाहा, अति पिछड़ा वोटो के 70 प्रतिशत वोट तो ले ही गई बल्कि पासवान, मांझी वोटो में भी 30 प्रतिशत तक सेंध लगाने में सफल हुई। जिसका साफ़ मतलब है कि उपेन्द्र कुशवाहा और रामविलास पासवान का अपने अंतर्गत वोटों पर पकड़ कमजोर हुई है। वहीं जीतन राम मांझी को बीजेपी ने जिस प्रकार से भुनाने की कोशिश की, खासकर महादलित वोटरो में वो धरा का धरा रह गया।

7. बिहार के चुनावों में राष्ट्रीय लोकत्रांतिक गठबंधन को आरएसएस प्रमुख मोहन भगवत के आरक्षण सम्बन्धी बयान का सबसे ज्यादा खामियाजा उठाना पड़ा। लालू और नीतीश को पूरे चुनाव को अगड़ी जाति बनाम पिछड़ी जाति करने में मदद ही नहीं हुई बल्कि जब तक पार्टी ने डैमेज कंट्रोल के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से नीतीश कुमार पर आरक्षण के साथ छेड़छाड़ करने का बयान दिलवाया उसका कोई असर नहीं हुआ। दरअसल बिहार के मतदाता खासकर पिछड़ी दलित जातियों ने देखा है कि लालू-नीतीश ने आरक्षण की लड़ाई में अपनी भागीदारी के कारण आज तक अगड़ी जातियों से गाली खाते हैं।

8. बीजेपी ने वोटरों को धर्म के नाम पर लामबंद करने की कोशिश की और इसके लिए गोहत्या का मुद्दा उठाया, लेकिन इसका वोटरों पर कोई असर नहीं दिखा।

9. बिहार बीजेपी के नेता अब मानते हैं कि चुनाव दो दर्जन हेलीकाप्टर, टीवी चैनल पर विज्ञापन, वीडियो रथ के सहारे नहीं जीता जा सकता और खासकर बड़े-बड़े पोस्टर पर केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह का चेहरा होने से बीजेपी के अपने वोटरों में बहुत उत्साह नहीं दिखा। साथ ही वो मानते हैं कि अगर प्रधानमंत्री के साथ बिहार बीजेपी के किसी वरिष्ठ नेता का चेहरा होता तो नीतीश कुमार के बिहार बनाम बाहरी का वो मुकाबला कर सकते थे।

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10. अंत में हारे कई प्रत्यशियों ने माना कि जीतन राम मांझी से इस साल फरवरी में सत्ता की कमान संभालने के बाद नीतीश कुमार ने राज्य में आंदोलन कर रहे सभी कर्मचारियों की बातें सुनीं और उनकी मांगें मानी जिसमें शिक्षकों को वेतनमान देने का फैसला अहम रहा जिसके कारण नीतीश कुमार के खिलाफ कोई नाराजगी नहीं थी। वहीं केंद्र प्रायोजित परियोजना जैसे मनरेगा, ग्रामीण सड़क योजना राशि के अभाव में उनका काम धीमा पड़ता जा रहा है, जिससे की गरीब तबके की नाराजगी का पार्टी को सामना करना पड़ा।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति एनडीटीवी उत्तरदायी नहीं है। इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार एनडीटीवी के नहीं हैं, तथा एनडीटीवी उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।