कैराना के बहाने क्‍या बदलेगी देश की राजनीतिक तस्‍वीर...

आंकड़े गवाह हैं कि सपा, बसपा, आरएलडी और कांग्रेस मिल कर लड़ें तो बीजेपी को अगले लोकसभा चुनाव में 70 सीटें जीतना मुशिकल हो जाएगा.

कैराना के बहाने क्‍या बदलेगी देश की राजनीतिक तस्‍वीर...

आरएलडी उम्‍मीदवार तब्‍बसुम बेगम के साथ चौधरी अजित सिंह

उत्तर प्रदेश के कैराना में होने वाला उपचुनाव यह तय करेगा कि 2019 के लोकसभा चुनाव की क्‍या दिशा होगी. यह तय हुआ है कि कैराना का उपचुनाव राष्ट्रीय लोक दल लड़ेगा यानी जयंत चौधरी वहां पर अपना उम्मीदवार उतारेंगे. अभी तक सपा और बीएसपी के ही गठबंधन की बात हो रही थी मगर अब इसमें राष्ट्रीय लोकदल भी जुड़ गया है. यानी 2019 के लोकसभा चुनाव की घेराबंदी शुरू हो गई है. जरा कैराना का ही गणित बता देता हूं. यहां करीब 5.50 लाख मुसलमान, 2 लाख दलित, 175000 जाट, 1.30 लाख गुर्जर और बाकी अन्य जातियां हैं. अब यहां पर मुसलमान, दलित और जाट को मिला दिया जाए तो एक ऐसा गठबंधन बनता है जिसे हरा पाना मुमकिन नहीं है.

कुछ ऐसे ही गठबंधन की वजह से बीजेपी को गोरखपुर और फूलपुर की सीट गंवानी पड़ी थी. अखिलेश यादव अब उत्तर प्रदेश की राजनीति को बदलने में जुटे हुए हैं. दशकों पहले मुलायम सिंह ने कांशीराम से हाथ मिलाया था मगर वह प्रयोग सफल नहीं रहा था और उसके बाद दोनों राजनैतिक रूप से प्रतिद्वंद्वी बन कर रह गए जो एक दूसरे को देखना भी पसंद नहीं करते थे. मगर वक्त बदला, हालात बदले, नया नेतृत्व आया और साथ में आई नई सोच. सबसे पहले अखिलेश यादव ने कांग्रेस के साथ हाथ मिला कर विधानसभा का चुनाव लड़ा मगर वो सफल नहीं रहे. उस वक्त अखिलेश को परिवार से भी जूझना पड़ रहा था. मुलायम सिंह यादव और चाचा शिवपाल यादव अखिलेश के इस निर्णय के खिलाफ थे, केवल राम गोपाल यादव ही अखिलेश के साथ खड़े दिखाई दे रहे थे. मगर धीरे-धीरे अखिलेश ने पार्टी पर पकड़ बनानी शुरू की और अपने ढंग से चीजों को व्यवस्थित करने में जुट गए.

गोरखपुर और फूलपुर के बाद अब कैराना में यदि यह प्रयोग सफल रहता है तो आने वाले दिनों में एनडीए की राह आसान नहीं होगी, खासकर तब जब एनडीए 2019 का लोकसभा चुनाव जीतना चाहती है. अब जरा आंकड़े देखते हैं. 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को 42.63 फीसदी वोट मिले थे जबकि सपा को 22.35 फीसदी, बीएसपी को 19.77 फीसदी, कांग्रेस को 6 फीसदी और आऱएलडी को 0.86 फीसदी वोट मिले थे. इन सब को यदि जोड़ दिया जाए तो यह 49.18 फीसदी बनता है जो बीजेपी के 42.63 फीसदी से अधिक है. यदि 2017 के विधानसभा चुनाव के आंकड़ों को देखें तो बीजेपी को लोकसभा की ही तरह 41.57 फीसदी वोट मिले जबकि सपा को 28.32 फीसदी, बीएसपी को 22.23 फीसदी, कांग्रेस को 6 फीसदी और आरएलडी को 2.59 फीसदी वोट मिले थे. यानी 50.67 फीसदी जो बीजेपी के वोटों से अधिक है.

यानी आंकड़े गवाह हैं कि सपा, बसपा, आरएलडी और कांग्रेस मिल कर लड़ें तो बीजेपी को अगले लोकसभा चुनाव में 70 सीटें जीतना मुशिकल हो जाएगा. पूर्वी उत्तर प्रदेश के गोरखपुर औप फूलपुर ने तो यह साबित कर दिया मगर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में यह साबित होना बाकी है और कैराना एक उदाहरण होगा कि जाट, गुर्जर मुसलमान और दलित साथ वोट कर सकते हैं क्योंकि यहां का इतिहास रहा है कि जाट अक्सर दलितों और मुसलमानों को वोट नहीं डालने देते. ऐसा कई बार हो चुका है. मगर बदले हालात में यदि ये इकट्टा हो जाते हैं तो उत्तर प्रदेश की राजनीति की तस्वीर ही बदल जाएगी जो देश की राजनीति को भी बदल सकती है.

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(मनोरंजन भारती एनडीटीवी इंडिया में सीनियर एक्जीक्यूटिव एडिटर - पॉलिटिकल, न्यूज हैं)

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