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एशियाड के हीरो : संयम के साथ संघर्ष की दास्तानें

अरपिंदर सिंह...ने ट्रिपल जंप में सोना जीता किसी को इसकी उम्मीद नहीं थी..यही वजह है कि आपको उसके संघर्ष की कहानी जाननी चाहिए

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एशियाड के हीरो : संयम के साथ संघर्ष की दास्तानें
अरपिंदर सिंह...ने ट्रिपल जंप में सोना जीता किसी को इसकी उम्मीद नहीं थी..यही वजह है कि आपको उसके संघर्ष की कहानी जाननी चाहिए..अरपिंदर के पिता सेना में हवलदार रहे और 1990 में रिटायर्ड हुए..बेटा को खिलाड़ी बनाने के लिए वो अरपिंदर को पांच साल से ट्रेनिंग दे रहे हैं..बेटे को खिलाड़ी बनाने के लिए जगबीर सिंह ने अपनी डेढ़ एकड़ जमीन गिरवी रख दी ..साथ में अरपिंदर को ट्रेनिंग और अन्य सुविधांए मुहैया कराने के लिए 5 लाख का उन पर कर्जा हो गया. लेकिन जब अरपिंदर को 2014 का कॉमनवेल्थ गेम में कांस्य पदक मिला और उसके बाद जो इनाम मिले उससे उन्होंने अपनी जमीन छुड़वाई..

अपने कैरियर के शुरुआती दौर में अरपिंदर 100 मीटर, 200 मीटर और लांग जंप की प्रैक्टिस करते थे मगर बाद में उनके कोच ने कहा कि वो ट्रिपल जंप की कोशिश करें ..पिछले पांच साल से अरपिंदर ट्रिपल जंप की ट्रेनिंग कर रहे हैं..वो इसके लिए रोमानिया गए..मगर वहां के हालात, मौसम और  खानपान की वजह से उनकी टाइमिंग अच्छी नहीं हो पा रही थी..इसलिए अरपिंदर ने भारत लौटने का फैसला लिया..एक खास बात यह रही कि उनके रोमानियन कोच भी भारत आने के लिए तैयार हो गए और रिजल्ट आपके सामने है ..अरपिंदर ने ट्रिपल जंप में सोना जीत कर अपने पिता का सपना सच किया..
 
स्वप्ना बर्मन पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी की रहने वाली ..पिता आटो चलाते थे फिर 2003 में  दिल की बीमारी की वजह से बिस्तर पकड़ लिया..मां चाय बगान में काम करती हैं..एशियाड के दौरान दांतों में दर्द था दो दातों का रूट केनाल कराया..यही नहीं स्वप्ना बर्मन के पांव में 6 अंगुलियां हैं..जिससे उनको कोई भी जूता फिट नहीं होता यही नहीं जब प्रतियोगिता के दौरान उन्हें स्पाईक पहनना पड़ता है तो उन्हें और भी दर्द होता है..इस एशियाड के दौरान उन्होंने टूथ से नेल, जो एक अंग्रेजी कहावत है, की लड़ाई जीती..मगर उसने हिम्मत नहीं हारी..घर वाले जब भी स्वप्ना से अपने परिवार के हालात की बात करते तो वह उनसे कहती मैं हूं न..बर्मन को गाने का शौक है.
 
मंजीत सिंह ने 800 मीटर में सोना जीता..2013 में राष्ट्रीय चैंपियनशिप में सोना जीता था..जीत के बावजूद ओनजीसी ने उन्हें नौकरी से निकाल दिया यह कहते हुए कि आपकी उम्र 27 साल हो गई है और आप अपने प्रदर्शन को और बेहतर नहीं बना सकते..मगर मंजीत ने हिम्मत नहीं हारी ..डेढ़ साल तक ऊटी में अभ्यास किया..फिर तीन महीने के लिए भूटान गए..पिता किसान हैं और दूध का कारोबार करते हैं और मंजीत उनसे समय-समय पर पैसे लेते रहे..मंजीत चार महीने पहले पिता बने और मेडल जीतने तक अपने बेटे को देख नहीं पाए हैं.

1500 मीटर की दौड़ में कांस्य पदक जीतने वाली  चित्रा उन्नीकृष्णन को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट कर बधाई दी. चित्रा एक आर्थिक रूप से कमजोर परिवार से आती हैं. उनका जन्म 1996 में हुआ. चित्रा के माता-पिता मजदूर हैं और खेतों में काम कर जो कुछ मिलता था उसी से अपना गुजर बसर करते हैं.मगर इस गरीबी में भी उन्होंने चित्रा को स्कूल भेजा, चित्रा उनके चार बच्चों में तीसरी संतान है.अपने स्कूल जो पालाकाड में है वहां चित्रा ने खेलों में बेहतर प्रदर्शन किया.2011 के नेशनल स्कूल गेम्स में चित्रा ने 1500, 3000 और 5000 मीटर दौड़ में स्वर्ण पदक जीता.यह सिलसिला 2013 के नेशनल स्कूल गेम्स तक जारी रहा. चित्रा के इस प्रदर्शन पर केरल के राज्यपाल ने उसे नैनो कार भेंट की. इतना ही नहीं चित्रा ने 2016 के वर्ल्ड एथलेटिक चैंपियनशिप में भी उसने स्वर्ण पदक जीता. 2017 में  जब चित्रा को वर्ल्ड एथलेटिक चैंपियनशिप जो लंदन में होने वाला था तब फेडरेशन ने उसे वहां  भेजने से मना कर दिया. इसके खिलाफ चित्रा केरल हाई कोर्ट पहुंच गईं. इस मामले में बाद में कोर्ट ने फेडरेशन को आदेश दिया कि वह चित्रा को लंदन भेजे. हालांकि फेडरेशन ने समय कम होे का बहाना बना करके उसे वहां नहीं भेजा. 

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दुत्ती चंद
दुत्ती ने 100 मीटर और 200 मीटर को दौड़ में रजत पदक जीता..लेकिन 2014 के गल्सागो कॉमनवेल्थ गेम से पहले उसे टीम में शामिल नहीं किया गया..मगर दुत्ती ने हार नहीं मानी वह अपनी लैंगिकता को साबित करने के लिए अंतरराष्ट्रीय कोर्ट ऑफ आरबीट्रेशन तक गई जो कि स्विटजरलैंड में है..उस वक्त उसके पास ठंड के कपड़े भी नहीं थे..उनकी वकील ने दुत्ती चंद को इस कानूनी लड़ाई लड़ने में काफी मदद की..2015 में कोर्ट ने अपने अंतरिम आर्डर में वैसे महिला एथलीट जिनमें एनड्रोजेन हारमोन की मात्रा अधिक होती को खेलों में हिस्सा लेने की अनुमति दे दी.. फिर क्या था दुत्ती हर रेस में ऐसा भागने लगी माने वो उसकी आखिरी रेस है और आगे उसे मौका नहीं मिलेगा.
 
नीरज चोपडा..भाला फेंकने में सोना
नीरज 13 साल से खेल प्रतियोगिताओं में हिस्सा ले रहे हैं मगर कोई मेडल नहीं मिला..हर हरियाणवी की तरह पहले बॉक्सिंग, कुश्ती और कबड्डी में हिस्सा लिया..2011 में सीनियर की सलाह पर भाला फेंकना शुरू किया मगर राज्य स्तर तक कोई मेडल नहीं मिला..नीरज के पिता बस में उसे साथ लेकर ट्रेनिंग कराने ले जाते थे..दो साल पहले जूनियर वर्ल्ड कप में मिली सफलता ने सब कुछ बदल कर रख दिया..फिर साउथ एशियन गेम्स, एशियन चैंपियनशिप और कॉमनवेल्थ गेम में मिली सफलता ने सब कुछ बदल कर रख दिया..नीरज ने जीतनी दूरी तक भाला फेंका है यदि यही प्रर्दशन वे रियो ओलंपिक में करते तो उन्हें कांस्य पदक मिलता.
 
यही नहीं इस एशियाड में मिले मेडल में से 12 मेडल 20 या उससे कम उम्र के खिलाड़ियों ने जीते हैं. जैसे 15 साल के शार्दुल ने निशानेबाजी में रजत पदक जीता तो 16 साल के सौरभ चौधरी ने 10 मीटर पिस्टल शूटिंग में सोना जीता..भाला में सोना जीतने और रिकार्ड बनाने वाले नीरज चोपड़ा 20 साल के हैं..16 साल की मुस्कान को तीरंदाजी में रजत पदक मिला..हिमा दास को एथलेटिक्स में रजत पदक मिला जो 18 साल की है और कुश्ती में कांस्य पदक जीतने वाली दिव्या काकरान 20 साल की हैं.
 
यानि इस एशियाड ने काफी उम्मीदें जगाई हैं कि आने वाले दिनों में खेल में भी भारत अपनी छाप छोड़ेगा..और इसके लिए खेल फेडरेशन और खेल मंत्री राठौर की भी सराहना की जानी चाहिए..आखिर एक ओलंपिक पदक विजेता के खेल मंत्री होने का फायदा खेल और खिलाड़ियों को ही होगा क्योंकि उससे अच्छा उनकी भावनाओं और जरूरतों और खिलाड़ियों को लगने वाले चोट को बेहतर समझ सकता है और उनका हौसला बढ़ा सकता है.


मनोरंजन भारती NDTV इंडिया में 'सीनियर एक्ज़ीक्यूटिव एडिटर - पॉलिटिकल न्यूज़' हैं...

 
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