महामहिम के महा कारनामे..

अभी तक यह आरोप कांग्रेस द्वारा नियुक्त किए गए राज्यपालों पर लगते रहे हैं मगर हाल के वर्षों में एनडीए शासन द्वारा राज्यपालों ने सभी को पीछे छोड दिया है.

महामहिम के महा कारनामे..

राजस्‍थान के मौजूदा सियासी संकट में राज्‍यपाल कलराज मिश्र की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं

भारत के संविधान निर्माताओं ने जब संविधान में राज्य में राज्यपाल (Governor) का व्यवस्था की होगी तब उनके दिमाग में एक ऐसे पद या व्यक्ति की परिकल्पना होगी जो राज्य में संविधान की रक्षा करेगा. राज्यपाल दरअसल किसी भी प्रदेश में केंद्र का प्रतिनिधि होता है जिसका काम गृह मंत्रालय को समय-समय पर राज्य के कानून व्यवस्था पर रिपोर्ट भेजना होता है कि राज्य में कैसे हालात हैं. सबसे ताजा उदाहरण हैं बंगाल के राज्य जगदीप धनखड़ (Jagdeep Dhankhar) की भूमिका, जो गाहेबगाहे बंगाल में कानून व्यवस्था पर टिप्पणी करने से बाज नहीं आते हैं. अभी हाल में ही बंगाल के राज्यपाल 'धनखड़जी' दिल्ली आकर गृहमंत्री से मुलाकात कर अपनी रिपोर्ट उन्हें सौंप चुके हैं.मतलब राज्‍यपाल अब राजभवन को राजनीति का अखाड़ा बनाने से बाज नहीं आ रहे हैं. 

अभी तक यह आरोप कांग्रेस द्वारा नियुक्त किए गए राज्यपालों पर लगते रहे हैं मगर हाल के वर्षों में एनडीए शासन द्वारा राज्यपालों ने सभी को पीछे छोड दिया है. बंगाल के राज्यपाल जगदीप धनखड का उदाहरण तो दे ही चुका हूं. राजस्थान के राज्यपाल कलराज मिश्र (Kalraj Mishra) भी इसका सबसे ताजा उदाहरण है, जहां मुख्यमंत्री अशोक गहलोत (Ashok Gehlot) विधानसभा का सत्र बुलाना चाहते हैं मगर राज्यपाल महोदय को यह नागवार गुजर रहा है. वो किसी ना किसी बहाने इसे टालना चाहते हैं. भारत की राजनीति में ऐसा कम देखने को मिलता है जहां एक मुख्यमंत्री को विधानसभा का सत्र बुलाने से रोका जाता है. दरअसल हमने अभी तक इसका उल्टा होते देखा है कि राज्यपाल किसी भी मुख्यमंत्री को जल्दी से जल्दी बहुमत साबित करने के लिए विधानसभा आने का न्यौता देते हैं. इसके जबाब में राजस्थान के मुख्यमंत्री को राजभवन में विधायकों की परेड करानी पडी.

वैसे राजस्थान के लिए यह कोई नई घटना नहीं थी.1993 में राजस्थान में भैंरोंसिंह शेखावत भी विधायकों की राजभवन में परेड करवा चुके हैं..हालांकि इस बार कहा गया कि अशोक गहलोत के विधायकों की राजभवन में परेड को लेकर राज्यपाल कलराज मिश्र नाराज बताए जा रहे हैं मगर ये बात अलग है कि 2 जून 1995 को खुद कलराज मिश्र बीजेपी नेता के तौर पर यही कारनामा उत्तर प्रदेश के राजभवन में कर चुके हैं. खैर बात हो रही थी एनडीए द्वारा नियुक्त राज्यपालों की तो महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी (Bhagat Singh Koshyari) को तो आप नहीं भूल सकते हैं जिन्होंने रातोंरात बिना बहुमत की जांच-पड़ताल किए हुए बीजेपी के नेता देवेंद्र फडणवीस को मुख्यमंत्री और एनसीपी नेता अजित पवार को उपमुख्यमंत्री पद की शपथ दिलवा दी. यही नहीं जब बाद में उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री बन गए तो उनके विधान परिषद में मनोनयन को लेकर टालमटोल करते रहे और बेवजह का अडंगा लगाते रहे.

बाद में जब उद्धव ठाकरे ने प्रधानमंत्री से बात की तब जाकर उनका विधान परिषद में मनोनयन हो पाया.उसी तरह पुडुचेरी के उप राज्यपाल और दिल्ली के उपराज्यपाल अनिल बैजल (Anil Baijal) पर भी यह आरोप लगता रहता है कि वे राज्य सरकार के कामों में दखल देते हैं और अपनी समानांतर सरकार चलाने की कोशिश करते हैं. उसी तरह जम्मू-कश्मीर के राज्‍यपाल पर यह आरोप लगा कि वे सरकार बनाने के विपक्ष के दावों पर ध्यान नहीं दे रहे हैं और अपने समर्थन में उन्होने जो तर्क दिए वो काफी बचकाना था. राज्यपाल सत्यपाल मलिक (Satya Pal Malik) ने कहा कि राजभवन में फैक्स मशीन नहीं था इसलिए वो लाचार थे..बाद में उनका तबादला कर दिया गया.एक और मजेदार उदाहरण है जब कर्नाटक के राज्यपाल ने बहुमत न होने के बावजूद येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी. फिर अंतरिम स्‍पीकर की उनकी नियुक्ति पर भी सवाल उठे. ये बात और है कि मुख्यमंत्री बनने के बाद भी येदियुरप्पा अपना बहुमत साबित नहीं कर सके और विश्वासमत से ठीक पहले इस्तीफा दे दिया था.वहीं उत्तराखंड में तो हाईकोर्ट को दखल देना पडा था. केके पॉल, जो उत्तराखंड के राज्यपाल होते थे, वहां के मुख्यमंत्री हरीश रावत के खिलाफ कांग्रेस के विधायकों की बगावत को सही ठहराते रहे और राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश कर दी. मामला हाईकोर्ट पहुंचा और राष्ट्रपति शासन को अदालत ने खारिज कर दिया और हरीश रावत को बहुमत साबित करने के लिए कहा और रावत ने बहुमत साबित किया.

तो ये रहे एनडीए के समय नियुक्त किए गए महामहिम राज्पालों के कारनामे. मगर एक राज्यपाल का जिक्र किए बिना यह बात अधूरी रहेगी वो राज्‍यपाल थे उत्तर प्रदेश के राज्यपाल रोमेश भंडारी (Romesh Bhandari) , जिन्‍होंने 1997 में कल्याण सिंह सरकार को बर्खास्त कर इकलौते विधायक जगदंबिका पाल को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलवा दी थी.बाद में दो दिन बाद जगदंबिका पाल को इस्तीफा देना पडा..ये 'भूतो ना भविष्यति' वाला काम था जो बाद में फिर देखने को नहीं मिला. मगर महामहिमों के महा कारनामों की गाथा जारी है..देखते हैं राजस्थान में महामहिम राज्यपाल अशोक गहलोत को विधानसभा बुलाने से रोक पाते हैं? मगर हाल के दिनों में चाहे वो कोश्यारी हों या कलराज मिश्र, अपने निर्णयों से राज्यपालों पर से जनता का भरोसा उठाने का ही काम किया है और राज्यपालों को केंद्र  सरकार का एजेंट और उनके इशारों पर चलने वाले कठपुतली ही साबित किया है.


(मनोरंजन भारती NDTV इंडिया में 'सीनियर एक्ज़ीक्यूटिव एडिटर - पॉलिटिकल न्यूज़' हैं.)

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