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यशवंत सिन्हा - क्या एक बिहारी है सब पर भारी?

सिन्हा के इस बाग़ी तेवर के पीछे क्या कारण हैं? अगर आप भाजपा के दिल्ली से पटना तक सत्ता से चिपके नेताओं से पूछेंगे तो उनका जवाब होता है कि सिन्हा का कथन अंगूर खट्टे हैं जैसा है.

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यशवंत सिन्हा - क्या एक बिहारी है सब पर भारी?

वरिष्‍ठ बीजेपी नेता यशवंत सिन्‍हा (फाइल फोटो)

पिछले एक हफ़्ते से अधिक समय से देश की राजनीति में जो भूचाल आया है उसके केंद्र में हैं पूर्व केंद्रीय वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा. एक अख़बार में लिखे उनके लेख के बाद पहली बार देश की आर्थिक व्यवस्था चर्चा के केंद्र में है. इस लेख और उसके बाद विभिन्‍न चैनलों को दिए गए इंटरव्‍यू के बाद सिन्हा के ऊपर भी भाजपा नेताओं ने बारी-बारी से हमला बोला. लेकिन सिन्हा के तेवर नरम नहीं हुए. और अब तो जीएसटी की दरों में जिस तरह शुक्रवार को कमी लायी गयी, उससे तो लगता है कि सिन्हा कम से कम पहले राउंड की बाज़ी जीतने में कामयाब हुए हैं. अगर सिन्हा के तर्कों में दम नहीं होता तो शायद पहली बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक सरकारी कार्यक्रम में अपनी बातों को समझाने के लिए पावर प्‍वाइंट प्रेज़ेंटेशन का सहारा नहीं लेना पड़ता.

केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने भी सार्वजनिक मंच से यह कह कर पल्ला झाड़ने की कोशिश की कि उनकी उम्र 80 साल हो गई है, लेकिन जेटली को भी मन मार कर जीएसटी काउंसिल की बैठक ही नहीं करनी पड़ी बल्कि कई वस्तुओं पर जीएसटी की दर को भी कम करना पड़ा. इससे पहले पेट्रोल और डीज़ल पर केंद्र सरकार ने टैक्स कम कर दाम घटाने की सार्वजनिक रूप से कोशिश शुरू की. ये सब अब आप संयोग कहें या समय, सब कुछ सिन्हा के सार्वजनिक रूप से सरकार की आलोचना के बाद शुरू हुआ.

लेकिन सिन्हा के इस बाग़ी तेवर के पीछे क्या कारण हैं? अगर आप भाजपा के दिल्ली से पटना तक सत्ता से चिपके नेताओं से पूछेंगे तो उनका जवाब होता है कि सिन्हा का कथन अंगूर खट्टे हैं जैसा है. कोई बताएगा कि ये सब प्रचार के किए किया जा रहा है क्‍योंकि उनकी एक नई किताब आने वाली है, इसलिए वो अपने ऊपर सारा फ़ोकस रखना चाहते हैं. कुछ लोग आपको बताएंगे क‍ि कैसे ब्रिक्स बैंक का वो अध्यक्ष बनना चाहते थे लेकिन केन्द्रीय वित मंत्री अरुण जेटली ने उन्हें समझाया कि चीन और रूस किसी बैंकर को ही अध्यक्ष मानेंगे इसलिए उनकी उम्मीदवारी कमज़ोर है. लेकिन कई भाजपा नेता कहते हैं कि अपनी निरंतर हो रही उपेक्षा से वो दुखी थे. ख़ुद सिन्हा ने माना कि एक साल पूर्व उन्होंने प्रधानमंत्री से समय मांगा लेकिन आजतक वो अपने लिए समय का इंतजार कर रहे हैं.

लेकिन सिन्हा को जानने वाले लोगों का कहना है कि सिन्हा को नज़रंदाज कर देना सच्‍चाई से मुंह मोड़ने के समान है. सिन्हा के जीवन के कुछ पलों को अगर आप जान जाएंगे तो उससे वो आज जो कर रहे हैं और जो भविष्य में करेंगे उसका आकलन आसान हो जाएगा. सिन्हा राजनीति में आने से पहले एक आईएएस अधिकारी रहे और आज तक उन्होंने कुछ नेताओं के साथ जो व्यवहार किया उसका उदाहरण दिया जाता है.

यशवंत सिन्हा जब संथाल परगना के डीसी थे तो आज से चालीस साल पहले वहां सूखा पड़ा था. स्थिति ख़राब थी लेकिन सिन्हा ने स्थिति को सुधारने के लिए बहुत कुछ किया. उस समय बिहार में पहली बार मिलीजुली सरकार, जिसको महागठबंधन कहा जा सकता है, महामाया प्रसाद सिन्हा के नेतृत्व वाली सरकार थी और मुख्यमंत्री दुमका के दौरे पर थे. वहां जनता से मिलने के बाद उन्‍होंने उस समय सरकार में सहयोगी वामपंथी नेता चंद्रशेखर सिंह की मौजूदगी में सिन्हा के साथ सवाल-जवाब शुरू किया. सिंह वहां आग में घी डालने का काम कर रहे थे लेकिन सिन्हा ने सबके सामने मुख्यमंत्री से कहा कि वो अगर चाह लेंगे तो राज्य का मुख्यमंत्री बन सकते हैं लेकिन सर, आप अब जीवन में आईएएस तो कम से कम नहीं बन सकते. ये उस ज़माने में काफ़ी चर्चा का विषय रहा. इसके बाद जब 1977 में कर्पूरी ठाकुर के नेतृत्व में सरकार बनी तब यशवंत सिन्हा उनके प्रधान सचिव हुए. ठाकुर सरकार द्वारा कई महत्‍वपूर्ण निर्णय लिए गए जिसमें आरक्षण के लिये जो कोटा शुरू हुआ वो आज भी चर्चा का विषय है. इस सिस्टम में पिछड़ों में जो वर्गीकरण किया गया, उसमें ग़रीब जातियों को अति पिछड़ा श्रेणी में रखते हुए उनके लिये अधिक आरक्षण का प्रावधान किया गया. इसकी ख़ासियत ये रही कि अगड़ी जातियों के ग़रीब और सभी जातियों की महिलाओं के लिये भी कुछ प्रतिशत कोटा निर्धारित था. और अब माना जा रहा हैं कि केंद्र में मोदी सरकार ऐसे ही प्रावधान ला रही है. इसके अलावा शराबबंदी हो या चीनी मिलों का अधिग्रहण, उस समय किया गया लेकिन उस ज़माने के नेता मानते हैं कि सिन्हा मॉनिटरिंग इतनी चुस्त रखते थे कि सामाजिक या क़ानून व्यवस्था की कोई समस्या नहीं हो.

लेकिन सिन्हा का राजनीति में प्रवेश पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के कारण सम्भव हुआ. उन्होंने आईएएस की नौकरी से इस्तीफ़ा देकर राजनीति में प्रवेश किया जबकि आजकल लोग रिटायरमेंट के बाद राजनीति में संभावना तलाशते हैं. जब विश्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व में सरकार बनी तो शपथ ग्रहण समारोह में राज्य मंत्री में अपना नाम होने के विरोध में राष्ट्रपति भवन की सीढ़ियों से सिन्हा लौट आए थे. हालांकि उन्हीं के समय सोना गिरवी रखना पड़ा लेकिन सिन्हा इसे ग़लत नहीं मानते बल्कि उनका मानना है कि देश में आर्थिक सुधार की नींव इसी से पड़ी.

राज्यसभा सदस्य रहने के बावजूद जब सिन्हा भाजपा में गए तब 1995 में रांची से विधानसभा चुनाव जीते और विपक्ष के नेता चुने गए. उस समय लालू यादव के खिलाफ विधानसभा और उसके बाहर कोई विरोधी बोलने की हिम्मत नहीं जुटाता था. लेकिन कुछ ही दिनों में लालू यादव ने सिन्‍हा से पंगा लेना बंद कर दिया था. दरअसल लालू यादव ने सिन्हा की तरफ़ इशारा करते हुए कह दिया कि कैसे-कैसे लोग जीतकर आ गए हैं, तब सिन्हा ने सदन में खड़े होकर कहा कि आपकी छाती पर मूंग दल कर आए हैं. फिर एक बार लालू ने कहा कि अधिकारी क्या जानेंगे लोकतंत्र क्या होता है, इस पर सिन्हा का जवाब था, आपको अगले बीस साल लोकतंत्र पढ़ा सकते हैं.

दरअसल सिन्हा पटना विश्वविद्यालय में छात्र रहने के बाद शिक्षक भी रहे थे. इसके अलावा जब लालू ने आरएसएस के लोगों के बारे में कुछ व्यक्तिगत आरोप लगाये तब सिन्हा ने कहा कि आप खगड़ि‍या में किसके साथ नाच रहे थे सब जानते हैं. लेकिन जैन हवाला कांड में नाम आने के बाद सिन्हा ने कुछ घंटे के अंदर जब इस्तीफ़ा दे दिया तब उनके विरोधी भी आश्‍चर्यचकित रह गए थे. और जब बिहार में पार्टी की कमान दी गयी तब पार्टी के नेता भी उनके रूटीन से परेशान रहते थे. हालांकि केंद्रीय वित्त मंत्री बनने के बाद बिहार में उस समय बहुत सारी परियोजनाएं शुरू कराने में उन्‍होंने सक्रि‍य भूमिका अदा की थी.

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फ़िलहाल ये सारे तथ्य इस बात का संकेत हैं कि सिन्हा को शांत करना मुश्किल है, कम से कम कुछ आरोप लगा कर आप कुछ हासिल नहीं कर सकते. बिहार जैसे जातिवादी राज्य में कायस्थ समुदय से आकर राजनीति कर लेना और वो भी अपनी शर्तों पर एक बहुत बड़ी उपलब्धि है. हालांकि उनके आलोचक कहते हैं कि सिन्हा अगर क़ाबिल थे और हैं तब भाजपा ने उनका पूरा सम्मान किया. बिहार की राजनीति में विपक्ष का नेता, पार्टी अध्यक्ष, केंद्र में वित्त मंत्री, विदेश मंत्री उन्हें बनाया. ये सब उनकी क़ाबिलियत की ही क़द्र की गई. लेकिन सिन्हा ने ख़ुद अपने बेटे जयंत को पार्टी उम्मीदवार बनाया और जिन्हें मोदी ने केन्द्र में मंत्री बनाया लेकिन पूरी सरकार तो उनके इशारे पर नहीं चल सकती. आख़िर उन्हें भी इस समय से समझौता करना होगा कि ये नई भाजपा हैं जहां उनके विचार और सुझाव की ज़रूरत नहीं.

लेकिन यशवंत सिन्हा पर शायद ये सब नियम लागू नहीं होते क्योंकि उनके जिस उम्र का हवाला देकर उन्हें अप्रासंगिक बनाने की कोशिश हो रही है वो उनका सबसे बड़ा हथियार है क्योंकि अब उनके पास खोने के लिये कुछ नहीं है लेकिन पाने के लिये अभी भी कुछ बाक़ी है.


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